अयातुल्लाह अलीरेजा अराफी को ईरान का अंतरिम सुप्रीम लीडर बनाया गया है। अमेरिका-इजरायल के हमले में सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई की हत्या के बाद ये फैसला लिया गया। संवैधानिक प्रक्रिया से खामेनेई के उत्तराधिकारी चुने जाने तक अराफी इस पर पर रहेंगे।
बता दें कि ईरान की संवैधानिक व्यवस्था के मुताबिक, जब सुप्रीम लीडर की मौत के बाद देश के शीर्ष नेतृत्व की कुर्सी खाली होती है, तब शासन चलाने के लिए अस्थायी नेतृत्व परिषद (temporary leadership council) जिम्मेदार होती है। इस काउंसिल में राष्ट्रपति मसूद पेज़ेश्कियन, चीफ जस्टिस गुलाम हुसैन मोहसेनी और गार्जियन काउंसिल के एक धर्मगुरु शामिल हैं। अयातुल्लाह अराफी को इसी अंतरिम काउंसिल के ‘ज्यूरिस्ट मेंबर’ के तौर पर नियुक्त किया गया है।
कौन हैं अयातुल्लाह अलीरेजा अराफी?
अराफी का जन्म 1959 में यजद प्रांत के मेबोड में हुआ था। उन्होंने अपनी प्रारंभिक धार्मिक शिक्षा ईरान के प्रमुख सेमिनरी शहर क़ोम में ही ली, जहाँ से उन्होंने इस्लामी कानून और जूरीस्टिक अध्ययन में विशेषज्ञता हासिल की। 2008 से 2018 तक वह अल-मुस्तफ़ा इंटरनेशनल यूनिवर्सिटी के अध्यक्ष रहे, जो ईरान और विदेशों में शिया धर्म प्रचार और धार्मिक शिक्षा का एक प्रमुख केंद्र है। इसके साथ-साथ 2016 से वे ईरान के सेमिनरी नेटवर्क के प्रमुख भी रहे हैं।
इन भूमिकाओं ने उन्हें न केवल पुस्तक-ज्ञान तक सीमित नहीं रखा बल्कि उन्हें प्रशासनिक कौशल, रणनीतिक सोच और वैश्विक संवाद के अनुभव से संपन्न किया। अराफी ने विदेशों में शिया धर्म के प्रसार के लिये भी कई कार्यक्रमों और पहलों में भाग लिया, जिससे उनका दायरा अंतरराष्ट्रीय स्तर तक विस्तृत हुआ।
राजनीतिक और संवैधानिक भूमिका
अलीरेजा अराफी खामेनेई के काफी भरोसेमंद करीबी माने जाते थे। खामेनेई के शासन के दौरान अराफी के पास कई अहम पद थे। अराफी धार्मिक विद्वान होने के साथ साथ ईरान की संवैधानिक ढाँचे में भी गहरे रूप से जुड़े रहे हैं। उन्हें गॉर्डियन काउंसिल (Guardian Council) का सदस्य बनाया गया, जो ईरानी कानूनों और चुनावों पर निगरानी रखता है। यह परिषद संसद द्वारा पारित कानूनों को इस्लामी मानदंडों के अनुरूप सुनिश्चित करती है और चुनावों में उम्मीदवारों की योग्यता का मूल्यांकन करती है।
इसके अतिरिक्त, वह एसेम्बली ऑफ़ एक्सपर्ट्स के भी सदस्य हैं। यह वह 88-सदस्यीय निकाय है, जो सर्वोच्च नेता के चयन का अधिकार रखती है। इस निकाय में उनकी भूमिका ने उन्हें ईरान के सर्वोच्च शक्ति चक्र का हिस्सा बनाया है, और उनकी उपस्थिति न केवल धार्मिक बल्कि संवैधानिक निर्णयों में भी निर्णायक रही है।
बताते चलें कि साल 1989 से ईरान पर शासन कर रहे 86 साल के खामेनेई शनिवार, 28 फरवरी को मारे गए। इस हमले में इजरायल और अमेरिका ने मिलकर ईरान के सैन्य ठिकानों, सरकारी इमारतों और ईरान के वरिष्ठ अधिकारियों को निशाना बनाया था। इसमें ईरान के रक्षामंत्री अमीर नासेरज़ादेह और रिवॉल्युशनरी गार्ड के कमांडर-इन-चीफ मोहम्मद पाकपुर की भी मौत हो गई।
पहले अमेरिका के राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप और इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने खामेनेई की मौत की घोषणा की। ट्रंप ने खामेनेई की मौत को ‘इतिहास के सबसे क्रूर लोगों में से एक की मौत’ बताया था। ईरान ने पहले तो खामेनेई की मौत की खबरों का खंडन किया, लेकिन रविवार, 1 मार्च की सुबह उनकी मौत की पुष्टि कर दी।

