Friday, March 20, 2026
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BMC चुनाव: ‘हॉर्स ट्रेडिंग’ के डर से शिंदे गुट के नवनिर्वाचित पार्षद बांद्रा के होटल में शिफ्ट

227 सदस्यीय बीएमसी में बहुमत का आंकड़ा 114 है। भाजपा ने 89 सीटें जीती हैं, जबकि एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना को 29 सीटें मिली हैं। इस तरह सत्तारूढ़ गठबंधन का कुल आंकड़ा 118 तक पहुंचता है यानी बहुमत से महज चार सीट ज्यादा है।

मुंबई महानगरपालिका (बीएमसी) चुनाव में भाजपा की स्पष्ट बढ़त के बावजूद मुंबई की राजनीति में हलचल बढ़ी हुई है।भाजपा भले ही सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी हो, लेकिन वह बहुमत के आंकड़े से दूर रह गई है, जिससे जोड़-तोड़ और संभावित टूट-फूट की आशंकाएं तेज हो गई हैं।

हिंदुस्तान टाइम्स की एक रिपोर्ट की मानें तो इसी आशंका को देखते हुए महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे ने अपने नवनिर्वाचित पार्षदों को बांद्रा के एक होटल में शिफ्ट कर दिया है, ताकि किसी भी तरह की राजनीतिक खींचतान से बचा जा सके।

राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि भाजपा ने बीएमसी चुनाव में कम से कम 110 सीटें जीतने का लक्ष्य रखा था, ताकि वह बहुमत के करीब पहुंच सके, लेकिन पार्टी इस लक्ष्य से काफी पीछे रह गई।

मुंबई में सियासी गणित क्या कहता है?

227 सदस्यीय बीएमसी में बहुमत का आंकड़ा 114 है। भाजपा ने 89 सीटें जीती हैं, जबकि एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना को 29 सीटें मिली हैं। इस तरह सत्तारूढ़ गठबंधन का कुल आंकड़ा 118 तक पहुंचता है, जो बहुमत से महज चार सीट ज्यादा है। इतना नाजुक अंतर किसी भी छोटे फेरबदल से समीकरण बिगाड़ सकता है।

वहीं विपक्षी खेमे में, शिवसेना (यूबीटी) प्रमुख उद्धव ठाकरे ने नगर निगम पर नियंत्रण खोने के बावजूद चुनौतीपूर्ण तेवर दिखाए। उन्होंने कहा कि मुंबई में शिवसेना (यूबीटी) का मेयर देखना उनका अब भी सपना है और अगर भगवान ने चाहा तो यह सपना पूरा हो सकता है। नतीजों के अगले दिन शनिवार को उन्होंने एक बयान में यह भी कहा कि उनकी पार्टी अभी भी मुंबई का मेयर बना सकती है, हालांकि उन्होंने इसका तरीका साफ नहीं किया। वहीं, भाजपा को मेयर बनाने के लिए 25 पार्षदों की जरूरत होगी।

‘अगर शिवसेना एकजुट होती…’

शिवसेना (यूबीटी) के नेता सुनील प्रभु का कहना है कि भाजपा की सफलता केवल शिवसेना के विभाजन की वजह से संभव हो पाई। पूर्व कांग्रेस नेता संजय झा ने भी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर यही बात दोहराई। उन्होंने लिखा, “अगर शिवसेना एकजुट होती तो भाजपा के पास बीएमसी चुनाव जीतने का कोई मौका नहीं था।”

उनका तर्क है कि अगर दोनों गुट वास्तव में शिवसेना की खोई हुई शान लौटाना चाहते हैं, तो आपसी समझौता भाजपा को विपक्ष में बैठने पर मजबूर कर सकता है।

आंकड़े भी इसी ओर इशारा करते हैं। भाजपा को जहां 89 सीटें मिलीं, वहीं उद्धव ठाकरे की शिवसेना को 65 और शिंदे गुट को 29 सीटें हासिल हुईं। दोनों शिवसेना गुट मिलकर 94 सीटों पर पहुंच जाते, जो भाजपा से अधिक है। अगर इसमें कांग्रेस का साथ जुड़ता, तो बहुमत का आंकड़ा आसानी से पार हो सकता था।

नतीजों से भाजपा भी संतुष्ट नहीं

सीट बंटवारे की बातचीत से पहले भाजपा ने 155 से ज्यादा सीटों पर चुनाव लड़ने और 120–125 सीटें जीतने की योजना बनाई थी। हालांकि, पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व के हस्तक्षेप के बाद एकनाथ शिंदे ने कड़ी बातचीत करते हुए अपनी पार्टी के लिए 91 सीटें सुनिश्चित कर लीं, जिससे भाजपा को 137 सीटों पर ही संतोष करना पड़ा।

सीटों की संख्या घटने के बाद भाजपा ने अपना लक्ष्य संशोधित कर 110 सीटें कर लिया, लेकिन पार्टी 89 सीटों पर ही सिमट गई। उधर, दोनों डिप्टी सीएम अपनी पार्टियों की सीटें कम आने से भाजपा से नाराज हैं।

एक भाजपा नेता ने नाम न छापने की शर्त पर हिंदुस्तान टाइम्स को बताया कि चुनाव से पहले पार्टी ने दूसरी पार्टियों के 11 मौजूदा पार्षदों को शामिल किया था। इस तरह हमारे पास अपने 82 समेत कुल 93 मौजूदा पार्षद थे, लेकिन हम उस संख्या को भी बरकरार नहीं रख सके।

अनिल शर्मा
अनिल शर्माhttp://bolebharat.in
दिल्ली विश्वविद्यालय से पत्रकारिता में उच्च शिक्षा। 2015 में 'लाइव इंडिया' से इस पेशे में कदम रखा। इसके बाद जनसत्ता और लोकमत जैसे मीडिया संस्थानों में काम करने का अवसर मिला। अब 'बोले भारत' के साथ सफर जारी है...
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