अमेरिका, इजराइल-ईरान युद्ध ने ना सिर्फ पश्चिम एशिया में तनाव को जन्म दिया है बल्कि भारतीय शेयर बाजार में उथल-पुथल मचा दिया है। कच्चे तेल के झटके और विदेशी निवेशकों की रिकॉर्ड निकासी के बीच भारतीय शेयर बाजार के लिए वित्त वर्ष 2026 का अंत बेहद निराशाजनक रहा।
सोमवार को सेंसेक्स दो साल से ज्यादा के निचले स्तर पर बंद हुआ, जबकि निफ्टी करीब एक साल के निचले स्तर तक फिसल गया। मार्च महीने में बाजार ने मार्च 2020 के बाद की सबसे बड़ी मासिक गिरावट दर्ज की। इस तेज गिरावट के चलते कुछ ही घंटों में निवेशकों को करीब 6 लाख करोड़ रुपए का नुकसान हुआ।
शेयर बाजारः 16 सेक्टर लाल निशान में बंद हुए
सोमवार को निफ्टी 50 करीब 2.14% गिरकर 22,331 के आसपास बंद हुआ, जबकि सेंसेक्स 2.22% टूटकर 71,947 पर आ गया। मार्च में दोनों प्रमुख सूचकांक 11% से ज्यादा गिर चुके हैं। वित्त वर्ष 2026 में भी निफ्टी और सेंसेक्स क्रमशः करीब 5% और 7% नीचे रहे, जो महामारी के बाद का सबसे खराब प्रदर्शन है।
गिरावट का इसर इतना ज्यादा रहा कि मार्च में सभी 16 सेक्टर लाल निशान में बंद हुए। मिडकैप और स्मॉलकैप शेयरों की बात करें तो इनमें 10% से ज्यादा की गिरावट देखी गई। इसी तरह बैंकिंग और वित्तीय शेयरों में 15% से अधिक की गिरावट आई, जिसमें एचडीएफसी बैंक में गिरावट और विदेशी निवेशकों की बिकवाली बड़ा कारण रही। ऑटो और कंज्यूमर ड्यूरेबल्स सेक्टर भी 12-15% तक लुढ़क गए।
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बाजार में इतनी बड़ी गिरावट के क्या कारण रहें?
भारतीय शेयर बाजार में इतनी बड़ी गिरावट के कारणों की तरफ जाएं तो पहला और साफ कारण पश्चिम एशिया में बढ़ता तनाव है। फरवरी के अंत में शुरू हुए इस युद्ध ने न केवल मानवीय संकट पैदा किया है, बल्कि वैश्विक सप्लाई चेन को भी पूरी तरह अस्त-व्यस्त कर दिया है। इसके चलते अंतरराष्ट्रीय बाजार में ब्रेंट क्रूड की कीमतों में अकेले मार्च महीने में लगभग 60% का उछाल दर्ज किया गया है, जो अब तक की सबसे बड़ी मासिक बढ़त है।
कच्चे तेल की कीमतें 120 डॉलर प्रति बैरल तक पहुँचने से दुनिया के तीसरे सबसे बड़े तेल आयातक भारत के आर्थिक संतुलन पर भारी दबाव बढ़ गया है। चूंकि भारत अपनी तेल की जरूरतों का लगभग 85-90 प्रतिशत हिस्सा आयात से पूरा करता है, इसलिए महंगे तेल ने देश की अर्थव्यवस्था और राजकोषीय गणित को बिगाड़ दिया है।
इसके अतिरिक्त, होर्मुज स्ट्रेट जैसे सामरिक रूप से महत्वपूर्ण समुद्री रास्तों पर युद्ध के असर से आपूर्ति बाधित होने की आशंका गहरा गई है, जिसने निवेशकों के बीच डर का माहौल पैदा कर दिया है और बाजार में भारी बिकवाली को जन्म दिया है।
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बाजार में बढ़ती अस्थिरता भी एक बड़ी वजह बनी है। वोलैटिलिटी इंडेक्स इंडिया वीआईएक्स 5% से ज्यादा बढ़कर 28.1 के पार पहुंच गया, जो निवेशकों के बीच बढ़ते डर और अनिश्चितता को दर्शाता है। आमतौर पर 12-15 का स्तर सामान्य माना जाता है, लेकिन इसके ऊपर जाने पर बाजार में तेज उतार-चढ़ाव की आशंका बढ़ जाती है।
अन्य कारणों में विदेशी निवेशकों की लगातार बिकवाली और एफएंडओ कॉन्ट्रैक्ट की एक्सपायरी है। विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPI) ने मार्च में 27 तारीख तक भारतीय बाजार से करीब 1.23 लाख करोड़ रुपये निकाल लिए हैं, जिससे बाजार पर भारी दबाव बना हुआ है। वहीं, 30 मार्च को मार्च सीरीज के कॉन्ट्रैक्ट खत्म हो रहे हैं, जिससे ट्रेडिंग गतिविधियां तेज हो जाती हैं और बाजार में उतार-चढ़ाव और बढ़ जाता है।
रुपया पहली बार 95 के पार
इस बीच भारतीय रुपया लगातार तीसरे दिन गिरकर रिकॉर्ड निचले स्तर पर पहुंच गया। पश्चिम एशिया में तनाव के कारण डॉलर के मुकाबले रुपए में लगातार कमजोरी देखी जा रही है और अकेले मार्च में अमेरिकी मुद्रा के मुकाबले भारतीय मुद्रा ने 4.4 प्रतिशत की गिरावट देखी गई।
डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपए ने सोमवार को पहली बार 95 के स्तर को पार 95.2 का नया लो बनाया है। हालांकि, दिन के दौरान डॉलर के मुकाबले रुपया 94.83 के स्तर पर बंद हुआ, जो कि शुक्रवार के बंद 94.81 से 0.3 प्रतिशत की गिरावट को दर्शाता है।
आरबीआई द्वारा बैंकों के लिए ओवरनाइट नेट ओपन पॉजिशन लिमिट को घटाकर 100 मिलियन डॉलर करने के बाद, रुपया मजबूती के साथ खुला था, लेकिन सत्र के दौरान इसने अपनी बढ़त खो दी और शुरुआती स्तर से 160 पैसे गिर गया।
वित्त वर्ष 2026 में विदेशी निवेशकों ने भारतीय बाजार से रिकॉर्ड 19.3 अरब डॉलर की निकासी की, जिससे बाजार पर और दबाव बढ़ा। ऊंची अमेरिकी बॉन्ड यील्ड, महंगा कच्चा तेल और अन्य बाजारों में बेहतर वैल्यूएशन के कारण विदेशी निवेशकों की वापसी फिलहाल मुश्किल नजर आ रही है।
आईटी और अन्य सेक्टरों पर भी दबाव
बता दें कि आईटी सेक्टर, जो बाजार का दूसरा सबसे बड़ा सेक्टर है, पूरे वित्त वर्ष में करीब 21% गिरा। इसकी वजह एआई के बढ़ते प्रभाव, अमेरिकी ग्राहकों की कमजोर मांग और विदेशी निवेशकों की बिकवाली रही।
विशेषज्ञों का मानना है कि अगर ईरान युद्ध लंबा खिंचता है, तो भारत की अर्थव्यवस्था के लिए यह गंभीर जोखिम बन सकता है, खासकर कच्चे तेल पर निर्भरता के कारण।
सरकार की ओर से आयकर में राहत, जीएसटी दरों में कटौती और रेपो रेट में कमी जैसे कदमों से साल के अधिकांश समय बाजार को सहारा मिला था, लेकिन वित्त वर्ष के आखिरी महीने में युद्ध के असर ने इन सभी सकारात्मक पहलुओं को पीछे छोड़ दिया।

