पटना: बिहार में राज्यसभा की पांच सीटों के लिए सोमवार को हुए मतदान में राष्ट्रीय लोकतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) की जीत लगभग तय मानी जा रही है। नतीजे कुछ देर में आएंगे, हालांकि दिन भर में वोटिंग के दौरान जो कुछ देखने को मिला, उससे एनडीए की जीत लगभग पक्की है। सूत्रों के हवाले से आ रही जानकारी के मुताबिक असदुद्दीन ओवैसी की AIMIM और बसपा के समर्थन के बावजूद राज्य में महागठबंधन को कम से कम एक सीट जीतने के लिए जरूरी 41 वोट नहीं मिल पाए। दरअसल, कांग्रेस के तीन विधायक और आरजेडी का एक विधायक मतदान करने नहीं पहुंचे। सामने आई जानकारी के अनुसार राजद के 25 में से 24 विधायक ही वोट डालने पहुंचे। कांग्रेस के बिहार में 6 विधायक हैं, जिनमें तीन नदारद रहे।
आंकड़ों पर गौर करें तो 243 सदस्यों वाली बिहार विधानसभा में एक उम्मीदवार को जीतने के लिए 41 विधायकों का समर्थन चाहिए। बिहार की इस बार पांच राज्यसभा सीटों के चुनाव के लिए एनडीए की ओर से जदयू प्रमुख नीतीश कुमार, बीजेपी अध्यक्ष नितिन नवीन और आरएलएम के उपेंद्र कुशवाहा शामिल हैं। इसके अलावा केंद्रीय मंत्री रामनाथ ठाकुर (जदयू) और भाजपा के प्रदेश महासचिव शिवेश कुमार भी मैदान में हैं। दूसरी ओर राष्ट्रीय जनता दल (राजद) ने एक संभावित जीत के लिए अमरेंद्र धारी सिंह को मैदान में उतारा था।
विपक्ष के किन चार विधायकों ने नहीं डाला वोट
सुरेंद्र प्रसाद कुशवाहा: बिहार के वाल्मीकि नगर से पहली बार विधायक बने हैं। ये कांग्रेस से हैं। 2015 में उन्होंने उपेंद्र कुशवाहा की राष्ट्रीय लोक समता पार्टी (आरएलएसपी) के टिकट पर चुनाव लड़ा था। उन्हें निर्दलीय उम्मीदवार रिंकू सिंह ने हराया था। बाद में रिंकू जदयू में शामिल हो गए। जबकि सुरेंद्र कुशवाहा कांग्रेस में शामिल हो गए। 2025 के चुनाव में उन्होंने जदयू उम्मीदवार को 1,675 वोटों से हराया था। राज्यसभा चुनाव के दौरान उपेंद्र कुशवाहा की नई पार्टी राष्ट्रीय लोक मोर्चा (आरएलएम) के प्रदेश अध्यक्ष आलोक सिंह ने उनसे मुलाकात की थी। सुरेंद्र कुशवाहा बिहार विधानसभा की पिटिशन कमिटी के सदस्य भी हैं।
मनोज विश्वास: फारबिसगंज से पहली बार विधायक बने कांग्रेस के विश्वास ने महज 221 वोटों के अंतर से जीत हासिल की थी। वे कई पार्टियों में रहे हैं। 2019 में जदयू ब्लॉक अध्यक्ष, फिर राजद और फिर कांग्रेस से जुड़े। चुनाव से पहले उन्हें पूर्णिया सांसद पप्पू यादव का करीबी माना जा रहा था।
मनोहर प्रसाद सिंह: इन्होंने पिछले साल चौथी बार मनिहारी सीट से जीत हासिल की थी। अनुसूचित जनजाति समुदाय से ताल्लुक रखने वाले, वे पहली बार जदयू के टिकट पर चुने गए थे। 2015 में जब महागठबंधन बना और यह सीट कांग्रेस के खाते में गई, तो नीतीश कुमार के आग्रह पर उन्होंने कांग्रेस में शामिल होकर नए टिकट पर चुनाव लड़ा। तब से वे कांग्रेस विधायक ही रहे हैं। हालांकि इन सभी कार्यकालों में जदयू नेताओं से उनकी राजनीतिक निकटता बनी रही।
फैसल रहमान: वे पूर्व सांसद मोतिउर रहमान के पुत्र हैं और पहली बार विधायक बने हैं। उन्होंने विधानसभा चुनाव में पूर्वी चंपारण जिले ढाका सीट पर भाजपा के पवन जायसवाल को 178 वोटों से हराया था। फैसल के पिता राजद और कांग्रेस दोनों में पद संभाल चुके हैं। राज्य सभा चुनाव में वोट नहीं देने को लेकर फैसल रहमान का बयान भी सामने आया है। उन्होंने कहा कि उनकी मां की तबीयत खराब है और वह दिल्ली में हैं। फैसल रहमान ने कहा कि वह वोट डालने के लिए रविवार को पटना गए थे लेकिन मां के बीमार होने के कारण उन्हें दिल्ली जाना पड़ा। उन्होंने दावा किया कि तेजस्वी यादव को इस बारे में पता है।

