45 मंचित नाटकों के विश्लेषण से स्पष्ट होगा कि 2025 का भारतीय रंगमंच किसी एक शैली, किसी एक विचारधारा या किसी एक सौंदर्य-प्रणाली में बंद नहीं है। वह एक ऐसे ऐतिहासिक क्षण में खड़ा है, जहाँ “रंगमंच” स्वयं अपने अस्तित्व के प्रश्न से टकरा रहा है, ठीक उसी तरह जैसे बीसवीं सदी के मध्य में ब्रेख़्त, आर्टो और ग्रोटोव्स्की ने रंगमंच की सीमाओं को पुनर्परिभाषित किया था। परंतु आज का संकट केवल सौंदर्य का नहीं है, यह लोकतंत्र, अस्मिता, जीवन और समुदाय के संकट से जुड़ा है। यह संकट रंगमंच के विकास के बजाय रंगमंच के अस्तित्व की रक्षा का भी हो गया है, जो भारत में रंगमंच के स्वरूप के पुनराविष्कार की माँग करता है।
यदि हम 2025 की प्रवृत्तियों को समझना चाहते हैं, तो पहले 1950 और 1990 के बाद के हिंदी रंगमंच के विकास को समझना आवश्यक है। हिंदी रंगमंच की बीसवीं सदी की यात्रा को यदि संक्षेप में देखें, तो चार निर्णायक मोड़ या अवस्था स्पष्ट होते हैं। पहली अवस्था में भारतेन्दु युग और द्विवेदी युग में नाटक राष्ट्र-निर्माण और सामाजिक सुधार का औज़ार था। दूसरी अवस्था में स्वतंत्रता के बाद का आधुनिकतावादी रंगमंच में मोहन राकेश, धर्मवीर भारती आदि के माध्यम से अस्तित्व, अकेलापन और आधुनिक मनुष्य का संकट केंद्र में आया। तीसरी अवस्था में 1970–90 के दशक में राजनीतिक रंगमंच, जन नाट्य मंच, बादल सरकार, हबीब तनवीर आदि के रुप में प्रस्तुति प्रत्यक्ष हस्तक्षेप बनी। चौथी और वर्तमान अवस्था में हिंदी रंगमंच का यह क्षण विशेषकर 2000 के बाद सरकारी अनुदान पर निर्भरता, ओटीटी ( OTT) और सोशल मीडिया से डिजिटल विस्थापन, राजनीतिक ध्रुवीकरण, सांस्कृतिक बाज़ारीकरण और अस्मिता-राजनीति के तीव्र संघर्षों से निर्मित हुआ है। 2025 तक पहुँचते-पहुँचते रंगमंच न तो केवल “प्रतिरोध” का मंच रह गया है और कभी राजनीतिक विरोध का उपकरण रहा नुक्कड़ नाटक चुनाव प्रचार के काम आ रहा है। रंगमंच न ही वह मात्र “मनोरंजन” का माध्यम रहा है, वो ओटीटी ( OTT) और सोशल मीडिया के सामने अपने अस्तित्व के लिए किसी तरह से साँस भर ले रहा है। इसलिए 2000 के बाद विशेषकर 2010–2020 के बीच—हिंदी रंगमंच धीरे-धीरे संस्थागत संकट, दर्शक-क्षरण और डिजिटल माध्यमों की आक्रामक उपस्थिति से जूझता रहा। पर 2020 की महामारी ने एक विचित्र विडंबना पैदा की और जब सब कुछ डिजिटल हुआ, तब लाइव होने का अर्थ बदल गया।
इसलिए 2025ई में हिंदी रंगमंच अब एक संकटग्रस्त सार्वजनिक स्थान है, जहाँ विचार, अस्मिता और इतिहास आमने-सामने खड़े हैं। 2025 का हिंदी रंगमंच इन चारों अवस्थाओं और परंपराओं का उत्तराधिकारी हो सकता है, पर उनका अनुकरणकर्ता बनकर नहीं रह सकता। 2025 का हिंदी रंगमंच और आगे के रंगमंच को इस अवस्था से नया रास्ता निकालना पड़ेगा।
वर्तमान रंगमच-समाज में मंडल–कमंडल राजनीति, उदारीकरण और वैश्वीकरण के बाद हिंदी रंगमंच में तीन प्रमुख प्रवृतियाँ स्पष्ट होती हैं। पहली प्रवृति राजनीतिक यथार्थवाद की पुनर्रचना की थी, जिसमें सफ़दर हाशमी की विरासत, जन नाट्य मंच की परंपरा और स्ट्रीट थिएटर का विस्तार और फिर उसके पतन की प्रक्रिया शामिल है। दूसरी प्रवृति ब्रेख़्त के प्रभाव में लोक–आधुनिक संलयन का था, जिसमें भिखारी ठाकुर, नाचा, तमाशा, यक्षगान आदि का आधुनिक प्रयोग हुआ और फिर उसी लोक के रूढ़ि में बदलने की कथा है। तीसरी प्रवृति अंतरराष्ट्रीय रंग-सिद्धांतों का स्थानीय अनुवाद पर निर्भरता थी, जिसमें ब्रेख़्त, बेकट, पिंटर, लोर्का, ग्रोटोव्स्की आदि के नाटक के अनुवाद हुआ और मगर नये हिंदी नाटकों का लेखन बहुत कम रहा या अविकसित रहा। अब इन संदर्भों में 2025 के 45 श्रेष्ठ नाटकों का अध्ययन और वर्तमान प्रवृति की पहचान इस आलेख का उद्देश्य है।
2025 के पाँच सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन
2025 में “45 प्रमुख भारतीय नाटक–प्रस्तुति” का आशय किसी आधिकारिक सूची से नहीं, बल्कि उन मंचन-प्रथाओं, सौंदर्यगत निर्णयों और वैचारिक हस्तक्षेपों की पहचान है, जो हिंदी रंगमंच के वर्तमान को परिभाषित कर रहे हैं। यह समय “महान नाटक” की खोज का नहीं, बल्कि अर्थवान प्रस्तुति के संघर्ष का समय है। सबसे पहले मैं उन दस नाटकों की चर्चा करता हूँ, जिसका मंचन मेरी दृष्टि में इस वर्ष के सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन हैं। मगर दस सर्वश्रेष्ठ नाटकों में चौदह नाटकों को रखा गया है और यह चयन भी अपूर्ण ही है। पहले पाँच नाटय-प्रस्तुतियाँ हाल के समय के पाँच सबसे सशक्त, दार्शनिक और चुनौतीपूर्ण रंगमंचीय अनुभव है।
ज्योति डोगरा निर्देशित ‘मेज़ोक’ इच्छाओं पर नहीं, इच्छा की बनावट पर ध्यान देता है। उन घाव पर बात करता है, जो भीतर पहाड़ की तरह जमा रहता है। मंच पर एक साधारण मेज़, वस्तु से अधिक स्मृति और भूगोल बन जाती है, ठीक वैसे ही जैसे समकालीन परफ़ॉर्मेंस थियेटर में वस्तुएँ अर्थ रचती हैं। बहुभाषिक प्रवाह (हिंदी, अंग्रेज़ी, लद्दाखी आदि) इच्छा को निजी नहीं, ऐतिहासिक और राजनीतिक अनुभव में बदल देता है। पहचान-पत्रों, नंबरों और काग़ज़ों की उपस्थिति आधुनिक मनुष्य की बेचैनी को सूक्ष्म व्यंग्य में बाँधती है। छह कलाकारों और आकार बदलती मेज़ के साथ यह प्रस्तुति एक रूपांतरणकारी यात्रा बनती है, जहाँ वस्तु स्मृति और भूगोल में बदल जाती है। मेज़ोक अंततः यह दिखाता है कि दूरी और आकांक्षा के बीच फँसा मनुष्य ही आज का सबसे बड़ा मंच है।
पर्ण पेठे निर्देशित ‘Something Like Truth’ नाटक सत्य, न्याय और स्वतंत्रता के प्रश्नों को चार स्त्रियों की आवाज़ों के माध्यम से संवेदनशील और चिंतनशील ढंग से उभारता है। इसके संवाद दर्शक को अपने भीतर के सवालों से सामना कराता है। नाटक में शब्दों को संगीत, आंदोलन और दृश्य भाषा के साथ मिलाकर शब्दों से परे अनुभव की ओर उठाया है, जिससे मंच पर मनुष्यता और लोकतंत्र का दर्पण उभरता है। यह नाटक चार महिला पात्रों के माध्यम से यह नाटक विभिन्न युगों और देशों में सत्य और प्रतिरोध की जटिलताओं को उजागर करता है, जिससे दर्शक इतिहास और वर्तमान की गहरी समझ प्राप्त करते हैं। संगीत, आंदोलन और संवाद की संयोजन शैली नाटक को सिर्फ देखने योग्य ही नहीं बल्कि अनुभवनीय बनाती है, जो भावनाओं और चिंतन दोनों को उत्तेजित करती है। पर्ण पेठे का निर्देशन और कलाकारों की सशक्त अभिव्यक्ति दर्शाती है कि थिएटर अब केवल कथानक नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और दार्शनिक विमर्श का माध्यम है। यह नाटक दर्शकों को सोचने पर मजबूर करता है कि कैसे सत्य, स्वतंत्रता और न्याय व्यक्तिगत और सामाजिक दोनों स्तरों पर लगातार परख का विषय बने रहते हैं।

मोहित टकलाकर निर्देशित ‘The Nether’ की आसक्त कैलामंच, पुणे द्वारा तकनीक, मनोविज्ञान और नैतिकता के बीच की सूक्ष्म दरारों को खोलता है। अमेरिकी नाट्यकार जेनिफर हेले का मूल पाठ है, जो भारत में मोहित टकलाकर की कलात्मक दृष्टि के साथ नया अर्थ पाता है। इसमें वर्चुअल रियलिटी केवल तकनीकी कल्पना नहीं, बल्कि मानव इच्छा और परिणाम की दार्शनिक परीक्षा बनकर उभरती है। प्लॉट उस समकालीन चिंतन को प्रतिबिंबित करता है जहाँ इंटरनेट और आभासी दुनिया न केवल मनोरंजन बल्कि मानसिकता और नैतिकता के सवाल उठाती है और पुछती है कि क्या जब यथार्थ और कल्पना की सीमाएँ धुंधली हो जाती हैं, तब नैतिकता और जिम्मेदारी का आधार क्या बचता है? आख़िरकार, यह प्रस्तुति हार मान लेने की कहानी नहीं, बल्कि उस ऐसी दुनिया का चिंतन है जहाँ इच्छाएँ, नियंत्रण और तकनीकी उन्माद हमें स्वयं के अस्तित्व के सबसे गहरे सवालों का सामना करने पर मजबूर करते हैं और यही इसे आज के समय का आवश्यक थिएटर बनाता है।
नसीरुद्दीन शाह निर्देशित ‘आइंस्टीन’ नाटक में महान वैज्ञानिक की प्रतिष्ठा, त्रासदी और आत्म-संदेह समान रूप से उभरते हैं। शाह का अभिनय इतना सजीव है कि दर्शकों को लगता है जैसे आइंस्टीन के भय और हास्य की दार्शनिक परतें खुलती चली जाती हैं। यह एक एकल‑अभिनय नाटक है जिसमें वैज्ञानिक सिद्धांत से लेकर युद्ध और नैतिक जिम्मेदारी तक के प्रश्न बिना दिखावे के सामने आते हैं, जिससे विज्ञान मानवता के भीतर की उलझनों से सीधे जुड़ता है। स्थापत्य‑रूप से सरल सेट (प्रिंस्टन अध्ययन, किताबें, वायलिन, काला बोर्ड) नाटक को दरबार‑सा अनुभव देता है, जहाँ विचार और स्मृति एक साथ मंचित होते हैं। ‘आइंस्टीन’ केवल वैज्ञानिक इतिहास नहीं, मानव संघर्ष का चिंतन‑स्थल है, जहाँ प्रतिभा, पछतावा, युद्ध का भय और तर्क की सीमाएँ दर्शक के भीतर देर तक गूंजती रहती हैं।
रणधीर कुमार और कृष्ण समिद्ध निर्देशित “स्मॉल टाउन ज़िंदगी” छोटे शहर की उस चुप पीड़ा का नाटक है, जहाँ आस्था, गरीबी और नियति एक-दूसरे में उलझकर मनुष्य को गढ़ती हैं। हृषिकेश सुलभ के उपन्यास ‘दाता पीर’ का कृष्ण समिद्ध द्वारा नाट्य रुपांतरण विश्वास के सहारे जीने को विवश मनुष्य की नैतिक और अस्तित्वगत त्रासदी बन जाती है। रशीदन और अमीना का समानांतर जीवन पीढ़ी-दर-पीढ़ी चलने वाले दारिद्र्य को एक दार्शनिक प्रश्न में बदल देता है, क्या हर जीवन की परिणति समाज और सत्ता द्वारा पहले से तय है? नाटक का निर्देशन और कलाकारों का संयमित अभिनय नाटक को भावुक नहीं, बल्कि गहराई से मार्मिक बनाता है। यह नाटक हमें याद दिलाता है कि “छोटा शहर” कोई भूगोल नहीं, बल्कि एक ऐसी मानसिक अवस्था है जहाँ सपने भी सीमित जगह में साँस लेते हैं।

2025 के दस सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन
आगे अमितेश ग्रोवर द्वारा निर्देशित ‘मेहरुन’ प्रेम, वियोग और लालित्य के प्रतीकों को नए अर्थ प्रदान करता है, जहाँ रंग और भावना एक-दूसरे में घुल-मिल जाते हैं। सारा मरियम की रचना स्त्री की अंतरात्मा की गहन पीड़ा और उसके पुनर्निर्माण की प्रक्रिया को काव्यात्मक और संगीतमय ढंग से व्यक्त करती है। अभिनय और संगीत के माध्यम से नाटक वास्तविकता और स्वप्न के बीच की सीमाओं को चुनौती देता है, दर्शकों को भावनाओं की गहराई में ले जाता है। कहानी व्यक्तिगत वियोग के माध्यम से सार्वभौमिक संवेदनाओं प्रेम, हानि और लालसा की खोज करती है। ‘मेहरुन’ नाटक केवल एक दृश्य अनुभव नहीं है, बल्कि थिएटर की शक्ति और संभावनाओं को विस्तार देता है।
रजत कपूर निर्देशित ‘करमजले ब्रदर्स’ The Brothers Karamazov के महान उपन्यास का हिन्दी रंगमंचीय अनुवाद है, जो पारिवारिक संघर्ष, विश्वास और नैतिक द्वंद्व को जीवंत करता है। यह प्रस्तुति पारिवारिक हत्या की कथा में हास्य और यथार्थ के बीच झूलती है। पारिवारिक पितृत्व की विघ्नपूर्ण आकांक्षा और पुत्रों की आशा की टकराहट को मंच पर ऐसे प्रस्तुत किया गया है कि हर संवाद में सामाजिक, दार्शनिक और मनोवैज्ञानिक परतें उभरती हैं। विनय पाठक जैसे प्रतिभाशाली कलाकार की उपस्थिति नाटक को शांत-उर्जा से भर देती है, जहाँ हास्य और गहराई साथ-साथ चलते हैं। यह नाटक आधुनिक भारतीय थिएटर में एक चुनौतीपूर्ण प्रयास है, जहाँ शास्त्रीय साहित्य की गंभीरता और समकालीन सामाजिक रंगभूमि का संवाद सहज लेकिन प्रभावशाली रूप से स्थापित होता है।

बांग्लादेशी निर्देशक कमालुद्दीन नीलू का ‘नेटिव पीयर’ का मंचन महत्वपूर्ण है, जो वर्तमान विश्व की नैतिक, राजनीतिक और मानवीय विडंबनाओं के बीच रखकर एक भयावह भविष्य-दृष्टि रचता है। यह नाटक बताता है कि आधुनिक सभ्यता की सबसे बड़ी त्रासदी इंसानी दिमाग है, जो सत्ता, हिंसा और बाज़ार में बदल चुका है। फंतासी, व्यंग्य और क्रूर यथार्थ मिलकर इसे केवल नाट्य-अनुभव नहीं, बल्कि वैश्विक चेतावनी बना देते हैं। मंच पर स्त्री-देह, युद्ध, पूँजी और सत्ता का संबंध असहज लेकिन सटीक ढंग से उजागर होता है। अंततः ‘नेटिव पीयर’ एक ऐसा नाटक है जो खत्म होने के बाद भी दर्शक के भीतर लंबे समय तक बेचैनी और आत्ममंथन छोड़ जाता है।
अनिरुद्ध सरकार निर्देशित “चंदा बेड़नी” इतिहास को कथा नहीं, लोक-स्मृति के जीवित शरीर की तरह मंच पर उतारता है। बुंदेलखंड की मिट्टी, संगीत और सामूहिक देह-गत लय के माध्यम से यह नाटक प्रेम और प्रतिरोध को एक ही सांस में रखता है। अनिरुद्ध सरकार के निर्देशन में संतुलन है, जो दृश्य सौंदर्य संघर्ष को ढकता नहीं और तीखा करता है। यह प्रस्तुति दिखाती है कि लोक रंगमंच केवल अतीत की विरासत नहीं, बल्कि शोषक-सत्ता के विरुद्ध एक सक्रिय भाषा है।
इस वर्ष के श्रेष्ठ दस नाटकों में वे प्रस्तुतियाँ विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं जो वर्षों से या दशकों से लगातार मंचित होती आ रही हैं, रिचर्ड शेकनर के अभ्यास निरंतरता (performance continuity) के सिद्धांत की तरह है, जिसमें निरंतरता रंगमंच को घटना नहीं सामाजिक संस्था में बदल देती है। ऐसे नाटक याद दिलाते हैं कि रंगमंच की सार्थकता नई होने में नहीं, बार-बार होने में भी है। ऐसे नाटक हर प्रस्तुति में थोड़ा बदला हुआ और थोड़ा थका हुआ होता है, फिर भी ज़रूरी होता है। ये प्रदर्शन नहीं, एक जीवित अभ्यास की तरह हैं।
इसलिए इस वर्ष रंगमंच की एक उपलब्धि विजय कुमार निर्देशित और अभिनीत ‘हम बिहार में चुनाव लड़ रहे हैं’ के 1000वें मंचन के रुप में हुआ, जो इब्राहीम अलकाजी के थिएटर सपने को जमीनी स्तर पर साकार करता है। ‘हम बिहार में चुनाव लड़ रहे हैं’ विजय कुमार का नाटक भारतीय रंगमंच में “नो फार्म” के प्रयोग का अद्भुत उदाहरण है। यह नाटक हर मंचन के साथ अपने स्वरूप को बदलता है, दर्शक और अभिनेता के बीच जीवंत संवाद का निर्माण करता है। विजय कुमार का शारीरिक अभिनय, देह की सूक्ष्मता और स्थिरता, भावों और व्यंग्य को शब्दों से परे संवेदनाओं में परिवर्तित करता है। नाटक में अभिनित पात्र बहु-कोडित है, जिसमें एक ही अभिनेता कई सामाजिक और राजनीतिक चरित्रों का आरोपण करता है, जो परसाई के व्यंग्य को जीवित रंगमंचीय रूप में प्रस्तुत करता है। गीत और लोक-संवाद नाटक की रैखिकता को तोड़कर दर्शक को सक्रिय अनुभव में खींचते हैं। इस नाटक में राजनीतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक संदर्भों का मिश्रण अत्यंत सूक्ष्म है, जो बिहार और भारतीय समाज की समकालीन विवेकशीलता को उद्घाटित करता है। नाटक की प्रक्रिया, प्रयोग और निरंतर परिवर्तन इसे स्थायी रूप से “जीवित रचना” बनाते हैं। विजय कुमार ने लोक, शास्त्रीय और वैश्विक रंगशैलियों का संगम करके आधुनिक-लोक रंगमंच का स्वरूप रचा है। यह नाटक केवल प्रदर्शन नहीं, बल्कि दर्शक की चेतना में घटित होने वाला अनुभव है, जो प्रक्रिया को महत्व देता है।
मीता वशिष्ठ निर्देशित और अभिनीत ‘लाल देद’ भी पिछले 21 वर्षों से लगातार मंचन 2025 में भी भारतीय रंगमंच की एक दुर्लभ उपलब्धि है, जहाँ अभिनय अभ्यास नहीं, साधना बन जाता है। मीता वशिष्ठ का एकल अभिनय इतिहास, दर्शन और स्त्री-अस्तित्व को देह की स्मृति में बदल देता है। यह प्रस्तुति न कथा कहती है, न उत्तर देती है, यह दर्शक को भीतर तक सुनने के लिए विवश करती है। ‘लाल देद’ नाटक भारतीय रंगमंच में स्त्री चेतना और आध्यात्मिक अनुभव का अद्भुत समन्वय प्रस्तुत करता है। मीता वशिष्ठ द्वारा अभिनीत यह एकल प्रस्तुति न केवल कश्मीरी कवियित्री लाल देद के जीवन और दर्शन को जीवंत करती है, बल्कि शारीरिक रंगमंच और दृश्यात्मक प्रतीकों के माध्यम से आत्म-बोध की सूक्ष्मता दर्शाती है। यह नाटक मध्यकालीन धार्मिक और सामाजिक संरचनाओं को केवल अनुकरण नहीं करता, बल्कि एक कालातीत, अनुभवात्मक यथार्थ रचता है, जो समकालीन संवेदनाओं और स्त्री आध्यात्मिकता से संवाद करता है। ‘लाल देद’ एक दृश्य-काव्य है, जो भारतीय रंगपरंपरा में आत्मा, मिथक और सांस्कृतिक स्मृति के बीच संतुलित संवाद स्थापित करता है, और यह साबित करता है कि नाटक केवल कथ्य नहीं, बल्कि अनुभव की पुनर्रचना भी है।
सविता रानी निर्देशित और अभिनीत “नोशनस इन बिट्वीन यू एंड मी” पिछले कई वर्षों से ऐसा नाटक है जो शब्दों से पहले शरीर, श्वास और संवेदना के माध्यम से मनुष्य के अस्तित्व को छूता है। प्रारंभिक मौन और जल-स्पर्श की अनुभूति दर्शक को भीतर की यात्रा के लिए तैयार करती है। नाटक में जीवन के प्रश्न उभरते हैं, जो प्रश्न शेक्सपियर से लेकर आधुनिक अस्तित्ववाद तक फैला है। गति, ध्वनि और प्रकाश मिलकर एक ऐसी भाषा रचते हैं जहाँ अर्थ बताया नहीं जाता, महसूस कराया जाता है। नाटक का दूसरा हिस्सा जानबूझकर कठिन है, जो दर्शक से सक्रिय भागीदारी की माँग करता है। सविता रानी की निजी कथा धीरे-धीरे हर स्त्री की सामूहिक त्रासद स्मृति में बदल जाती है, जिसमें नाम, देह और पहचान के संघर्ष की कथा होती है। वैवाहिक हिंसा के दृश्य दर्शक को असहज करते हैं। यह नाटक देखने का नहीं, झेलने का अनुभव है। ‘नोशनस’ साबित करता है कि रंगमंच आज भी आत्मा को हिला सकता है, अगर वह ईमानदार और निर्भीक हो।
लक्की जी गुप्ता निर्देशित और अभिनीत ‘माँ मुझे टैगोर बना दे’ एक रोमांटिक स्वप्न की भाँति अपनी 1763वीं प्रस्तुति पूरी कर चुका है। यह नाटक शिल्प पूरी तरह अभिनय-केंद्रित है, जहाँ रंगमंचीय उपकरणों की अनुपस्थिति स्वयं एक सशक्त डिज़ाइन बन जाती है। नाटक की सबसे बड़ी ताकत इसकी भावनात्मक संप्रेषण-क्षमता है, जो दर्शक को अपने निजी अनुभवों से जोड़ देती है। यह इसकी कमजोरी भी है और कथ्य का कृत्रिम नियतिवाद और प्रक्रियागत यथार्थ का अभाव तर्कशील दर्शक के लिए एक दूरी पैदा करता है। फिर भी, यह प्रस्तुति अभिनय को रंगमंच का सबसे सशक्त औज़ार सिद्ध करते हुए एक वैकल्पिक, शैक्षणिक रंगमंचीय मॉडल प्रस्तुत करती है। लकी जी ने इस वर्ष एक नए नाटक की आठवीं प्रस्तुति की है – ‘बहरूपिया’। यह नाटक पहचान और रूपांतरण की मानवीय राजनीति को सादे मंचीय शिल्प में कहती है, उम्मीद है कि कथा-स्तर अलग होकर भी प्रक्रिया के स्तर पर यह ‘माँ मुझे टैगोर बना दे’ का दोहराव बनकर नहीं रह जाये।
फिरोज़ अब्बास ख़ान निर्देशित ‘हिंद: 1957’ एक संवेदनशील और गहन पारिवारिक नाटक है, जो इस वर्ष के श्रेष्ठ दस नाटकों में में अंतिम और चौदहवाँ नाटक है। यह नाटक अगस्त विल्सन के पुलित्ज़र विजेता नाटक Fences का हिन्दुस्तानी रूपांतरण है। फिरोज़ अब्बास ख़ान के निर्देशन में, नाटक विभाजनोत्तर भारत के सामाजिक-राजनीतिक संदर्भों में पितृसत्तात्मक संघर्ष और पीढ़ियों के मतभेद को उत्कृष्ट रूप से उजागर करता है। सचिन खेड़ेकर ने इस थके और टूटे हुए पिता की भूमिका में इतिहास, पूर्वाग्रह और भेदभाव की पीड़ा को सहजता और भावनात्मक गहराई के साथ प्रस्तुत किया, जो भूमिका गर्म हवा के बलराज साहनी की याद दिलाती है। अभिषेक शुक्ला की कविताएँ नाटक में अंतर्निहित इच्छाओं, असफलताओं और आशाओं के भाव को और गहन बनाती हैं, जो हर दृश्य को मनोवैज्ञानिक और सामाजिक परिप्रेक्ष्य में संवेदनशील बनाती हैं। विकास बहारी के रुपांतरण ने मूल कथा की वैश्विक प्रासंगिकता को भारतीय परिवेश में सहजता से स्थापित किया। नाटक में पिता और पुत्रों के बीच भविष्य की आशा और अतीत के बोझ का संघर्ष तीव्र और अपरिहार्य दिखता है, जो दर्शक को भावनात्मक रूप से बांधे रखता है। सोनल झा और सहायक कलाकारों की मजबूत भूमिकाएँ पारिवारिक द्वंद्व और सामाजिक विषमताओं की गहराई को और सजीव करती हैं। यह प्रस्तुति जातिवाद, धर्म और सामाजिक भेदभाव के मुद्दों को भी सूक्ष्म ढंग से छूती है, जिससे दर्शक को चिंतन और आत्मावलोकन का अवसर मिलता है। कुल मिलाकर, हिंद: 1957 पारिवारिक, सामाजिक और ऐतिहासिक आयामों को बहुस्तरीय दृष्टिकोण से पेश करता है और दर्शक को एक अविस्मरणीय थिएटर अनुभव देता है।
तुलनात्मक अध्ययन
प्रसंगवश इस विषय पर किये गये दो और नाटकों से तुलनात्मक अध्ययन आवश्यक है। कला के सायस उपयोग के स्तर पर ‘हिंद: 1957’, ‘तमस’ और ‘दिल्ली 1946’ एक ही विषय पर दो अलग-अलग रंगमंचीय नैतिकताएँ रचते हैं।
पहला राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के वर्तमान निर्देशक चितरंजन त्रिपाठी की ‘तमस’ विभाजन को स्मृति-नाटक नहीं, बल्कि जीवित सामाजिक मनोविज्ञान के रूप में मंच पर पुनः उपस्थित करती है। राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय में पहले ‘तमस’ के मंचन के स्थगन के बाद इसका मंचन हुआ, जिसके लिए चितरंजन त्रिपाठी प्रशंसा के पात्र हैं। परंतु कुछ वैचारिक जोड़-घटाव बहस को जन्म देते हैं। ये बदलाव नाटक की मूल संवेदना और प्रश्न को कमजोर नहीं कर पाते। ये बदलाव और स्थगन भीष्म साहनी के उपन्यास की प्रासंगिकता को और प्रमाणित करता है। यह प्रस्तुति व्यक्ति के बजाय समुदायों के चरित्र रचती है, जहाँ हिंसा किसी एक धर्म की नहीं, बल्कि भय, अफ़वाह और सत्ता-राजनीति की उपज बनकर उभरती है। चितरंजन त्रिपाठी के निर्देशन की सबसे बड़ी शक्ति उसकी सामूहिकता है, जो भीड़, शोर और ठहराव मिलकर इतिहास की नैतिक घुटन को मूर्त कर देते हैं। इस नाटक का मंचन इस मायने में महत्वपूर्ण है कि इससे पुनर्थात्नवादी राष्ट्रवादी प्रवृति की प्रक्रिया और प्राथमिकता स्पष्ट होती है और निकट भविष्य में सरकार समर्थित रंगमंच का स्वर और दिशा यही रहेगी। इन सबके बावजूद अंततः ‘तमस’ का यह मंचन हमें यह याद दिलाता है कि विभाजन अतीत की घटना नहीं, बल्कि वर्तमान की लगातार लौटती हुई चेतावनी है।
विकास बहारी निर्देशित और लिखित ‘दिल्ली 1946’ एक समकालीन हिन्दी मंचन है, जो विभाजन के ऐतिहासिक पूर्वानुमान को नाटक की लय और मानवीय संवेदनाओं के साथ बेहद साफ़ तौर पर पेश करता है। विकास बहारी का लेखन‑निर्देशन 1946 के दिल्ली के सामाजिक तनावों और रिश्तों की जटिल राजनीति को पौने तौर पर शब्दों और पात्रों के माध्यम से खोलता है। यह प्रस्तुति बताती है कि कैसे अलगाववादी राजनैतिक विचारों ने लंबे समय तक शांतिपूर्ण सहअस्तित्व को छिन्न कर दिया और कैसे परिवार के भीतर भी विचारों का टकराव व्यक्तिगत बल्कि सामाजिक विभाजन को प्रतिबिंबित करता है। पिता‑संतान के बीच का संघर्ष, जिसके केंद्र में इतिहास, भय और आशा है, न केवल कहानी को आगे बढ़ाता है बल्कि भारतीय रंगमंच को स्मृति और चेतना के बीच एक संवेदनशील संवाद प्रदान करता है। दर्शक को यह एहसास दिलाता है कि भाषाएं, संगीत और सांस्कृतिक साझा‑अनुभव पहले एकता के प्रतीक थे, जिन्हें राजनीति ने अस्थिर कर दिया था और ये सवाल आज भी प्रासंगिक हैं। कुल मिलाकर, दिल्ली 1946 राजनीति से परे मानव स्वभाव के सवालों को उनके ऐतिहासिक आधार पर पुनःस्थापित करता है, जो आज के सामाजिक विमर्श में एक चिंतनशील स्थान रखता है।
तीनों नाटक की तूलना से कई बातें स्पष्ट होती है। ‘हिंद: 1957’ और ‘दिल्ली 1946’ में कला का प्रयोजन पारिवारिक अंतरंगता के माध्यम से संप्रदायिकता के इतिहास को मानवीय पीड़ा में बदलना है। यहाँ अभिनय और कविता भावनात्मक संप्रेषण के औज़ार हैं, जो दर्शक को भीतर से बाँधते हैं। इसके विपरीत ‘तमस’ में कला का उपयोग सामूहिक चेतना के निर्माण के लिए होता है, जहाँ व्यक्ति नहीं, समुदाय की पहचान मंच का नायक है। यह प्रस्तुति कला को राजनीतिक चेतावनी में रूपांतरित करती है। तीनों नाटकों में कला का लक्ष्य समान नहीं है। ‘तमस’ ऐतिहासिक-राजनीतिक नैतिकता को और ‘हिंद: 1957’ और ‘दिल्ली 1946’ वैचारिक-मानवीय संतुलन को रचते हैं।
इस भिन्नता से समकालीन भारतीय रंगमंच के परिवर्तन को समझा जा सकता है। युर्गेन हबरमास की The Structural Transformation of the Public Sphere (1962) में जिस सार्वजनिक क्षेत्र के क्षरण की बात है, हिंदी रंगमंच आज उसी क्षरण के बीच एक वैकल्पिक सार्वजनिकता रचने की कोशिश करता दिखता है। हबरमास बताते हैं कि पुनर्जागरण के बाद आधुनिक यूरोप में “सार्वजनिक क्षेत्र” वह स्थान था जहाँ निजी नागरिक सत्ता से स्वतंत्र होकर तर्कपूर्ण विमर्श करते थे। यह सार्वजनिक क्षेत्र साहित्यिक सैलून, कैफ़े और प्रेस के माध्यम से विकसित हुआ, जिसने लोकतांत्रिक आलोचना को जन्म दिया। उन्नीसवीं–बीसवीं सदी में पूँजीवाद, राज्य और बाज़ार के गठजोड़ ने इस तर्कशील सार्वजनिकता को कमजोर कर दिया। मीडिया के व्यापारीकरण और जनमत के प्रबंधन से सार्वजनिक विमर्श “प्रचार” में बदलने लगा। हबरमास के अनुसार लोकतंत्र का भविष्य इसी बात पर निर्भर है कि तर्कपूर्ण सार्वजनिक संवाद को कैसे पुनर्जीवित किया जाए। यह सार्वजनिकता अख़बार या संसद से नहीं, बल्कि मंच पर उपस्थित जीवित देह से जन्म लेती है। 2025 का हिंदी रंगमंच इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि वह उस क्षण में बोल रहा है जहाँ बोलना स्वयं जोखिमपूर्ण हो चुका है। उदाहरण के लिए दिल्ली का मंडी हाउस केंद्रित रंगमंच लगभग अस्सी प्रतिशत तक राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय पोषित है, जो वर्तमान सरकार के बदली हुई सांस्कृतिक नीतियों में अलग तरह से काम कर रही है। इसलिए इस सरकारी मॉडल पर निर्भर पुराने रंगकर्मियों के सामने अस्तित्व का प्रश्न का सामना करना पड़ रहा है। स्पष्ट है कि हिंदी रंगमंच को सरकारी सहयोग के बाहर एक आत्मनिर्भर मॉडल विकसित करना होगा।
आवश्यक सूची : अन्य 23 महत्वपूर्ण नाटक
अब जिन नाटकों की चर्चा हो रही है, वे किसी भी तरह से उपरोक्त सूची के नाटकों से कमतर नहीं हैं और अंतर केवल दृश्यता का है, सार का नहीं। वाल्टर बेंजामिन की तरह कहें तो कला का मूल्य उसकी उपस्थिति में नहीं, उसके अनुभव में बसता है। रंगमंच का इतिहास बताता है कि कई निर्णायक नाटक हाशियों पर रहकर ही केंद्रीय प्रश्न रचते हैं, जिसका महत्व समय के साथ खुलता है। इसलिए कला का कोई भी पैमाना, पुरस्कार, सूची या चयन—अंतिम नहीं होता है, अस्थायी होता है। इस तरह की सूची की एक मात्र सार्थकता तात्कालिक संवाद में है, बस। अंत में जो बचा रह जाता है, वह है दर्शक के भीतर टिकने वाली बेचैनी और वही कला की वास्तविक कसौटी है। इतिहास और समय अपने सर्वश्रेष्ठ की सूची स्वयं बनाती है, जो अंतिम होती है।
इस दृष्टि से योगेंद्र चौबे की ‘बहादुर कलारिन’ लोककथा को स्मृति-नाटक नहीं, बल्कि गहरी मानवीय त्रासदी के रूप में मंच पर प्रतिष्ठित करती है। हबीब तनवीर के नाट्य-विरासत से संवाद करते हुए यह प्रस्तुति ‘देसीपन’ को अनगढ़ नहीं, संस्कारित संवेदना में रूपांतरित करती है। छाछन का चरित्र यहाँ अज्ञान का नहीं, विकृति का प्रतीक बनकर उभरता है, जिससे त्रासदी और अधिक असहज व सच्ची हो जाती है। मंच-संयोजन, कोरस और लोक-लय मिलकर एक ऐसी दुनिया रचते हैं जहाँ रस और भय साथ-साथ चलते हैं। अंततः यह प्रस्तुति सिद्ध करती है कि लोक के भीतर छिपी त्रासदी आज भी शास्त्रीय रंगमंच को चुनौती और ऊर्जा दोनों दे सकती है।
युकी एलियास निर्देशित ‘ द फार पोस्ट (The Far Post)’ युद्ध और मृत्यु के गहरे सवालों को हल्के, हास्यपूर्ण और कल्पनाशील अंदाज में प्रस्तुत करता है, जहाँ दो शत्रु सैनिकों की आत्माएँ पोस्टमैन आंटी और उसके सुनहरी मछली के साथ परलोक की यात्रा करती हैं। युकी एलियास का निर्देशन शारीरिक थिएटर, मास्क और कठपुतली के माध्यम से संवेदनाओं को दृश्य रूप देता है, जो पारंपरिक नाट्य रूपों और आधुनिक प्रयोगों का मिश्रण है। सिक्किम की सोफियुम (Sofiyum) बैंड द्वारा जीवंत लोक-संगीत नाटक की भावनात्मक और सांस्कृतिक गहराई को और भी सशक्त बनाता है। यह नाटक मृत्यु, संघर्ष और मानवीय संबंधों पर दार्शनिक विचारों को हल्के और सुलभ ढंग से प्रस्तुत करता है, जो सभी उम्र के दर्शकों को सोचने पर मजबूर करता है। ‘द फार पोस्ट’ केवल एक दृश्य अनुभव नहीं, बल्कि युद्ध और शांति, जीवन और मृत्यु के बीच मानवीय संवेदनाओं का अंतरराष्ट्रीय संवाद है, जो थिएटर की सीमाओं को चुनौती देता है।
पुंज प्रकाश निर्देशित ‘राग दरबारी’ का यह मंच रूपांतरण आज़ादी के बाद के भारतीय लोकतंत्र की भीतरी दरारों को तीखे लेकिन सहज व्यंग्य में खोलता है। श्रीलाल शुक्ल की भाषा और दृष्टि यहाँ नॉस्टेल्जिया नहीं, बल्कि जीवित सामाजिक आलोचना बनकर उभरती है। पटना की दस्तक इस कथा को सामूहिक अभिनय और लोक-संवेदना के सहारे एक जीवंत सामाजिक दस्तावेज़ में बदल देती है। पुंज प्रकाश का निर्देशन सत्ता, पंचायत, शिक्षा और नैतिक पतन को बिना भाषणबाज़ी के उजागर करता है। यह प्रस्तुति हँसाते हुए चुभती है और यही ‘राग दरबारी’ की सबसे बड़ी रंगमंचीय सफलता है। इसमें युवा अभिनेता राहुल कुमार का वैद्य जी के रुप में अभिनय प्रशंसनीय है।
पुर्वा नरेशनिर्देशित ‘लेडीज संगीत’ नाटक केवल एक शादी का मनोरंजक दृश्य नहीं, बल्कि परंपरा, लिंग‑भूमिका और सामाजिक अपेक्षाओं पर एक तीक्ष्ण आलोचनात्मक टिप्पणी है, जो शादी के उत्सव के मंच को सांस्कृतिक शोध का स्थान बनाता है। यह नाटक पारिवारिक समारोह की चमक‑धमक के पीछे छिपे पितृसत्ता, बॉलीवुडीकरण और लिंग आधारित रूढ़ियों को व्यंग्य और संगीत के माध्यम से उभारती है। नाटक में दादी का प्रतिबंध केवल हास्य तत्व नहीं, बल्कि उस पुरानी मानसिकता का संकेत है जो आज भी सामाजिक समारोहों में पुरुष‑निग्रहित मानदण्डों को पुष्ट करती है। संगीत, शास्त्रीय से लेकर लोक स्वरूप, संवादों के साथ मिलकर स्त्री‑आत्मा की आवाज़ और उसकी कठिनाइयाँ बताता है, जहाँ उत्सव ही एक सवाल बन जाता है। परिणामतः ‘लेडीज संगीत’ हँसी के साथ सोचने पर मजबूर करने वाला नाटक है, जो पारिवारिक मानदण्डों को चुनौती देकर दर्शक को सांस्कृतिक आत्मनिरीक्षण की दिशा में खींचता है।
संजय उपाध्याय का ‘बिदेसिया’ भिखारी ठाकुर की लोक-करुणा को संगीत और देहगत भावनाओं में सजीव कर देता है। प्रवास, स्त्री-वियोग और पुरुष-अपराधबोध यहाँ कथा नहीं, बल्कि सामूहिक स्मृति बनकर उभरते हैं। बिदेसिया भीतर से टूटा हुआ मनुष्य दिखता है, जबकि पत्नी का मौन ही नाटक की सबसे तेज़ आवाज़ है। लोक-नृत्यों की रंगत मंच को उत्सव का दृश्य देती है, साथ ही कथा की पीड़ा को और तीव्र बनाती है। यह प्रस्तुति याद दिलाती है कि लोकनाटक केवल परंपरा नहीं, बल्कि आज भी जीवित सामाजिक प्रश्न का सबल माध्यम हो सकता है। इस नाटक का प्रथम मंचन 1990 में हुआ, जिसके संगीतकार और निर्देशक संजय उपाध्याय हैं, जिन्होंने इसे आधुनिक लोक-संगीतात्मक नाट्य का सशक्त रूप दिया। पिछले 35 वर्षों से
अब तक बिदेसिया के लगभग 800 से अधिक मंचन में हो चुके हैं, यह निरंतरता रंगमंच के लिए एक उपलब्धि है।
मकरंद देशपांडे निर्देशित ‘A LOVE STORY “1938-1979” प्रेम को निजी भावना नहीं, इतिहास-संलग्न नैतिक संकल्प के रूप में देखती है। 1938–1979 के बीच फैली यह कथा राष्ट्र, प्रतिबद्धता और स्त्री-पुरुष साझेदारी की एक शांत लेकिन दृढ़ गाथा रचती है। नादिरा ज़हीर बब्बर, नूर ज़हीर और जूही बब्बर सोनी की लेखनी स्मृति को संवेदना में बदल देती है। मकरंद देशपांडे का निर्देशन प्रेम को नाटकीय नहीं, वैचारिक गरिमा देता है। यह नाटक बताता है कि सच्चा प्रेम वही है, जो समय, संघर्ष और इतिहास—तीनों की परीक्षा में खरा उतरे।
नसीरुद्दीन शाह निर्देशित ‘कम्बख़्त बिल्कुल औरत’ मंच पर इस्मत चुग़ताई की वैचारिक निर्भीकता को जीवित स्मृति की तरह उपस्थित करती है। आत्मकथात्मक अंशों और निबंधों की संरचना स्त्री-अस्तित्व को कथा नहीं, अनुभव के रूप में सामने लाती है। नसीरुद्दीन शाह का निर्देशन भाषा, देह और मौन के बीच संतुलित संवाद रचता है। सिर्फ़ महिला कलाकारों की उपस्थिति इस्मत की दृष्टि को किसी नारे के बिना राजनीतिक बना देती है। यह नाटक स्त्री-विमर्श को सहानुभूति से नहीं, सच्चाई की कठोर रोशनी से देखने की ज़िद करता है।
आकर्ष खुराना निर्देशित और कुमुद मिश्रा अभिनीत नाटक ‘धूम्रपान’ कॉर्पोरेट 2017 से जीवन की राजनीति, तनाव और मानवीय व्यवहार का व्यंग्यपूर्ण चित्र प्रस्तुत करता रहा है। अधीर भट्ट की लिखी पटकथा कार्यालय के स्मोकिंग रूम के माध्यम से वर्गीय और प्रशासनिक संघर्षों को सूक्ष्म हास्य के साथ उजागर करती है। कुमुद मिश्रा ‘बॉस’ की भूमिका में अभिनय की बारीकियों और मानवीय कमजोरियों को सहजता से व्यक्त करते हैं, जो नाटक को जीवंत बनाता है। निर्देशक आकर्ष खुराना ने दृश्य और संवादों के माध्यम से कॉर्पोरेट संरचना में दबाव, आकांक्षाओं और रिश्तों की जटिलताओं को प्रभावशाली ढंग से मंचित किया है। ‘धूम्रपान’ केवल हास्य का माध्यम नहीं, बल्कि आधुनिक कार्यस्थल और समाज की सूक्ष्म राजनीतिक और भावनात्मक विसंगतियों का दर्पण है। पर संवादो में कई जगह सरलीकरण की समस्या है।
दानिश हुसैन निर्देशित और अभिनित ‘मैं पल दो पल का शायर’ नाटक पिछले कई वर्षों से साहिर लुधियानवी के जीवन, संघर्ष और उनकी कविताओं की गहराई को अद्भुत संवेदनशीलता से प्रस्तुत करता है। दानिश हुसैन की अभिनय-निर्देशन शैली साहिर के अर्ध-आत्मकथात्मक जीवन और उनके सामाजिक सरोकारों को सहज और प्रभावशाली ढंग से मंचित करती है। पटकथा और संगीत का संयोजन, विशेषकर खय्याम साहब और अन्य संगीतकारों के गीतों के माध्यम से, नाटक में नॉस्टैल्जिया और भावनात्मक गहराई पैदा करता है। नाटक न केवल साहिर की प्रेम कहानियों का प्रदर्शन करता है, बल्कि उनके साहित्यिक संघर्ष, सामाजिक चेतना और मानवीय संवेदनाओं का बारीक चित्रण करता है। यह प्रस्तुति दर्शकों को केवल मनोरंजन नहीं देती, बल्कि हिंदी सिनेगीत और उर्दू कविता की समृद्ध विरासत के साथ साहिर के समयोत्तर महत्व को उजागर करती है।
के. के. रैना निर्देशित ‘हार्दित कौर गिल’ में इब्सेन की हैड्डा गैबलर केवल स्त्री-मुक्ति का नाटक नहीं रहती, बल्कि आधुनिक मनुष्य की आत्म-विनाशक आकांक्षा का गहन रूपक बन जाती है।
इला अरुण का रूपांतरण हैड्डा को भारतीय सामाजिक संरचना में रखते हुए उसके भीतर के सत्ता-लोभ, ऊब और भावनात्मक हिंसा को और तीखा कर देता है। के. के. रैना का निर्देशन इस हिंसा को शोर में नहीं, बल्कि सूक्ष्म चुप्पियों, ठहरे हुए क्षणों और नैतिक घुटन में रचता है। यह नाटक बताता है कि दमन केवल बाहरी नहीं होता—अक्सर व्यक्ति स्वयं अपनी कारागार की दीवारें खड़ी करता है। अंततः ‘हार्दित कौर गिल’ एक स्त्री की नहीं, बल्कि उस आधुनिक चेतना की त्रासदी है जो स्वतंत्रता चाहती है, पर संतुलन नहीं सीख पाती।
भूमिका दुबे निर्देशित और लिखित ‘केला जामूनवाली’ एक सूक्ष्म लेकिन शक्तिशाली महिला प्रधान‑नाटक है, जो 1950 के दशक की ग्रामीण पृष्ठभूमि से उठती हुई स्वप्न, आकांक्षा और सामाजिक सीमाओं के बीच की दरारें खोलती है। नाटक का मंचन भूमिका दुबे की आवाज़ और शारीरिक उपस्थिति को केवल प्रस्तुति नहीं, मन की यात्रा के रूप में बदल देता है, जहाँ हर दृश्य में आत्म‑निरिक्षण और परंपरा के दबाव की झलक मिलती है। पितृसत्ता और रूढ़िवादी प्रथाओं के साथ संघर्ष की यह कथा न केवल कला और पहचान का सवाल उठाती है, बल्कि महिलाओं की लंबे समय से दबाई गई आशाओं को संवेदनशीलता से सामने लाती है। हास्य और विलाप के संतुलन के साथ नाटक दर्शक को हर्ष और पीड़ा के बीच एक अंतरंग अनुभव देता है, जो नायक के भीतर के मनोवैज्ञानिक परिवर्तनों को भी स्पष्ट करता है। यह प्रस्तुति बताती है कि छोटी‑सी कहानी में भी बड़ी मानव‑कथा समाई हो सकती है, जहाँ आम जीवन के साधारण तत्वों में आत्म‑स्वीकृति और धैर्य की महानता मौजूद है।
स्वाती दुबे निर्देशित ‘वासाँसी जीर्णानि’ समागम रंगमंडल की वह प्रस्तुति है। महेश एलकुंचवार लिखित यह नाटक यहाँ परिवार को एक भावनात्मक प्रयोगशाला में बदल देता है, जहाँ प्रेम, अहं और चुप्पियाँ समान रूप से सक्रिय हैं। स्वाती दुबे का निर्देशन शोर से बचते हुए मौन की राजनीति रचता है और पात्र बोलने से अधिक अपने भीतर ढहते हैं। नाटक का शीर्षक गीता के श्लोक से लिया गया है और देह एवं संबंधों की नश्वरता याद दिलाता है कि पुराने वस्त्रों की तरह रिश्ते भी उतरते हैं, पर उनके निशान रह जाते हैं। हर पात्र अपने अधूरे जीवन को देखता है, बिना किसी नाटकीय राहत के। आशीष त्रिपाठी का कला निर्देशन न्यूनतम है, जिससे मनोवैज्ञानिक तनाव और तीखा हो उठता है। यह प्रस्तुति बताती है कि उम्र के अंत में हाथ कुछ नहीं लगता, सिवाय उन सवालों के, जिन्हें जीवन भर टालते रहे।
ध्वनि विज निर्देशित ‘बाघिन’ थर्ड स्पेस कलेक्टिव का नाटक पहाड़ों की संस्कृति, लोकगीत और सामाजिक-सांस्कृतिक संघर्षों को सजीव रूप में प्रस्तुत करता है। यह नाटक उत्तराखंड के मूल निवासियों और आधुनिक विकास के बीच झूलते सवालों, भू-कानून, इंसान और जानवर के संबंध को संवेदनशील ढंग से उठाता है। गढ़वाली और कुमाऊनी भाषाओं में संवाद तथा जागर और हुड़का की पारंपरिक ध्वनियाँ नाटक की स्थानीय आत्मा और सामुदायिक चेतना को जीवंत करती हैं। पर्दे पर जीवन, संघर्ष और पर्यावरणीय न्याय की बहस को समेटते हुए यह नाटक दर्शकों को गहरे दार्शनिक और सांस्कृतिक चिंतन की ओर प्रेरित करता है। ‘बाघिन’ केवल एक नाट्य प्रस्तुति नहीं, बल्कि पहाड़ी समाज और उसके अधिकारों, पहचान और प्रकृति के साथ रिश्ते की बहुआयामी यात्रा है।
नील चौधुरी निर्देशित ‘तारामंडल’ का नाटक जीवन, पहचान और मानवीय संवेदनाओं की जटिलताओं को सजीव रूप में प्रस्तुत करता है। यह नाटक केवल कहानी नहीं, बल्कि मंच पर भावनाओं और विचारों का एक प्रयोगात्मक और बौद्धिक अन्वेषण है। अभिनय, निर्देशन और अभिनय की सूक्ष्मता दर्शकों को सामाजिक और दार्शनिक प्रश्नों पर सोचने के लिए प्रेरित करती है। ‘तारामंडल’ आधुनिक भारतीय रंगमंच में संवेदनशील और विचारोत्तेजक नाट्य प्रस्तुति का उत्कृष्ट उदाहरण है।
निर्देशक सौरभ अनंत और ‘विहान’ समूह की प्रस्तुति ‘गांधी कथा’ एक ऐसी प्रस्तुति है जो इतिहास से अधिक रंगमंचीय शिल्प की शक्ति पर भरोसा करती है। लियोनार्डो दा विंची की द लास्ट सपर जैसी स्थिर संरचना में रचा गया यह नाटक एक लंबे, गतिशील चित्र की तरह सामने आता है, जहाँ दृश्य बदलते नहीं, बल्कि अर्थ बदलते हैं। सौरभ अनंत का निर्देशन डिज़ाइन-केंद्रित है, जिसमें कोरस, संगीत, लोक-शैलियाँ और देहगत अभिनय मिलकर एक दृश्य–श्रव्य उत्सव रचते हैं। अभिनेता समूह का सामूहिक अभिनय अनुशासन और ऊर्जा का उदाहरण है, जो एक ही दृश्य में अनेक भूमिकाओं को सहजता से रूपांतरित करता है। पर यही डिज़ाइन धीरे-धीरे कथा पर हावी हो जाता है और गांधी का जीवन प्रश्नों से अधिक घोषणाओं में बदलता जाता है। यह प्रस्तुति सोचने से अधिक सम्मोहित करती है, जो देखने और सुनने में समृद्ध है, पर प्रश्न उठाने में संकोची। अंततः ‘गांधी कथा’ गांधी की कथा नहीं, गांधी का उत्सव है, जहाँ प्रक्रिया प्रभावी है, पर उद्देश्य अधूरा रह जाता है। इसके बाद भी यह इस वर्ष की महत्वपूर्ण प्रस्तुति है।
विपिन कुमार निर्देशित ‘वार ब्राइड्स’ यह याद दिलाता है कि युद्ध केवल मोर्चों पर नहीं, स्त्रियों के शरीर और निर्णयों पर भी लड़ा जाता है। मेरियन क्रेग वेंटवर्थ का यह प्रथम विश्वयुद्धकालीन नाटक स्त्री को राष्ट्र की जैविक संपत्ति में बदलने वाली राजनीति को तीखे रूपक में खोलता है। विपिन कुमार का निर्देशन पाठ को ऐतिहासिक दस्तावेज़ की तरह नहीं, जीवित वैचारिक बहस की तरह प्रस्तुत करता है। मंच पर स्त्री की सहमति का प्रश्न केंद्रीय नैतिक संघर्ष बनकर उभरता है, जो आज के समय में और अधिक प्रासंगिक लगता है। नाटक का अंत करुणा नहीं, प्रतिरोध पैदा करता है। अभिनय में संयम है, भावुकता नहीं और यही इसकी वैचारिक दृढ़ता को मजबूत करता है। एलटीजी रंगमंडल की सामूहिक ऊर्जा नाटक को घोषणापत्र बनने से बचाती है। ‘वार ब्राइड्स’ युद्ध-विरोध को नारे की तरह नहीं, स्त्री-अस्तित्व के प्रश्न की तरह रखता है।
टीकम जोशी निर्देशित ‘अंधायुग’ दृश्य नहीं मात्र नहीं रचता है। बिना मंचीय तामझाम के, नवोदित कलाकारों की सामूहिक स्वर-साधना महाभारत की त्रासदी को भीतर तक उतार देती है। यह प्रस्तुति सत्ता, हिंसा और नैतिक अंधत्व को देखने नहीं, सुनने और आत्मसात करने का आग्रह करती है। भारती के जन्म शताब्दी वर्ष में यह अंधायुग नहीं, बल्कि हमारी समकालीन चेतना का शुद्ध श्रव्य प्रतिबिंब बन जाता है।
पंकज कपूर निर्देशित ‘ड्रिम्ज सेहर एक ऐसा नाटक है जो पंकज कपूर के स्वप्न और वास्तविकता के बीच के अंतर को छूते हुए दर्शक को अंत तक सोचने पर मजबूर रखता है। कहानी प्रोफेसर संजय मिश्रा की साधारण यात्रा से शुरू होती है। पर जैसे‑जैसे सेहर की रहस्यमयी उपस्थिति प्रकट होती है, दोनों पात्र वास्तविकता के किनारे पर उठते हुए सपनों की अस्पष्टता में उलझते चले जाते हैं। निर्देशन और अभिनय की ताकत से नाटक में मनोवैज्ञानिक गहराई आती है। नाटक में भावनाएँ और प्रश्न सीधे शब्दों में नहीं, पर मंचीय मौन और संकेतों में उभरते हैं। पात्रों की खालीपन और रहस्य दर्शकों को सोच में छोड़ देता है कि आख़िर क्या वास्तविक था और क्या केवल भ्रम? यह नाटक केवल कहानी नहीं, बल्कि एक अनुभूति है, जिसमें सपने और हकीकत को बाँधनेवाल महीन सा धागा खूबसूरती से दृश्य रूप लेता है।
मानव कौल के लेखन और निर्देशन में ‘पार्क’ समकालीन दुनिया की राजनीतिक और नैतिक उलझनों का सूक्ष्म रूपक बन जाता है। ‘पार्क’ नाटक में मानव कौल ने सरल दृश्य के माध्यम से मानवीय लालच, असुरक्षा और सामाजिक प्रतिस्पर्धा की सूक्ष्मतम पड़ताल की है। तीन बेंच और तीन पात्र मिलकर अधिकार, विस्थापन और सत्ता की उस लड़ाई को उजागर करते हैं जो वैश्विक इतिहास से लेकर रोज़मर्रा के जीवन तक फैली है। न्यूनतम मंच-सज्जा में अभिनेताओं का सधा हुआ अभिनय नाटक की सबसे बड़ी शक्ति बनकर उभरता है। हँसी, बहस और असहज चुप्पियों के बीच यह प्रस्तुति दर्शक को बिना उपदेश दिए सोचने पर मजबूर करती है। ‘पार्क’ अंततः बताता है कि सबसे साधारण जगहें भी हमारे समय के सबसे जटिल सवालों को अपने भीतर समेटे होती हैं। पटकथा की न्यूनतमता और संवादों की तीव्रता दर्शकों को रोजमर्रा की जिंदगी की मानसिक जटिलताओं से अवगत कराती है। मनव कौल का निर्देशन और अभिनेताओं की प्रस्तुति इसे विचारोत्तेजक, अंतरंग और समयोत्तर रूप से प्रासंगिक बनाती है।
इस वर्ष 1998 में मृत बृजमोहन शाह के निर्देशन में ‘मोलीयर का कंजूस’ का पुनः मंचन विजय कुमार और मुंबई के कलाकारों द्वारा हुआ, जो बृजमोहन शाह को श्रद्धांजलि का एक जीवंत प्रमाण है। छात्र के रूप में विजय कुमार ने इस नाटक में हरपागोन का अभिनय अपने गुरु बृजमोहन शाह के निर्देशन में किया था। सच तो यह है कि अपने गुरु को इससे बड़ी श्रद्धांजलि और क्या हो सकती है कि उनके रचे गए नाटक को पुनः जीवित किया जाए। मंच मुंबई ने इसी उद्देश्य से शाह जी के इस नाटक को नये कलाकारों के साथ पुनर्जीवित किया है। इस पुनर्सृजन में मार्गदर्शन की भूमिका निभा रहे हैं विजय कुमार, जो स्वयं भी मंच पर अभिनय करते हुए दिखाई दिये, संत रंजन और अन्य नये अभिनेताओं के साथ। यह नाटक यूरोपीय क्लासिक कॉमेडी और भारतीय रंगमंचीय संवेदनाओं का सजीव संगम प्रस्तुत करता है। हरपागोन का चरित्र केवल लालच का प्रतीक नहीं, बल्कि सामाजिक, आर्थिक और नैतिक मूल्यों पर व्यंग्य की बहुपरत व्याख्या है।
रामगोपाल बजाज निर्देशित राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय रीपटरी द्वारा प्रस्तुत ‘लैला मजनू’ ने इस वर्ष भी प्रेम और जज्बात की गहराई को अद्भुत ढंग से पेश करता है। इस्माइल चुनारा की काव्यात्मक पटकथा और साबिर इरशाद उस्मानी के हिंदी अनुवाद ने शायरी और संवादों को सहज और प्रभावशाली बनाया है। कोरस के माध्यम से कहानी कहने का प्रयोग दर्शक को घटनाओं और पात्रों के भावनात्मक संसार में डुबो देता है। कैस और लैला की त्रासदी केवल व्यक्तिगत प्रेम नहीं, बल्कि उस समय के सामाजिक और पारिवारिक बंधनों की सांस्कृतिक आलोचना भी प्रस्तुत करती है। संगीत, मंच संयोजन और अभिनय का समन्वय इस क्लासिक प्रेमकथा को आज भी सजीव, मार्मिक और दर्शनीय बनाता है। कार्य एवं संघर्ष की यह प्रस्तुति दर्शकों को हँसाती और रुलाती दोनों है, क्योंकि इसमें मानवीय जुनून और सामाजिक बंधनों के बीच का प्रतिरोध प्रकट होता है।
देवेंद्र राज अंकुर निर्देशित राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय रीपटरी द्वारा प्रस्तुत ‘बंद गली का आख़िरी मकान’ दशकों की तरह इस वर्ष भी मंच पर मनुष्य के भीतर बसे अकेलेपन और सामाजिक नैतिकता के टकराव को अत्यंत सधी हुई संवेदनशीलता के साथ उजागर करता है। मुंशीजी का चरित्र परंपरा और दमन के बीच फँसे उस भारतीय पुरुष का प्रतीक बन जाता है, जिसकी पराजय बाहरी नहीं, गहरी मानसिक है। बिरजा और बिटोनी की उपस्थिति नाटक को स्त्री-अस्तित्व, निर्भरता और सामाजिक स्वीकृति के जटिल प्रश्नों तक ले जाती है। कहानी का ‘बंद गली’ वाला रूपक यहाँ एक मनोवैज्ञानिक अवस्था बनकर उभरता है, जहाँ जीवन आगे बढ़ने के बजाय भीतर ही भीतर सिमटता चला जाता है। यह प्रस्तुति साबित करती है कि शब्द, मौन और अभिनय तीनों मिलकर रंगमंच को विचार और आत्मचिंतन का सशक्त माध्यम बना सकते हैं।
परवेज़ अख्तर निर्देशित और रवि कुमार अभिनित “डेढ़ इंच ऊपर” में मौन, स्मृति और अपराध-बोध का ऐसा रंगमंचीय अनुवाद है, जहाँ शब्द से अधिक अंतराल बोलते हैं। निर्मल वर्मा की कथा-चेतना जेम्स जॉयस और प्रूस्त की अंतर्मुखी परंपरा से संवाद करती है, यहाँ न्यूनतम दृश्य और अधिकतम संवेदना में ढलती दिखती है। निर्देशन की सादगी अभिनेता को पूर्णतः अनावृत कर देती है। हालाँकि दृश्यात्मक संभावनाओं का संयम कभी-कभी नाटक को शब्द-प्रधान बना देता है, फिर भी यह चयन कथा की नैतिक चुप्पी के अनुकूल है। “डेढ़ इंच ऊपर” भारतीय रंगमंच में उस विरल परंपरा की याद दिलाता है, जहाँ नाटक घटना नहीं, चेतना की हल्की-सी दरार से उपजता है।
राजेश सिंह निर्देशित ‘बाबूजी’ राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय रीपटरी द्वारा प्रस्तुत मंच पर एक और अद्वितीय संगीतात्मक और भावनात्मक यात्रा पेश करता है, जहाँ ललन सिंह की जीवनगाथा पारिवारिक, सामाजिक और कलात्मक संघर्षों में गूँजती है। राजेश सिंह का निर्देशन न केवल कथा को जीवंत बनाता है बल्कि भारतीय रंगमंच पर बी. वी. कारंथ की धरोहर को आधुनिक संवेदनाओं से जोड़ता है। नाटक में पिता और समाज के बीच टकराव, व्यक्तिगत स्वतंत्रता और कलात्मक समर्पण की गहरी समझ सामने आती है। ललन की कला के प्रति अटूट निष्ठा और सामाजिक आलोचना का संतुलन इस प्रस्तुति को ऐतिहासिक और दार्शनिक दृष्टि से महत्वपूर्ण बनाता है। कुल मिलाकर, ‘बाबूजी’ कलाकारों, समाज और संस्कृति के बीच जटिल रिश्तों पर चिंतन करने का अवसर प्रदान करता है।
इप्टा मुंबई समूह की राकेश बेदी निर्देशित ‘बीवी ओ बीवी’ समकालीन पुरुष-सत्ता को घरेलू जीवन के सूक्ष्म संघर्षों में बेनकाब करती है। यह नाटक दिखाता है कि आधुनिक पितृसत्ता शोर में नहीं, रोज़मर्रा की आदतों और भाषा में बसती है। राकेश बेदी का लेखन–निर्देशन हास्य के भीतर वैचारिक तीखापन पैदा करता है। स्त्री पात्र प्रतिरोध को नारे में नहीं, आत्मसम्मान और विवेक में बदलती है। यह प्रस्तुति बताती है कि सामाजिक परिवर्तन का पहला मंच अक्सर घर ही होता है।
उपेक्षित आवाज़ का मंच: 5 नाटक
वंचित वर्गों की कला ‘कला की सीमा’ में आवश्यक विस्तार करती है। वंचित वर्गों की कला न केवल समाज की उपेक्षित आवाज़ को मंच पर लाती है, बल्कि रंगमंच की सीमाओं को भी चुनौती देती है। ऐसे नाटक पारंपरिक संरचनाओं और प्रतीकवाद के बंधनों को तोड़ते हुए नए प्रयोग की दिशा दिखाते हैं। वे सामाजिक और आर्थिक असमानताओं की जटिलताओं को दृश्य और भावनात्मक रूप में प्रस्तुत करते हैं, जिससे दर्शक के अनुभव में गहराई आती है। इस प्रक्रिया में कलाकार और विषय दोनों ही सीमाओं को आगे बढ़ाते हैं एवं इस तरह कला के उद्देश्य को व्यापक बनाते हैं। अतः वंचित वर्गों की कला केवल सामाजिक प्रतिनिधित्व नहीं, बल्कि संवेदनशीलता, बहस और सामाजिक चेतना का एक शक्तिशाली माध्यम बनकर उभरती है और कला की सीमा में में आवश्यक विस्तार करती है। आगे के कुछ नाटक इस दृष्टि से और अधिक महत्वपूर्ण हैं।
लक्ष्मण के पी निर्देशित ‘वी द पीपुल आफ इंडिया’ (We The People of India) मंच पर भारतीय संविधान की प्रज्ञप्ति को सिर्फ पाठ नहीं, बल्कि सक्रिय नागरिक भावना के रूप में उतारता है और यही उसकी सबसे बड़ी शक्ति है। ‘वी द पीपुल आफ इंडिया’ मंच पर संविधान के मूल सिद्धांतों को ग्राम‑जीवन की सांस्कृतिक प्रथाओं से जोड़कर प्रस्तुत करता है, जहाँ ग्रामीण संदर्भ में समानता, भाइचारा और स्वतंत्रता की व्याख्या होती है। लक्ष्मण के निर्देशन में पात्र केवल कानून के नियम नहीं, बल्कि जीवन की सांस बनकर उभरते हैं, जो संविधान को जीते हुए अनुभव के रूप में दर्शाते हैं। यह नाटक न केवल राजनीतिक अधिकारों की व्याख्या करता है, बल्कि सामाजिक असमानता और सांस्कृतिक विविधता को भी प्रश्नों में बदलता है। मंचीय रूपक और ऐतिहासिक स्मृतियों का मिश्रण दर्शक को नागरिक‑आत्मचिंतन के स्तर पर ले जाता है। अंततः यह प्रस्तुति याद दिलाती है कि “हम” का अर्थ महज वाक्यांश नहीं, बल्कि सतत सामाजिक प्रतिबद्धता है। कुल मिलाकर, नाटक दर्शकों को संविधान के शब्दों से परे, उसके कर्तव्य और अनुभव की तरफ़ ले जाता है।
चन्द्रशेखर के निर्देशित ‘Song of the Ghetto’ नाटक जीवंत रूप से उन जीवन‑कथाओं को सामने लाता है जो अक्सर इतिहास और समाज की मुख्य धारा से-बाहर रह जाती हैं। यह प्रस्तुति केवल कला का प्रदर्शन नहीं, बल्कि जीवन की वास्तविकता-विविध समुदायों की संस्कृति, संघर्ष और आत्म‑अभिव्यक्ति—को गीत और कथानक के माध्यम से जोड़ती है। निर्देशक चन्द्रशेखर के द्वारा रचित यह कार्य स्थानीय जीवन के कथांशों और समुदायों की आवाज़ों को मंच पर उतारता है, जिससे यह केवल प्रदर्शन नहीं बल्कि सांस्कृतिक आत्म‑प्रस्तुति बन जाता है। यह प्रस्तुति साबित करती है कि रंगमंच में लोक, जीवन और संस्कृति के अनुभव कितने शक्तिशाली ढंग से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी प्रतिध्वनित हो सकते हैं। यह प्रस्तुति याद दिलाती है कि कला केवल मनोरंजन नहीं है। वह संवाद और चेतना का केंद्र है जो अलग‑थलग जीवनों को भी साझा अनुभव में बदल देता है।
बिजेंदर कुमार टांक निर्देशित ‘नागरदोला’ मानवीय अस्थिरता और सामाजिक हाशिये की कथा को शांत, मगर गहरे असर के साथ सामने रखता है। रवीन्द्र भारती का आलेख लोक-स्मृति और आधुनिक पीड़ा के बीच झूलते जीवन को रूपक में बदल देता है। बिजेंदर कुमार टांक का निर्देशन अनावश्यक नाटकीयता से दूर रहकर, पात्रों के भीतर की समाजिक संरचना को सादगी से उभारता है। नागरदोला अंततः मनोरंजन नहीं, बल्कि दर्शक को अपने समय और संवेदना की ऊँचाई-नीचाई पर सोचने के लिए विवश करता है।
हरिशंकर रवि निर्देशित रामधारी सिंह दिनकर की ‘कुरुक्षेत्र’ युद्ध-कथा नहीं, बल्कि नैतिक विवेक की रंगमंचीय खोज की तरह है। खंडकाव्य के सात सर्गों से चुने गए दृश्य युद्ध और शांति के बीच मनुष्य की दुविधा को सघन रूप देते हैं। मूवेबल सेट और दृश्य-बंध काव्य को बोझ नहीं बनने देते, बल्कि विचार को दृश्य में बदलते हैं। यह मंचन दिनकर के ओज को संभालते हुए उसे समकालीन प्रश्नों से जोड़ने का प्रयास करता है। एक निर्माणाधीन नाटक होने के बावजूद यह प्रस्तुति स्पष्ट करती है कि ‘युद्ध, हिंसा के बीच समाज का क्षरण’ आज भी जीवित नैतिक प्रश्न है।
रजनीश कुमार निर्देशित मैक्सिम गोर्की की वैचारिक कठोरता पर आधारित ‘ब्लैक ब्लैक ब्लैक’ का यह भारतीय रूपांतरण अंधकार को केवल रंग नहीं, सामाजिक अवस्था के रूप में पढ़ता है। रजनीश कुमार का निर्देशन यथार्थ और अमूर्तता के बीच एक बेचैन संतुलन रचता है, जहाँ मंच-संरचना स्वयं विचार बन जाती है। यह प्रस्तुति गोर्की के मनुष्य-केंद्रित यथार्थवाद को समकालीन भारतीय नैतिक संकटों से जोड़ती है। संवाद संतुलित हैं, पर चुप्पियाँ सत्ता, भय और आत्म-विस्थापन पर तीखा वक्तव्य देती हैं।
2025 की केंद्रीय प्रवृत्तियाँ
2025 में इन नाटकों के मंचन से स्पष्ट है कि हिंदी रंगमंच किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुँचता, वह प्रश्नों में जीता है। वह न तो क्रांति का दावा करता है, न ही परंपरा की शरण लेता है। वह स्मृति और संभावना के बीच खड़ा है, जिसमें कई प्रवृतियों को पहचाना जा सकता है।
पहली प्रवृति यह है कि रंगमंच का पुनः-राजनीतिकरण नए अर्थ में हुआ है। यह कहना आसान है कि “आज का रंगमंच राजनीतिक है”, पर 2025 में राजनीति का स्वरूप बदल चुका है। यह वह राजनीति नहीं है जो नैतिक नियमों के प्रश्न करती है। यह प्रत्यक्ष पक्षधरता का समय है। हिंदी रंगमंच उसी विडंबना की संतान है।
अगर राजनीति को उस सामाजिक कार्य (action) के रूप में देखें,जहाँ मनुष्य सार्वजनिक रूप से प्रकट होता है तब 2025 का हिंदी रंगमंच इसी प्रकट होने की राजनीति करता है। मंच पर हाशिए के शरीर (दलित, आदिवासी, स्त्री, क्वीयर), निषिद्ध स्मृतियाँ (दंगे, विस्थापन, क़ैद, ग़ायबियाँ) , भाषा के भीतर छुपी हिंसा के साथ-साथ पुनरोत्थानवादी राष्ट्रवाद को सामने लाया जा रहा है। यह रंगमंच केवल सत्ता के विरुद्ध नहीं है, बल्कि सत्ता की दृश्यता को मजबूत भी करता है।
दूसरी प्रवृति यह है कि पाठ का संकट और प्रदर्शन की प्रधानता है। 2025 का हिंदी रंगमंच “अच्छे नाटक” की तलाश से अधिक “सार्थक प्रदर्शन” की तलाश में है। नाटक अब केवल साहित्यिक पाठ नहीं, बल्कि शरीर, मौन , ध्वनि, स्थान और दर्शक की उपस्थिति से मिलकर बनता है। इस प्रवृत्ति में शब्द से पहले देह आती है। हिंदी रंगमंच में यह देह अक्सर ऐतिहासिक रूप से दमित रही है; अब वह स्वयं बोल रही है। इसलिए एकल नाटक की परंपरा मजबूत हुई है, जो विशेष तरह के नाटक का विकास कर रही है।
तीसरी प्रवृति यह है कि 2025 का हिंदी रंगमंच “शुद्ध हिंदी” के भ्रम से बाहर आ चुका है और हिंदी के जगह बहुभाषिकता मजबूत हुई है। यह प्रवृति मुंबई, दिल्ली और बंगलौर रंगमंच में दिखती है। यहाँ उर्दू, भोजपुरी, मैथिली, अवधी, अंग्रेज़ी के टुकड़े और मौन की भाषा साथ-साथ चलते हैं। यह बहुभाषिकता केवल सौंदर्य नहीं, बल्कि सामज का विकसित होता नया भविष्य है।
चौथी प्रवृति इसकी सबसे सबसे गहरी समस्या भी है कि हिंदी रंगमंच के पास आत्मनिर्भर आर्थिक व्यवस्था का अभाव है, जो उसके स्वाभाविक विकास को लगातार अवरुद्ध करता रहा है। औपनिवेशिक काल से ही रंगमंच राज्य–संरक्षण, शौकिया संरचना और वैचारिक प्रतिबद्धता पर टिका रहा, बाज़ार से उसका संबंध कभी सहज नहीं बन पाया। आधुनिक हिंदी रंगमंच ने वैचारिक तीव्रता तो अर्जित की, पर उत्पादन, वितरण और दर्शक–संस्कृति की टिकाऊ अर्थनीति विकसित नहीं कर सका। हिंदी रंगमंच के पास प्रतीकात्मक पूँजी है, लेकिन आर्थिक पूँजी में उसका रूपांतरण अवरुद्ध है। राज्य अनुदान ने कई बार रचनात्मक स्वतंत्रता दी, पर उसी ने निर्भरता की एक आदत भी पैदा की। निजी निवेश और दर्शक–आधारित मॉडल के अभाव में रंगमंच जीविका नहीं, लगभग तपस्या बन गया। इसका असर कलाकारों की निरंतरता, तकनीकी गुणवत्ता और संस्थागत स्मृति पर साफ़ दिखता है।
रंगमंच के इतिहास में “नाटक” और “प्रस्तुति” कभी एक नहीं रहे। एरिस्टॉटल के ‘पोएटिक्स’ से लेकर पीटर ब्रुक की ‘द एम्प्टी स्पेस’ तक यह स्पष्ट होता गया है कि पाठ (text) और मंचन (performance) के बीच एक सृजनात्मक तनाव रहता है। 2025 के हिंदी रंगमंच में यह तनाव अपने निर्णायक क्षण पर है। यहाँ प्रश्न यह नहीं कि कौन-सा नाटक खेला जा रहा है, बल्कि यह कि कैसे और किस ऐतिहासिक–सामाजिक चेतना के साथ वह मंच पर उपस्थित हो रहा है।
इसलिए नीत्शे ने अपनी शुरुआती पुस्तक ‘द बर्थ आफ ट्रेजडी’ (The Birth of Tragedy) में कहते हैं कि रंगमंच सभ्यता का आत्मालोचन है। वर्तमान हिंदी रंगमंच आज स्वयं हिंदी समाज का आत्मालोचन कर रहा है और वर्तमान समाज की हिंसा, उसकी चुप्पी, उसकी इच्छाएँ और उसके डर को स्वर दे रहा है।
शायद यही उसकी सबसे बड़ी उपलब्धि है कि 2025 में जब बोलना आसान नहीं, हिंदी रंगमंच अब भी धीमे, जोखिम भरे, लेकिन ज़रूरी स्वर में बोल रहा है। और यही स्वर आने वाले समय में उसके ऐतिहासिक महत्व को तय करेगा।
मगर अंतिम रुप से यह दोहराना आवश्यक है कि यह संकट रंगमंच के विकास के बजाय रंगमंच के अस्तित्व की रक्षा का भी हो गया है, जो भारत में रंगमंच के स्वरूप के पुनराविष्कार की माँग करता है। कुल मिलाकर यह 2025 का वर्ष आधारभूत रुप से अनुत्तरित प्रश्नों का वर्ष का रहा है। स्पष्ट है कि हिंदी रंगमंच को सरकारी सहयोग के बाहर एक आत्मनिर्भर मॉडल विकसित करना होगा।
(समाप्त)

