Friday, March 20, 2026
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विरासतनामा: अंडमान-निकोबार: औपनिवेशिक सत्ता, समाज की निर्मिति और पुनर्वास का छलावा

1947 में भारत-पाकिस्तान विभाजन के समय, अंडमान और निकोबार की स्थिति पर भी चर्चा हुई। पाकिस्तान ने भी दावा किया, लेकिन आखिरकार द्वीप भारत को मिले। 1950 में यह केंद्र शासित प्रदेश बना।

अंडमान और निकोबार सिर्फ बंगाल की खाड़ी में स्थित सुंदर उष्णकटिबंधीय द्वीप नहीं हैं। ये दक्षिण एशिया के इतिहास का एक जिंदा हिस्सा हैं। यहाँ यूरोपीय औपनिवेशिक संघर्ष, ब्रिटिश सख्त नीतियाँ, भारत-पाकिस्तान विभाजन के समय की चर्चाएँ और आजादी के बाद की पुनर्वास योजनाएँ सब कुछ देखने को मिलता है। इन सबने समाज को बदल दिया और समानता और पूर्वाग्रह जैसे सवाल खड़े किए।

शुरुआती यूरोपीय संपर्क

निकोबार और अंडमान पर यूरोपीय शक्तियाँ उस समय पहुँचीं जब आधुनिक देश बने भी नहीं थे। 1755 में डेनिश ईस्ट इंडिया कंपनी ने निकोबार पर दावा किया और तंजोर के नायक शासकों ने उन्हें बसने की इजाजत दी।

डेनिश व्यापारियों ने इसे एक छोटा सा उपनिवेश बनाया, जिसे न्यू डेनमार्क या फ्रेडरिकसोएर्ने कहा गया। डेनिश लोग अपने भारतीय अड्डे ट्रांकेबार (आज का थारंगमबाड़ी) से यहाँ का प्रशासन चलाते थे। लेकिन मलेरिया जैसी बीमारियों की वजह से उनका ज्यादातर प्रयास 1760 तक असफल हो गया। अंत में 1868 में डेनमार्क ने अधिकार अंग्रेजों को बेच दिए। इससे ब्रिटिश अंडमान और निकोबार में मुख्य यूरोपीय शक्ति बन गए।

ब्रिटिश दंड कॉलोनी

1857 के विद्रोह के बाद, अंग्रेजों ने 1858 में पोर्ट ब्लेयर के पास दंड कॉलोनी बनाई। दोषियों को रखने के लिए रॉस, चैथम और वाइपर द्वीप इस्तेमाल किए गए। यहां की कठिन परिस्थितियों की वजह से इसे “काला पानी” कहा गया।

1896-1906 के बीच बनी सेलुलर जेल, राजनीतिक कैदियों और अपराधियों के लिए प्रसिद्ध हुई। धीरे-धीरे ब्रिटिश ने कुछ दोषियों को शादी करने, जमीन लेने और परिवार लाने का लोभ भी दिया। इसका उद्देश्य बस मानवतावाद नहीं था, बल्कि आबादी नियंत्रित करना और द्वीप को आर्थिक रूप से सक्रिय बनाना था।

मोपला कैदी

मोपला समुदाय (केरल के मुस्लिम किसान) ने 1921 में ब्रिटिश सत्ता के खिलाफ विद्रोह किया। विद्रोह कुचलने के बाद 1922-26 में कई मोपला कैदियों को अंडमान भेजा गया।

कुछ लोग वहाँ बस गए, परिवारों को लाए और खेती-बाड़ी व समाज में योगदान दिया। 1931 में करीब 1,900 मोपला द्वीपों में थे। यह दिखाता है कि कैसे ब्रिटिश नीतियों ने अनजाने में अंडमान में बहु-जातीय समाज की नींव रखी।

विभाजन की राजनीति

1947 में भारत-पाकिस्तान विभाजन के समय, अंडमान और निकोबार की स्थिति पर भी चर्चा हुई। पाकिस्तान ने भी दावा किया, लेकिन अंततः द्वीप भारत को मिले। 1950 में यह केंद्र शासित प्रदेश बना और 1956 में संविधान में औपचारिक रूप दिया गया। इस वार्ता से पता चलता है कि द्वीपों का राजनीतिक महत्व कितना बड़ा था, भले ही आज इसे कम ही याद किया जाता है।

आजादी के बाद की बस्तियाँ

विभाजन के बाद भारत ने विस्थापित लोगों का पुनर्वास करना शुरू किया। अंडमान और निकोबार में कम जनसंख्या और सामरिक महत्व के कारण यह जगह चुनी गई। पूर्वी बंगाल के कई दलित नमशूद्र और अन्य पिछड़ी जातियाँ अंडमान और कुछ अन्य दूरदराज़ क्षेत्रों में बसाई गईं और उन्हें ‘पायनियर सेटलर’ कहा गया।

वहीं, सामाजिक और आर्थिक तौर पर अधिक ऊँची जातियों के कई लोग शहरों या अधिक विकसित इलाकों में ही बस पाए। 1949 में करीब 200 शरणार्थी परिवारों को जमीन, खेती और सहायता दी गई। समय के साथ बंगाली भाषी समुदाय द्वीपों में सबसे बड़ा बन गया। हालांकि इसने पुराने निवासियों और दोषियों के वंशजों को कभी-कभी हाशिए पर भी रखा।

आज का अंडमान और निकोबार

आज, अंडमान और निकोबार में करीब 3.8 लाख लोग रहते हैं और ये 570 से ज्यादा द्वीपों में फैले हैं। ये रणनीतिक रूप से बहुत महत्वपूर्ण हैं और यहाँ बहु-जातीय, बहुभाषी समाज बसता है। जारवा, ओन्गे और सेंटिनली जैसी स्वदेशी जनजातियाँ अलग-अलग द्वीपों में रहती हैं। वहीं, ब्रिटिश दोषियों के वंशज, मोपला, बंगाली शरणार्थी और अन्य प्रवासी भी यहाँ रहते हैं।

इस इतिहास में सिर्फ भूगोल नहीं बल्कि सत्ता, नीति और लोगों की बातचीत का असर दिखता है। अंडमान और निकोबार का इतिहास सिर्फ द्वीपों का नहीं, बल्कि राजनीति, समाज और सत्ता का भी इतिहास है।

ऐश्वर्या ठाकुर
ऐश्वर्या ठाकुर
आर्किटेक्ट और लेखक; वास्तुकला, धरोहर और संस्कृति के विषय पर लिखना-बोलना।
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