Friday, March 20, 2026
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पुस्तक समीक्षाः गंगा का समय हो गया 

अखिलेश की ‘के विरुद्ध स्वामीनाथन एक पक्ष’ स्वामीनाथन को समझने का दावा नहीं करती, बल्कि समझने की हमारी क्षमता पर ही सवाल उठाती है। हिन्द-स्वराज की प्रश्नोत्तर शैली से बुनी यह रचना पाठक को कला, भाषा और चेतना के उन किनारों तक ले जाती है जहाँ भ्रम और ब्रह्म का अंतर धुंधला पड़ने लगता है। यह पाठक को कोई सुविधा नहीं देती; वरन् उन्हें बाध्य करती है कि वह बार-बार लौटे, दुबारा पढ़े, और अपनी ही धारणाओं को संशय की कसौटी पर रखे। कला के अनंत अर्थों और भाषा की सीमाओं पर यह पुस्तक वैसा ही दबाव बनाती है, जैसा  की एक कठिन सत्य बनाता है। उद्भट लेखक अम्बर पांडे द्वारा इस किताब की यह समीक्षा भी उसी यात्रा की एक अनंत कहानी है, जहाँ शब्द अपना अर्थ नहीं, अपनी अनंत संभावनाएँ लेकर उपस्थित होते हैं।

अखिलेश की किताब ‘के विरुद्ध स्वामीनाथन एक पक्ष’ हिन्द स्वराज की शैली में लिखी गई है, यानी प्रश्नोत्तर शैली में औपनिषदिक विन्यास जिसे हम कह सकते है। पृष्ठ ८७ पर वे स्वामीनाथन की चित्रों में आये तांत्रिक प्रभाव की बात करते है, जहाँ वे गीता कपूर का स्वामीनाथन के चित्रों पर तांत्रिक प्रभाव के संदर्भ में उद्धरण देते है; ‘स्वामीनाथन की कला पर तांत्रिक प्रभाव अवश्य था मगर अर्थपूर्ण चित्रात्मक ब्रह्मांडिकी का दावा अधिक देर तक टिक नहीं सकता था’। तांत्रिक चित्रों की अपनी स्वतंत्र कॉस्मोलॉजी होती है, स्वामीनाथन के पास वह कॉस्मोलॉजी नहीं थी इसकी खोज करने वह काशी जाते है। संन्यासियों का सानिध्य करते है और किताब अब पूर्णत: औपनिषदिक होने लगती है। 

एक बाबा स्वामीनाथन को कहता है, “जा भाग— अब यहाँ नहीं आना— बच्चा ढोंग करता है।” इस किताब की समीक्षा लिखते हुए मैं भी दो या तीन बार ढोंगी हो गया था। मैंने एक बार यह झूठ कहा कि मैंने समीक्षा लिख दी है और नहीं लिखी थी। यह ढोंग उतना बड़ा नहीं है जितने बड़े ढोंग का शिकार मैं लिखते हुए हुआ। किताब पढ़ते हुए मैं कई स्थानों पर फँस गया जैसे बहुत बरसात के बाद एक गाँव से दूसरे गाँव जाती बैलगाड़ी गहन अरण्य के कीचड़ भरे रस्ते में फँस जाती है और उस बैलगाड़ी में बैठा पण्डित जो दूसरे गाँव सत्यनारायण की कथा करवाने जा रहा है उसे गाड़ी में बैठे बैठे ही यह भ्रम हो जाए कि वह दूसरे गाँव पहुँच गया है उसने कथा करवा दी है, अब पंचामृत चाटकर वह खीर पूड़ियाँ खा रहा है। ऐसा गाँजा पीनेवालों को, भाँग खानेवालों को बहुत होता है और यह स्वामीनाथन भी बनारस में देखते है, जब साधुओं का दल “गंगा का समय हो गया” कहते हुए गाँजा और भांग पीने चले जाते है। फिर ब्रह्म और भ्रम में बहुत दूरी भी नहीं है, हम जब देवनागरी लिखना सीखते है तब भ्रम को अक्सर ब्रह्म और ब्रह्म को भ्रम लिख देते है फिर काटते है और फिर लिखते है क्योंकि हम ठीक उसे ही संप्रेषित करना चाहते है जो हमारे भीतर है इसे स्वामीनाथन “भाषा का नियमित विकास व्यग्रता के विकास और आश्चर्यबोध की मृत्यु का भी इतिहास है” बताते है, उनके अनुसार  “संप्रेषण के रूप में भाषा के ताने बाने को छोड़ते हुए, जिस तरह कि मैली कुचैली क़मीज़ उतारी जाती है, जिससे कि शब्द समागम के रूप में प्रकट हो सके, जिससे कि इन्द्रिय ज्ञान से उद्दीप्त अंतर्ज्ञान मिले और चीख तथा खिलखिलाहट को फिर से अर्थ मिले।” 

इस किताब के बारे में लिखते हुए मुझे भी भ्रम हो गया कि मैं ब्रह्म लिख रहा हूँ, सत्यनारायण की कथा करवाने जाते उस भंगेड़ी पंडित की तरह, यही भ्रम अक्सर स्वामीनाथन के चित्रों के आगे खड़े लोगों को भी हो जाता है। इस किताब की सबसे बड़ी सफलता इसी भ्रम को तोड़ने की है, यह बताने में है कि जिसे आप ब्रह्म पढ़ रहे है है वह भ्रम है और यह जानना ही ब्रह्म को प्राप्त करना है। पढ़ते हुए भी हम इसी पड़कर भ्रम के शिकार होते है जब हमें लगता है कि हम जो पढ़ रहे है वह न केवल वही है जो लेखक संप्रेषित करना चाहता है बल्कि हम उसे समझ भी रहे है। 

दूसरे दिन स्वामीनाथन दूसरे अखाड़े में पहुँच जाते है, किसी दूसरे बाबा के सामने, दूसरे बाबा से वे बात शुरू करना चाहते है नचिकेता से, बाबा कहता है, “पता है पता है, कल तू बता न पाया था, चौथा वर क्या दिया पूछा और तू तीसरे पर चला गया। यह चंचलता ठीक नहीं। मन से नहीं बुद्धि से सोच। इतना अधीर न हो। बता क्या था चौथा वर?” स्वामी विस्मित होते है। “क्या विचार भी यात्रा करते हैं। राजघाट पर बसे इस अखाड़े के महाराज को कल अस्सीघाट पर हुए वार्तालाप के बारे में कैसे पता चला?”  

नोबेल विजेता भौतिकीविद् इरविन श्रोदिंगर (Erwin Schrödinger) की भारतीय दर्शन में अचूक गति थी, एक जगह वे लिखते है, 

“यदि वास्तव में इस संसार का निर्माण हमारे अवलोकन के कार्य से होता है, तो ऐसे अरबों संसार होने चाहिए — हम में से प्रत्येक के लिए एक-एक। फिर तुम्हारा संसार और मेरा संसार एक जैसा कैसे है? यदि मेरे संसार में कुछ घटित होता है, तो क्या वह तुम्हारे संसार में भी घटित होता है? सभी संसार एक साथ कैसे सामंजस्य में चलते हैं?”

स्पष्टतः केवल एक ही संभावना है — हमारी चेतनाओं का अद्वैत । उनकी बहुलता केवल आभासी है; वस्तुतः केवल एक ही चेतना है। यही उपनिषदों का सिद्धांत है।

(If the world is indeed created by our act of observation, there should be billions of such worlds, one for each of us. How come your world and my world are the same? If something happens in my world, does it happen in your world, too? What causes all these worlds to synchronize with each other?”

There is obviously only one alternative, namely the unification of minds or consciousnesses. Their multiplicity is only apparent, in truth there is only one mind. This is the doctrine of the Upanishads.)

कहानियाँ और उपन्यास लिखनेवाले का मन इस दुनिया में क्या रहता है? वे एक भिन्न सत्य, गल्प निर्मित जगत में रहते है जहाँ असत् अर्थात् झूठ ही झूठ होता है और इसलिए उनकी चेतना में वह नहीं घट रहा होता जो दूसरे अन्यों की चेतना में घटता है। इस दृष्टि से देखे तो दुनिया में असत् या झूठ कुछ है ही नहीं। अलग हो सकता है असत् नहीं। सत् जिससे सत्य शब्द बना है उसका अर्थ है “जो है”, झूठ या असत् भी तो है। यह कौन कह सकता है कि संसार में झूठ नहीं है। मृत्यु और आत्मा के विषय में प्रश्न करने पर बाबा स्वामी को खालिद जावेद का उपन्यास ‘मौत की किताब’ पढ़ने को कहते है, २५ अप्रैल १९९४ को स्वामीनाथन की मृत्यु हो जाती है जब ‘मौत की किताब’ २०२५ में प्रकाशित होती है। हालांकि लेखक इसे स्वामीनाथन की जीवनी न कहकर स्वामी के बारे में है और इसलिए ही यह जो है और जो नहीं है उनके बीच अबाध विचरण करती है। 

पृष्ठ ४३ पर स्वामीनाथन पश्चिम के प्रभुत्व को नकारते हुए पश्चिम के आधुनिक कला आंदोलन के विषय में कहते है, “और चूँकि यह आंदोलन ‘मैं-तू’ संबंध से पैदा हुआ है इसलिए शुरू से ही ग़लत रास्ते पर है—”; मैं और तू केवल एक और दूसरे व्यक्ति का फ़र्क़ नहीं है। यह देकार्ते का “मैं और तू” (subject/object) भी है, पश्चिम की दुनिया को संभवतः सबसे बड़ी देन और शायद सबसे बड़ा अभिशाप भी। देकार्ते से पहले मानवता मन और शरीर के द्वैत से ग्रस्त नहीं थी, भारतीय मनीषा के मन-बुद्धि-चित्त अहंकार एक ही इकाई के भाग थे, वहाँ देखनेवाले और दृश्य में विभेद न था। स्वामीनाथन देखनेवाले और दृश्य के अभेद तक पहुँचना चाहते है। पढ़ते हुए आप अनुभव करते है कि अखिलेश के लिए इसे लिखना कितना कठिन रहा होगा। सबसे पहले तो विचार और भाषा के अभेद को प्राप्त करना और फिर उसे ऐसे प्रकट करना कि वह विचार (अथवा वाक्य) पढ़नेवाले से अभिन्न हो जाए। विचार को अनुभव में बदलने की इस प्रक्रिया के कारण ही यह किताब आनेवाले वर्षों में पढ़ी जाती रहेगी। अंग्रेज़ी में जिसे felt reading कहा जाता है, जिसका उचित हिंदी पर्याय मुझे दिमाग़ पर ज़ोर डालने पर भी नहीं सूझ रहा, इस किताब का इस felt reading से इतर कोई पाठ संभव नहीं है जैसे स्वामीनाथन के चित्रों को देखना रूपांतरित करनेवाले अनुभव (transformative experience) हो सकता है, रूप देखकर स्वरूप बदलने की प्रक्रिया हो सकती है, उसी तरह इस किताब को पढ़ा जाना चाहिए स्वामी को समझने के लिए तो निश्चय ही बल्कि उससे बढ़कर भारतीय कला और मनीषा को समझने के लिए।   

स्वामी के हवाले से किताब यह सवाल भी उठाती है कि क्या हम कला को समझ भी सकते है, उसका विश्लेषण कर सकते है? हम केवल यह जान सकते है कि उसमें अनंत सम्भावनाएँ होती है, अनंत मतलब यह कि हम उन्हें कभी पूरी तरह से नहीं जान सकते, हमेशा कुछ शेष रह जाता है, भगवान विष्णु जिस पर लेटते है उस शेषनाग की तरह। अख़बार में छपे वाक्य और कविता में छपे दोनों वाक्य अपनी संरचना और शब्दों में भले हुबहू हो मगर कविता के वाक्य में अनंत संभावनाएं होती है जबकि अखबार के वाक्य का अर्थ मात्र एक होता है। 

किताब के लेखक अखिलेश ने एक बार मुझे ह्वाट्सऐप पर फटकार लगाई थी, “क्या आप अपने लिखे और कहे गए शब्दों पर विश्वास करते है?” अनंत अर्थों की सम्भावनाओं वाले शब्दों पर इतना विश्वास तो किया जा सकता है कि उनमें अर्थ होगा मगर कौन कौन से अर्थ होंगे इस पर विश्वास नहीं किया जा सकता और अनंत संभावनाओं में से एक बार में यदि एक संभव चुनने का अवकाश है तो मैं वह अर्थ चुनूँगा जो वे चुनेंगे इसकी संभावना भी बहुत क्षीण है।

स्वामी के विषय में किताब से पता चलता है कि वे पंडित मल्लिकार्जुन मंसूर से राग बिहारी सुनाने की हमेशा फ़रमाइश करते थे। बिहारी का अर्थ है बिहार अर्थात् घूमने या भटकनेवाला, राग की बंदिश भी कुछ यूँ है, “नींद न आए…”, इसी तरह यह किताब भी स्वामी के संग बहुत जगह भटकती है और यदि पूछूँ कि पहुँचती कहाँ है? वापस वहीं आ जाती है जहाँ से हम चले थे। जैसे लोग घर लौट आते है मगर बदलकर। स्वामी को समझने से अधिक किताब यह समझने के बारे में है कि स्वामी को समझने की अनंत संभावनाएं अनंत प्रकार हो सकते है। 

और फिर किसी को समझने का प्रयास ऐसा भी हो सकता है जैसे वैज्ञानिक वस्तु को समझते है, उसे भिन्न मानकर, कला को ऐसे नहीं समझा जा सकता या यों कहना चाहिए कि जैसे ही किसी को समझने का हम प्रयास करते है उससे हमारा अलगाव हो जाता है (हम उसे alienate कर लेते है) इसलिए अखिलेश किताब की बिलकुल शुरुआत में ही लिखते है कि किताब स्वामीनाथन के बारे में है, समझने का कोई दावा नहीं करते। किताब के विषय और लेखक में सबसे कम दूरी का यह किताब उदाहरण है। दूरी मगर अद्वय नहीं। ऐसा क्यों है? प्रथम पुरुष में इर्विंग स्टोन की तरह भी तो यह किताब लिखी जा सकती थी? हिन्द स्वराजी ढंग फिर क्यों अपनाया? क्योंकि स्वामी गांधी से बहुत प्रभावित थे और यह कि अंग्रेज़ी कहावत direct from horse’s mouth पर लेखक को विश्वास नहीं, उनके अनुसार घोड़े बोल नहीं सकते। यदि बोल सकते तो भी क्या हम उन्हें समझ पाते! इस तरह यह किताब स्वामी से उतनी दूर भी नहीं जाती कि उनका विश्लेषण करने लगे और इतनी पास भी नहीं कि लेखक अखिलेश स्वामी बन जाए, घोड़े के बोलने और घोड़े की एनाटॉमी परखने के बीच इसकी दृष्टि घोड़े की आँख पर केंद्रित है, जहाँ आँसू है मगर अभी तक प्रकट नहीं हुआ है। किसी भी कलाकृति की तरह यह किताब भी कल्पना को संबोधित करती है मनुष्य को नहीं, कल्पना के पंख खोलने की बात पन्ना नम्बर १६९ पर लेखक करता भी है। 

जैसे सृष्टि मनुष्य केंद्रित नहीं, मनुष्य को संबोधित विशेष नहीं करती उसी तरह कलाएँ भी नहीं होती। वे कल्पना के आसपास डोलती है, उसी को संबोधित करती है। स्मृति को स्वामी शब्द और छवि से बना बताते है, बिना छवि के कोई स्मृति नहीं होती, और बिना शब्द के छवि नहीं हो सकती जैसे बिना छवि के शब्द नहीं होता। स्वामी इन्हीं शब्द और छवि से चित्र बनाते है। स्मृति का एक स्वभाव है दोहराना, दोहराया स्मरण रखने के लिए भी जाता है और दोहराने अर्थात् रटने से हम भूल भी जाते है। 

कलाकार भी ख़ुद को दोहराते है, कलाकार दोहराने से डरते भी है, हमेशा नया करने के दबाव में वे रहते है। अखिलेश लिखते है कि जैसे प्रकृति नहीं दोहराती कलाकार भी नहीं दोहराता। ख़ुद को दोहराने से मैं भी बहुत डरता था, लेखक अक्सर डरते भी है। तब मैंने देखा चित्रकार ख़ुद को दोहराने से नहीं डरते, संगीतकार नहीं डरते, बड़े बड़े शेफ नहीं डरते, लेखक क्यों डरते है? वे इसलिए नहीं डरते क्योंकि जानते है दोहराना संभव ही नहीं लेखक इसलिए डरते है क्योंकि उनकी कला इंद्रियगम्य (tactile) नहीं होती, उन्हें यह जानना चाहिए कि कोई शब्द दुबारा नहीं लिखा जा सकता भले वर्तनी वही हो। 

अब तक इस पुस्तक से मैं इतना ही जान सका हूँ मगर इसकी अनंत संभावनाओं को अभी तक मैंने समाप्त नहीं किया है, गल्प की तरह इसे बार बार पढ़ना होगा। यही वजह है कि कई बार इसकी समीक्षा करते करते मैं रह गया, झूठ बोलता गया क्योंकि मुझे पता नहीं था कि केवल तांत्रिक ही मंत्र नहीं दोहराता पाठक को भी दोहराना पड़ता है। मैं अभिमानी था एक बार पढ़कर उस रहस्य को जानना चाहता था जो अनंत बार पढ़कर भी शेष रह जाएगा, इसे आप स्वरूप कह सकते है यदि स्वामीनाथन न कह पाए।

पुस्तक– के विरुद्ध स्वामीनाथन:एक पक्ष
लेखक– अखिलेश
प्रकाशन – सेतु प्रकाशन
प्रकाशन वर्ष- 2024
मूल्य हार्ड बाउंड– ₹650

अंबर पांडे
अंबर पांडे
अंबर पांडे के अब तक तीन कविता संग्रह प्रकाशित हुए हैं- कोलाहल की कविताएँ, गरुड़ और अन्य शोकगीत तथा रुक्मिणी हरण। उनका उपन्यास 'मतलब हिंदू' भारत में हिंदू अस्मिता के गठन की प्रक्रिया को गल्प रूप में खोजती अंबर के उपन्यासों की त्रयी की पहली कड़ी है, जो वाणी प्रकाशन द्वारा प्रकाशित है। श्रीरामकृष्ण परमहंस की पत्नी शारदा के जीवन पर आधारित उनका उपन्यास भी शीघ्र प्रकाश्य है। अंबर कई भारतीय और यूरोपीय भाषाओं जैसे गुजराती, मराठी, हिंदी, उर्दू, फ्रेंच और जर्मन जानते है। भाषा के प्रति उनका प्रेम उनके द्वारा प्रकाशित अनुवाद के अनेक कार्यों में भी प्रकट होता है। इसमें रिल्के, पॉल सेलाँ, इंगबॉर्ग बाख़मन, इव्स बॉनफॉय, उमाकांत जोशी, विंदा करंदीकर और अरुण कोलाटकर की रचनाओं का हिंदी में अनुवाद शामिल है। पुरस्कार/ सम्मान- उनके पहले कविता संग्रह के लिए, उन्होंने प्रतिष्ठित शब्द सम्मान 2019, हेमंत स्मृति कविता सम्मान 2021 और 2022 में कृति सम्मान प्राप्त है।
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