एक दिन, उनके पति ने बाहर जाने से पहले अपने ‘चैतन्य भागवत’ को रसोई में छोड़ दिया। रससुंदरी ने हिम्मत जुटाई, किताब से एक पन्ना अलग किया और रसोई में छिपा दिया। फिर उन्होंने अपने बच्चे के पास से ताड़ के पत्ते को चुरा लिया जिस पर वह लिखने का अभ्यास किया करती थीं।
ये कथा है पहली आत्मकथा ‘अमार जीबोन’ की लेखिका रसासुंदरी देवी की।
1984 में मराठी में एक आत्मकथा प्रकाशित हुई मला उद्ध्वस्त व्हायचंय। लेखिका थी मल्लिका अमर शेख। प्रकाशन के अपने शुरूआती वर्ष में यह पुस्तक बहुत पढ़ी गयी। बाद में अंग्रेजी में प्रकाशित हुई। हिन्दी के पाठकों के लिए पुस्तक अभी भी अनजान थी। हाल में ही इस आत्मकथा का हिन्दी अनुवाद प्रकाशित हुआ है। इस तरह से यह पुस्तक हिन्दी के पाठकों के लिए नयी किताब है।
इस आत्मकथा की शुरूआत में ही मल्लिका लिखती है कि मैं इस पितृसत्तात्मक व्यवस्था से न्याय चाहती हूँ। वह अपनी आत्मकथा लिखने को मजबूर थीं। स्त्री जब तक लज्जा, संकोच और त्याग के सहनशील वस्त्र उतारकर फेंक नहीं देती है, तब तक उसके भोगे हुए की, उसके दुख की उपेक्षा ही होती है। उसके दुखों को कमतर आंका जाता है। जिस समाज को स्त्री की पीड़ा को कम आँकना स्वीकार है, वह समाज उसे स्तुति,सहानुभूति या बरबादी इन तीन तीजों की अतिरिक्त कुछ नहीं दे सकता है।
मल्लिका अमर शेख एक ऐसे माता पिता की संतान थी जिसके बारे में आज भी सोचना आसान नहीं है। मल्लिका के पिता अमर शेख मुस्लिम परिवार से थे और माँ हिन्दू ब्राह्मण परिवार से। मातापिता दोनों ही घोषित तौर पर कम्युनिस्ट कार्यकर्ता थे। दोनों ने अपने बच्चों को नये तरह के मनुष्य में ढ़ाला था। उनके घर पर और जीवन में हर तरह के लोग आते जाते थे। कला-संस्कृति, साहित्य और आन्दोलन सबकुछ एक साथ था। कविता-कहानी, ड्रामा और ट्रेड यूनियन कुछ भी खांचों में बंटा हुआ नहीं था। मल्लिका पूरे जीवन अपना धर्म-मनुष्य होने को लेकर अड़ी रही। उन्होंने सरकारी फार्म में इस कॉलम के न होने पर लड़ाई की। मल्लिका अमर शेख बहुत ही कम उम्र, तकरीबन सत्रह साल की उम्र में दलित पैंथर पार्टी के फायरब्रांड नेता नामदेव ढसाल के संपर्क में आती हैं। दोनों के बीच प्रेम और विवाह होता है। इसके बाद मल्लिका का जीवन बहुत हद तक बदल जाता है। यहाँ उनसे एक ऐसी स्त्री की अपेक्षा होती है जो अन्नपूर्णा बनकर पूरे घर को संभाल लेगी। नामदेव ढसाल खुद बहुत बड़े कवि और नेता रहे हैं। उनकी कविताओं की प्रशंसक और पूरे आंदोलन की समर्थक मल्लिका अपने साथ उनका एकदम अलग व्यवहार पाती है। नामदेव का शराब पीकर मार-पिटाई करना, मल्लिका की उपेक्षा करना, वेश्यागमन और गृहस्थी में हाथ न बंटाना सबकुछ झेलती हैं। लेखिका ने ऐसे कई दृश्यों का वर्णन किया है जब वह पाती है कि नामदेव ने नशा उतरने के बाद अगले दिन उनके गोद में सिर रख रोकर माफी मांगी है लेकिन अगले दिन से फिर वही सबकुछ होता था। यह आत्मकथा इसलिए महत्वपूर्ण है कि यह घरे-बाईरे यानी घर और बाहर की दुनिया पर समान नजर डालती है। किस तरह राज्यसत्ता और धर्मसत्ता को सीधे चुनौती देने वाले नामदेव ढसाल बहुत ही आकर्षक हैं लेकिन वही नामदेव अपने निजी जीवन या घरेलू जीवन में बिलकुल वैसा ही व्यवहार करते हैं जैसा कि कोई भी पिछड़े पितृसत्तात्मक मूल्यों वाला पुरूष करता है। यह द्न्द्व साफ जाहिर है। राज्यसत्ता की हिंसा का प्रतिकार करने वाला, धर्मसत्ता को उखाड़ने की बात करने वाला, खुद को पुरूष होने के चलते मिली सुविधाओं और अधिकार के प्रति बिलकुल भी सोचने को तैयार नहीं है। दूसरी बात और भी जरूरी है कि गैरबराबरी के खिलाफ खड़े आन्दोलनों में शराबखोरी, वेश्यागमन या गैरजिम्मेदारी का जिस तरह से रूमानीकरण किया गया है यह आत्मकथा उस पर भी प्रहार है।
डा. भीमराव आंबेडकर शराब और नशे के खिलाफ थे। उनका मानना था कि शराब समाज को नैतिक, आर्थिक और सांस्कृतिक रूप से कमजोर करती है और दलितों व श्रमिक वर्ग की प्रगति में सबसे बड़ी बाधा है। उन्होंने इसे सामाजिक बुराई मानकर इसके उन्मूलन की वकालत की। लेकिन बाद के दिनों में नशे का रूमानीकरण किया गया। हम इस आत्मकथा को ऐसे भी देख सकते हैं कि कैसे दलित पैंथर पार्टी विशेषतौर पर नामदेव ढ़साल नशा और वेश्यागमन को एक विद्रोह के टूल के रूप में देखते थे। जबकि इस तरह के विद्रोह से व्यवस्था का कुछ आता-जाता नहीं है। उसका भला ही होता है क्यों कि बहुत ज्यादा नशा या वेश्यागमन दोनों ही आत्मघाती हथियार बनते हैं और वह अपनों को ही नुकसान पहुँचाते हैं खासतौर पर पत्नी-परिवार या बच्चों पर ही इसका कहर टूटता है।
मल्लिका बहुत ही निरपेक्ष तरीके से हर बार अपनी आशा-निराशा का उल्लेख करती हैं। वह हर बार टूटती हैं लेकिन सोचती हैं कि नामदेव उनकी बात समझ जायेंगे। यहाँ हम राजनीतिक पुरूष कार्यकर्ताओं की उस प्रवृति को देखते हैं जो नये तरह के पौरूषीय अहं के साथ इंकलाब को बरतते हैं। उनके लिए सामाजिक बदलाव या व्यवस्था परिवर्तन एक मैसकुलीन एक्ट-एक मर्दाना टक्कर है। वो बीवी और बच्चों के खाने की परवाह किये बगैर शराब की दावत दे सकते हैं या किसी भी प्रकार का जोखिम उठा सकते हैं। मल्लिका अमर शेख कहीं भी आन्दोलन के खिलाफ नहीं रहीं। वो पूरे समय प्रयासरत रही कि दलित पैंथर पार्टी बुर्जुआ पार्टियों की गुलाम न बनें, उनसे पैसे न ले। उनकी चिन्ता उसे आगे ले जाने की है। लेकिन पौरूष अहं उन्हें इस चिन्ता के लायक ही नहीं समझता है। उन्हें तो पारम्परिक तौर पर घरे या बाईरे में से चुनना है।
मल्लिका अपने अबार्शन और गर्भ, बाद में अपने बच्चे के जन्म के दौरान मिली उपेक्षा अकेलेपन को बहुत ही विस्तार से बताती हैं। अममून सहसंबंध में स्त्री अपने शारीरिक बनावट के चलते विशिष्ट होती है। जिस संबंध को दो लोगों ने मिलकर बनाया, उसका सुख महसूस किया वही संबंध कई बार औरत को नितांत अकेले छोड़ देता है। अबार्शन और गर्भ या फिर बच्चे के दौरान पार्टनर का उपेक्षित रवैया झेलना औरतों के लिए सामान्य बात है। ज्यादातर पुरूषों को स्त्री की शारीरिक जटिलताओं के बारे में पता ही नहीं या फिर वह समझने की जरूरत ही नहीं समझते हैं। वह उसे औरतों का नखरा समझते हैं क्यों उनके पास ऐसी कई स्त्रियों के उदाहरण होते हैं जिन्होंने न तो अबार्शन की बात अपने पति से बताई और न ही प्रसव के दौरान पति से कोई अपेक्षा रखी। वे हमेशा ‘गिवर’ सेविका की भूमिका में बनी रहीं।
मल्लिका कहीं नहीं छुपाती कि उन्होंने पार्टी के दूसरे कार्यकर्ताओं से अपनी तकलीफ नहीं बतायी। कई बार उनके सामने ही इस तरह के झगड़े हुए। यहाँ साफ दिखता है कि किसी राजनीतिक आन्दोलन का हिस्सा रही स्त्री जबतक देश-दुनिया या समाज पर चर्चा करती है और इसके साथ अपनी घरेलू जिम्मेदारियों को निभाती रहती है तबतक उसकी बात सुनी जाती है जैसे ही वह किसी प्रकार के प्रश्न खड़े करती है या फिर वह घर के भीतर वही हिंसा अपमान और तिरस्कार झेलती है तब वह बिलकुल अकेली पड़ जाती है। अमूमन बड़े नेता या राजनीतिक कार्यकर्ता का कद इतना ऊँचा होता है कि उसके विपरित बोलने वाले लोग कम होते है। वहाँ पर भी मुँहदेखी और भय काम करता है। अपनी पत्नी को पीटना, शराब पीकर उत्पात मचाना जैसे मुद्दे घरेलू मुद्दे हैं। किसी राजनीतिक कार्यकर्ता के घर के भीतर की दुनिया से ज्यादातर लोग संबंध नहीं रखना चाहते हैं। देश-विदेश के मुद्दों पर मुखर होकर बोलने वाले लोग यहाँ चुप्पी साध लेते हैं या फिर अपनी सहूलियत के अनुसार ताकतवर पुरूष के साथ खड़े हो जाते हैं।
मल्लिका अमर शेख कहीं भी जातिवादी या धार्मिक नजरिये से अपने जीवन को नहीं देखती हैं। वह किसी साधारण स्त्री की तरह अपने उस साथी से प्रेम और अपनेपन की कामना करती हैं जो उनके लिए गैरबराबरी के खिलाफ खड़ा हुआ सौन्दर्य से भरा प्रेमी था। लेकिन वह लगातार छीजती जा रही थी। वह पूरे समय महसूस करती हैं कि क्या उनकी भूमिका भोजन और शरीर तक ही सीमित है। वह भी जिसमें दोनों को सहज उपलब्ध माना जाता हो। वह अपनी सास के बारे में लिखती हैं कि कैसे खुद उनके पति भी कभी कभी मारपिटाई करते थे लेकिन वह लगातार उनकी सेवा में लगी रहती थीं। मल्लिका खुद भी कई शारीरिक और यौन बीमारियों की शिकार हुई, उन्हें ये बीमारियां नामदेव से मिली।
इस आत्मकथा से एक और बात दिमाग में आयी। वह है कि ज्यादातर लड़कियों की तरह मल्लिका के भीतर भी नामदेव ढ़साल उनके लिए सपनों के राजकुमार की तरह थे। राजनीतिक आन्दोलनों से जुड़ी लड़कियां कई बार जब ऐसे लोगों को मिलती है जो गैरबराबरी को उखाड़ फेंकने के लिए खड़े हैं तो उनके भीतर एक सहज प्रेम और आकर्षण पैदा होता है। वह उनको समानता के प्रतीक पुरूष के रूप में देखने लगती हैं। यहाँ वह बोध क्षीण हो जाता है कि पुरूषसत्तात्मक समाज में ऐतिहासिक तौर पर पुरूष को कई अधिकार प्राप्त हैं। यह एक कठिन लड़ाई है। समाज की तमाम गैरबराबरी स्त्री उतना ही झेलती है जितना कोई पुरूष लेकिन औरत इसके साथ गैरबराबरी झेल रहे पुरूष के भी वर्चस्व, कुंठा और हिंसा को कई बार झेलती है। पुरूष-वर्चस्व और पितृसत्तात्मक मूल्य किसी वायरस की तरह हर जगह विद्मान रहते हैं, मौका मिलते ही अपनी कॉलोनी का विस्तार करते हैं। इसे पहचानना और लड़ना एक समानान्तर लड़ाई की मांग करता है।
आत्मकथा के अंत में मल्लिका लिखती हैं कि- एक पराजित और असफल मन की है यह यात्रा। कोई भी आत्मकथा उस स्त्री की अकेले की नहीं होती है। वह कई स्त्रियों की होती है। बहुत पहले मुझसे कुछ क्रांतिकारी स्त्रियों की मुलाकात हुई थी। उनमें से एक स्त्री ने गुस्से में कहा था कि साथी! इंकलाब तो हम भी करने आये थे वो इंकलाब करते रहे और हम रोटियां बनाने में लग गये। वह एक व्यथा थी जो व्यक्त हुई थी इसी व्यथा का पूरक है ये आत्मकथा।
मल्लिका अमर शेख की जीवनी को सामाजिक आन्दोलनों में महिलाओं के प्रश्न,उनके जीवन की चुनौतियों और खुद उनके लिए कुछ सबक के रूप में पढ़ना चाहिए। आत्मकथा का मराठी भाषा से बहुत ही प्रवाहमय अनुवाद सुनीता डागा ने किया है। एक सौ अठ्ठासी पन्नों की यह किताब राधाकृष्ण प्रकाशन से प्रकाशित हुई है।
समीक्षित पुस्तक: मैं बरबाद होना चाहती हूँ
लेखिका: मल्लिका अमर शेख
अनुवाद: सुनीता डागा
विधा:कथेतर (आत्मकथा)
प्रकाशक: राधाकृष्ण प्रकाशन
मूल्य-299(पेपरबैक)


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