आम तौर पर यही माना जाता है कि कोई जिस विधा में पारंगत होता है, उसमें ही अपना हाथ आजमाता रहता है। इसलिए कोई व्यंग्यकार या हास्यबोध से भरा लेखक अक्सर व्यंग्य लेखन ही करता है। लेकिन ना सोच को किसी सीमा में बांधा जा सकता है, ना समझ और सामर्थ्य को। वरिष्ठ पत्रकार और लेखक पीयूष पांडे इसी श्रेणी में आते हैं। उनका नया उपन्यास आया है- उसने बुलाया था। ये एक रोमांच से भरी अपराध कथा है जिसमें हर मोड़ पर एक नए रहस्य से आपकी मुठभेड़ होती रहेगी।
ये उपन्यास आपको अनुभवों के कई मोड़ से भी ले चलता है। लेकिन उससे पहले पीयूष के लिखने की विधा क्या है, उसकी पृष्ठभूमि जान लेना जरूरी है। ये सुर्खियों में आए मशहूर अभिनेता मनोज बाजपेयी की जीवनी लिखकर। उस बायोग्राफी को बहुत सराहना मिली। मुझे पता है कि मनोज वाजपेयी के जीवन से जुड़े अनुभवों, पुरानी यादों को जुटाने के लिए पीयूष को कितने पापड़ बेलने पड़े थे। तब जाकर वो किताब तैयार हुई थी। लेकिन सहजता के साथ पीयूष जो लिखते रहे हैं, वो है व्यंग्य लेखन।
उन्होंने हास्य व्यंग्य पर तीन किताबें लिखी- कबीरा खड़ा डिबेट में, धंधे मातरम और छिछोरेबाजी का रिजोल्यूशन। किताब का नाम भले छिछोरे से जुड़ा हो लेकिन लेखन हास्य के बावजूद मर्यादा की लक्ष्मण रेखा को नहीं लांघता। आप कह सकते हैं कि पीयूष के लेखन में ऐसा हास्य है जो कभी हास्यास्पद नहीं होता। तो व्यंग्य और जीवनी लेखन के बाद पीयूष जी ने उपन्यास लेखन की दुनिया में कदम रखा और कमाल कर दिया।
वैसे तो यही कहा जाता है कि जो कुछ नहीं करता है, वह कमाल करता है। लेकिन पीयूष बहुत कुछ करते हुए भी इस उपन्यास में कमाल कर गए हैं। जैसा कि मुख्य पृष्ठ पर किताब का नाम ही है- ‘उसने बुलाया था…एक सच की फरेबी दास्तां।’ क्या सच भी फरेबी हो सकता है? आप कहेंगे कि नहीं। लेकिन सच जब झूठ, धोखा, मक्कारी के पत्थरों से बार बार टकराता है तो कई बार ऐसा आभास होता है मानो वह धीरे धीरे झूठ बनता जा रहा है।
पीयूष ने अपने उपन्यास में उसी झूठ को बेपरदा किया है। इसी उपन्यास की एक किरदार प्रज्ञा जब अदालत में जज के सामने खड़ी होती है तो एक संदर्भ में वह जज से क्या कहती है, उससे ही जिंदगी के सच-झूठ, प्रेम-घृणा जैसे मनोभावों को समझा जा सकता है। प्रज्ञा जज साहेब से कहती है कि “क्या मारना सिर्फ हाथ से होता है? कभी शब्द भी मार देते हैं। कभी नजरअंदाज कर देना भी किसी को जिंदा दफनाना होता है। बाकी मैं तो सर आईना दिखा रही हूं…।”
पीयूष का ये उपन्यास हमारे समाज को आईना ही दिखा रहा है और बता रहा है कि जो सोने की तरह समाज में चमकते दिखते हैं, हो सकता है कि उनकी नीयत और पीछे की जिंदगी कोयले की तरह काली हो। बहुत ज्यादा बता देने से उपन्यास को पढ़ने की आपकी रोचकता कम हो सकती है।
इसलिए उपन्यास के बारे में ज्यादा लिखने की जरूरत नहीं है। अच्छी कहानी की पहचान ये होती है कि जब आप उसको पढ़ें तो वह वास्तविकता लगे। कहीं पर ऐसा आभास ना हो कि ऐसा भला होता है कहीं, ये तो लेखक की अपनी कल्पना भर है। पीयूष अपने उपन्यास को वास्तविक कहानी बताने के दृष्टिकोण से कामयाब नजर आते हैं। आप भी ‘उसने बुलाया था’ को पढ़ियेगा जरूर।
पुस्तक का नाम- उसने बुलाया था…एक सच की फंरेबी दांस्तां
लेखक- पीयूष पांडे
प्रकाशक- पेंगुइन स्वदेश
वर्ष- 2026

