Friday, March 20, 2026
Homeकला-संस्कृतिअनिकेतः बनारस के ‘काशी’- एक बदलते शहर का बूढ़ा दरख्त

अनिकेतः बनारस के ‘काशी’- एक बदलते शहर का बूढ़ा दरख्त

लेखक हमेशा से अनिकेत होते हैं। उनका कोई एक निश्चित घर नहीं होता और सारी दुनिया उनके लिए उनका घर होती है। फिर भी वो कोई एक ठौर तो होता ही है जीवन में, जहां वे जीते हैं, लिखते हैं, जहां उनका मन रमता है। लेखक भले चले जायें दुनिया से, सचमुच के अनिकेत हो जायें पर वह घर बना रहता है, उनके होने की गवाही देता हुये। लेखकों के होते हुये और लेखकों के बाद भी उनके इन्हीं घरों की कहानी है ‘अनिकेत’। आज इस स्तंभ में हम वरिष्ठ कथाकार काशीनाथ सिंह के घर की चर्चा कर हैं; वही काशीनाथ सिंह, जिनमें उनका शहर बनारस बसता है, जां-ब-लब।

बनारस कोई पंद्रह बरस से जा रहा हूं। जितना मैंने देखा-जाना, इस शहर को यदि किसी एक शब्द में बाँधना हो तो वह शब्द होगा- ‘बात’ और यदि किसी एक लेखक में बनारस की इस ‘बात’ को मूर्त रूप में देखना हो, तो वह हैं- काशीनाथ सिंह। उनके यहाँ बनारस केवल भौगोलिक शहर नहीं, बल्कि संवादों का अखाड़ा है; एक ऐसी खुली चौपाल जहाँ भाषा का पान घुलता है, व्यंग्य की इलायची चबाई जाती है और जीवन की खट्टी-मीठी गंध हर वाक्य में तैरती रहती है।

काशीनाथ सिंह के लेखन में जो सहज ‘बतियाहट’ है, मेरे लिए वही बनारस है। बनारस की परंपरा में जो ‘बात’ जीवन-दर्शन की सार्वजनिक अभिव्यक्ति है, वही काशीनाथ सिंह के साहित्य की आत्मा है। ऐसी आत्मा जो घाटों पर बैठकर, चाय की दुकानों पर टिककर, पान की गिलौरी के साथ जीवन में उतरती जाती है।

जब जाना काशी सिर्फ एक शहर नहीं

पिछले दस वर्षों से काशीनाथ सिंह से मिलने की इच्छा इसी बरस जनवरी में पूरी हुई। मैंने उन्हें पहली बार पत्रकारिता के मेरे गुरु राजीव सिंह के जरिए जाना था। उनके सुझाव पर ही मैंने काशीनाथ सिंह को पहले पढ़ा, फिर जाना, और बाद में महसूस किया कि उनका लिखा, पढ़ने और संभालकर रख लेने योग्य है। भूलते-बिसरते, छूटते शहर-नौकरी और तमाम उलझनों में उनका लिखा लगभग सब पढ़ने में दस साल लग गए। हां, इस बीच ये हुआ कि तमाम माध्यमों पर उपलब्ध फिल्म, साक्षात्कार देख-पढ़ रहा था। पिछले दिनों जब ‘रेहन पर रग्घू’ खत्म किया तो लगा कि अब अपने प्रिय कथाकार से मिल लेना चाहिए।

यहीं से मिलने की इच्छा ने जन्म लिया, पत्नी (जो बीएचयू की छात्र रही हैं) से कहा और हम पहुंच गए बनारस। अपने प्रिय कथाकार से मिलने। पता किया तो मालूम हुआ इन दिनों बीमार हैं। बहुत कम लोगों से मिलते हैं। चूंकि बीएचयू परिसर में ही ठहरा था और वहीं ‘पुलिया प्रसंग’ में भी शामिल हुआ था, सो बनारस के रंग में रमे रहने वाले कवि और बीएचयू में ही हिंदी विभाग के प्रोफेसर श्रीप्रकाश शुक्ल से अनुरोध किया कि मुलाकात की कुछ व्यवस्था हो सके तो कर दें। उन्होंने शाम के समय शैलेंद्र सिंह को हमारे साथ कर दिया। शैलेंद्र सिंह, काशीनाथ सिंह के छात्र रहे हैं और इन दिनों उन्हीं का ज्यादा आना-जाना है सो उन्हें साथ पाकर हम निश्चिंत हो उनके घर पहुंचे।

कभी मोहल्ला कल्चर वाला बनारस, अब कॉलोनी कल्चर अपना चुका है। गायब होती गलियों वाले बनारस से थोड़ी दूर सुन्दरपुर में हम काशीनाथ सिंह के घर पहुंचे। पहली झलक की स्मृति शब्दों में न उतार पाने वाली रही, इसलिए उसे छोड़ रहा हूं।

दूसरी बार भी एक झलक भर मुलाकात हुई। हुआ यूं कि, हम हॉलनुमा कमरे में बैठे थे, काशीनाथ सिंह बहुत धीरे-धीरे कमरे की तरफ आए, हमें देखा और तेजी से अपने कमरे में लौट गए। बातें स्पष्ट नहीं सुन पा रहा था लेकिन इतना अंदाजा लगा सका कि शैलेंद्र सिंह से कुछ कह रहे हैं। मैं, ‘चलो दर्शन तो हुए, मुलाकात फिर कभी हो जाएगी’ यह सोचकर मैं अपनी किताबें समेटने लगा। बहुत धीमी आवाज में हम वहां से बाहर निकलने की तैयारी में लगे कि तब तक एक प्लेट में तिलकुट लेकर काशीनाथ सिंह कमर में आए। आकांक्षा को तिलकुट देते हुए कहा- ‘घर में कोई चाय बनाने वाला भी नहीं है, मैं सोच रहा था मेरे बच्चे आए हैं, उन्हें क्या खिलाऊं-पिलाऊं? खातिरदारी कैसे होगी, कोई घर आता है तो यही सोचकर घबरा जाता हूं। खैर, चार दिन बाद तो मकरसंक्रांति है ही, हमलोग आज ही मना लेते हैं।’

उन्हें देखने-मिलने का यह दूसरा क्षण भी बहुत भावुक गुजरा। खैर… औपचारिकताओं के बाद बातों पर बैठे। उनकी अस्वस्थता देख, मानकर चल रहा था कि शायद समय मिले। जो दस-पंद्रह मिनट की बातचीत होगी उसी में दस-बारह बरस की सारी बातें कर लूंगा। लेकिन लगभग दो घंटे हम बात करते रहे। यही बातें ही तो काशीनाथ सिंह की पहचान है, और हमने देखा कि बातों के लिए वे किस तरह से अपनी बाकी चीजों को दरकिनार कर रहे हैं।

काशी का ही नहीं वह नामवर का घर लगा

घर में जहां तक मैं देख पा रहा था, वह काशीनाथ सिंह का घर कम और नामवर सिंह का घर अधिक लग रहा था। दीवारों पर लगी तस्वीरों में, शेल्फ में रखी किताबों में और बातचीत में भी, नामवर सिंह की मौजूदगी बनी रही। जिस प्रेम के साथ काशीनाथ सिंह अपने बड़े भाई को याद कर रहे थे, मैं मंत्रमुग्ध था। भाई के बारे में बोलते हुए इतनी आत्मीयता कि सुनते हुए मन भींग रहा था। हर तस्वीर के बारे में बताना, किताबों के बारे में और उनके जीवन के बारे में। उनकी कुछ किताबें जो मैं दस्तखत के लिए साथ लेकर गया था, मसलन ‘सदी का सबसे बड़ा आदमी’, ‘रेहन पर रग्घू’, ‘उपसंहार’, ‘याद हो कि न याद हो’, ‘आछे दिन पाछे गए’, ‘काशी का अस्सी’, आदि पर हस्ताक्षर के अनुरोध से बातचीत का क्रम न तोड़ा होता तो शायद पूरी बातचीत नामवर सिंह पर हो जाती।

क से ‘काशी’ और क से कबूतर की टांग

इस पूरी मुलाकात में अम्मा (काशीनाथ सिंह की पत्नी) की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण थी। उनसे भोजपुरी में बात हो रही थी और जितनी देर हम उनके घर रहे, हमारे साथ मौजूद रहीं। खूब स्नेह लुटाया। किताबों और लेखन के इतर काशीनाथ सिंह की जिंदगी पर बतियाती रहीं। उनकी नजर से काशीनाथ सिंह को जानने का अनुभव, काशीनाथ सिंह को सुनने के अनुभव से जरा भी कम नहीं था। बातों की व्यंगात्मकता आकर्षित करने वाली। जब काशीनाथ सिंह किताबों पर हस्ताक्षर कर रहे थे- उन्होंने धीमे से कहा- अब लेखक जी काशी लिखने क लिए बड़ा सा क बनाएंगे। जैसे कबूतर की टांग हो। क से ‘काशी’ और क से कबूतर की टांग। सुनते हुए काशीनाथ सिंह का मुस्कुराना एक जादू की तरह था।

पान लाने वाले कम हुए तो, पान खाना छोड़ दिया

तमाम बातचीत में आई एक बात जो मुझे झकझोर गई थी- पान खाना लगभग छूट गया है। अब तो शरीर उतना साथ देता नहीं कि खुद ले आऊं और कोई है भी नहीं जो पनवारी दुकान का चक्कर लगा ले। पान खाने वाले, इस उम्र तक आते-आते, पान लाने वाले की कमी से पान खाना छोड़ देते हैं। हम जितने लोग उस समय कमरे में थे, यह सुनते हुए मन उदास हो रहा था। उस समय मैं यही सोच रहा था- क्या दिन रहे होंगे कि काशीनाथ सिंह के लिए पान लाने-लगवाने वाले छात्र भी अपने आप को दूसरे विद्यार्थियों से ज्यादा करीब मानते होंगे। समय कितना क्रूर है। बच्चों को कोसने ही वाला था कि ध्यान आया मेरे दादा भी इसी उम्र के हैं, पान खाने के शौकीन हैं और हम उनसे 800 किलोमीटर दूर रहते हैं।

बनारस पांव और साइकिल वालों का शहर है

कुछ देर बनारस में क्या-क्या घूमा-देखा पर बातें हुई। मैंने बताया सुबह पप्पू की चाय की दुकान पर गया था। इतना सुनते ही हँस दिए। फिर बहुत गंभीर होकर कहने लगे- अब पप्पू की चाय की दुकान वैचारिक बातों और गपोड़ों का अड्डा नहीं रहा। दुकान अब पॉलिटिकल हो गई है। अब दुकान पर आने वाले नेताओं की बड़ी-बड़ी तस्वीरें लगी हैं। अब लोग चाय कम और तस्वीरों के लिए अधिक पहुंचते हैं। दुकान का अस्तित्व धूमिल हो रहा है, वैसे ही जैसे बनारस का।

अबका बनारस उनका बनारस नहीं है। सड़कें चौड़ी हो रही हैं, कार और काफिला गुजर सकने लायक सड़कें बन रही हैं। किसी को इस बात की फिक्र तक नहीं कि यह शहर पैदल और साइकिल से चलने वालों का शहर है। इस शहर का सामर्थ्य, तेज दौड़ते-भागते शहरों जैसा नहीं है। क्योटीकरण में वह बनारस धीरे-धीरे खो रहा है।

अब ना वे दोस्त रहे, ना ही वह जमाना रहा

‘काशी का अस्सी’ पर बातें हो रही थीं। तमाम किरदारों पर बातें हुई। उसी दरम्यान मैंने साल 2019 में दिल्ली में हुई चौथीराम यादव से मुलाकात का जिक्र किया। इस नाम पर वे ठहर गए। फिर बातें, किताब से हटकर दोस्तों पर होने लगी। बनारस की शाम, दोस्तों की महफिल और रोज की बैठकी पर। उनके लिए बनारस उन्हीं दोस्तों से था। दोहरा आघात यही है कि अब एक-एक कर दोस्त भी छूट रहे हैं और रफ्ता-रफ्ता शहर भी। अपने दोस्तों को इतने मन से वे याद कर रहे थे जैसे उनके दरम्यान जीवन-मृत्यु का फासला न होकर दो शहरों का फासला हो।

तीन दिन पहले ही पहल के संपादक ज्ञानरंजन गुजरे थे। उनको याद करने लगे। सुनते हुए ऐसे लग रहा था जैसे आंसुओं को रोके हुए बातें कर रहे हों। मेरी घड़ी की ओर देखते हुए बस इतना कहा- समय दोस्तों को छीन रहा है। सोचता हूं, अब कितने लोग रह गए हैं जिनसे खोज-खबर ली जा सके। अब ना वे दोस्त रहे, ना ही वह जमाना रहा।

इस दौर में आकर ‘वायरल राइटर’ हो गया हूं

मुझे सुखद आश्चर्य हुआ कि काशीनाथ सिंह अपनी किताबों, लेखों, साक्षात्कारों, और उनपर होने वाली बातचीतों से पूरी तरह अभिज्ञ हैं। आकांक्षा ने जब कहा कि आपकी किताबें नई पीढ़ी के बच्चे खूब पढ़ रहे हैं तो मुस्कुराते हुए कहने लगे- फेसबुक पर देखता रहता हूं। लोग किताबों के साथ फोटो लगाते हैं, लिखते हैं। काशी का अस्सी तो अब जितनी बिक रही है, पहले भी नहीं बिकी थी। कुछ दिन पहले पता चला कि सत्तरवां या बहत्तरवां एडिशन आ गया है। मतलब इस दौर में आकर वायरल राइटर हो गया हूं। देखकर अच्छा लगता है, इसलिए नहीं कि बच्चे मेरी किताबें खरीद-पढ़ रहे हैं, इसलिए कि बच्चों की यह पढ़ने की प्रवृत्ति मुझे जीने का हौसला देती है।

बनारस के किसी घाट सा ही लगा काशीनाथ सिंह का कमरा

शहर वाराणसी, जिसे कोई काशी, बनारस या वाराणसी कहता है, अपनी बहुलता में अद्वितीय है। यहाँ मृत्यु भी उत्सव है और जीवन भी। गंगा के घाटों पर बैठा आदमी दार्शनिक भी है और फक्कड़ भी। काशीनाथ सिंह ने इस शहर को बाहर से नहीं देखा; उन्होंने इसे जिया है। उनकी रचनाओं में बनारस का मिज़ाज अपने पूरे विस्तार में आता है। उन्हें सामने से सुनते हुए शब्दों की लचक और खास तरह की ‘बनारसी बेफिक्री’, ठीक वैसा ही जैसा उनकी किताबों की भाषा। दुख को भी मुस्कराहट में ढाल देने वाली मुस्कुराहट। अपने छात्रों से हो रही बातचीत को भी इस तरह रच रहे थे कि उसमें समय की पूरी हलचल दर्ज हो रही थी। काशीनाथ सिंह अपने लिखे की तरह ही ईमानदारी दिखे। ‘जो देखा, वही लिखा; जो सुना, वही कहा’ वाले काशीनाथ सिंह से बतियाना, बनारस के किसी कम हलचल वाले घाट पर बैठकर अस्सी से मणिकर्णिका की ओर बहती-बढती गंगा को निहारने जैसा सुखद था।

स्मृतियों में बसा रहेगा बनारस और बनारस का काशी

घर से विदा करते हुए काशीनाथ सिंह और अम्मा दरवाजे तक आए। वहां भी कुछ देर बातें हुईं। जैसे न उन्हें विदा कहने का मन हो न हमें वहां से लौटने का। उन्हें बताया कि कल ही कलकत्ता लौट जाऊंगा। कलकत्ता के नाम पर चहक उठे। एक उदास हंसी लिए बोले- कलकत्ता तो छूट गया। क्या सुंदर शहर है। यहां बनारस, वहां कलकत्ता। अब तो लग रहा है कलकत्ता जा भी नहीं पाऊंगा, लेकिन अगर कुछ मन बना तो तुम्हें बताऊंगा। घर आऊंगा। अपने विद्यार्थियों के घर पर जाना तो गुरुओं का गुरुदक्षिणा है।

विदा होते हुए मुझे इतना मालूम हो चुका था कि इस मुलाकात के बाद जब भी बनारस की याद आएगी, गंगा की लहरों के साथ-साथ काशीनाथ सिंह की पंक्तियाँ भी याद आएंगी। कोई पंक्ति ध्यान आएगी, जैसे कि- बात करते रहो, तभी शहर ज़िंदा रहेगा। बात केवल शब्द नहीं, संबंध है। वही संबंध जो एक पाठक को लेखक तक खींच लाता है। एक पाठक अब अपने लेखक के बारे में कह सकता है कि-काशीनाथ सिंह को याद करना बनारस की उस जीवित परंपरा को याद करना है, जहां बातें साँस लेती हैं, जहाँ साहित्य और जीवन के बीच कोई दूरी नहीं है।

हंस राज
हंस राज
हंस राज पढ़ने-लिखने की दुनिया से जुड़े मीडियाकर्मी हैं। कई प्रतिष्ठित समाचार पत्रों और साहित्यिक मंचों पर कला, संस्कृति और रंगमंच पर लेखन कार्य करते रहे हैं। वर्तमान में भारतीय रेलवे के अधीनस्थ कोलकाता स्थित सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी ब्रेथवेट एंड कंपनी लिमिटेड में बतौर जनसंपर्क अधिकारी कार्यरत हैं। देश के महत्वपूर्ण साहित्यिक-सांस्कृतिक आयोजनों का फोटोग्राफिक डॉक्यूमेंटेशन उनके उल्लेखनीय कार्यों में शामिल है।
RELATED ARTICLES

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Most Popular

Recent Comments