Friday, March 20, 2026
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पुस्तक समीक्षाः महिलाओं का सच हलफ़नामा में दर्ज

हलफ़नामा केवल कविताओं का संग्रह नहीं, बल्कि उन स्त्रियों की सामूहिक गवाही है जिनका जीवन इतिहास, समाज और सत्ता की निर्दय संरचनाओं के बीच बार-बार परखा गया है। नासिरा शर्मा की यह समीक्षा इन कविताओं को पढ़ने से पहले हमें उस नैतिक और मानवीय धरातल पर खड़ा करती है, जहाँ कविता सौंदर्य का नहीं, बल्कि सच का पक्ष लेती है।
अशोक तिवारी की कविताएँ स्त्री-अनुभव को इतिहास, सांप्रदायिकता, न्याय-व्यवस्था और घरेलू जीवन के सभी स्तरों पर रखकर देखती हैं। हलफ़नामा को पढ़ना सिर्फ उससे सहमत होना नहीं, बल्कि जवाबदेह होना भी है।

अशोक तिवारी की कविताओं के संग्रह हलफ़नामा से गुज़रना, दरअसल अपने और अपने जैसे असंख्य लोगों से मुलाक़ात करने जैसा महसूस होता है। औरतों की दुनिया, जो उनकी संवेदनाओं से फूटती है, हमारे लिए उतनी ही परिचित और देखी-भाली है। इस संग्रह में अतीत और वर्तमान के वे चेहरे उपस्थित हैं जिनके साथ समय की ऐसी घटनाएँ नत्थी हैं, जो अब इतिहास में दर्ज हो चुकी हैं; फिर भी वे हमें आज इसलिए बेचैन करती हैं क्योंकि उनके सवाल अब तक अनुत्तरित हैं।

अशोक तिवारी कवि, नाटककर्मी (विशेष रूप से नुक्कड़ नाटक), कलाकार, आलोचक होने के साथ-साथ गणितज्ञ भी हैं। निःसंदेह, शिक्षा के क्षेत्र में उनका महत्वपूर्ण योगदान रहा है। उनकी कविताओं को किसी परिचय की आवश्यकता नहीं थी, मगर यह परिचय इसलिए ज़रूरी है कि यह समझा जा सके कि वे जीवन के कितने क़रीब हैं और ज़मीनी सच्चाइयों को किस दृष्टि से देखते हैं। ज़मीन की एक सबसे बड़ी सच्चाई – इस कायनात का अनिवार्य हिस्सा – औरत है; और उनके संग्रह की कविताएँ औरत के इसी यथार्थ पर केंद्रित हैं, जहाँ प्रेम नहीं, सरोकार मुख्य है। यहाँ सौंदर्य का अलंकरण नहीं, बल्कि सताई हुई स्त्रियों के चेहरों की वह श्रृंखला है जिसमें माँ, बहन, पत्नी के साथ-साथ वे महिलाएँ भी शामिल हैं जिन्हें न बराबरी मिलती है, न न्याय। फिर भी उनकी जिजीविषा इतनी प्रबल है कि वे संघर्ष करना नहीं छोड़तीं; अपनी हार-जीत का फ़ैसला वे स्वयं करती हैं। उन्हें भलीभाँति पता है कि यह संसार, यह व्यवस्था, यह परिवार- उनके प्रति संवेदनहीन ही नहीं, कई बार निष्ठुर भी हो चुका है।

ये मेहनतकश औरतें अपने ख़ून-पसीने से अपनी जिजीविषा का पौधा सींचती हैं और उसी की छाँव में सुस्ताती हैं। उनका सौंदर्य और लावण्य उनके चेहरे पर छलछलाते पसीने से ही निखरता और सँवरता है। उन पर अचानक फूट पड़ने वाली खिलखिलाहट वही असली ख़ुशी है, जो उनके भीतर के संतोष से जन्म लेती है – जहाँ वे अपने जांगर पर भरोसा रखकर हर विषमता से लड़ने की क्षमता अर्जित करती हैं। यह सिलसिला आज का नहीं, आदिकाल से चला आ रहा है – उन औरतों का, जिनकी दुनिया जंगल, जानवर और जमीन से बनी है।

अशोक तिवारी के कविता-संग्रह हलफ़नामा को पढ़ते हुए ऐसा महसूस होता है, मानो आप वर्तमान में समय की बुलेट ट्रेन में सवार होते हैं जो आपको एक ही झटके से ‘रूपकुँवर’ नाम की कविता पर उतार देती है – और आप इन पंक्तियों से गुज़रते चले जाते हैं…

सुनते हुए
संस्कृति का गुणगान
आग में ज़िंदा जलाने का
इजलास ने मिचकाईं आँखें
और मुहर लगा दी फ़ैसले पर
बरी कर दिया गया
रूपकुँवर के हत्यारों को 37 साल बाद
सबूतों के अभाव ने
रूपकुँवर को धकेल दिया जलती चिता में
एक बार फिर….
सती के ज़िंदाबाद के नारों में
जलाया जाता रहा उसे फिर-फिर

इस कविता के साथ वर्तमान का अन्याय और अतीत के खुलते किवाड़ों से झाँकता सती-प्रथा का रूप एक साथ सामने आ खड़ा होता है  – वह रूप, जहाँ नरेश की पराजय के बाद रानियाँ शत्रुओं के हाथ पड़ जाने के भय से स्वयं को अग्नि समर्पित कर देती थीं। आँखों के सामने उन रानियों के नन्हे हाथों के  वे छापे घूम जाते हैं, जो आज भी समय की दीवारों पर जमे हुए हैं।

अकबर से लेकर राजा राममोहन राय तक की कोशिशों पर बार-बार पानी फिरता हुआ लगता है, क्योंकि हैवानियत के तराजू पर लाभ और मुनाफ़े के भार तले हम आज भी बार-बार अँधेरे की तरफ़ मुड़ जाते हैं—और फिर वही पुरानी दोहाई देने लगते हैं…

हर सुनवाई पर साबित किया जाता रहा उसे

साँस्कृतिक उपादन की जीती-जागती मिसाल 

भविष्य की तरफ़ ले जाने वाली समय-बुलेट ट्रेन हमें उन स्थानों पर भी उतार देती है, जहाँ रास्ता रूपकुँवर से बिलक़ीस बिलक़ीस बानो तक पहुँचता है। 2002 का दंगा—जिसने 2001 में आए गुजरात के भूकंप को भी पीछे छोड़ दिया—एक ऐसी त्रासदी थी जो प्राकृतिक नहीं, बल्कि मनुष्य द्वारा मनुष्य पर रची गई सोची-समझी साजिश थी। यह आपदा मानवीय मूल्यों पर किसी शोकगीत की तरह भीतर गहरा उत्पात मचाती है। और यही उत्पात सवालों में बदल जाता है, जब बिलक़ीस कह उठती है—

क्या करूँ
कहाँ जाऊँ
किस खोह में लूँ मैं पनाह
किस दहलीज़ पर करूँ अपनी फ़रियाद
रगड़ूं अपना माथा किस चौखट पर
अपने से ज़्यादा अपने कुनबे,
बच्चों और पति की सलामती के लिए जनाब
क्योंकि हर चौखट पर उन्हीं चेहरों के प्रतिरूप तैनात पाए हैं ड्यूटी पर
जिन्होंने बीस साल पहले दिया था
मेरी ज़िंदगी में ऐसा घाव
जिसे भरने के बजाय कुरेदा जाता रहा बार-बार
2002 का क़हर कैसे करूँ बयाँ

सियासत मर्द करते हैं और उसका परिणाम भुगतती है औरत जात। जब बेगुनाहों के घर जलाए जाते हैं, तो उसका प्रभाव मर्द और औरत – दोनों पर पड़ता है। मगर बलात्कार की पीड़ा केवल औरत ही सहती है, जब बाप और भाई के सामने उसे निर्वस्त्र किया जाता है, और वह अपनी फटी आँखों से बच्चों और माँ-बाप के क़त्ल का मंजर देखती है। और न्याय?

न्यायालय की दीवारों में चिनी ईंटें
हिफ़ाजत नहीं कर पाईं
मेरे उस यक़ीन का जो न्यायालय में
मोटा-मोटा लिखा है ….
“सत्यमेव जयते”

मुझे जानना है
क्या मेरे अंदर का डर जनाब न्यायाधीश
आपके अंदर से भी होकर आता है…!!   

‘डर’ कविता में उठाया गया यह सवाल सिर्फ़ बिलक़ीस अकेली नहीं करती, बल्कि बिलक़ीस जैसी वे सभी औरतें करती हैं जो अन्याय की शिकार होती हैं। कवि इन औरतों के बहाने उन पुरुषों से यह पूछता है कि आप अपने क़लम से लिखे फ़ैसलों के बाद कैसा समाज देखना चाहते हैं?

कवि ‘हमीदन’ कविता में हमीदन का दुख हमारे सामने लाता है – वह दुख जो मुज़फ्फ़रनगर में, अर्थात अपने मुल्क में अपने लोगों द्वारा अपनों को दिया गया। हमीदन आपको राह चलती यूँ ही नहीं मिल जाएगी; वह मिलेगी एक विशेष पहचान के साथ!

मैं हमीदन
आज़ाद हिंदुस्तान की एक लड़की
पैदा हुई जो
मुल्क के बँटवारे की आग को पाले हुए
अपने सीने में
जिसकी भेंट चढ़े मेरे वालिद
मारे गए जो सरेआम
…………
मैं जो अब धकेल दी गई हूँ
दंगों के बाद
पुलिस संरक्षण में बने राहत कैंप में
और अपने घर की
दीवारों को छूने से भी रखी जा रही हूँ वंचित
जो समूचा का समूचा खड़ा है
मेरी बंद आँखों के सामने
मगर खुली आँखों में
दीवारों के जले हुए मंज़र के सिवा
कुछ भी नहीं जो दिखता हो

कवि अशोक जहाँ समाज, देश, रणनीति और मानवीय सरोकारों के प्रश्नों के बीच उन घावों की ओर भी हमारा ध्यान ले जाते हैं जो भरने से पहले ही फिर से ज़ख्मी हो जाते हैं। पुरुष के मुक़ाबिल स्त्री की कोई सुनवाई नहीं, जो रूपकुँवर और बिलक़ीस के सिलसिले से फ़ैसले लिए गए, वही हमीदन के लिए –

ख़त्म होता रहा मेरा परिवार एक-एककर
फ़ैसले के इंतज़ार में
हवा के रुख़ और बदलावों को
करती रही मैं नोट
ज़िंदगी की डायरी में
सभी के पते छपे थे मेरे अंदर
गवाह रहे जो
मेरे अपने अंदर के बदलावों के साथ
उम्र के हर पड़ाव पर
होती रही मैं और भी चौकन्ना
हमीदन से लेकर हमीदन काकी तक के
संबोधनों को टाँकती रही अपने अंदर

…………

गाँव से तिरोहित होता
भाईचारा और बहनापा
कहाँ खो गया
हिंदुस्तान की मिट्टी की आबरू का क्या हुआ?

हमीदन का यह सवाल भारतवर्ष की दीवारों से टकराता हुआ केवल बौद्धिक या ऐतिहासिक विमर्श भर नहीं है, बल्कि सिन्धु घाटी की सभ्यता वाले उस हिंदुस्तान से है जहाँ जीवन-मूल्य, जीवन-दर्शन, मानवीय सरोकार, राजनैतिक विचार-विस्तार, अनेकता, विभिन्नता और अखंडता प्रचुरता में मौजूद हैं। यही सवाल अशोक के मन में भी उठता है, जिसे वे केवल कविताओं में ही नहीं, बल्कि अपनी पुस्तक समकालीन हिंदी कविता और सांप्रदायिकता में भी ज़ोरदार ढंग से उठा चुके हैं।

अशोक गणित के अध्यापक हैं, और गुणा-भाग से कहीं अधिक उलझे हुए मेथमैटिक्स के सवालों को हल करने में सक्षम रहे हैं। इन्हीं क्षमताओं के सहारे अशोक अपनी दूसरी कविताओं में भी इसी पीड़ा को उठाते हुए उसका हल तलाशते हैं। गणित को आसान और रुचिकर बनाने के लिए वे तमाम नई-नई गतिविधियों को बच्चों के साथ करते रहे हैं। खेल-खेल में ही बच्चे सीख जाते हैं कि मुश्किल से मुश्किल सवालों को चुटकियों में कैसे हल किया जा सकता है। हम सब जानते हैं कि इन सवालों का हल बहुत सरल और सहज होता है – बशर्ते कि उसके लिए कोई गंभीर क़दम उठाए। हमारे बीच मौजूद कुछ विशेष सोच वाले लोग अपनी ऊर्जा नकारात्मक स्तर पर खर्च करते हैं। यह सिलसिला 1947 के बाद से निरंतर दंगे-फ़सादों के रूप में नज़र आता रहा है, चाहे सत्ता में कोई भी रहा हो।

बुलेट ट्रेन की रफ़्तार हमें वे दृश्य भी झटके से दिखा जाती है – हवा की तरह उड़ते हुए, जहाँ शहर को सजाने-सँवारने, पुल और इमारतें बनवाने की मुहिम चल रही है। उसी लय में कुछ सुंदर छापे भी दिखाई देते हैं – बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ, भारत को स्वर्ग बनाओ; नारी शिक्षित—पूरा घर शिक्षित; महिलाओं का सम्मान करो इत्यादि। दूसरी तरफ़ झालरें लहरा रही हैं – सबका साथ, सबका विकास – परंतु उनके पीछे दीवारों पर लिखे नारे जैसे गायब हो गए हैं – जय जवान, जय किसान!

हलफ़नामा की कविताएँ हमारे सरोकारों के प्रति हमें सचेत और जवाबदेह बनाती हैं। वे बताती हैं कि मानवीय रिश्तों और कर्तव्यों से हटकर हम किस तरह भौतिकवाद के वैभव की तरफ़ धकेले जा रहे हैं, जहाँ आत्मा की शांति और तृप्ति का कोई मूल्य नहीं रह जाता, बल्कि एक ऐसी तेज़ रफ़्तार का सपना दिखाया जाता है जिसमें आप चलकर नहीं, दौड़कर नहीं, बल्कि एक झटके में कहीं पहुँच जाने का सुख ख़रीदना चाहते हैं।

भ्रूण-हत्या और षड्यंत्री हत्याओं के कारण औरतों की आबादी पुरुषों की तुलना में कम हुई है। हलफ़नामा की कविताएँ औरतों की अंतरात्मा में बहती वेदना की तरंगों को पकड़ती हैं। वे उस यातना को भी पकड़ती हैं जिसमें एक औरत समान मनुष्य की तरह जीवन नहीं जी पाती, फिर भी वह रिश्तों को समेटे हुए हर स्थिति से मुठभेड़ करती रहती है। उसके भीतर ममता और दया है, हमदर्दी और अपनापन है, और यही सब उसे, परिस्थितियों की शिकार होते हुए भी, आगे बढ़ने की ताक़त देता है।

बुलेट ट्रेन की यह समय-यात्रा अचानक बदल जाती है। कविताओं में एक ठहरा हुआ ठोस यथार्थ उभरता है। वे बताती हैं कि बहुत कुछ बदल चुका है, पर जो सात दशकों बाद भी पूरी तरह नहीं बदला, वही कवि को बेचैन कर देता है। यहीं उसकी मुलाक़ात उस औरत से होती है जिसे उसने अपने बचपन में भेदभाव, जात-पात और पक्षपात से पीड़ित देखा था। ‘रबड़ी का कुल्हड़’ कविता में वह इस बात का एतराफ़ करता है—

कुछ तस्वीर बस जाती हैं
मन में इस तरह
कि न चाहकर भी उनके नए संस्करण
आ ही जाते हैं सामने
वो औरत जो गुज़र गई थी सालों पहले
अचानक आ जाती है सामने
अलग ही संस्करण में ऐसे
जैसे लगता है
अरे….! ये तो वही है!

इस कविता में ‘संस्करण’ शब्द की उपमा औरतों के हालात को ज़ेरॉक्स कॉपी, फ़ोटो कॉपी या कार्बन कॉपी की तरह सामने रख देती है, जो आपको वर्तमान से अतीत और अतीत से वर्तमान में ला खड़ा करती है। राजधानियाँ, बड़े शहर और क़स्बे जो इन सच्चाइयों से दूर स्मार्ट सिटी की ओर बढ़ चुके हैं, देश के पिछड़े इलाक़ों की इस वास्तविकता से हमें लगातार दूर ले जाते हैं। मगर ‘ये औरत’ नाम की कविता में यह सच अचानक हमारे सामने पूरी तीक्ष्णता के साथ खुल जाता है।

कवि ने यह कविता गाँव के लोग पत्रिका के मुखपृष्ठ पर छपे एक चित्र को देखकर लिखी है, परंतु अपने जन्मस्थान इगलास जाते हुए उन्होंने ऐसे दृश्य न जाने कितनी बार देखे होंगे।

इस औरत को जिसे आप
देख रहे हैं लगातार काम करते हुए
कौन है ये
क्या हम महसूस कर सकते हैं
उसके घर का व्याकरण
झेलती है जो ज़िल्लत
अल्ल सुबह से देर रात तक
हर रोज़
कि वह औरत है
कि वह एक दलित औरत है
कि वह एक अल्पसंख्यक दलित औरत है
कि वह एक गरीब अल्पसंख्यक दलित औरत है
कि वह मर्दों के अधीन एक गरीब अल्पसंख्यक दलित औरत है
वो औरत
जिसे आप देख रहे हैं,
कौन है?
क्या आपने कभी इसे अपने इर्द-गिर्द देखा है?
कवि अपने पूछे सवाल का जवाब ख़ुद ही ‘रबड़ी का कुल्हड’ नामक कविता की अंतिम पंक्तियों में कुछ इस तरह‌ व्यक्त करता है।
ज़िंदगी से आशिक़ी करने वाली
इस औरत का
नया संस्करण क्या आपने कहीं देखा है?

कवि अपने पूछे सवाल का जवाब ख़ुद ही ‘रबड़ी का कुल्हड’ नामक कविता की अंतिम पंक्तियों में कुछ इस तरह‌ व्यक्त करता है।

ज़िंदगी से आशिक़ी करने वाली 

इस औरत का   

नया संस्करण क्या आपने कहीं देखा है?

यहाँ ‘आशिक़ी’ शब्द उस शिद्दत का बयान है, जो ज़िंदगी की कठिनाइयों से जूझने का जुनून अपने भीतर संजोए रखता है, परेशानियों से पंजा लड़ाने का हौसला, और इस संघर्षमय जीवन से बेइंतहा मोहब्बत करते हुए कभी न हार मानने की क़सम का रूपक है।

हलफ़नामा की कविताओं से गुज़रना, औरतों की उस बस्ती में साँस लेने जैसा है, जिसकी गलियों के आर-पार हर तबक़े, हर मिज़ाज और हर तेवर की औरतों से आपकी मुलाक़ात होती है। उनसे भी मुलाक़ात होगी जो अंदर-बाहर की दुनिया को एक नए तरह के संघर्ष के साथ जीती हैं और उसी संघर्ष में अपनी पूरी ऊर्जा लगाए रहती हैं।

‘आज़ाद स्त्रियाँ’ कविता में इन स्त्रियों की जीवटता को अशोक एक नए अंदाज़ में सामने लाते हैं जिसमें कटाक्ष भरा आश्चर्य भी है, सराहना भी है, और सम्मान भी—

स्त्रियों,
कितनी आज़ादी चाहिए तुम्हें
दिन-रात कितना भी काम करने की आज़ादी
यहाँ-वहाँ, घर में हर जगह घूमने की आज़ादी
रसोई में खाना पकाने और
स्वादिष्ट पकवान बनाने की आज़ादी
कविता अपनी लय में सारे काम और ज़िम्मेदारी गिनवाती हुई इन पंक्तियों पर, यह कहकर ठहरती है –
और कितनी आज़ादी चाहिए तुम्हे?
इतना सब करने के बाद भी
कहा जाता है –
“स्त्रियाँ आज़ाद नहीं हैं!”

कविता का यही एहसास उनकी रचना ‘अनकहे काम’ में भी उभरता है, जहाँ एक पति पहली बार यह महसूस करता है कि उसके और घर के तमाम काम किस तरह एक मुस्कान के साथ सहजता से होते चले जाते हैं। यह कविता शशी के नाम समर्पित है।

काम जो मेरे हिस्से के थे
बने नहीं कभी मगर मेरी ज़मीन का वो हिस्सा
जाना नहीं मैंने, माना भी नहीं
पहचाने भी नहीं बहुत से अपने ही काम
कि वाक़िफ़ ही नहीं था मैं ख़ुद से ही
यहाँ पर कवि शर्मिंदा भी है, चौकन्ना भी और हैरतज़दा भी कि –
थे जो मेरे लिए दुनिया के सबसे कम ज़रूरी काम
लगा रहा दिन भर अन‌कहे उन्हीं कामों को सँभालने में,
चीज़ो को अपनी जगह पहुँचाने में
भूलता रहा रोज़मर्रा के ज़रूरी कहे जाने काले कामों को
मुझे लगा अनकहे बहुत से कामों ने थका दिया मुझे
मेरी सोच आसमान से ज़मीन पर गिरी औंधे-मुँह
“क्या मुश्किल है, घर के ही तो काम हैं!”

हलफ़नामा की यह अंतिम कविता हमें अँधेरे से निकालकर रौशनी में खड़ा कर देती है – उस क्षण, जब पति अपनी पत्नी को पहली बार एक पूरा इंसान समझकर देखना शुरू करता है। तब उसकी लिखी हुई कविताएँ, जो उसने समाज की विभिन्न स्त्रियों के प्रति समानुभूति से रची हैं, सिर्फ़ लेखन भर नहीं रह जातीं। वे यह प्रमाण बनकर उभरती हैं कि वह सचमुच अपने जैसे दूसरे इंसान – स्त्री – के प्रति चिंतित है, व्यथित है, और उसके दुःख-संघर्ष को समझने के लिए भीतर से तैयार है।

अपने हाथों को टाँग देता हूँ अलगनी पर
रख देता अपने चेहरे को उतारकर मेज़ पर
टाँग देता हूँ अपने पैरों को खूँटी पर
इस इंतज़ार में कि ‘वो’ आएगी मुझे पूरा करने
हँसते हुए सुबह से शाम तक
मशगूल रहती है जो अपने कहे कामों के साथ
घर को घर बनाने में
रहती है जिसे महज़ एक मुस्कुराहट की दरकार
शुक्रिया या सिर्फ़ थोड़ा समझे जाने की हर बार !!

नासिरा शर्मा
नासिरा शर्मा
ख्यात वरिष्ठ लेखिका नासिरा शर्मा का जन्म अगस्त 1948 को हुआ था। वे हिन्दी की प्रमुख लेखिकाओं में से हैं। सृजनात्मक लेखन के साथ ही उन्होंने स्वतन्त्र पत्रकारिता में भी उल्लेखनीय कार्य किया है। वह ईरानी समाज और राजनीति के अतिरिक्त साहित्य कला व सांस्कृतिक विषयों की विशेषज्ञ हैं। वर्ष 2016 का साहित्य अकादमी पुरस्कार उन्हें उनके उपन्यास 'पारिजात' के लिए मिला है।
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