अंतोन चेख़व का मैक्सिम गोर्की के नाम पत्र
याल्टा, 3 जनवरी, 1899
प्रिय मैक्सिम,
मैंने तुम्हारी कहानियाँ पढ़ी हैं। तुम्हमें प्रतिभा है, इसमें कोई संदेह नहीं। लेकिन मैं तुम्हें एक बात बहुत स्पष्ट रूप से कहना चाहता हूँ। अच्छा लिखने की चिंता मत करो।
सच्चा लिखने की चिंता करो।
साहित्य में सबसे खतरनाक चीज़ है, खुद को बेहतर दिखाने की इच्छा। जब लेखक यह तय करने लगता है कि उसे ‘महान’ दिखना है, उसी क्षण उसकी दृष्टि धुँधली हो जाती है।
तुम्हारी ताक़त तुम्हारी असुविधा में है, तुम्हारे घावों में है,
तुम्हारी उस बेचैनी में है, जो तुम्हें चुपचाप बैठने नहीं देती।
लोग सोचते हैं कि साहित्य विचारों से बनता है, यह भ्रम है। साहित्य ईमानदारी से बनता है।
अपने पात्रों पर दया मत करो। उनसे घृणा भी मत करो।
उन्हें वैसे ही देखो जैसे वे हैं। और उन्हें बोलने दो।
और सबसे ज़रूरी बात, जीवन को सजाओ मत। वह जैसा है, वैसा ही काफ़ी क्रूर और सुंदर है।
बाक़ी सब समय सिखा देगा।
तुम्हारा
अंतोन चेख़व
मैक्सिम गोर्की का प्रत्युत्तर, अंतोन चेख़व के नाम
निज़्नी नोवगोरोद, जनवरी 1899
प्रिय और आदरणीय अंतोन पावलोविच,
आपका पत्र मिला और उसने मुझे असहज कर दिया।
ठीक उसी तरह जैसे कोई सच्ची बात करती है।
आप कहते हैं, ‘अच्छा लिखने की चिंता मत करो।’
मैं मानता हूँ कि मैं यही चिंता सबसे ज़्यादा करता हूँ।
शायद इसलिए, क्योंकि मैं भीतर से जानता हूँ कि
मेरे शब्द कई बार मेरे अनुभव से तेज़ दौड़ने लगते हैं।
आपने सही कहा, मैं अपने घावों से लिखता हूँ।
गरीबी, अपमान, भूख; ये सब मेरे लिए विषय नहीं,
मेरी स्मृति का मांस हैं। लेकिन मैं आपसे यह स्वीकार करता हूँ कि कई बार मैं अपने पात्रों को उनसे बड़ा बना देता हूँ, जितना वे हैं। शायद यह मेरी बेचैनी है, शायद मेरी महत्वाकांक्षा।
आपकी बातों ने मुझे रोका है। पहली बार ऐसा लगा है कि मुझे अपने वाक्यों को नहीं, अपने देखने के ढंग को सुधारना होगा।
आप कहते हैं—’ दया मत करो, घृणा भी मत करो।’ यह मेरे लिए सबसे कठिन है। क्योंकि मैं दुनिया से नाराज़ हूँ और उस नाराज़गी को काग़ज़ पर छोड़ देना मुझे आसान लगता है।
मैं कोशिश करूँगा, सचमुच कोशिश करूँगा कि जीवन को वैसा ही लिखूँ जैसा वह मेरे सामने आता है। बिना सजावट, बिना घोषणा।
आपका आभारी
मैक्सिम गोर्की

