Friday, March 20, 2026
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दृश्यमः भारत रंग महोत्सव का दुखद अवसान

मंडी हाउस में हर वर्ष करोड़ों रुपये के बजट से आयोजित होने वाला भारत रंग महोत्सव कभी भारतीय रंगमंच का सबसे बड़ा सांस्कृतिक उत्सव माना जाता था। देश के विभिन्न प्रांतों से नाट्य दल आते थे, नए रंगमंचीय प्रयोग प्रस्तुत होते थे, लोकधर्मी नाट्यरूपों को जगह मिलती थी और रंगकर्मियों के बीच संवाद की एक जीवंत प्रक्रिया चलती थी। लेकिन पिछले एक-डेढ़ दशक में इसका स्वरूप धीरे-धीरे बदलता गया।

भारत रंग महोत्सव का सूर्य अब अस्ताचल की ओर है। यह एक ऐसा अवसान है जो किसी प्राकृतिक चक्र का परिणाम नहीं, बल्कि दीर्घकालीन प्रशासनिक कुप्रबंधन, संस्थागत अहंकार और सांस्कृतिक दृष्टिहीनता की उपज है। कभी भारतीय रंगमंच के लिए एक प्रतिष्ठित और बहुप्रतीक्षित आयोजन रहा यह महोत्सव आज एक ऐसे शरीर की तरह प्रतीत होता है जो अभी औपचारिक रूप से जीवित है, परंतु उसके भीतर जीवन के लक्षण क्षीण होते जा रहे हैं। यह मृत्युशय्या पर पड़े एक उत्सव का दृश्य है—एक ऐसा उत्सव जिसकी विडंबना यह है कि उसकी मृत्यु भी उसी संस्थान के हाथों लिखी जा रही है जिसने उसे जन्म दिया था।

यह स्थिति अचानक नहीं आई है। इसकी पटकथा धीरे-धीरे लिखी गयी—राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय (रानावि) के प्रशासकों की अक्षमता, अदूरदर्शिता, आत्ममुग्धता, अनंत भ्रष्टाचार, चापलूसों और परजीवियों के स्थायी जमघट तथा संस्थागत वर्चस्ववाद के सम्मिलित प्रभाव से। जिन लोगों के हाथों में भारतीय रंगमंच के इस महत्वपूर्ण मंच का संचालन था, उन्होंने इसे धीरे-धीरे एक ऐसे बंद घेरे में बदल दिया जिसमें विचार, संवाद और सहभागिता के लिए कोई जगह ही नहीं बची।

विडंबना यह है कि जो महोत्सव कभी देश भर के रंगकर्मियों के लिए संवाद और आदान-प्रदान का मंच माना जाता था, वह अब अपने ही निर्माताओं के आत्मप्रदर्शन का मंच बनकर रह गया है।

एक राष्ट्रीय उत्सव का संकुचित होता दायरा

मंडी हाउस में हर वर्ष करोड़ों रुपये के बजट से आयोजित होने वाला भारत रंग महोत्सव कभी भारतीय रंगमंच का सबसे बड़ा सांस्कृतिक उत्सव माना जाता था। देश के विभिन्न प्रांतों से नाट्य दल आते थे, नए रंगमंचीय प्रयोग प्रस्तुत होते थे, लोकधर्मी नाट्यरूपों को जगह मिलती थी और रंगकर्मियों के बीच संवाद की एक जीवंत प्रक्रिया चलती थी।

लेकिन पिछले एक-डेढ़ दशक में इसका स्वरूप धीरे-धीरे बदलता गया। यदि रानावि से सीधे जुड़े हुए निर्देशकों और उनके निकटवर्ती लोगों को अलग कर दिया जाए, तो दिल्ली के सक्रिय रंग समूहों, निर्देशकों और स्वतंत्र रंगकर्मियों की भागीदारी लगातार घटती चली गयी है। आज स्थिति यह है कि दिल्ली के अनेक महत्वपूर्ण नाट्य समूहों के कलाकार इस महोत्सव में झाँकने तक नहीं जाते। यह केवल उदासीनता नहीं है; यह एक प्रकार का मौन बहिष्कार है।

रंगकर्मियों के बीच धीरे-धीरे यह धारणा गहरी होती गयी है कि रानावि प्रशासन ने इस महोत्सव को एक राष्ट्रीय मंच के बजाय अपने आंतरिक आयोजन में बदल दिया है। यहाँ चयन की प्रक्रिया से लेकर आमंत्रण तक सब कुछ कुछ गिने-चुने और विशेषाधिकार-प्राप्त व्यक्तियों के नियंत्रण में है। परिणाम यह हुआ कि देश के अनेक सक्रिय नाट्य समूह धीरे-धीरे इस आयोजन से दूर होते चले गये।

अहंकार और संस्थागत वर्चस्व

देश के बहुत-से रंगकर्मी इस स्थिति के लिए रानावि प्रशासन के बढ़ते हुए अहंकार को जिम्मेदार मानते हैं। उनका कहना है कि संस्थान ने स्वयं को और भारत रंग महोत्सव को कुछ विशिष्ट व्यक्तियों और वर्गों के दायरे में कैद कर लिया है। ग्रांट बाँटने, परियोजनाएँ स्वीकृत करने और महोत्सव में आमंत्रण देने-न देने की शक्ति जब किसी एक संस्थान के हाथों में केंद्रित हो जाती है, तो वह धीरे-धीरे एक सांस्कृतिक नौकरशाही में बदलने लगता है। रानावि के साथ भी यही हुआ।

ऐसा प्रतीत होने लगा कि मानो भारतीय रंगमंच का जीवन और मृत्यु उसी की कृपा पर निर्भर हो। जैसे वह चाहे तो किसी रंगकर्मी को प्रतिष्ठा दे दे और चाहे तो उसे हाशिए पर धकेल दे। इस मानसिकता का परिणाम यह हुआ कि संस्थान अपनी बिरादरी, अपने परिवार और अपनी चारदीवारी के बाहर के रंगकर्मियों को संदेह और हीनता की दृष्टि से देखने लगा। जो लोग उसकी सत्ता-संरचना के भीतर नहीं थे, वे उसके लिए धीरे-धीरे अप्रासंगिक होते गये।

संवादहीनता की संस्कृति

किसी भी सांस्कृतिक आयोजन की शक्ति उसके संवाद में होती है। विचारों का आदान-प्रदान, आलोचना, सुझाव और सहभागिता—ये सभी तत्व मिलकर उसे जीवंत बनाते हैं। लेकिन भारत रंग महोत्सव के संदर्भ में सबसे दुखद तथ्य यह है कि रानावि प्रशासन ने संवाद की इस संस्कृति को लगभग समाप्त कर दिया।

दिल्ली में ही अनेक ऐसे सक्रिय निर्देशक, नाट्य-समूह संचालक और स्वतंत्र रंग-समीक्षक मौजूद हैं जिनके पास दशकों का अनुभव है। उनके सुझावों से किसी भी राष्ट्रीय आयोजन का स्वरूप समृद्ध हो सकता था। परंतु आश्चर्यजनक रूप से रानावि की ओर से न तो कभी कोई खुली बैठक आयोजित की गयी, न किसी प्रकार का परामर्श सत्र। यहाँ तक कि देश के सक्रिय नाट्य समूहों को भागीदारी के लिए औपचारिक आमंत्रण भेजने की परंपरा भी लगभग समाप्त हो गयी।

यह एक विचित्र स्थिति है—एक तथाकथित राष्ट्रीय रंगोत्सव जिसका आयोजक देश के रंगकर्मियों से संवाद करने की आवश्यकता तक महसूस नहीं करता।

राष्ट्रीय से निजी उत्सव तक

इन परिस्थितियों में यह प्रश्न स्वाभाविक है कि भारत रंग महोत्सव को राष्ट्रीय महोत्सव क्यों माना जाए?

किस अर्थ में यह राष्ट्रीय है? क्या इसलिए कि इसे सरकारी बजट से आयोजित किया जाता है? क्या इसलिए कि इसके मंच पर कुछ विदेशी प्रस्तुतियाँ दिखाई जाती हैं? या इसलिए कि इसके नाम में “भारत” शब्द जुड़ा हुआ है?

वास्तविकता यह है कि पिछले वर्षों में यह आयोजन धीरे-धीरे एक आंतरिक उत्सव में बदल गया है—एक ऐसा बंद समारोह जिसमें वही लोग आते हैं, वही लोग आमंत्रित होते हैं और वही लोग प्रशंसा के पात्र बनते हैं जो संस्थागत संरचना के भीतर या उसके निकट हैं। राष्ट्रीयता का आवरण बना रहता है, पर उसकी आत्मा कहीं खो जाती है।

दर्शक की अनुपस्थिति

किसी भी रंगमंचीय आयोजन की अंतिम कसौटी दर्शक होता है। यदि दर्शक नहीं हैं, तो मंच पर कितनी ही रोशनी क्यों न जलाई जाए, वह एक खाली सभागार का प्रदर्शन ही रह जाता है। आज भारत रंग महोत्सव के कई नाटक दर्शकों के लिए तरसते दिखाई देते हैं।

यह विडंबना केवल दर्शकों की रुचि के क्षय का परिणाम नहीं है; यह आयोजन की विश्वसनीयता के संकट का संकेत है। जब स्थानीय रंगकर्मी ही किसी महोत्सव में रुचि नहीं लेते, तो सामान्य दर्शक उससे क्यों जुड़ेंगे?

दर्शक वहाँ जाते हैं जहाँ उन्हें जीवंतता दिखाई देती है। जहाँ संवाद होता है, जहाँ प्रयोग होते हैं, जहाँ नए विचार जन्म लेते हैं।

लेकिन जब किसी आयोजन का स्वरूप धीरे-धीरे औपचारिकता और दिखावे में बदलने लगता है, तो दर्शक स्वाभाविक रूप से उससे दूर हो जाते हैं।

संस्थान की गिरती साख

राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय का इतिहास गौरवपूर्ण रहा है। उसने भारतीय रंगमंच को अनेक महत्वपूर्ण कलाकार दिए हैं—अभिनेता, निर्देशक, डिज़ाइनर और नाटककार।

लेकिन किसी भी संस्थान की प्रतिष्ठा उसके अतीत से नहीं, उसके वर्तमान से बनती है। यदि वर्तमान में दृष्टि का अभाव हो, प्रशासनिक संवेदनशीलता समाप्त हो जाए और संस्थान अपने ही बनाए हुए दायरे में कैद हो जाए, तो उसका गौरवशाली अतीत भी उसे लंबे समय तक बचा नहीं सकता। 

आज रानावि के सामने यही संकट है। कूपमंडूकता, अदूरदर्शिता और निरर्थक विशिष्टताबोध ने इस महत्वपूर्ण नाट्य विद्यालय को धीरे-धीरे एक ऐसे संस्थान में बदल दिया है जो अपने ही बनाए हुए मिथकों के बोझ तले दबता जा रहा है।

एक उत्सव का भविष्य

भारत रंग महोत्सव का भविष्य अभी पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है। किसी भी सांस्कृतिक आयोजन को पुनर्जीवित किया जा सकता है—यदि उसके संचालकों में आत्मालोचना का साहस हो।

इसके लिए सबसे पहले यह स्वीकार करना होगा कि समस्या बाहर नहीं, भीतर है। रंगकर्मियों से संवाद स्थापित करना होगा, चयन प्रक्रियाओं को पारदर्शी बनाना होगा, और महोत्सव को सचमुच एक राष्ट्रीय मंच के रूप में पुनर्गठित करना होगा।

यदि ऐसा नहीं किया गया, तो आने वाले वर्षों में भारत रंग महोत्सव केवल एक औपचारिक सरकारी कार्यक्रम बनकर रह जाएगा—एक ऐसा कार्यक्रम जो कागज़ों में जीवित होगा, पर भारतीय रंगमंच के वास्तविक जीवन से उसका कोई संबंध नहीं होगा।

विडंबना यह है कि जिस संस्थान ने भारतीय रंगमंच को दिशा देने का दावा किया था, वही आज अपने सबसे बड़े आयोजन को दिशा देने में असमर्थ दिखाई देता है। यह स्थिति केवल एक महोत्सव की विफलता नहीं है; यह उस सांस्कृतिक प्रशासन की विफलता है जो कला को संवाद के बजाय नियंत्रण के माध्यम से संचालित करना चाहता है।

भारत रंग महोत्सव का सूर्य यदि सचमुच अस्त हो रहा है, तो यह केवल एक उत्सव का अंत नहीं होगा—यह उस मानसिकता का परिणाम होगा जिसने संस्कृति को जीवंत प्रक्रिया के बजाय संस्थागत अधिकार समझ लिया। और जब संस्कृति अधिकार बन जाती है, तो उत्सव धीरे-धीरे शोकसभा में बदल जाते हैं। भारत रंग महोत्सव शायद उसी परिवर्तन की अंतिम अवस्था में खड़ा है।

राजेश चन्द्र
राजेश चन्द्र
राजेश चन्द्र वरिष्ठ रंगकर्मी, नाटककार और समकालीन रंगमंच के संपादक हैं।
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