Friday, March 20, 2026
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चिठिया हो तो हर कोई बांचे…

समाज, राजनीति, साहित्य और संस्कृति की दुनिया में घटित प्रेम से संवाद और संवाद से विवाद तक की जाने कितनी कहानियाँ बीते ज़माने में लिखे गए पत्रों की इबारतों में छुपी हुई हैं। संचार की क्रांति ने भौगोलिक दूरी को तो समाप्त किया ही, उसके साथ आत्मीयता, सुकून, बेचैनी, इंतज़ार और काग़ज़ तथा लिखावट की ख़ुशबू से जुड़े वे अहसास भी कहीं खो गए। ‘चिठिया हो तो हर कोई बाँचे’ नामचीन साहित्यकारों, विचारकों और कलाकारों की सहेज कर रखी जाने लायक ऐसी ही चिट्ठियों को आप तक पहुँचाने का एक विशेष सिलसिला है। इसकी नवीनतम कड़ी के रूप में हम अब मैक्सिम गोर्की और अंतोन चेखव के एक-दूसरे को लिखे गए पत्र पढ़ेंगे। दो समकालीन महान लेखकों के बीच का यह पत्राचार अत्यंत सहज और संवेदनात्मक है—जहाँ प्रतिस्पर्धा की किंचित भी छाया नहीं, बल्कि एक-दूसरे के प्रति गहरा स्नेह और सम्मान है।

अंतोन चेख़व का मैक्सिम गोर्की के नाम पत्र

याल्टा, 3 जनवरी, 1899

प्रिय मैक्सिम,
मैंने तुम्हारी कहानियाँ पढ़ी हैं। तुम्हमें प्रतिभा है, इसमें कोई संदेह नहीं। लेकिन मैं तुम्हें एक बात बहुत स्पष्ट रूप से कहना चाहता हूँ। अच्छा लिखने की चिंता मत करो।
सच्चा लिखने की चिंता करो।

साहित्य में सबसे खतरनाक चीज़ है, खुद को बेहतर दिखाने की इच्छा। जब लेखक यह तय करने लगता है कि उसे ‘महान’ दिखना है, उसी क्षण उसकी दृष्टि धुँधली हो जाती है।

तुम्हारी ताक़त तुम्हारी असुविधा में है, तुम्हारे घावों में है,
तुम्हारी उस बेचैनी में है, जो तुम्हें चुपचाप बैठने नहीं देती।

लोग सोचते हैं कि साहित्य विचारों से बनता है, यह भ्रम है। साहित्य ईमानदारी से बनता है।

अपने पात्रों पर दया मत करो। उनसे घृणा भी मत करो।
उन्हें वैसे ही देखो जैसे वे हैं। और उन्हें बोलने दो।

और सबसे ज़रूरी बात, जीवन को सजाओ मत। वह जैसा है, वैसा ही काफ़ी क्रूर और सुंदर है।

बाक़ी सब समय सिखा देगा।

तुम्हारा
अंतोन चेख़व

मैक्सिम गोर्की का प्रत्युत्तर, अंतोन चेख़व के नाम

निज़्नी नोवगोरोद, जनवरी 1899

प्रिय और आदरणीय अंतोन पावलोविच,

आपका पत्र मिला और उसने मुझे असहज कर दिया।
ठीक उसी तरह जैसे कोई सच्ची बात करती है।

आप कहते हैं, ‘अच्छा लिखने की चिंता मत करो।’
मैं मानता हूँ कि मैं यही चिंता सबसे ज़्यादा करता हूँ।
शायद इसलिए, क्योंकि मैं भीतर से जानता हूँ कि
मेरे शब्द कई बार मेरे अनुभव से तेज़ दौड़ने लगते हैं।

आपने सही कहा, मैं अपने घावों से लिखता हूँ।
गरीबी, अपमान, भूख; ये सब मेरे लिए विषय नहीं,
मेरी स्मृति का मांस हैं। लेकिन मैं आपसे यह स्वीकार करता हूँ कि कई बार मैं अपने पात्रों को उनसे बड़ा बना देता हूँ, जितना वे हैं। शायद यह मेरी बेचैनी है, शायद मेरी महत्वाकांक्षा।

आपकी बातों ने मुझे रोका है। पहली बार ऐसा लगा है कि मुझे अपने वाक्यों को नहीं, अपने देखने के ढंग को सुधारना होगा।

आप कहते हैं—’ दया मत करो, घृणा भी मत करो।’ यह मेरे लिए सबसे कठिन है। क्योंकि मैं दुनिया से नाराज़ हूँ और उस नाराज़गी को काग़ज़ पर छोड़ देना मुझे आसान लगता है।

मैं कोशिश करूँगा, सचमुच कोशिश करूँगा कि जीवन को वैसा ही लिखूँ जैसा वह मेरे सामने आता है। बिना सजावट, बिना घोषणा।

आपका आभारी
मैक्सिम गोर्की

कविता
कविता
कविता जन्म: 15 अगस्त, मुज़फ्फरपुर (बिहार)। पिछले ढाई दशकों से कहानी की दुनिया में सतत सक्रिय कविता स्त्री जीवन के बारीक रेशों से बुनी स्वप्न और प्रतिरोध की सकारात्मक कहानियों के लिए जानी जाती हैं। नौ कहानी-संग्रह - 'मेरी नाप के कपड़े', 'उलटबांसी', 'नदी जो अब भी बहती है', 'आवाज़ों वाली गली', ‘क से कहानी घ से घर’, ‘उस गोलार्द्ध से’, 'गौरतलब कहानियाँ', 'मैं और मेरी कहानियाँ' तथा ‘माई री’ और दो उपन्यास 'मेरा पता कोई और है' तथा 'ये दिये रात की ज़रूरत थे' प्रकाशित। 'मैं हंस नहीं पढ़ता', 'वह सुबह कभी तो आयेगी' (लेख), 'जवाब दो विक्रमादित्य' (साक्षात्कार) तथा 'अब वे वहां नहीं रहते' (राजेन्द्र यादव का मोहन राकेश, कमलेश्वर और नामवर सिंह के साथ पत्र-व्यवहार) का संपादन। रचनात्मक लेखन के साथ स्त्री विषयक लेख, कथा-समीक्षा, रंग-समीक्षा आदि का निरंतर लेखन। बिहार सरकार द्वारा युवा लेखन पुरस्कार, अमृत लाल नागर कहानी पुरस्कार, स्पंदन कृति सम्मान और बिहार राजभाषा परिषद द्वारा विद्यापति सम्मान से सम्मानित। कुछ कहानियां अंग्रेज़ी तथा अन्य भारतीय भाषाओं में अनूदित।
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