Monday, April 6, 2026
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राज की बातः बिहार में फर्जी प्रमाण पत्र पर 40 हजार शिक्षकों की नियुक्ति, ब्रिटिश दौर में भी होता था ऐसा!

बिहार के भोजपुर जिले के रहने वाले और पटना साइंस कॉलेज के स्नातक रहे अरुण कुमार उपाध्याय का दावा है कि अंग्रेजों के जमाने में भी यह सब होता था। अरुण कुमार उपाध्याय 1976 बैच के आईपीएस अधिकारी रहे और ओडिशा में आरक्षी महानिदेशक पद से सेवानिवृत्त हुए हैं।

बिहार में लाखों लोगों की नौकरी शिक्षकों के पद पर पिछले वर्षों में हुई थी। अब बिहार सरकार की विजिलेंस पुलिस ने पाया है कि 40,000 लोगों की नियुक्ति फर्जी प्रमाण पत्र पर हुई है। इनके खिलाफ फर्स्ट इंफॉर्मेशन रिपोर्ट दर्ज कर मुकदमा शुरू किया गया है। इन्हें दी गई वेतन राशि की रिकवरी की जाएगी। लेकिन बिहार में फर्जी प्रमाण पत्र के सहारे सरकारी नौकरी लेना तो ब्रिटिश काल में भी होता था।

बिहार के भोजपुर जिले के रहने वाले और पटना साइंस कॉलेज के स्नातक रहे अरुण कुमार उपाध्याय का दावा है कि अंग्रेजों के जमाने में भी यह सब होता था। अरुण कुमार उपाध्याय 1976 बैच के आईपीएस अधिकारी रहे और ओडिशा में आरक्षी महानिदेशक पद से सेवानिवृत्त हुए हैं।

उपाध्याय ने बताया, “फर्जी प्रमाण पत्र के दो मुख्य उदाहरण मैंने देखे थे। मेरे चाचा विद्याधर उपाध्याय ने स्वतंत्रता पूर्व मैट्रिक, आईए और बीए सभी की जाली डिग्री ली थी तथा बेसिक हाई स्कूल अगियांव (भोजपुर जिला) के प्रधानाध्यापक भी बन गए थे। उन्होंने कभी कक्षा में पढ़ाया नहीं। वे शिक्षा विभाग के अधिकारियों के यहां फल-सब्जी पहुंचाते थे, जिनमें अधिकांश अपने गांव के खेत-बगीचों से सूर्योदय से पहले चोरी कर लाते थे।”

अरुण कुमार उपाध्याय ने बताया, “चाचा अपना नाम ‘विद्याधर’ जीवन भर ठीक से नहीं लिख सके। वे इसे अलग-अलग तरह से लिखते थे- बिदाधर, बिद्दाधर, बिदेधर, बीदाधर आदि।”

अरुण कुमार उपाध्याय स्वयं भी फर्जी प्रमाण पत्र के मामले से प्रभावित रहे हैं। उनके अनुसार, जब वे साइंस कॉलेज के छात्र थे, तब पटना विश्वविद्यालय के कुलपति महेंद्र प्रताप तथा उनके सहयोगी बागेश्वरी नाथ सहाय पेपर लीक करने का धंधा चला रहे थे। जब उन्होंने इसका विरोध किया, तो वे मौन व्रत पर बैठ गए। इसके बाद उन्हें पत्रकारों के सवालों का जवाब देना पड़ा। महेंद्र प्रताप के अनुसार, उसी रात बीबीसी और पेकिंग रेडियो के हिंदी समाचार में उनका बयान प्रसारित हुआ था।

अरुण कुमार उपाध्याय ने आरोप लगाया, “इन लोगों ने चार वर्ष तक राष्ट्रीय छात्रवृत्ति मिलने के बावजूद मेरा मैट्रिक परीक्षा परिणाम रद्द करवा दिया। हालांकि, प्रोविजनल प्रमाण पत्र के आधार पर प्री-विज्ञान, बीएससी-1 और बीएससी-2 में उसी विश्वविद्यालय में मेरा प्रवेश हो चुका था। इस मामले के व्यापक प्रचार के बाद, एक पोस्टकार्ड पर अनुरोध करने पर केवल +2 मार्कशीट के आधार पर 1973 में मुझे भारतीय वन सेवा परीक्षा में बैठने की अनुमति दी गई, जिसमें मैं लिखित परीक्षा में प्रथम आया।”

अरुण कुमार उपाध्याय दो साल तक पंजाब कैडर में आईएफएस अधिकारी रहे, इसके बाद आईपीएस बनकर ओडिशा चले गए।

उन्होंने बताया, “बीएससी में फेल होने के कारण हर इंटरव्यू में मुझे सबसे कम अंक मिलते थे, क्योंकि मेरे रिजल्ट को जाली माना जाता था। जबकि नियुक्ति के लिए मैट्रिक प्रमाण पत्र जरूरी था। बिहार माध्यमिक विद्यालय परीक्षा समिति के क्लर्कों ने मेरा काम कर दिया था, लेकिन उसके चेयरमैन, एक वरिष्ठ आईएएस अधिकारी, बिना 50 रुपये घूस लिए काम करने को तैयार नहीं थे। उनके क्लर्कों ने बताया कि 40,000 जाली प्रमाण पत्रों के लिए उनका 50 रुपये का तय रेट था, जबकि मेरा प्रमाण पत्र असली था।”

उन्होंने आगे कहा, “मेरे संघर्ष और पंचायती राज मंत्री श्यामाचरण तुबिद की फटकार के बाद उनके स्टेनो और अन्य अधिकारी प्रभावित हुए और उन्होंने कई दस्तावेज दिए, जिन्हें मैं समझ नहीं पाया। स्टेनो ने उनके (हंसदा) बेटे की छात्रवृत्ति के लिए बनाया गया जाली आय प्रमाण पत्र भी दिया। हंसदा का मासिक वेतन 3,000 रुपये था, लेकिन उन्होंने तहसीलदार से अपनी वार्षिक आय 2,700 रुपये का प्रमाण पत्र बनवा रखा था। मैं यह प्रमाण पत्र लेकर बुद्ध मार्ग थाना गया।”

अरुण ने आगे बताया, “एक वृद्ध सब-इंस्पेक्टर इस मामले को देखकर बहुत प्रसन्न हुए और कहा कि इतना पक्का केस उन्होंने जीवन में नहीं देखा, लेकिन एक वरिष्ठ आईएएस अधिकारी के खिलाफ केस करना उनके लिए संभव नहीं था। इसलिए उसकी कई फोटो प्रतियां बनवाकर बिहार और भारत सरकार को भेजी गईं। मैंने उन्हें पढ़े बिना ही हस्ताक्षर कर दिए थे।”

अरुण कुमार उपाध्याय ने कहा, “पता नहीं वह इस मामले में जेल गए या 40,000 जाली प्रमाण पत्र वाले केस में, लेकिन उनके जेल जाने के बाद ही 1975 में, यानी परीक्षा के नौ साल बाद, मुझे मेरा मैट्रिक प्रमाण पत्र मिला। वर्तमान स्थिति में शायद यह जीवन भर नहीं मिलता।”

लव कुमार मिश्र
लव कुमार मिश्र
लव कुमार मिश्र, 1973 से पत्रकारिता कर रहे हैं,टाइम्स ऑफ इंडिया के विशेष संवाददाता के रूप में देश के दस राज्यों में पदस्थापित रह। ,कारगिल युद्ध के दौरान डेढ़ महीने कारगिल और द्रास में रहे। आतंकवाद के कठिन काल में कश्मीर में काम किए।
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