Friday, March 20, 2026
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थार की कहानियां: राजस्थान के ऐतिहासिक श्री मल्लीनाथ पशु मेले की बात

इस मेले का संचालन पशुपालन विभाग ने सन 1958 में संभाला था। तब से व्यवस्थाएं ठीक चल रही थी। आजकल लेकिन प्रशासन का उतना सहयोग नहीं रहा। सब एक औपचारिकता निभा कर चले जाते है।

चैत्र मास मालाणी के लिए एक संक्रमण काल जैसा है। सर्दियों की ठिठुरन अब पूरी तरह विदा ले चुकी है और गर्मियों की तीखी तपिश अभी अपने पूरे शबाब पर नहीं पहुँची हैं। मरुस्थल के वास्तविक रंग इसी दौरान दिखते हैं। खुला आकाश, दूर तक फैला पीला विस्तार और उस पर चमकती धूप, जो जीवन की कठोरता के साथ-साथ उसकी सुंदरता भी बयान करती है। घोड़ों के शौकीन बाघ जी अपने कामदार मूलचंद के साथ लूणी नदी के किनारे, तिलवाड़ा गांव में लगने वाले राजस्थान के सबसे बड़े और प्राचीन पशु मेले, श्री मल्लीनाथ पशु मेले का आनंद लेते हुए टहल रहे हैं। बाघ जी घोड़ों के बड़े पारखी और हर साल ही इस मेले में आना उनके लिए एक नियम सरीखा था। मूलचंद नया नया ही बाघ जी के सेवा में आया था और मेले में तो पहली बार ही आया था।

मेले का इतिहास

मेले की रौनक देखकर उसने बाघ जी से पूछा “दाता इतना सुंदर मेला है, ये कब से भर रहा है ? किसने शुरू किया ? कैसे शुरू हुआ? उसने एक साथ अनेक प्रश्न कर डाले। बाघ जी उसकी अधीरता भांपते हुए मजाकिया लहजे में बोले ” अरे थोड़ी सांस खा ले मूलचंद !” फिर दोनों थोड़ी दूर चले और एक घोड़े के व्यापारी के शामियाने में जाकर विश्राम करने लगे। बाघ जी बोले ” हाँ तो मूलचंद अब मैं तुझे सारी विगत सुनाता हूँ ।”

आज से कोई सात सौ बरस पहले विक्रम संवत १४३१ में रावल माल के गद्दी संभालने पर तिलवाड़ा में एक बड़ा समारोह हुआ था,उसमें आस पास के क्षेत्रों से हजारों की संख्या में लोग अपने अपने घोड़े, ऊंट और बैल लेकर आए थे। उत्सव का मौका था तो जैसा लोगों ने श्रृंगार कर रखा था वैसे ही अपनी अपनी सवारी को भी सजाकर लाए थे। यहीं आए हुए यात्रियों ने एक दूसरे के घोड़े, बैल, ऊंट आदि को देखा, प्रभावित हुए और आपस में अपने पशुओं का आदान प्रदान किया। यहीं से इस मेले की शुरुआत मानी जाती है।

रावल मल्लीनाथ जी की शक्ति और भक्ति

बाघ जी बात आगे बढ़ाते हुए कहते है कि रावल माल इस क्षेत्र के बड़े प्रतापी शासक हुए थे। १३७८ ई. में मालवा के सूबेदार निजामुद्दीन और दिल्ली के सुल्तान फिरोज शाह तुग़लक़ की १३ दलों की एक विशाल सेना लेकर रावल माल पर आक्रमण किया। रावल माल ने १३ दलों की इस विशाल सेना को परास्त कर दिया। इस घटना की स्मृति में मारवाड़ में एक कहावत है-

” तेरह तुंगा भांगिया माले सलखाणी।”

इस प्रकार उन्होंने पूरे क्षेत्र पर विजय प्राप्त की जिसे आगे चलकर “मालाणी” के नाम से जाना गया। वे इस क्षेत्र के पहले शासक थे जिन्होंने रावल की उपाधि धारण की। राणी रूपादे से विवाह के बाद उन्होंने आध्यात्मिक रूप से बहुत ऊंचे आयाम हासिल किए। कालांतर में अपने गुरु उगमसी भाटी से नाथ संप्रदाय की दीक्षा ली थी, जिसके बाद उन्हें ‘ रावल मल्लीनाथ’ के नाम से जाना जाने लगा। बाद में उनके प्रताप के कारण उन्हें लोक देवता का दर्जा मिला और उनके स्थलों पर मेले लगने लगे, जिसमें से एक मेला यह भी है।

“कुछ समझ में आया मूलचंद ? ” बाघ जी सारी बात कहने के बाद हंसते हुए पूछने लगे।

मूलचंद हामी में सिर हिलाता है। तब से यह मेला हर वर्ष चैत्र बदी ग्यारस (एकादशी) से चैत्र सुदी ग्यारस तक लगता है। मेले की शुरुआत रावल मल्लिनाथ जी के ध्वजारोहण और उनकी वीरता के गान से होती है।

मारवाड़ी काठियावाड़ी घोड़े

घोड़ों के व्यापारियों से बाघ जी की अच्छी जान पहचान है। हर साल आना जाना होता ही है। इस साल भी बाघ जी किसी अच्छे घोड़े को खरीदने का मन बनाकर आए थे।

इस मेले में प्रसिद्ध मारवाड़ी और काठियावाड़ी घोड़ों की बड़ी आमद होती है। हर घोड़े का अलग नाम और वंशावली होती है। जितना पुराना घोड़े का इतिहास उतनी ही कीमत। कीमतें करोड़ों में जाती है।

घोड़ों के एक व्यापारी ने ही बाघ जी से कहा कि “रूप जी खारा का घोड़ा “बाज़” जिसकी कीमत डेढ़ करोड़ लगाई गई थी फिर भी नहीं बेचा।” व्यापारी ने एक बात और जोड़ी कि “मल्लीनाथ जी की कृपा से किसी को मन्नत पूरी होने पर कृतज्ञता के प्रतीक के रूप में छोटे आकार के घोड़े चढ़ाने की परंपरा है। उत्तर प्रदेश के मथुरा, आगरा और अलीगढ़ से आने वाले व्यापारी यहाँ लकड़ी, पीतल और कांसे के बने छोटे घोड़े बेचते हुए दिखेंगे आपको”

देसी मेला और देसी साजो सामान की दुकानें

चाय पानी करने के बाद दोनों लोग आगे बढ़े, जहां घुड़दौड़ होने वाली थी। उनके दोनों ही तरफ सैकड़ों दुकानें थी। ये अस्थाई दुकानें लूणी नदी के मैदान में ही लगती हैं। सब देसी सामान की दुकानें जिसमें से भी अधिकतम पशुओं के श्रृंगार से संबंधित दुकानें होती हैं। घोड़ों के चाँदी की लगाम, चमड़े की जीन और रंगीन जीनपोश,कंठा और छातीबंध, पांवों के लिए घुंघरू लगी पायलें आदि। साथ ही पीलिया चणा और लूनिया चणा के ढेर लगी हुई दुकानें। यहाँ आने वाले ये चने और मीठे मखाने जरूर घर ले जाते है। बर्तन की अनेक दुकानें नजर आएंगी जहां लोहे की बनी बड़ी बड़ी देग, लोहे की कड़ाहीयाँ, चिमटे आदि मिलते है। साथ ही मिट्टी,स्टील आदि के घर-गृहस्थी के बर्तन भी मिलते हैं। लाठी और तलवार जैसी पारंपरिक चीजें नज़र आएंगी।

यहाँ आने वाले लाठी या तलवार भी जरूर खरीदते हैं। यात्रियों और व्यापारियों ठहरने में काम आने वाला तिरपाल व अन्य सामान भी मिलता है। ग्रामीण मेला है सो बड़ी संख्या में पशुपालक और किसान शामिल होते है सो उनके लिए कृषि औज़ार और उपकरण की दुकानें लगती है जिसमें खेती और पशुपालन से जुड़े औज़ार जैसे हल, कुदाल आदि मिलते हैं। पशुओं के लिए फूस,चारा और फ़ीड के विक्रेता भी आते हैं।

इन सब दुकानों पर ग्रामीण जरूरतों का सब सामान एक स्थान पर मिल जाता है। ग्रामीणों का यही शॉपिंग मॉल बन जाता है। साल में एक बार यहां आते हैं, कुछ दिन रुकते है और जरूरत का सब सामान घर ले जाते है।

आकर्षण का केंद्र घुड़दौड़ प्रतियोगिता

दुकानों को निहारते बाघ जी और मूलचंद एक ऐसे स्थान पर पहुंचते हैं जहाँ काफी भीड़ हैं साथ ही लोग उत्साहित भी बहुत कर रहे है। उत्सुकता वश मूलचंद ने बाघजी से पूछा कि ” दाता, ये इतनी भीड़, इतना हल्ला क्यों?” बाघ जी ने उसे बताया कि ” यह मेले का मुख्य आकर्षण है। यहाँ अब घोड़ों की दौड़ होगी। इस दौड़ में यहाँ के आसपास के सभी ठिकानों के रावल, राणा और राव आदि अपने अपने घोड़े इस रेस में दौड़ाते हैं साथ ही मारवाड़, उत्तरी गुजरात, पंजाब आदि से लोग भी अपने सबसे बेहतरीन नस्ल के घोड़े लेकर आते है। विजेता को इनाम भी मिलता है। और जो घोड़ा जीतता है उसकी कीमत हाथों हाथ ही कई गुना बढ़ जाती है। इस दौड़ में जीतना बड़ी प्रतिष्ठा का विषय माना जाता है।

सुकून और फुर्सत के क्षण

शाम को दौड़ पूरी होने के बाद बाघ जी अपने पुराने परिचित व्यापारी के शामियाने में रात्रि विश्राम के लिए जाते है। मेले के दौरान पंद्रह दिन तक इन तंबुओं में बड़ी रौनक होती है। लोग काफी समय लेकर आते हैं, बैठते हैं और खूब पुरानी बातें होती हैं। यहीं लकड़ियां जलाकर भोजन बनाते हैं और एक दूसरे की खूब मनवारें करते हैं।

बाघ जी ने मूलचंद की ओर देखकर कहा “सुन मूलचंद तुझे यहाँ के और परचे की बात बताता हूँ। मल्लीनाथ बापजी के परचे से इस मेले में पानी की कोई कमी नहीं रहती। कोई हाथ भर भी खोद दे तो पानी निकल आता है। जबकि मेले के बाद यहाँ पानी नहीं निकलता। दूसरी खास बात ये कि जैसा खोदने वाले के गाँव का पानी है ऐसा ही पानी यहाँ तिलवाड़ा मेले में निकलेगा।

जैसे अपने गांव में मीठा पानी है तो हम यहाँ खोदेंगे तो मीठा पानी आएगा। किसी के गांव का पानी खारा है और वो यहाँ गड्ढा खोदेगा तो खारा पानी निकलेगा।
”डोकरे री माया रो कोई पार कोनी। जय हो मल्लीनाथ जी री।”

मूलचंद तो यह सब देखकर हैरान सा ही था।

सरकार की ओर टकटकी लगाए प्राचीन मेला

भोजन आदि के बाद लंबा हथाई का दौर चालू हो गया। बाघ जी और व्यापारी आपस में बातें कर रहे थे कि अब मेले में पहले जितनी पशुओं की आवक नहीं होती। पुराने दिन याद करते हुए बताने लगे कि इस मेले का संचालन पशुपालन विभाग ने सन 1958 में संभाला था। तब से व्यवस्थाएं ठीक चल रही थी। पार आजकल प्रशासन का उतना सहयोग नहीं रहा। सब एक औपचारिकता निभा कर चले जाते है। यहाँ आने वाले यात्रियों और उनके माल मवेशियों के लिए माकूल प्रबंध है या नहीं इसकी खास चिंता किसी को नहीं रहती।

स्थानीय लोग, पत्रकार और भामाशाह अपने स्तर पर प्रयास करके इस मेले को जिंदा रखे हुए है। पत्रिका में एक पत्रकार है रतन दवे उन्होंने खूब मेहता करी। पिछली बार भामाशाह पृथ्वी सिंह कोलू और समंदर सिंह नौसर ने एक किलो चांदी और ट्रैक्टर जैसे इनामों की घोषणा करके भी लोगों को खूब आकर्षित किया। पर फिर भी सरकार सरकार ही होती है। जब तक वहाँ से दिल से प्रयास नहीं होंगे तब तक सुधार मुश्किल ही है। देर रात सभी श्री मल्लीनाथ जी का नाम लेकर सो जाते है।

महेंद्र सिंह तारातरा
महेंद्र सिंह तारातरा
सामाजिक कार्यकर्ता और स्वतंत्र लेखक। भाषा, इतिहास और संस्कृति के संरक्षण और संवर्धन को लेकर सक्रिय।
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