समकालीन हिंदी कविता के इस शोर-भरे कोलाहल में, जहाँ हर दूसरी आवाज अपनी मौजूदगी का विज्ञापन करने में जुटी है, वहाँ कुछ अनुगूँजें ऐसी हैं जो अपनी खामोशी से ही आपको ठहरने पर मजबूर कर देती हैं। इस खामोशी को पढ़ना दरअसल एक तरह की साधना करना है, क्योंकि यह उन पंक्तियों के बीच का वह निर्जन खाली स्थान है जिसे कवि ने जानबूझकर शब्दों से नहीं भरा। वह जानता है कि जो सत्य उस खालीपन में सुरक्षित है, उसे अगर शब्दों की देह दे दी गई तो उसकी गरिमा कम हो जाएगी। इस काव्य-संसार से गुजरना दरअसल इक्कीसवीं सदी की उस सघन हताशा का सामना करना है जहाँ सफलता और दृश्यता के उन्मादी दौर ने हमें अपने ही भीतर निर्वासित कर दिया है। मैं बात कर रहा हूँ कवि अंचित के हालिया प्रकाशित कविता संग्रह ‘ आधी पंक्ति’ की जहाँ कविता कोई भव्य राजप्रासाद नहीं है, न ऐसी कोई मशाल है जो धधकती हुई आग से भरी हुई है बल्कि एक ऐसे मलबे का ढेर है जिसके नीचे हमारी सभ्यता के सबसे सुंदर और सबसे डरावने सच दबे हुए हैं।
जिसे कवि ‘आधी पंक्ति’ कह रहा है, वह दरअसल हमारे समय का वह अधूरापन है जिसे अब किसी भी तरह के महाकाव्य से भरा नहीं जा सकता। अब वह समय बीत चुका है जब कविताएँ पूर्णता का दावा करती थीं और कुछ हद तक होती भी थीं। अब केवल कुछ टूटे हुए बिम्ब, अधूरी मुलाकातें और वे आधे अधूरे वाक्य ही हमारे हिस्से में हैं जो कभी पूरे नहीं हो सकेंगे। यह वही शब्द हैं जो बोले जाने से पहले ही गले में सूख गए।
इस कविता संग्रह में प्रवेश किसी उत्सव या प्रेमिल रोमांच की तरह नहीं होता, बल्कि एक बेहद निर्मम और ठंडी स्वीकारोक्ति से होता है। कवि यह कठोर सत्य जानता है कि आज का दौर प्रदर्शन का दौर है, और जो दिखावा नहीं कर पाएगा उसका कुछ भी असल नहीं समझा जाएगा, यही जानना ही कवि से यह कहलवाता है “जो रोता नहीं, उसका दुःख कोई नहीं देखता।”
यह पंक्ति उस संवेदनशून्य सभ्यता की ओर इशारा करती है जहाँ संवेदनाएँ केवल विजुअल्स की गुलाम हो गई है।
कवि इक्कीसवीं सदी की मानवीय सीमा को बहुत बारीकी से पहचानता है, जानता है और उसी दौर में जी रहा है जहाँ हम हज़ारों डिजिटल माध्यमों से जुड़े होकर भी एक-दूसरे के लिए अन्य बने रहते हैं। कहता भी है कि “पूरी दुनिया में कोई एक ही होगा जो किसी एक वक़्त पर तुम्हारे बारे में सोचेगा।” यह हाइपर-कनेक्टिविटी के बीच फैले महा-अकेलेपन और इस बनावटी दुनिया के बीच कवि का अपना सुरक्षित एकांत है। जैसे कवि यह जानता है कि “अनुभवों की एक दीन दुनिया अकेला करती है/ बहुत जीना अकेला करता है।”
कवि यहाँ कविताओं को असफलता की एक तह के रूप में देखता है। यह कोई साधारण असफलता नहीं है, बल्कि उस मनुष्य की असफलता है जो अपनी पीड़ा को व्यक्त करने के लिए शब्दों का सहारा लेता है और अंततः पाता है कि शब्द केवल उस पीड़ा की बाहरी त्वचा को छू तक भी नहीं ही सके हैं। कवि कविता को कहीं किसी झण्डे की तरह नहीं लहराता और स्वीकार करता है कि
“असफलता की एक तह के ऊपर एक और तह कविता की यही परिभाषा जानता हूँ।
छिपा रहा हूँ बहुत-सी बातें,
जो सबसे बड़े दर्द हैं उनके लिए रख देता हूँ जिन्दगी के बड़े सच
कुछ तो रहेगा जो कभी नहीं लिखा जाएगा।“
यह जो न लिखा जाना है, यही इस पूरी रचना प्रक्रिया की नैतिक धुरी है। यह उस सच को बचा लेने की एक हठधर्मी जिद है जो बाज़ार की चौखट पर नीलाम होने से इनकार कर देती है। आज के समय में, जहाँ निजता का अर्थ बदल चुका है और हर सूक्ष्म अनुभव को तुरंत शेयर कर देना ही सामाजिक होने की एकमात्र शर्त मान ली गई है, वहाँ कुछ बातों को छिपा लेना, उन्हें एक रहस्य की तरह अपने भीतर सहेज लेना, दरअसल एक तरह का आत्मिक प्रतिरोध है।
कवि का यह प्रतिरोध केवल वर्तमान से ही नहीं है, बल्कि यह उस महान परंपरा से भी एक जटिल संवाद है जिसे हम अपनी विरासत कहते हैं। कवि के यहाँ कालिदास कोई मिथकीय या ऐतिहासिक खंडहर बनकर नहीं आते हैं, बल्कि वे एक ऐसी आधुनिक छाया की तरह उपस्थित होते हैं जो आज के रचनाकार के अंतर्मन में चल रहे युद्ध का हिस्सा है।
‘आषाढ़ का एक दिन’ का वह पुराना और चिर-परिचित द्वंद्व जो सृजन और सत्ता के बीच का द्वंद्व है वो यहाँ एक नई विडंबना के साथ सामने आता है। क्योंकि कवि पहले कह चुका है कि ” स्मृति ही बार बार बदल सकती है कथानक”
कालिदास और मल्लिका के बीच की दूरी, जो सदियों से काव्य का आधार रही है, यहाँ आकर उस भीरुता में तब्दील हो जाती है जिसे आधुनिक रचनाकारों ने ओढ़ रखा है। कालिदास यहाँ इसलिए नहीं हैं कि वे महान कवि थे, बल्कि इसलिए हैं क्योंकि वे अपनी दुर्बलताओं में हमसे मिलते हैं। वे उस राजसत्ता के प्रलोभन और उस प्रेम की विदाई के बीच खींची मेड़ पर खड़े हैं जहाँ से वापसी का कोई रास्ता नहीं है। प्राप्ति की आकांक्षा का समाप्त हो जाना यहाँ कोई आध्यात्मिक उपलब्धि नहीं है, बल्कि वह एक ऐसी गहरी और ठंडी निराशा है जो मनुष्य को भीतर से खोखला कर देती है। कवि कहता है ―
“प्राप्ति की आकांक्षा तो उन्हीं पृष्ठों में समाप्त हो गई थी।
यहाँ किसी लघु भेंट की सी नाटकीयता का आग्रह भी जाता रहा।
कालिदास जितना गिर भी नहीं सका कि राजसत्ता मिलती
न यह भीरु होना गया कि मल्लिका मुझसे पालती कोई उम्मीद।“
इस भीरु होने की प्रक्रिया में जो कुछ छूट जाता है, वह है राग की शुद्धता, चित्त की वास्तविक निर्मलता। कवि जब अपने भीतर झांकता है, तो उसे वहाँ कोई पवित्र अग्नि नहीं मिलती, बल्कि एक बेजोड़ मिलावट मिलती है। यह मिलावट उन तमाम समझौतों की है, उन तमाम नाकामियों की है जो एक औसत जीवन को जीने के लिए अनिवार्य बना दी गई है।
तीस्ता का ठंडा पानी यहाँ केवल पहाड़ी भूगोल का हिस्सा नहीं है, वह उस मानवीय संवेदना का पर्याय है जो धीरे-धीरे जम रही है। वह विछोह जो कभी एक बड़ी त्रासदी हुआ करता था, अब केवल एक मिसरे की तरह है जिसमें सैकड़ों विच्छेद समाए हुए हैं। कवि इस विछोह की टीस में कहता है “वह सिर्फ़ मेरा राग नहीं था इसमें बेजोड़ मिलावट थी। एक मिसरे में थे सैकड़ों विच्छेद एक पहलू में नाकामियाँ तमाम उम्र की।”
यह स्वीकार करना कि हमारी नाकामियाँ ही हमारा असली पहलू हैं, एक तरह की निर्भीक ईमानदारी है। हम सब अपनी सफलताओं का मुखौटा पहनकर एक-दूसरे से मिलते हैं, लेकिन कविता वह जगह है जहाँ वह मुखौटा उतर जाता है और हम अपनी नग्न नाकामियों के साथ अकेले खड़े होते हैं। इस अकेलेपन का समाजशास्त्र और भी क्रूर है।
अनुभवों की इस छोटी होती उम्र और संवेदनाओं के इस क्षरण के बीच, मनुष्य अपनी सार्थकता की तलाश में अक्सर देह की शरण में जाता है। लेकिन वह भूल जाता है कि देह कोई सुरक्षित पनाहगाह नहीं है, बल्कि वह एक ऐसा युद्ध-क्षेत्र है जहाँ हार पहले ही तय हो चुकी है। देह का भूगोल केवल हाड़-मांस का विवरण नहीं है, बल्कि वह उन अनगिनत स्मृतियों का एक जटिल नक्शा है जिन्हें हम अपनी त्वचा पर एक बोझ की तरह ढोते हैं। कवि इन संकटों पर बिल्कुल अलहदा ढंग से चेताता है विशेषकर सोनागाछी जैसे प्रसंगों में, देह का वर्णन हिंदी की पारंपरिक रोमानी प्रेम-कविताओं के मुंह पर एक तमाचा है। यहाँ देह की पवित्रता का कोई मिथक नहीं खड़ा किया गया है, यहाँ उस नग्न यथार्थ को स्वीकार लिया गया है जहाँ प्रेम एक सौदा है और स्पर्श एक यांत्रिक क्रिया।
वेश्यावृत्ति के उस घने अंधेरे गलियारे में, जहाँ सिगरेट का धुआँ और पसीने की गंध एक-दूसरे में घुली हुई है, कवि उस प्रेम की संभावना को टटोलता है जो देह के बाज़ार के पार जा सके। जबकि कवि पहले कह चुका है कि “मर जाते हैं सौ कायर तो एक कवि पैदा होता है” फिर भी कवि हिम्मत दिखाता है अपनी कायरता को कहीं किसी शर्ट की कमीज के उभार में भूल आता है और कहता है वह सब जो न कह पाने से ही अपने को कायर कहता है।
कवि की स्त्री अपने देह और मन के द्वंद्व से अलग हटकर खड़ी होती है वो पूछती है ” वह बार बार पूछती है, तुम सोनागाछी में क्या कर रहे हो ? ” और कवि कुछ नहीं बोल पाता जैसे लगभग पुरुष नहीं बोल पाते, स्त्री फिर पूछती है ” तुम रोज मुझसे प्रेम करते हो, तुम रोज मुझे छूते हो कई-कई बार
तुम चीखते हुए जो ढह जाते हो मेरे भीतर, मेरे लिए तो नहीं ―
तुम किस से करते हो प्रेम जब मेरे साथ सोते हो पाब्लो?“
कवि के यहाँ पाब्लो नेरुदा का संदर्भ केवल एक साहित्यिक उल्लेख के रूप में नहीं आया है बल्कि वह एक गहरी दार्शनिक विडंबना है। कवि उस स्त्री के माध्यम से एक ऐसा प्रश्न पूछता है जो हमारी पूरी सभ्यता की पुरुषवादी ग्रंथि को झकझोर देता है। एक जगह से निकाले जाने का मोह या निकाले जाने से भीतर बैठा कलुष, क्या है वह जो अपने निकाले जाने को सह नहीं पाता और बार बार एक स्त्री पर ढह जाना चाहता है ?
यहाँ ढह जाना केवल एक शारीरिक चरम नहीं है, बल्कि यह उस चरम अकेलेपन का विसर्जन है अपने को भूलने की राह है जहाँ मनुष्य दूसरे के शरीर का उपयोग केवल अपनी ही किसी दमित स्मृति या फैंटेसी को जीने के लिए करता है। संभोग के उस क्षण में, जहाँ दो शरीर एक होने का दावा करते हैं, वे वास्तव में एक-दूसरे से सबसे अधिक दूर होते हैं। स्मृति का यह दैहिक मानचित्र ‘भूतकाल’ में और भी सघन हो जाता है। कवि जान जाता है कि वह क्या है और कहता है “मैं बना हुआ था अपनी इच्छाओं से
और अपना नक़्शा तुम्हारे जाने के बाद
तुम्हारे नाखूनों के निशान में खोजता।“
लेकिन यह जानना क्या अपने को पूरा जान लेना है, आदमी अपने को खोते हुए जानता है और यह खोना कई किस्तों में होता है शहरों के बदलने, प्रेम के छूट जाने और जीवन की उस धार के छूट जाने से जिसे वो अपना मान रहा होता है। ये सब एक ही प्रक्रिया के कई अलग-अलग नाम हैं।
पुरुष का जो चेहरा यहाँ उभरता है, वह अपने नग्न स्वार्थ और अपराधबोध के साथ खड़ा है। कवि कहता है “कितना स्वार्थी है पुरुष का प्रेम
दुनिया से लौटते अपने अकेलेपन की तरफ़ सोच रहा हूँ।
मैं कहाँ जाऊँगा, किस ओर लिये एक स्त्री के प्रति अपने अपराध?”
यह विन्यास दरअसल उस मानवीय बेबसी का दस्तावेज़ है जहाँ हम अपने अपराधों को ढोते हुए एक स्त्री की आराधना करते हैं। कवि स्वीकार करता है कि पुरुष का प्रेम कितना स्वार्थी है और वह किस ओर अपने इन अपराधों को लेकर जाएगा।यह अपराधबोध ही हमें इंसान बनाए रखता है। इसी बोध में हम वो जान पातें हैं जो बस जाना ही जा सकता इसीलिए तो कवि कहता “देह के सिहरते ताप का भागी अब कोई नहीं बचा। जो कोई आएगा, सिर्फ़ तुम्हारी टूट का एहसास तुमको दिलाने। तुम्हें याद आएगा कि इस जीवन में अब तुम नाक़ाबिल घोषित किये गए।”
यह ईमानदारी कवि को एक मशीनी कवि होने से बचाती है। संग्रह में प्रेम का जो गाढ़ापन है, वह देह की सघनता और रूह की तड़प के बीच का एक दुर्गम रास्ता है जिसे ईमानदारी और साफ मन से ही तय किया जा सकता है। कवि के यहाँ प्रेम कोई सुवासित कोमलता नहीं, बल्कि एक लगातार खराब होता शब्द है, जिसे हम बार-बार इस्तेमाल करके और गंदा कर रहे हैं।
कवि उन लोगों को स्पष्ट चेतावनी देता हैं जो कविता में केवल पुरस्कार या प्रशंसा खोज रहे हैं। संग्रह की इधर मत आना जैसी कविता एक मेनिफेस्टो की तरह है जो वर्जित सच को अपनी जड़ता के नीचे दबाकर बैठे कवि का स्वर है। जिसमें कवि कठोर स्वर में कहता है
” अच्छी कविताओं में लिखे जाने की चाह हो तो पुरस्कृत कवियों के पास चली जाओ।
यहाँ तुमको अपमान मिलेगा प्रेम के बदले
विष के प्याले और सबूतों की माँग।
जो वर्जित है वही धरा है यहाँ- मत आना,
भूल जाना।“
आधी पंक्ति उस वर्जित सत्य की कविता है जिसे सहेजना इस दौर में सबसे मुश्किल काम है। कवि ने शब्दों को खर्च करके अकेलापन कमाया है, और यही एक सच्चे कवि की पहचान है। कवि जानता है कि अंततः अकेलापन ही सत्य है और “एक अनन्त जाल है वर्तमान” इसीलिए “वह कुछ भी महसूस करने से डरा हुआ है।” डर इस समय का सच है।
यह संग्रह आत्म-मुग्धता के बजाय आत्म-आलोचना की ओर बढ़ता है। ये कविताएँ हमें उस आश्विन के कृष्णपक्ष की ओर ले जाती हैं जहाँ रौशनी की लालसा तो है, लेकिन पूरी सभ्यता का बोझ भी क्षत-विक्षत कंधों पर है। कवि कालिदास के ‘आषाढ़’ से लेकर ‘सोनागाछी’ की अंधेरी गलियों तक और ‘तीस्ता’ के ठण्डे तटों से देह के गर्म देश तक जो लंबी यात्रा करता है वह दरअसल एक आधुनिक मनुष्य के स्वयं की खोज की यात्रा है। और यही यात्रा ही हमें “उस कवि की तरफ़ वापस ले जाएगी, जो वहाँ कहीं बहुत पीछे छूट गया है।”
इन कविताओं में बिम्बों का चयन केवल दृश्य रचने के लिए नहीं है, बल्कि संवेदना की जड़ों को सहलाने के लिए किया गया है। गौर करें तो नदी का बिम्ब यहाँ ‘प्रवाह’ से अधिक ‘विस्थापन’ का सूचक है। जहाँ कालिदास की नदियाँ विरही यक्ष के संदेश की गवाह थीं, अंचित की नदी “रास्ता बदल लेने” की क्रूरता का प्रतीक है। यह रास्ता बदलना दरअसल उस आधुनिक प्रेम का रूपक है, जहाँ दो लोग एक-दूसरे के भीतर से इस तरह बेदखल हो जाते हैं कि फिर “वापस होगा भी तो वही कैसे होगा” का प्रश्न अनुत्तरित रह जाता है।
इसी तरह, मोम का बिम्ब देह की उस तात्कालिक गर्माहट और ‘स्थायी जड़ता’ को दिखाता है, जो ‘सोनागाछी’ जैसे संदर्भों में प्रेम को वासना से अलग कर एक कारुणिक धरातल पर खड़ा कर देती है।
अंचित अन्य कवियों की तरह देह को केवल एक मांसल उत्सव नहीं मानते; उनके लिए देह “नाखूनों के निशान” और “तिल” के माध्यम से पढ़ा जाने वाला वह नक्शा है, जिसमें एक पूरा खोया हुआ साम्राज्य छिपा हुआ है। उनकी कविता अन्य कवियों से इसलिए अलग है क्योंकि वे मौन को भी एक बिम्ब की तरह बरतते हैं। जहाँ समकालीन कविता शब्दों के अतिरेक से मरी जा रही है, अंचित “छिपा रहा हूँ बहुत-सी बातें” कहकर पाठक को उस खाली जगह में आमंत्रित करते हैं, जहाँ कविता का असली अर्थ निवास करता है। ‘आधी पंक्ति’ दरअसल वह पुल है, जिसे पार करने के लिए पाठक को अपना अकेलापन और अपनी ग्लानि साथ लेकर आना पड़ता है।
कवि ने कविता को चमत्कारी या बौद्धिक बनाने के मोह के बजाय उसे सच्चा और संवेदनशील बनाया है। ‘आधी पंक्ति’ एक ‘पूरी पुकार’ है उस प्रेम के लिए जो अनजाने में छूट गया, उस समय के लिए जो रेत की तरह फिसल गया और उस मनुष्य के लिए जो इस उन्मादी इक्कीसवीं सदी में अपनी नाकाबिलियत और ग्लानि के साथ अकेला खड़ा है। ये कविताएं जामुन के रस सरीखी हैं। जहाँ कसैलेपन पर मीठेपन की महक हावी है और मादकता ग्रहण करने वाले की बौद्धिक क्षमता पर छोड़ दिया गया है।
कविता संग्रह – आधी पंक्ति
कवि – अंचित
प्रकाशक – राधाकृष्ण प्रकाशन
वर्ष – 2026

