बिहार विधानसभा चुनाव से पहले सीमांत जिलों की यात्राओं में हर उस मोड़ पर पहुंचने की कोशिश रही जहां से राजनीति और समाज को देखने का नजरिया मिल सके! सीमांत जिलों की पालिटिक्स का गणित इन्हीं सब इलाकों में बिखरा है!
बिहार के सीमांत जिले की पॉलिटिक्स का गणित समझने के लिए इस इलाके का भूगोल समझना भी जरूरी है। यह इलाका पश्चिम बंगाल के साथ अंतरराज्यीय और नेपाल के साथ अंतरराष्ट्रीय सीमा साझा करता है। सीमांचल में बिहार के चार जिले आते हैं- कटिहार, पूर्णिया, अररिया और किशनगंज। इन चार जिलों में 24 विधानसभा सीटें हैं। अपनी यात्राओं के केंद्र में फ़िलहाल यही इलाका है। राहुल से लेकर मोदी तक की निगाहें इन विधनसभा सीटों पर टिकी हुई है।
लेकिन इन इलाकों में ऐसी भी जगहें हैं जिसे हर दल नरजअंदाज किए हुए है। अपनी यात्राओं के क्रम में एक ऐसे ही गांव जाना हुआ था, आज कहानी उसी गांव की सुनाने जा रहा हूं। यह इलाका किशनगंज जिले के कोचाधामन विधानसभा क्षेत्र में आता है।
बिहार को पूर्वोत्तर के राज्यों से जोड़ने वाली एक सड़क है, जो पूर्णिया- किशनगंज होते गुवाहाटी से आगे निकल जाती है। इन इलाकों में आप मक्का – धान से आगे चाय, सुपारी, अनानास, तेजपत्ता तक की खेती देख सकते हैं। अभी विधानसभा चुनाव से पहले इन्हीं सीमांत इलाकों में अपना रोज का आना- जाना लगा है।
यह इलाका कोसी से लेकर महानंदा – ब्रह्मपुत्र नदी के स्वभाव से वाक़िफ़ है। इसी क्षेत्र में एक गांव है ‘ बड़ीजान’, जो बिहार के किशनगंज जिला में आता है।
चुनाव और चुनाव के बाद भी धर्म- जाति की राजनीति में उलझे रहने वाले हम सब इतिहास के इस महत्वपूर्ण इलाके को रद्दी कागज की तरह छोड़ चुके हैं मानो यह घर का कबाड़ खाना हो !
कोचाधामन प्रखंड स्थित बड़ीजान गांव अपने अंदर हजारों साल के पुराने दास्तां को समेटे हुए है। लेकिन न तो सरकार और न ही पुरातत्व विभाग इस ओर अपनी रूचि दिखा रहा है। यहां आज भी पाल वंश युगीन सूर्य देव के काले पत्थर वाली मूर्ति अपनी दास्तां खुद सुना रही है।

बड़ीजान गांव लोनसबरी नामक एक बरसाती नदी के निकट बसा हुआ है। जो प्राचीन छाड़ नदी का किनारा है। लोनसबरी नदी कनकई नदी में मिलकर महानंदा नदी में समा जाती है।
आज के दौर में जब जमीन मतलब खरीदने और बेचने की चीज बन गई है, जिसे सरकारी भाषा में राजस्व कहा जाने लगा है, तब इस क्षेत्र को बड़ीजान दुर्गापुर कहा गया है।
अंग्रेज सर्वे अधिकारी बुकानन के अनुसार राजा वेण के वंशज ने बड़ीजान में एक किला बनवाया था। जिसमें करीब 28 तालाब थे। जो एक ही रात में खोदे गए थे। वर्तमान में उक्त जगह पर मात्र चार तालाब हैं। बुकानन ने इस बड़ीजान गांव के बारे में अपनी पुस्तक में उल्लेख किया है।
निरंतर कृषि कार्य होने के कारण इन टीलों की ऊंचाई अब समाप्त हो गई है। जिसके नीचे प्राचीन भगवान सूर्य का मंदिर और आवासीय क्षेत्र दबे हुए है। बड़ीजान हाट में पिपल वृक्ष के नीचे भगवान सूर्य की विशाल प्रतिमा रखी हुई है, जो दो टुकड़ों में खंडित है।
भगवान सूर्य की प्रतिमा की ऊँचाई पांच फीट छह इंच तथा चौड़ाई दो फीट 11 इंच है। बड़ीजान गांव के सीमावर्ती क्षेत्रों मे प्रस्तर से निर्मित मंदिर में प्रवेश द्वार पर लगाया गया एक विशाल लिंटेल मंदिर भी भव्यता को दर्शाता है। लिंटेल मंदिर बेसालू पत्थर से निर्मित है इसकी माप 12 फीट दो इंच है।

बड़ीजान अब पंचायत है, यहाँ के वार्ड संख्या आठ में मंदिर का अवशेष बिखरा पड़ा है लेकिन सरकार से लेकर विभाग तक जबरदस्त चुप्पी साधे हुए है!
गौरतलब है कि 2008 में हुए परिसीमन के बाद किशनगंज ज़िला तीन की बजाय चार विधानसभा क्षेत्रों किशनगंज, ठाकुरगंज, बहादुरगंज और कोचाधामन में बंट गया।
किशनगंज विधानसभा सीट, बिहार के सीमांचल क्षेत्र की एक अहम सीट है। यह मुस्लिम बहुल आबादी वाला इलाका है। पारंपरिक तौर पर यह सीट कांग्रेस का गढ़ रही है, लेकिन पिछले कुछ सालों में यहां दूसरी पार्टियां, खासकर ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM) ने भी यहां अपनी पैठ जमाई है, जिससे मुकाबला त्रिकोणीय हो गया है।
किशनगंज के अलावा ठाकुरगंज, बहादुरगंज और कोचाधामन में भी कांग्रेस और राजद की पैठ है। पिछली बार ओवैसी की पार्टी ने सीमांचल की 20 विधानसभा सीटों पर उम्मीदवार खड़े किए थे और 5 उम्मीदवारों ने जीत दर्ज की, लेकिन कुछ समय बाद पार्टी के 4 विधायक, मो. इजहार असफी (कोचाधामन), शाहनवाज आलम (जोकीहाट), सयैद रुकनुद्दीन (बायसी) और अजहर नईम (बहादुरगंज) टूटकर राजद में जा मिले। औवेसी की पार्टी के लिए यह बड़ा झटका था।
हाल ही में कांग्रेस के सबसे बड़े नेता और बिहार की मुख्य विपक्षी पार्टी के सर्वेसर्वा तेजस्वी यादव पूर्णिया-कटिहार में रोड शो करते हुए दरभंगा मधुबनी की ओर निकले थे। आने वाले कुछ दिन में भाजपा के सबसे बड़े नेता और देश प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी सीमांत इलाके में सबसे प्रमुख माने जाने वाले पूर्णिया आने वाले हैं, हवाई अड्डा का उद्धाटन करने लेकिन क्या यह संभव है कि वे बड़ीजान की बात करेंगे?
आप कह सकते हैं कि चुनावी गुणा भाग में इस तरह के इलाकों की भला कौन बात करेगा और वैसे भी राजनीति में ऐतिहासिक बातों का भला क्या महत्व है! वोट वाली राजनीति में ऐसी बातें भीड़ जुटाउ नेताओं को किताबी ही लगेगी, वो चाहे मोदी जी को या फिर राहुल गांधी!