नेहरू एक मुल्क़ की मुराद थे। एक स्वप्न थे। एक स्वप्निल मनुष्य थे। मोहम्मद नौशाद संपादित ‘अलविदा नेहरू’ सिर्फ़ नज़्मों और ग़ज़लों का एक संकलन भर नहीं, एक युग की अंतिम साँसों की कंपकंपाहट का अनुभव है। इसमें शायरी किसी रोशनदान से मानो जनवरी की झरती धूप है। इस नौजवान लेखक ने कुछ ख़ास नहीं किया, लेकिन सहजता से इतना ख़ास कर दिया है कि एक एक संग्रहणीय चीज़ बन गई है। मेरे लिए यह बेहद ख़ुशी की बात है कि यह पुस्तक मुझे पंडित जवाहरलाल नेहरू के जन्मदिन पर डाकिया देकर गया और मैंने इसे पढ़ भी लिया। पुस्तक जैसे एक बुझते हुए समय की राख में दबी एक ख़ास तरह की गर्मी की ऊष्मा लेकर आती है।
इस पुस्तक में इकट्ठी की गई उर्दू नज़्में पढ़ते हुए मन अचानक उस सांझ के रंग में उतर जाता है, जहाँ धुएँ और चाँदनी के बीच नेहरू की आकृति धीरे-धीरे धुँधली पड़ रही है। यह शायद लोलिता में कहा है या कि लेडी चैटर्लीज लवर में ध्यान नहीं; लेकिन ‘स्मृति एक रंगीन तितली है। हम उस पर उँगली रखते हैं और वह उड़ जाती है, पर पंखों का रंग उँगली पर रह जाता है।’ यही रंग इन नज़्मों में है। एक मुल्क़ की स्मृति के पंखों का रंग। पंडित नेहरू की आभा का संसार भी वैसा ही था।
हालांकि मैं राजनीति और राष्ट्र के लिए नेहरुवियन मॉडल को पसंद नहीं करता; लेकिन आजकल जिस तरह की राजनीति को देख रहा हूँ, उसने यह सोचने को विवश कर दिया है कि नेहरू एक राजनेता नहीं, शायरों, अदीबों और कलाकारों की सामूहिक आत्मा थे। हालांकि इन दिनों पंडित नेहरू पर घटिया किताबों का अंबार लगा हुआ है; लेकिन ‘अलविदा नेहरू’ कुछ अलग तरह की क़िताब है, जिसे राजकमल प्रकाशन ने प्रकाशित किया है।
इन नज़्मों को पढ़ते हुए बार-बार यह एहसास होता है कि नेहरू सिर्फ़ प्रधानमंत्री नहीं थे। वे उम्मीद, रैशनलिज़्म, तरक़्क़ी और मानवीय गरिमा के उन तमाम उज्ज्वल संकेतों का नाम थे, जिन्हें उर्दू शायरों ने अपनी सामूहिक आत्मा में पनपते देखा था। यह कितनी बड़ी बात है कि पाकिस्तान का एक मशहूर शायर उनके लिए ऐसी नज़्म लिखता है, जो मनुष्य को नेहरू के बारे में सोचते हुए भीतर से हिला देती है।
महमूद फ़ारूक़ी ‘पेश-लफ़्ज़’ में ठीक ही लिखते हैं कि नेहरू तरक़्क़ीपसंद शायरों के लिए एक आधुनिक स्वप्न के स्थापत्यकार थे। एक कश्मीरी ब्राह्मण परिवार के इस सितारे को मुसलमान जिस तरह चाहते हैं, वह बहुत कुछ सोचने को बाध्य करता है। वाक़ई नेहरू एक ऐसा स्वप्न हैं, जहाँ कलम, कला, क़ानून और सियासत एक-दूसरे को रोशन करते हैं, जहाँ विज्ञान गुलाब की तरह खिलता-महकता और मुस्कुराता है और जहाँ इंसान अपनी पूरी मानवीय ऊँचाई पर खड़ा होता है।
इस संकलन में शामिल पाकिस्तानी शायरों की नज़्में पढ़ते हुए, एक तरह का अचरज मन को पकड़ लेता है। भारत से अलग होने के बाद भी सीमाओं और इतिहास के टीसते ज़ख़्मों से गुजरते हुए भी वे नेहरू को मोहब्बत और एहतराम की उसी रोशनी में देखते रहे, जिसे भारतीय शायरों ने महसूस किया था। लेकिन जिस नेहरू ने भारतीय राजनीति में जिन अंधेरे कोनों को अपने विवेक से रोशन किया था, समय प्रवाह में हम देख रहे हैं कि उन कोनों में फिर से अंधेरा उलीचा जा रहा है। उन्होंने जिन कंटीलें पथराए इलाकों में नई राहें उलीकीं, वहाँ अब जाने कहाँ कहाँ से लाकर पत्थर पटके जा रहे हैं।
लेकिन ‘अलविदा नेहरू’ को पढ़ने से मन की सूनी घाटी में एक सुकून तैरने लगता है। लाहौर, कराची और रावलपिंडी के कवि भी मानो यह कह रहे हों कि नेहरू सिर्फ़ एक मुल्क की चेतना के नायक नहीं थे; वे पूरे उपमहाद्वीप की आधुनिक रुपहली सजगता के पहले वास्तुकार थे। यह वह दुर्लभ क्षण है जब राजनीति की कठोर सीमाएँ टूट जाती हैं और कविता मनुष्य की पहचान को बिना पासपोर्ट के स्वीकार करती है। इसलिए मोहम्मद नौशाद को ख़ूब बधाई दी जा सकती है।
मुझे यह कभी अच्छा नहीं लगा कि दिनकर ने ‘लोकदेवता नेहरू’ जैसी पुस्तक उनके जीते जी लिखी। लेकिन मुझे संजीदा लोग समझाते रहे हैं कि हिन्दी के महाकवि रामधारी सिंह ‘दिनकर’ ने नेहरू को लोकदेवता कहकर संबोधित किया, यह सिर्फ़ सम्मान नहीं था; यह नेहरू की उस सांस्कृतिक प्रतिध्वनि का स्वीकार था, जिसने भारतीय समाज के अनगिनत धरातलों को छुआ। दिनकर ने उनके व्यक्तित्व में वह उजास देखा था, जो पुराणों के ऋषियों की बुद्धि और आधुनिक मनुष्य की वैज्ञानिक दृष्टि को एक डोर में बाँध दे। लेकिन आज जब ‘अलविदा नेहरू’ को पढ़ा तो लगा कि दिनकर के शब्दों की दीप्ति इस संकलन में छिपी उर्दू नज़्मों की शोक-ध्वनि से मिलकर एक ऐसा समवेत संगीत रचती है, जिसमें नेहरू का व्यक्तित्व एक मानवीय किंवदंती की तरह उभरता है—त्रुटियों, सफलताओं, सपनों और अधूरे वादों से भरा हुआ, पर फिर भी आशा का प्रज्वलित केंद्र।
आप देखिए कि हमारे पास इस समय राजनीति में कोई और दीप्त चेहरा नहीं है। नेहरू ही हैं अगर कुछ है तो। नेहरू एक अंतरराष्ट्रीय प्रतिध्वनि हैं। नेहरू के निधन के बाद दुनिया भर के समाचार पत्रों, पत्रिकाओं और साहित्यिक मंडलियों में जो शोक के रूप में लिखा गया, वह भारत की राजनीतिक ऊँचाई का प्रमाण नहीं, नेहरू की वैश्विक मानवीयता की पहचान थी। जैसे कि लंदन में मैन्चेस्टर गार्डियन ने लिखा, हिज़ डेथ इज़ नॉट अ पॉलिटिकल इवेंट, बट ऐन इमोशनल वन फॉर मिलियन्स। फ्रांस के बुद्धिजीवियों ने उन्हें ‘पॉएट ऑव पॉलिटिक्स’ कहा। सोवियत रूस ने उन्हें ‘मानववादी युग का अग्रदूत’ बताया। अमेरिकी पत्रिकाओं में उन्हें ‘दॅ लास्ट जिएंट ऑव आइडियलिज़्म’ कहा गया।
‘अलविदा नेहरू’ हमें यह दिखाती है कि नेहरू की अनुपस्थिति सिर्फ़ भारत का रिक्त स्थान नहीं थी; वह पूरी विश्व-चेतना में एक दरार की तरह दर्ज हुई। इस संग्रह की नज़्में एक शोक, एक स्मृति, एक विघटित हो रहे स्वप्न की याद दिलाती हैं। पुस्तक पढ़ते हुए तीन स्तर बार-बार सामने आते हैं। एक व्यक्ति, एक जननायक और एक नेहरूवियन स्वप्न का खंडित होना।
नेहरू यहाँ किसी मूर्ति की तरह नहीं, ऐसी चिंतनशील आँखों वाले मनुष्य की तरह याद किए गए हैं, जिनकी मुस्कान में भविष्य का वादा था। उनका राजनीतिक अवदान सिर्फ़ संसद में नहीं, कविता की नसों में धड़कता है। एक विचारशील, शान्तिप्रिय, आधुनिक राष्ट्र का स्थापत्य। कई नज़्मों में यह टीस उभरती है कि उनके साथ ही एक पूरा युग धूमिल हो गया। वह युग जो यूटोपिया नहीं था, पर यूटोपिया की कल्पना से पैदा हुआ था।
‘अलविदा नेहरू’ को पढ़ना ऐसा है जैसे किसी पुराने बक्से में रखी चिट्ठियों को खोलना, जो पीली पड़ चुकी हैं, पर जिनसे अभी भी हल्की-सी पुराने काग़ज़ों की गंध आती है। यह क़िताब याद दिलाती है कि इतिहास में नेहरू सिर्फ़ नीतियों और बहसों से नहीं पहचाने जाते; वे भावनाओं, कल्पनाओं और सपनों के भी संरक्षक थे। उनकी मृत्यु पर जब उर्दू शायरों के शब्द बह रहे थे, दुनिया के कई हिस्सों में भी यही स्वर उठ रहा था कि एक ऐसा व्यक्ति चला गया जो राजनीति को कविता की तरह जीता था और कविता को भविष्य की तरह पढ़ता था।
अलविदा नेहरू’ इसलिए सिर्फ़ एक संकलन नहीं, यह उस युग का अन्तिम प्रकाशित दीप है, जो यह समझने के लिए आवश्यक है कि भारत की शुरुआती लोकतांत्रिक सुबह किस रोशनी में जन्मी थी। शक़ील बदायूनी, अज़ीज़ वारसी, जगन्नाथ आज़ाद, राही मासूम रज़ा, ग़़ुलाम रब्बानी ताबां एजाज़ सिद्दिक़ी, साहिर लुधियानवी, साग़र निज़ामी मख़दूम मोहिउद्दीन, नरेशकुमार शाद, क़ैफ़ी आज़मी, अर्श मलसियानी, नज़ीर बनारसी, जोश मलीहाबादी जैसे शायरों की ग़ज़लें और नज़्में नेहरू को इस तरह याद करती हैं कि मानो हमारे भीतर बहुत धीरे-धीरे मेघ गर्जना हो रही है और कुछ कराह रहा है।
जौहर अमेठवी की पंक्तियाँ देखिए:
तेरा किरदार ज़ियाबार नगीने की तरह, तूने सिखलाया है जीना हमें जीने की तरह।
तेरे अफ़कार से बेदार हुए अहल-ए-वतन, तेरे अख़लाक़ ने सैराब किया है ग़ुलशन।
तूने राशन किए दुनिया में वफ़ा के पहलू, तूने सुलझा दिए माहौल के उलझे गेसू।
तू रहा दहर में सूरज की तरह ताबिंदा, तेरा किरदार है तारीख़ ए जहाँ में ज़िन्दा
समीक्षित कृति : अलविदा नेहरू (शायरी | संचयन)
सम्पादक : मोहम्मद नौशाद
प्रकाशक : राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली
मूल्य : 350 रुपये

