Friday, March 20, 2026
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दृश्यम: प्रेम के रूप अनेक

प्रेम का अनुभव जितना निजी होता है, उसकी अभिव्यक्तियाँ उतनी ही विविध और जटिल होती हैं। कभी वह सामाजिक वर्जनाओं के बीच दबे हुए स्वर की तरह प्रकट होता है, तो कभी स्मृति और प्रेरणा बनकर किसी कलाकार के सृजन में लंबे समय तक जीवित रहता है। साहित्य, सिनेमा और रंगमंच ने समय-समय पर इन रूपों को अलग-अलग ढंग से व्यक्त किया है।उन्नीसवीं सदी के बंगाल में कादंबरी देवी और रवीन्द्रनाथ ठाकुर के संबंध को लेकर लंबे समय से साहित्य, शोध और कल्पना में अनेक तरह की व्याख्याएँ होती रही हैं। सबसे पहले इसे सत्यजीत रे की फिल्म चारुलता’ में दिखाया गया, फिर इसी प्रसंग को कल्पनाशील ढंग से रंजन बंद्योपाध्याय ने अपनी कृति ‘कादंबरी देवी का सुसाइड नोट’ में रूपायित किया, जबकि निर्देशक सुमन घोष की फिल्म कादंबरी ने इस त्रासद और रहस्यमय संबंध को दृश्यात्मक संवेदना में बदला। इस वर्ष के भारत रंग महोत्सव (भारंगम-25) में प्रस्तुत नाटक ‘कादंबरी’ इन्हीं तीनों का समुच्चय बनकर स्मृति, प्रेम और सृजन के जटिल रिश्ते को रंगमंच पर नए ढंग से परखने की कोशिश करता दिखाई देता है। अंतराष्ट्रीय स्त्री दिवस के विशेष अवसर पर स्त्री जीवन सम्बंधित कुछ नाटकों पर यहां बात कर रहे हैं वरिष्ठ नाट्यालोचक रवींद्र त्रिपाठी-

जिसे प्रेम, इश्क या मोहब्बत कहते हैं उसके कई रूप हैं। इसलिए अलग अलग वक्त में कवियों, शायरों, नाटककारों और फिल्मकारों ने अपने अपने अंदाज में इसे पेश किया है और अभी भी कर रहे हैं। इस बार के भारंगम (यानी भारत रंगमहोत्सव 25) में भी कुछ नाट्य प्रयोग ऐसे दिखे जिसमे प्रेम की अनदेखी सी छवियां हैं।

पहला नाटक था `मेहरून’ जिसके निर्देशक हैं अमितेश ग्रोवर। इसका नाट्यालेख तैयार किया सारा मरिमय नें।

मेहरून एक रंग है और इसका अंग्रेजी में प्रचलित नाम मैरून भी है। ऐसा लाल रंग जिसमें थोड़ा काला भी मिला हुआ हो। लाल प्रेम का रंग है, और इसमें थोड़ा कालापन, यानी विधवा जीवन और उसके दुख। नाटक में छह महिला अभिनेता हैं और एक पुरुष। महिला अभिनेता हैं- इप्सिता चक्रवर्ती सिंह, गरिमा दिवाकर, अमनजीत प्रोच, देवाश्री चक्रवर्ती, श्रुति मिश्रा और शिल्पी दता। पुरष अभिनेता हैं अजीत सिंह पालावत। वो दोहरी भूमिका में हैं।

एक विधवाश्रम में कुछ औरतें पहले से रह रही हैं। फिर वहां एक नई औऱत (ईप्सिता चक्रवर्ती) पहुंचती है। विधावाश्रम का मैनेजरनुमा व्यक्ति (अजीत सिंह पालावत) उसका नाम-पता पूछता है। सभी औरतें मेहरून रंग के कपड़े पहने हैं। नई औरत को भी वही पहनाया जाता है। फिर सभी औरतें बाजार जाती है और वहां अपना बनाया हुआ कुछ न कुछ बेचती हैं औऱ पैसा कमाती हैं। ये अनोखा बाजार है जिस मुख्यरूप से औऱतें ही संचालित करती है फिर अचानक जोरों का पानी बरसता है और विधवाश्रम डूबने-डूबने को है। ये विशेष अनुभूति का क्षण है। प्रेम की अनुभूति का। और जो दुखद अतीत है उसे याद करने का भी।

नाटक में एक कथाक्रम भी है लेकिन अमूर्तता भी। दृश्य हैं पर साथ ही साथ बहुत कुछ अदृश्य भी है, जिसे आप महसूस करते रहते हैं। जो अदृश्य है वो श्रव्य में भी है। ये श्रव्यता मुख्यत: संगीत में अभिव्यक्त हुई है। लेकिन कुछ जगहों पर संवादों भी है। और प्रकाश व्यवस्था में भी है। इस नाटक में कई तरह के संकेत और अभिप्राय हैं। कई चाहतें और आकांक्षाएं हैं। कुछ टूटी और बिखरी भी। खासकर महिलाओं की। कह सकते है नाटक में कई प्रकार के स्त्री-स्वर हैं।

समाज में महिलाओं पर कई तरह पाबंदिया रही हैं। जो चाहती हैं वो कर नही पाती। इप्सिता ने जो किरदार निभाया है वो कुम्हार परिवार से आती है, लेकिन वहां उसे मिट्टी के पुतले बनाने पर पाबंदी है। विधवाश्रम में आकर वो पुतले बनाना शुरू करती है और बाजार में बेचती है। जब वो मिट्टी के पुतले बनाती है तो एक पुरुष उसके पास पास आता है। लेकिन वो वास्तविक नहीं है। काल्पनिक है। खयालों में है। हालांकि अंत में उसे लगता है ये पुरुष सिर्फ खयालों में नहीं है, वास्तविक भी है। इस तरह नाटक में यथार्थ और कल्पना आपस में मिलती और टकराती रहती हैं।

दूसरी तरह से कहे तो ये नाटक कई खयालों का एक समुच्यय है पर सबसे जबर्दस्त खयाल तो प्रेम ही है। ये विधवाओं के जीवन में झांकता और वहां दबी, सोई, बैठी आकांक्षाओं को जागृत करता है। उनको पहचानता है। इसका एक दार्शनिक पहलू भी है। मिट्टी के पुतले का प्रसंग जीवन की अर्थवत्ता क्या है?’ की तरफ भी इशारा करता है। मनुष्य की जिंदगी मिट्टी की बनी है। ये बात कई संतों ने कही है। हबीब तनवीर के एक नाटक में एक गाने की शुरुआत इस तरह से होती है-चोला माटी के हो राम चोला माटी के।“ माटी का चोला आखिर में माटी में ही मिल जाना है। `मेहरून’ कुछ-कुछ उस ओर भी ध्यान दिलाता है।

जीवन त्रासदी से पूर्ण है। लेकिन क्या एक त्रासदी के बाद फिर से कोई नई शुरुआत हो सकती है? क्या रागहीन हो चुके है जीवन में कोई नया राग बज सकता है? क्या आकांक्षा के बीज फिर से अंखुआ सकते हैँ? क्या जिंदगी में चाहते शेष नहीं होतीं? या क्या हम चाहते हैं कि तमन्नाएं फिर से हमारे अंदर से उभरे? ऐसे कई मसले इस नाटक में उभरते हैं। लेकिन धमाकेदार तरीके से नहीं, बल्कि हौले हौले और फिर हमारे अस्तित्व को घेरते जाते हैं। `मेहरून” एक नाटक है पर एक रूपक भी है। एक खयाल भी है।

नाटक में संजीदगी है पर हंसी मजाक के कुछ लम्हे भी है। एक जगह जब सभी महिलाएं बरसात के पानी से बचने के लिए एक जगह इकट्ठा होकर बैठती हैं तो उनमें ठिठोली भी होती है। यहीं पता चलता है कि विधवाश्रम में आई एक महिला विधवा नहीं हुई है फिर भी वहां चली आई है। अपने पति को छोड़कर। जब साथी महिलाएं उससे पूछती हैं क्या- वो मरा नहीं’ तो वो जवाब देती है-“मरता ही तो नहीं था”। यहां हंसी का एक फव्वारा फूटता है पर ये हंसी सामान्य नहीं है, इसमें एक तंज भी है। ये दिखाता है कुछ विवाह ऐसे भी होते हैं जिनमें औरत कैद हो जाती है और वहां से छुटकारा पाने का जतन भी करती है। संक्षेप में सवाल ये है, क्या विवाह में प्रेम होता ही है? या प्रेम विवाह से परे भी जाता है? किसी अनजान दिशा में। किसी अनजान स्थल पर।

पूरी तरह तो नहीं लेकिन कुछ कुछ प्रेम और विवाह संबंधी इसी पेचीदे रिश्ते का अन्वेषण इस बार के भारंगम में शामिल एक और नाटक करता है- `कादंबरी’। युवा निर्दशक मेघना रॉय चौधरी ने इसे निर्देशित किया है।

`कादंबरी’ के केंद्र में है कवि रवीन्द्र नाथ ठाकुर और उनकी भाभी कादंबरी देवी। कादंबरी देवी का निधन मात्र पचीस साल की उम्र में हो गया। उनमें और रवीन्द्र नाथ में एक खास तरह का रिश्ता बन गया था। कह सकते है कि कांदबरी देवी रवीन्द्र नाथ की प्रेरणा थीं। लेकिन क्या वे आजीवन उनकी प्रेरणा रहीं। उनके निधन के बाद भी? नाटक इस ओर जाता है।

ये माना जाता है कि रवीन्द्र नाथ ठाकुर ने नष्टनीड़’ नाम की जो कहानी लिखी थी वे कांदबरी देवी के जीवन और मृत्यु को लेकर ही थी। सत्यजीत राय ने इसी परचारूलता’ नाम की फिल्म भी बनाई थी। क्या कादंबरी हीं चारूलता हैं? और एक त्रिकोण है चारूलता, कादंबरी और रवीन्द्र नाथ का। नाटक के सहृदय दर्शक ये बार बार महसूस करते हैं यहां चारूलता और कादंबरी देवी का भेद मिट जाता है। ये एक स्मृति नाटक भी है जिसमें रवीन्द्र नाथ अपने जीवन के अंतिम चरण में भी कादंबरी देवी को याद रखे हुए है। कुछ यादें हैं जो बार बार आती हैं और मथती हैं। क्या आखिरी दिनों में भी कादंबरी देवी बार-बार रवीन्द्र नाथ की चेतना में दस्तक देती है? नाटक में भी और शायद वास्तविक जीवन में भी।

कादंबरी देवी की भूमिका इप्सिता चक्रवर्ती सिंह ने निभाई है (संयोग से `मेहरून’ नाटक में भी मुख्य भूमिका में इप्सिता हैं), रबि बाबू की भूमिका में ऋषभ कांति। चारूलता की भूमिका में प्रियंका चौधरी और अमल (जो चारूलता में रवीन्द्र नाथ का ही प्रतिरूप माना जाता है) के रूप में आय़ुष ठाकुर। मृत्यु भी दो किरदारो, (पुरुष और स्त्री) के रूप में हैं। पुरुष के रूप में अभिजित विक्रम सिंह और स्त्री-मृत्यु हैं अदिति। निर्देशक ने उस ग्रीक मिथक कथा का भी इस्तेमाल किया है जिसमें ऑर्फियस और येरूदिचे के बीच प्रेम और प्रेरणा का प्रसंग आता है। कांदबरी देवी क्या येरूदिचे थीं जो रवीन्द्र नाथ को कलाकर्म में रमने और रचने के पीछे सक्रिय करती रही है? जब वो जीवित थी तब भी और इस जीवन जगत में नहीं रहने के बाद भी? ये तो सर्वविदित तथ्य है कि रवीन्द्र नाथ ने अपने जीवन के आखिरी बरसों में पेंटिंग शुरू की थी। इस नाटक में उनका ये पहलू दिखता है और वे कैनवास पर एक नारी आकृति बनाते हैं। क्या वो कादंबरी की आकृति थी?

मेघना रॉय चौधरी ने एक भारतीय और बांग्ला कवि-लेखक की जिंदगी के ऐसे पहलू को सामने लाया है जो बंगाल में भी और बाकी- दुनिया में भी चर्चा, सम्मान, अनुमान और शोध का विषय है। पर यहां निर्देशक की इसलिए भी तारीफ करनी होगी कि वो इस नाटक को दो व्यक्ति विशेष- रवीन्द्र नाथ और कादंबिरी देवी- से आगे ले जाती हैं और उस भावविंदु पर पहुंचा देती हैं जहां लगता है कि कोई कलाकार उस याद में हमेशा बिंधा रहता है जो उसके साथ जीवन के किसी मोड़ पर घटित हुआ था। नाटक में सिर्फ ये महत्त्वपूर्ण नहीं है कि रवीन्द्र नाथ और कादंबिरी देवी के बीच जीवन के आरंभिक दौर में क्या हुआ था बल्कि ये भी है कि जो हुआ उससे किस तरह एक कवि-कलाकार आजीवन आप्लावित रहा रहा। कोई याद क्या हमेशा इस तरह मन में बस जाती है कि कभी वहां से निकलती नहीं। क्या घरे बाइरे’ की विमला में भी रवीद्र नाथ ने कादंबरी देवी को ही उकेरा था। क्यास्त्रीर पत्र’ की मृणाल में भी कादंबिरी देवी का ही अक्स है? रवीन्द्र नाथ का एक गीत भी इस नाटक में आता है जिसका आरंभिक बोल है – तोबू मोने रखो जोदि दूरे जाइ छोले’ यानीदूर भी चली जाऊं तो याद रखना।‘ वैसे इस गीत के बारे में कम से कम हिंदी भाषा समाज में आम धारणा है कि रवीन्द्र नाथ कह रहे हैं कि दूर चला जाऊं तो मुझे याद रखना। लेकिन नाटक देखने के बाद ये एहसास होता है कि कादंबरी देवी कह रही हैं यदि दूर भी चली जाऊं तो मुझे याद रखना। गीत रवीन्द्र नाथ ने लिखा है पर क्या इसे लिखते वक्त कादंबरी देवी ने उनकी आत्मा में प्रवेश किया था? मेघना ने इस गीत को एक नया आयाम दे दिया है।

कादंबरी’ में प्रकाश व्यवस्था और संगीत का पक्ष भी बेहद प्रभावशाली है। एक जगह- चारूलता के प्रसंग में पुतली कला की तकनीक का भी इस्तेमाल किया गया है जो कुछ-कुछ इब्सन केडॉल्स हाउस’ की भी याद दिला देता है। क्या कादंबरी देवी या चारूलता परिवार में पुतली की तरह थीं?

नाटक में तीन भाषाओ का प्रयोग है हिंदी, बांग्ला और अंग्रेजी। बांग्ला के संवादों का सब टाइटिल अंग्रेजी में है। ये नाटक बहु-प्रसगों से युक्त है, यानी इममें रवीन्द्र नाथ का जीवन भी है और फिल्म `चारूलता’ भी है। यानी दोनों को जानने से ही आप इसका पूर्ण आस्वाद कर सकते हैं। साथ ही ये अभिनव प्रयोग भी है।

रवीन्द्र त्रिपाठी
रवीन्द्र त्रिपाठी
रवीन्द्र त्रिपाठी (जन्म 15 फरवरी, 1959), मेदिनीनगर/डालटनगंज, झारखंड। प्रिंट, टेलीविजन और सोशल-मीडिया के वरिष्ठ पत्रकार, नाटककार, साहित्य-फिल्म-कला-रंगमंच आलोचक, व्यंग्यकार, डॉक्यूमेंट्री फिल्ममेकर, यू- ट्यूबर, अनुवादक, स्क्रिप्ट-लेखक और संपादक। महात्मा गांधी के जीवन पर `पहला सत्याग्रही’ और स्वामी विवेकानंद के जीवन पर `विवेकानंद इन शिकागो’ नाटक लिखे। `कथा शिवपालगंज की’ , `राग विराग’ और `अज्ञातवास’ (तीनों श्रीलाल शुक्ल के उपन्यासों के नाट्य रूपांतर)। सभी नाटक मंचित। साहित्य अकादेमी और साहित्य कला परिषद के लिए डॉक्यूमेंट्री फिल्मों का निर्माण, एबीपी न्यूज के व्यंग्य-शो `पोलखोल’ के स्क्रिप्ट लेखक (शुरू में उसके प्रॉड्यूसर भी)। प्रसन्ना की पुस्तक `इंडियन मेथड इन एक्टिंग’ का `अभिनय की भारतीय पद्धति’ नाम से हिन्दी अनुवाद। राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय की पत्रिका `रंग प्रसंग’ और केंद्रीय हिन्दी संस्थान की पत्रिका `मीडिया विमर्श’ के अतिथि संपादक रहे।
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