हिंदी के जाने-माने कवि और लेखक लीलाधर मंडलोई ने बहुत सख़्त जीवन जिया है। हालांकि एक तरह से देखें तो यह बहुत ख़ास बात नहीं है। इस देश की बहुत बड़ी आबादी- शायद पचास फ़ीसदी से अधिक ही- ऐसा ही जीवन जीती है। ख़ास बात यह है कि हम अपने खोल में छुपे इस जीवन को देख नहीं पाते- या देखने से इनकार करते हैं। जबकि यह जीवन बहुत दूर नहीं है, वह हमारे चारों तरफ़ पसरा-छींटा हुआ है, लेकिन उसको देखते रहने के अभ्यास से मोटी हो चुकी हमारी चमड़ी उसकी ज़रा भी चुभन महसूस नहीं करती।
जब तक हमारे सामने ऐसी कोई कृति नहीं आ जाती जो हमारी ही भाषा में हमें उस यथार्थ का मर्म समझाती है जिससे आंख चुराते हुए हम बड़े और खड़े हुए हैं। लीलाधर मंडलोई की ‘जब से आंख खुली हैं’ ऐसी ही कृति है। यह उनकी आत्मकथा है- या कहें कि आत्मकथा का पहला हिस्सा- क्योंकि इसके बाद भी उनके लिखने और बताने के लिए काफी कुछ बचा हुआ है। यह पहला हिस्सा दरअसल लंबे समय तक जीवन पर पसरे उस अंधेरे की कहानी है जिसे बहुत जतन और धीरज से काटते हुए उन्होंने अपने हिस्से का उजाला रचा। अब उस उजाले की कहानी लिखी जानी बाक़ी है। हालांकि सच यह है कि मंडलोई जी ने जिस अंधेरे को दर्ज किया है, उसमें छुपे बहुत सारे उजाले भी वे खोज लाए हैं, और जब वे उजालों की बात करेंगे तो शायद वहां भी छुपा हुआ अंधकार वे खोज लाएंगे।
बहरहाल, अभी इस किताब पर बात करते हैं। ऐसा नहीं कि यह किताब बस लीलाधर मंडलोई के निजी या पारिवारिक संघर्षों पर केंद्रित है। यह किताब एक तरह से उस अभाव, बेदख़ली और विस्थापन के बीच बन-बिखर और फिर ख़ुद को समेट-संवार रहे जीवन का भी आईना है जिससे एक वृहत्तर भारतीय समाज को लगभग रोज़ गुज़रना पड़ता है। इस अभाव से ये लोग कैसे लड़ते हैं? प्रकृति और परिवार के सहारे। घर में मां है और बाहर प्रकृति है। मां पिता के साथ कंधे से कंधा छीलते हुए काम कर रही है। उसके भी हाथ में वैसे ही छाले हैं जैसे पिता के हाथ में हैं। उसकी पीठ पर भी वैसी ही दरकन और टीस है जैसी पिता की पीठ पर है। लेकिन उसे घर का पेट भी भरना है। जो परिवार को मिल रहा है, उसमें आस्वाद भी पैदा करना है। तो जहां लगभग विकल्पहीनता की स्थिति है, वहां मां प्रकृति के सहारे स्वाद के कई विकल्प पैदा कर देती है। मंडलोई जी की पहली स्मृति शायद इसी आस्वाद से बनती है- स्वाद और खुशबू के मेल से। इसमें वह प्रकृति भी सहचर हो जाती है जो तरह-तरह के रंग और गंध से युक्त है। मंडलोई जी की कविता में जो ऐंद्रीयता आई है, वह शायद अनुभव से आई है। वे शायद अपनी रचना के उत्स इस संसार में ही पाते हैं- इसलिए कई अध्यायों में बंटी इस किताब का हर अध्याय कुछ काव्यात्मक पंक्तियों के साथ शुरू होता है- बल्कि कई बार वह कविता बीच में भी दाख़िल हो जाती है। लेकिन उनके भीतर मां-पिता की जो मूल स्मृति है, वह गहरी संघर्षशीलता की ही है- ‘मां का बदन ठोस था। बांहें भरी हुई। हथेलियाँ सख्त। उसके हाथों में कुदाल, तसला, फावड़ा और बोइया (बांस की टहनियों से बनी सख़्त टोकरी) सदा रहे। खदान की मजूरी में यही उनके और पिता के हथियार थे। सामने था जीवन की जंग का बड़ा मैदान। हथेलियाँ इसलिए दोनों की खुरदरी थीं। बाज दफा इतनी अधिक कि गालों पर फेरते तो मैं कसमसा उठता। कई बार बोइया की फाँस हथेली में छूट जाती। और तब धोखे में गाल पर फेरते हुए पड़ जाने पर जैसे मैं बिलबिला जाता। लेकिन हथेलियों की छुअन में ऐसा जादू था कि मैं चुभन को भूल जाता और उनसे अलग न होता।‘
तो इस जीवन में सबसे बड़ी चीज़ संघर्ष की सुंदरता है। यह संघर्ष कातर नहीं करता, तोड़ नहीं पाता, बल्कि जीवन को तरह-तरह से निचोड़ने की युक्तियां निकालने को प्रेरित या मजबूर करता है। फिर हम पाते हैं कि इस संघर्ष के निजी से ज़्यादा सामाजिक आयाम है। ब्राजील के महान शिक्षाशास्त्री पाउलो फ्रेरे की याद आती है जो ग़रीबी शब्द का इस्तेमाल करना पसंद नहीं करते थे। उनको लगता था कि किसी को ग़रीब बताने से कुछ ऐसा लगता है जैसे वह नियति से ग़रीब हो। उनका कहना था कि वह गरीब नहीं, उत्पीड़ित है, उसका उत्पीड़न हुआ है।
सतपुड़ा के जंगलों के बीच किन्हीं गांवों में बसे, किन्हीं खदानों में काम करने को मजबूर ये लोग भी ग़रीब नहीं थे, उत्पीड़ित थे। इस उत्पीड़न के कई स्तर थे। पहला उत्पीड़न आर्थिक था जो ठेकेदार के हाथों हो रहा था। खदानों में जितनी अमानुषिक खटाई थी, उतना ही अमानुषिक भुगतान था। काम नियमित नहीं था। बरसों तक दिहाड़ी पर काम करने वाले इन परिवारों की गाज़ धीरे-धीरे बच्चों पर गिरती थी। भूख बच्चों का पीछा करती थी। बच्चे पढ़ाई का पीछा करते थे। पढ़ाई शिक्षकों का पीछा करती थी। शिक्षक स्कूल की तलाश करते थे। स्कूल खुले थे लेकिन पेड़ के नीचे चलते थे। अब यहां एक सामाजिक उत्पीड़न शुरू होता था। शिक्षकों की एक जाति है, उनका अपना एक वर्ग है। उनको मालूम है कि किन घरों के बच्चों को प्यार से पुचकारना है और किन घरों के बच्चों को दुत्कारना और पीछे बैठाना है। ये उत्पीड़ित बच्चे पढ़ाई की जगह की साफ़-सफ़ाई करते हैं, अगड़ी जातियों और खाते-पीते घरों की दबंगई झेलते हैं और पढ़ाई में अव्वल आने की सज़ा भी सहते हैं। जब ये कुछ बड़े हो जाते हैं तो घर के आर्थिक संकटों को महसूस करते हुए खदानों में काम करने को, बायलर की सफाई के लिए बिल्कुल भट्टियों की तरह तपती जगहों में उतरने को मजबूर होते हैं। बेटियां असमय बड़ी हो जाती हैं जिनका काम मां-पिता की अनुपस्थिति में छोटे बच्चों को संभालना होता है। उनकी पढ़ाई की कोई सोचता तक नहीं।
मर्मस्पर्शी बात यह है कि इस बेहद खुरदरे-खराश भरे जीवन में एक सांस्कृतिक लय फिर भी बची रहती है। पिता कबीरपंथी हैं जो कभी-कभी कबीर को गाते हैं। वे यह भी बताते हैं कि कबीर को गाना सही है, पूजना गलत है। मां के कंठ में कुछ भूले हुए गीत हैं जो तकलीफ़ भुलाने में मदद करते हैं। ये गीत धीरे-धीरे बेटी के कंठ में जमा होते जाते हैं जो अपने गायन के लिए जानी जाती है।
सतपुड़ा के जंगल इन परिवारों के लिए एक बड़ी छांव का काम करते हैं। वे मंडलोई जी के बचपन का बड़ा अनुभव संसार बनाते हैं- तरह-तरह के जीव-जंतुओं को करीब से देखना, उनकी दूर और पास की ध्वनियों को पहचानना, तरह-तरह की चिड़ियों को जानना- यह सब जंगलों में घूमते-भटकते हुए उनकी शख्सियत का हिस्सा होता जाता है। जीवन की रगड़ के बीच महुए की शराब बनते देखना, उसकी गंध को महसूस करना और कभी-कभी उसकी बिक्री में भी शामिल होना इस बचपन के वह संघर्ष है जिसे ये किशोर होते बच्चे अपनी मासूमियत और अपने जीवट से एक तरह की सुंदरता में बदल देते हैं। सतपुड़ा के ये इन्हें तरह-तरह के फल, शाक-सब्ज़ियां भी देते हैं। लेकिन इसके लिए उन्हें पहचानना पड़ता है। यह पहचान इतनी पुख्ता करनी पड़ती है कि कोई स्त्री बरसों पहले देखे हुए एक पेड़ को नए सिरे से पहचान लेती है और अभाव के दिनों में बच्चों से उसके फल तुड़वा स्वाद का एक नया रसायन तैयार कर देती है। एक बच्चा इनके बीच अपनी कविता खोजता-रचता और अपने भीतर बचाता हुआ बड़ा होता है और पूरी आत्मकथा को इन कविताओं से भर देता है।
मंडलोई जी ने यह किताब बहुत मनोयोग से लिखी है। बचपन जैसे उनके भीतर जमा है- इस बात के बावजूद कि उन्हें जीवन में कई विस्थापन झेलने पड़े। वे छिंदवाड़ा के एक गांव में पैदा हुए। परिवार रोजी-रोटी के लिए बाहर निकलने को मजबूर हुआ। दिहाड़ी की मजदूरी के अलावा परिवार ने कई काम किए। बच्चों ने भी हाथ बंटाया। दोस्त राहत की तरह भी आए, शरारत की तरह भी और सहारे की तरह भी। वे एक-एक दोस्त को याद करते हैं, स्कूल के दिनों को याद करते हैं, अच्छा रिज़ल्ट करने के एवज में मारा गया चाकू उन्हें याद है, वे लड़कियां याद हैं जो उनके साथ पढ़ती थीं। वह बहन याद है जिसने मां के कामकाज के लिए बाहर जाने की हालत में उन्हें पाला-पोसा। वह भाई याद है जो बहुत सुंदर था लेकिन लाचार भी था। और यह लाचारी बिल्कुल परिवार की लाचारी हो गई। फिर इस लाचारी को मां ने अपने कंधों पर ले लिया। वह अंत तक सबकुछ निभाती रहीं।
बहुत संभव था, इस स्मृति में बहुत सारी कड़वाहट होती। लेकिन वह कहीं नहीं है। कहीं आत्मश्लाघा भी नहीं है जिसकी गुंजाइश बनाई जा सकती थी। यह बस गुज़रे हुए एक लंबी, संलग्न निगाह डालने वाली स्मृति है- यह संकेत करती हुई कि जो जीवन जिया गया, वह अभावों के बावजूद अपनी मानवीय गरिमा का ख़ुद निर्माण करता रहा। यहां तक कि जिस बड़े भाई ने संकट में बहुत साथ नहीं दिया, अपना घर अलग कर लिया, उसके प्रति भी एक तटस्थ भाव है जिसमें कभी-कभी ममता ही झलकती है। जब घर का एक हिस्सा छोड़ एक बची हुई जगह में घर बनाना पड़ता है तो यह गायों के रहने की जगह होती है। मंडलोई जी लिखते हैं-
‘इस नए घर में जो गाय की सार थी। हमारा साबका जिस गंध से हुआ वह पहले-पहल असहनीय थी। बाद में जैसे आत्मा में बस गई। बग़ैर उस गंध के नींद न आती। रात जब कभी जाड़ा तेज़ होता तो गाय को अंदर ले आते। फिर एक और गंध होती गोबर मूत्र से अलग जो मनुष्य की नहीं किन्तु उससे अधिक आत्मीय। गाय ने जैसे हमारी विपदा को भाँप लिया था। वह रात को सार में गन्दगी न करती। ज़रूरत होती तो गर्दन हिलाना शुरू कर देती और घंटी बज उठती या वह रंभाती। यह आवाज़ सामान्य रंभाने से अलग होती। और वह बाहर ले जाई जाती। तो इस तरह हमारा घर था। बचपन का घर गंध में नहाया, गाय के साथ एक नई रिश्तेदारी में उगता। जानवर और आदमी एक छत के नीचे रह सकते थे। यह हमने उस समय जाना जबकि एक परिवार में मनुष्यों के साथ रहना दूभर था।‘
सिर्फ़ अनुमान लगाया जा सकता है कि इस परिवार ने कितनी दूभर स्थितियों में घर बनाए और बसाए। मूलतः कवि के रूप में ख्यात लीलाधर मंडलोई गद्य में भी- और दूसरी कला-विधाओं में भी- सक्रिय हैं, अमूमन इस बात की ओर कम ध्यान जाता है। उनकी डायरियां पहले भी उनके संघर्षों का आईना रही हैं। अब यह मुकम्मिल आत्मकथा पूरी समग्रता से वह निजी और सार्वजनिक आख्यान रचती है जिसमें एक परिवार की पीड़ा है, आर्थिक शोषण का जाल है, सामाजिक विद्रूप और भेदभाव के कई रूप हैं और वह जीवन है जो इन सबके बावजूद झुकने, हार मानने को तैयार नहीं होता- अपनी बेहद मामूली नज़र आती, लेकिन बहुत गहरे धंसी जीवनी-शक्ति के साथ।
फिर दुहराने की ज़रूरत है कि इस आत्मकथा का दूसरा हिस्सा आना चाहिए। पाठकों को उसका भी इंतज़ार होगा।
जब से आंख खुली हैं: लीलाधर मंडलोई, राजकमल प्रकाशन, 350 रुपये

