Friday, March 20, 2026
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पुस्तक समीक्षाः स्मृतियों के गोदने

अलका सरावगी हिंदी की ख्यातलब्ध लेखिका हैं, उनका नया उपन्यास ‘कलकत्ता कॉस्मोपॉलिटन : दिल और दरारें’ उनका नवां उपन्यास है, जिसका एक अहम हिस्सा किताब के प्रकाशन से पूर्व बोले भारत में ‘कोई जिंदगी बेमकसद’ के नाम से प्रकाशित हुआ था। यह किताब महानगर की चकाचौंध के पीछे छिपी मानवीय टूटनों का गहरा आख्यान है जो मानवीय टूटन को एक जीवित चेतना की तरह देखता है। यहाँ पहचान, प्रेम, धर्म और स्मृति बार-बार आपस में उलझकर जीवन की जटिल सच्चाइयों को उजागर करते हैं। सुनील बोस बनाम मोहम्मद दानियाल के जिस द्वंद्व के बहाने यह कहानी रची गई है,वह बताती है कि अस्तित्व की सबसे बड़ी लड़ाइयाँ बाहर नहीं, भीतर लड़ी जाती हैं और शहर की सबसे सच्ची कहानियाँ उसकी दरारों में ही जन्म लेती हैं। इस किताब की विवेचना कर रही हैं यहां पल्लवी विनोद

“आदमी अपनी स्मृतियों का ग़ुलाम होता है। ख़ासकर जब वह स्मृति जब किसी सदमे का रूप लेकर आत्मा पर कभी न मिटने वाले गोदने (टैटू) की तरह छप जाए।”

कलकत्ता कॉस्मोपॉलिटन भी ऐसी ही स्मृतियों की दास्तान है। वो स्मृतियाँ जो रह रह कर टभकती हैं। समय का लेप घटनाओं के ज़ख्म को भर देता है लेकिन उनके निशान रह जाते हैं फिर इस कहानी में तो चोट ने मन के कुछ हिस्से को तोड़ा है। ‘दिल और दरारें’ इस किताब की टैग लाइन जो इस कहानी को सही अर्थ देती है।

यह कहानी है कलकत्ता के आत्मा की… जहाँ इंसान जन्म से मृत्यु तक के सफ़र में अपने धर्म और क्षेत्र की विविधताओं के बावजूद बंगाल को ओढ़े रहता है। वामपंथ की भूमि पर लिखी गई इस कहानी का जन्म भी वामपंथ के एक अनुयायी से शुरू होती है। एक ऐसा इंसान जो अपनी सनातनी पत्नी को पूजा करते देख परेशान हो जाता है वहीं इंसान बाबरी मस्जिद के टूटने के बाद बदल जाता है। चूँकि यह कहानी धर्म पर केंद्रित है तो बिना धर्म की बात किए इसको विस्तारित नहीं किया जा सकता है। धर्म हमारी जीवन पद्धति से इस तरह जुड़ा हुआ है कि इसको परे रख कर जीवन जिया तो जा सकता है लेकिन आस पास होने वाली घटनाओं के बाद इसे अनदेखा नहीं किया जा सकता है। इस किताब में लेखिका ने अंतर्मन की अबूझ जटिलताओं को टटोला है। धर्मांतरण जैसे दुरूह विषय पर उपन्यास लिखना ख़ुद को चुनौती देने जैसा ही रहा होगा। एक सरल से अकाल्पनिक परिवेश को शब्दों में गढ़ने के बजाय अलका जी हमेशा सुदृढ़ और वास्तविक परिवेश को गढ़ती हैं। इस किताब का परिवेश निम्नवर्गीय और निम्नमध्यम वर्गीय बस्तियों का परिवेश है। मटियाबुर्ज से निकली कहानी मयूरभंज तक जाती है। दोनों इलाकों का वर्णन इतना सजीव है कि पाठक पात्रों और उनकी पृष्ठभूमि से एक मजबूत रिश्ता बना लेता है।

यह कहानी अपने नायक और नायिका के प्रेम, अंतरधार्मिक विवाह तथा पैसे कमाने की जद्द-ओ-जहद की दास्तान है।

नायक जो पहले सुनील बोस था, वो शादी के बाद मोहम्मद दानियाल हो जाता है। एक ऐसा मुस्लिम जो पाँच वक़्त का नमाज़ी है। उसने कुरान को वास्तव में पढ़ा है। इस कहानी के माध्यम से लेखिका ने ऐसी बहुत सारी बातों का जिक्र किया है जो भ्रांतियाँ बनकर हमारे मस्तिष्क और मन में बस जाती है। यह किताब यथार्थवादी गद्य की शैली में लिखा गया है।काल्पनिकता और आदर्शवाद से कोसों दूर इस किताब को पढ़ना जीवन को करीब से देखने का अनुभव देता है।

कलकत्ता कॉमोपॉलिटन पढ़ते हुए महसूस हुआ कि हमारी पहचान को पुख्ता करते काग़ज़ पाने के लिए किसी को अपने जीवन में कितनी क़ुरबानियाँ देनी पड़ सकती हैं? जब पहचान पर संकट आए तो इंसान विषम परिस्थितियों में भी ख़ुद क्रियान्वित कर लेता है। यह लेखिका का कौशल है कि उन्होंने बहुत संजीदगी से इस विषय को उठाया है। अपने पात्रों की मनःस्थितियों द्वारा ही उन्होंने सी ए ए को लेकर मुस्लिम समाज में व्याप्त डर को भी प्रदर्शित किया है।

“दीबा” इस उपन्यास मुख्य नायिका है। इसको गढ़ने में लेखिका ने औरत के हिस्से की तमाम विशेषताओं को उड़ेल दिया है। संवेदनाओं और प्रायोगिकता की कसौटी पर कसी गई नायिका पाठकों के दिमाग़ पर इस तरह छाई रहती है कि कहानी ख़त्म होने के बाद भी पाठक उसे भूल नहीं पाता है। दीबा के अंदर की अनूठी जिजीविषा तथा अथक प्रयासों द्वारा जीवन को सुलभ बनाने की लगन आपको विस्मित करेगी। एक फिजियोथेरेपी सेंटर पर मसाज करने वाली दीबा विषम परिस्थितियों में भी अटूट हौसले के साथ आगे बढ़ती है और अपने जीवन की ब्लेसिंग्स के बारे में सोचती है।

अगर इस किताब के केंद्रीय पात्रों की बात करूँ तो बोस, दीबा और उनके इर्द-गिर्द बदलने वाली परिस्थितियाँ भी इस कहानी का आधार हैं।

“सारे बंगाली सिर्फ़ क्लर्क बनने का ही सपना देख पाते हैं। तो वही सपना पूरा होगा न? कलमघिस्सू बनकर कलम घिसते रहने के लिए ही जैसे वो पैदा हुए हों। ज़्यादा से ज़्यादा दुर्गा-पूजा में नए कपड़े पहन लो, पंडालों में घूमकर दुर्गा देखो, चाऊमीन कहा लो। साल भर कटौती कर पैसे बचा कर बीवी को सोने का कर्णफूल दिला दो। दीघा-पूरी का समंदर दिखा दो या दार्जिलिंग के पहाड़।”

बंगाल के लोगों की मानसिकता का यह उद्धरण बंगाल को जानने वालों के लिए किंचित भी आश्चर्य की बात नहीं है। बंगाल उत्सव की तरह वहाँ रहने वालों के जीवन में बसा हुआ है। कल की कोई चिंता नहीं बस आज में जीने की प्रवृत्ति से बुने हुए लोग सिगरेट के धुएँ की तरह फ़िकर को भी उड़ाना जानते हैं। अलका जी ने इस किताब में बंगाल के अंदर व्याप्त समरूपता और समरसता को निरूपित किया है। रैपिडो बाइक चलाने वालों का दर्द हो या गुमटी लगाकर घर का खर्च चलाने वालों की व्यथा लेखिका की अनुभूतियों ने हर किसी का सहज चित्रण किया है।

“ज़िन्दगी के घाटे की लिस्ट लम्बी होती जाती है। दीबा ने लंबी साँस छोड़ते हुए सोचा। अब जाकर दाल-भात -सब्ज़ी बनाएगी और चार बजे तक खा-पीकर बिस्तर में घुसेगी तो रात साढ़े दस बजे खाना बनाने उठेगी। वही उसके सुकून का समय है चाहें नींद आए या ना आए। ज़िन्दगी से यह हक़ दीबा ने हासिल कर लिया है। आज वाह इन साढ़े छह घंटों में जीवन के घाटों की जगह फ़ायदों की लिस्ट बनाएगी।”

ऊपर उद्धृत पंक्तियों ने एक पाठक के तौर पर मुझे झकझोरा था। यह एक चालीस वयस औरत के मन की बात है। जब आप ज़िन्दगी की कशमकश से जूझ कर थक चुकी होती हैं। रोजमर्रा की आपधापी से कुछ घंटे ख़ुद के लिए निकालती ये औरतें उन्हीं लम्हों के सुकून को जीती हैं। ऐसी बहुत सी पंक्तियाँ हैं जिन्हें पढ़कर लगता है लेखिका ने अपनी संवेदित दृष्टि से समाज को देखा है। जिस माहौल में वो रहती हैं और जिस परिवेश को उन्होंने अपना विषय बनाया है वह दोनों एक दूसरे से सर्वथा भिन्न हैं। इस भिन्नता को परखना और शब्दों में इस पैनेपन के साथ उतारना कि पाठक उसमें डूब जाए, उत्कृष्ट लेखन की मिसाल है।

बोस की माँ के साथ हुआ हादसा इस कहानी का मूल तत्व है। बोस की आत्मा रक्तरंजित है। यदा-कदा उस पर मलहम लगे रूई के फाहे रखे जाते हैं लेकिन आख़िरी पन्नों में उसके घाव की पपड़ियाँ नोच दी गई हैं। इस किताब का आख़िरी भाग “ना हिंदू को चिता मिली ना मुल्ले को मिट्टी” इस किताब का सबसे संवेदनशील भाग है। हम सबने ऐसा समय देखा था जब इंसान की सारी विशिष्टाएँ चाहें वो धर्म संबंधी हों, वर्ण संबंधी हों या वर्ग संबंधी, नष्ट हो गईं थीं। सबका जीवन साँसों का मोहताज हो गया था और हर किसी से उसके अंतिम यात्रा का अधिकार छिन लिया गया था। इस किताब का एक पात्र “अजय मल्लिक” उस समय की भयावहता और जीवन के सच को जिस प्रकार रखता है पाठक एक अलग ही अवस्था में पहुँच जाता है। किताब की आख़िरी पंक्तियों तक आते-आते वो उस काल को मन में स्मरण करते हुए दोहराता है तथा भारी मन से किताब बंद करते हुए लेखिका के प्रति धन्यवाद अर्पित करता है। अलका जी ने बिना उपदेश दिए आपको जीवन का वो सच दिखाया है जिसे बार-बार पढ़ना चाहिए।

इस उपन्यास में मौजूद प्रेम कहानी बहुत सुंदर है लेकिन कहीं से भी काल्पनिक प्रतीत नहीं होती है। जीवन की कड़वाहट को लपेट कर ही वो आगे बढ़ती है। अंतर्धार्मिक विवाहों में आने वाली परेशानियों का बहुत सजीव वर्णन है यहां। धर्म से जुड़ी बहुत सी सच्चाइयाँ हैं जिसके बारे में हर किसी को पढ़ना चाहिए। लेखिका के पास पाठकों के हृदय को बांधने का हुनर है। पूरी किताब में कहीं भी बोझिलता या भटकाव महसूस नहीं होता है। समय हो तो आप एक बार में पूरी किताब खत्म कर सकते हैं। भाषा कथावस्तु के अनुसार और सहज है। मुख्य पात्रों के अतिरिक्त किताब में जितने भी पात्र मौजूद है वो सब आपको आनंदित करते हैं। छोटे-छोटे चुटीले किस्सों के साथ बेहद गंभीर बातें हैं। माँ का स्नेह अलग-अलग रूप में प्रकट हुआ है। बोस के प्रति उनकी माँ का, दीबा के प्रति उनकी माँ का और दीबा तथा रेहान का प्रेम ..तीनों ही माएँ एक दूसरे से पृथक हैं। उनका स्नेह को व्यक्त करने का तरीका भी विभिन्न है लेकिन इसे पढ़ते समय वात्सल्य की अव्यक्त अनुभूति पाठक को महसूस होती है।

समसामयिकता अलका जी के उपन्यासों का विशेष गुण होता है। वर्तमान समय में समाज में व्याप्त परेशानियों को चित्रित करते हुए वो पात्रों के माध्यम से ही इस समाज से सवाल करती हैं। इस किताब में भी बेरोजगारी और धार्मिक भेद भाव को उन्होंने प्रमुख रूप से चिह्नित किया है। हमारे युवाओं को पता होने के बावजूद कि विदेशों में उनकी दुर्गति है वो पैसा कमाने वहाँ जाते हैं। सालों की मेहनत के बाद अपना एक घर बनवा पाते हैं।

यह कहानी सामजिक संदर्भ की कहानी है, जिसे पढ़ा जाना हम सबके लिए बेहद जरूरी है। वर्ग भेद की बात करती इस कहानी में कहीं भी दूसरे पक्ष की शिकायत नहीं है। यहाँ तक कि एक ही धर्म के दो पक्ष भी अपने आप में सही दिखाई देते हैं। किरदारों के माध्यम से वस्तुस्थिति को जस का तस पाठक के सामने रख दिया गया है। यह विरूपण की नहीं अपितु नव निर्मिति की कहानी है। एक सामान्य मनुष्य की सोच को धर्म किस प्रकार बदलता है, उसका विवरण है। इसे पढ़ते हुए आप समाज के उस वर्ग से तादात्म्य स्थापित करते लेते हैं। यह उपन्यास अलका जी की गहरी अंतश्चेतना की परिणति है जिसे हर किसी को पढ़ना चाहिए।

उपन्यास का सबल पक्ष इसका कथानक, परिवेश तथा उद्देश्य है। अलका जी निःसंदेह हिंदी साहित्य के अग्रगण्य रचनाकारों में से हैं और “कॉस्मोपॉलिटन कलकत्ता” उनकी साहित्यिक निधि का एक अमूल्य रत्न। मैं इस समृद्ध उपन्यास के लिए अलका जी को हार्दिक धन्यवाद देती हूँ।

पल्लवी विनोद
पल्लवी विनोद
पल्लवी विनोद जन्मदिन -26 नवम्बर लेख, कविताएँ तथा कहानियाँ हिंदुस्तान, अमर उजाला, जनसत्ता, परिंदे, वनमाली कथा, अन्विति, कृति बहुमत, वाचन आदि में प्रकाशित हो चुके हैं। कविता संग्रह “परिधि से बाहर” दीपक अरोड़ा स्मृति पुरस्कार योजना द्वारा बोधि प्रकाशन से प्रकाशित हुआ है। इसके अतिरिक्त वे परिवार कल्याण केंद्र में कॉउंसलिंग का कार्य करती हैं तथा एक गैर सरकारी सेवा संस्थान से भी जुड़ी हैं।
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