नई दिल्ली: बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री खालिदा दिया और बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) के कार्यवाहक अध्यक्ष तारिक रहमान गुरुवार को ढाका पहुंच गए। पार्टी के लाखों कार्यकर्ताओं ने उनका स्वागत किया। इसी के साथ यूनाइटेड किंगडम में उनका 17 साल से ज्यादा का स्व-निर्वासन भी खत्म हुआ। वे 2008 में इलाज के लिए बांग्लादेश से बाहर गए थे। उस समय भी बांग्लादेश में कानूनी और राजनीतिक दबाव सुर्खियों में था।
तारिक रहमान वापसी ऐसे समय में हुई है जब बांग्लादेश एक अप्रत्याशित हालात से गुजर रहा है। देश में हिंसा की घटनाएं हो रही हैं, और 12 फरवरी को संसदीय चुनाव कराने का भी ऐलान किया जा चुका है। ऐसे में पूर्व प्रधानमंत्री और BNP चेयरपर्सन खालिदा जिया के बड़े बेटे रहमान को चुनावों से पहले पार्टी का मुख्य चेहरा माना जा रहा है, खासकर इसलिए क्योंकि जिया अभी भी बीमार हैं।
पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना को हटाए जाने के बाद से बांग्लादेश में हिंसा और अशांति का दौर जारी है। हसीना को हटाने में अहम भूमिका निभाने वाले युवा नेता उस्मान हादी की हाल ही में हुई हत्या ने देश में तनाव फिर से बढ़ा दिया है। हादी के भाई ने आरोप भी लगाया है कि यह हत्या ‘चुनावों में गड़बड़ी’ करने के मकसद से की गई है।
इन सबके बीच ये भी साफ है कि रहमान की घर वापसी में अंतरिम सरकार ने मदद की है। इस महीने की शुरुआत में विदेश सलाहकार मोहम्मद तौहीद हुसैन ने कहा था कि अगर रहमान वापस लौटना चाहते हैं, तो सरकार एक दिन के अंदर ‘एक बार’ का ट्रैवल पास जारी कर सकती है।
अधिकारियों के मुताबिक, चीफ एडवाइजर मुहम्मद यूनुस ने भी हाल ही में एक मीटिंग में रहमान की वापसी पर चर्चा की थी। वहीं, बीएनपी नेताओं ने कहा कि रहमान 27 दिसंबर को रजिस्टर्ड वोटर बनने की औपचारिकताएं पूरी करेंगे, जिससे उन्हें देश की चुनावी राजनीति में सीधी भूमिका निभाने का मौका मिलेगा। रहमान ने इससे पहले BBC बांग्ला को बताया था, ‘कुछ वाजिब कारणों से मेरी वापसी नहीं हो पाई है… लेकिन अब समय आ गया है, और मैं जल्द ही वापस आऊंगा… मैं चुनाव भी लड़ रहा हूं।’
तारिक रहमान कौन हैं, क्यों 17 साल से थे बाहर?
58 साल के तारिक रहमान पूर्व प्रधानमंत्री और अब 80 साल की हो चुकीं खालिदा जिया के बड़े बेटे और बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी के कार्यवाहक अध्यक्ष हैं। कई आपराधिक मामलों में दोषी ठहराए जाने के बाद, जिनमें मनी लॉन्ड्रिंग और तत्कालीन प्रधानमंत्री शेख हसीना की हत्या की कथित साजिश से जुड़े आरोप शामिल हैं, रहमान 2008 में बांग्लादेश छोड़ने के बाद से लंदन में रह रहे थे।
पिछले एक साल में बांग्लादेश की ऊपरी अदालतों ने उन्हें 2004 के ग्रेनेड हमले और जिया अनाथालय ट्रस्ट भ्रष्टाचार मामले सहित सभी बड़े मामलों में बरी कर दिया है, जिससे उनके बांग्लादेश की राजनीति में वापसी की लगभग सभी कानूनी बाधाएं दूर हो गई हैं।
बांग्लादेश की मौजूदा राजनीति की बात करें तो शेख हसीना की अवामी लीग को आगामी चुनावों में हिस्सा लेने से रोक दिया गया है। इससे BNP एक बड़ी दावेदार बन गई है। चुनाव में बीएनपी के नेतृत्व वाला गठबंधन नए जमात-ए-इस्लामी के नेतृत्व वाले गठबंधन का सामना करेगा।
तारिक रहमान की वापसी, भारत के लिए क्या है मायने?
शेख हसीना को सत्ता से हटाए जाने और भारत में उनके राजनीतिक शरण लेने के बाद से भारत और बांग्लादेश के संबंध तेजी से खराब हुए हैं। हसीना अभी भी भारत में रह रही हैं, जबकि ढाका से उनके खिलाफ गिरफ्तारी वारंट और प्रत्यर्पण की मांग आई हुई हैं। बीएनपी ने भी हसीना को शरण देने के लिए नई दिल्ली की आलोचना की है। रहमान कह चुके हैं कि ऐसा करके भारत बांग्लादेशी जनता को नाराज करने का जोखिम उठा रहा है।
बीएनपी और खालिदा जिया ऐसे भी भारत विरोधी भावना के लिए जाने जाते रहे हैं। एक आशंका ये है कि बीएनपी के बांग्लादेश में सत्ता में लौटने से संबंध और खराब हो सकते हैं। ऐसा इसलिए कि इस पार्टी के ऐतिहासिक रूप से पाकिस्तान के साथ करीबी संबंध रहे हैं, जबकि हसीना का रुख भारत समर्थक रहा है। हसीना विद्रोही और चरमपंथी नेटवर्क के खिलाफ भी भारत का सहयोग करती रही थीं।
हालांकि, आशंकाओं के बीच बीएनपी से भारत बदले हुए हालात में कुछ बेहतरी की भी उम्मीद कर सकता है। मुहम्मद यूनुस के नेतृत्व में फिलहाल बांग्लादेश में कट्टरपंथी इस्लामिक ताकते बेकाबू होती नजर आई हैं और भारत विरोधी नफरत खुल कर फैलाया जा रहा है। भारत के लिए खास चिंता का विषय जमात-ए-इस्लामी है, जिसे पाकिस्तान की ISI का एजेंट भी माना जाता है। जमात, जिसे पिछली शेख हसीना सरकार ने बैन कर दिया था, पिछले साल उनके सत्ता से हटने के बाद फिर से राजनीति में वापस आ गई है।
एक हालिया ओपिनियन पोल में यह सामने आया है कि रहमान की बीएनपी पार्टी चुनाव में सबसे ज्यादा सीटें जीत सकती है, वहीं जमात जो कभी BNP की सहयोगी थी, उसे कड़ी टक्कर दे रही है। हाल में जिस बात ने भारत की चिंता बढ़ाई है, वह ढाका यूनिवर्सिटी चुनावों में जमात के छात्र विंग की चौंकाने वाली जीत भी है।
ऐसे हालात में भारत बीएनपी को ज्यादा उदार और लोकतांत्रिक विकल्प के तौर पर देख सकता है। भले ही बीएनपी के भारत से ऐतिहासिक रूप से रिश्ते तनावपूर्ण रहे हों। इसके अलावा, चुनावों में एक और खिलाड़ी- छात्रों के नेतृत्व वाली नेशनल सिटिजन पार्टी (NCP) ने आरोप लगाया है कि BNP अवामी लीग के सदस्यों को अपनी पार्टी में शामिल कर रही है।
हसीना के समय बांग्लादेश ने भारत के साथ करीबी रिश्ते बनाए और चीन के मामले में सावधानी से काम लिया। साथ ही हसीना ने पाकिस्तान से भी सुरक्षित दूरी बनाए रखी। यूनुस के आने के बाद स्थिति पूरी तरह बदल गई है, जिन्होंने बांग्लादेश को भारत से दूर करके पाकिस्तान के साथ करीबी रिश्ते बनाने पर जोर दिया है।
अगर बीएनपी सत्ता में वापस आती है, तो भारत उम्मीद करेगा कि बांग्लादेश की विदेश नीति में बदलाव आए। हाल ही में कुछ ऐसे संकेत मिले हैं कि भारत और बीएनपी रिश्ते सुधारने की कोशिश कर रहे हैं।
अभी 1 दिसंबर को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गंभीर रूप से बीमार खालिदा जिया के लिए सार्वजनिक रूप से चिंता जताई और भारत की ओर से मदद की पेशकश की। इस पर बीएनपी ने इसके लिए दिल से आभार व्यक्त किया – जो सालों के खराब रिश्तों के बाद राजनीतिक गर्मजोशी का एक दुर्लभ और अहम उदाहरण हो सकता है।
भारत के लिए अच्छी बात यह भी है कि रहमान कुछ मौकों पर यूनुस सरकार से मतभेद जताते रहे हैं। उन्होंने अंतरिम प्रमुख के लंबे समय तक चलने वाले विदेश नीति को लेकर फैसले लेने के अधिकार पर भी सवाल उठाया था। वह जमात की आलोचना भी करते रहे हैं और चुनावों के लिए गठबंधन करने से इनकार किया है। वैसे इन तमाम उम्मीदों और आशंकाओं के बावजूद अभी साफ नहीं है कि बीएनपी किस रास्ते को अपनाएगी। ऐसे में ये देखने वाली बात होगी कि बांग्लादेश के चुनाव क्या नतीजे लेकर आते हैं और ये देश किस राह पर आगे बढ़ता है।

