Thursday, March 26, 2026
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दृश्यम: सीता बनवास- मिथक, मंच और समकालीनता

रामकथा के अनगिन रूपांतरणों के बीच ‘सीता बनवास’ का यह मंचन एक जरूरी, लेकिन जटिल हस्तक्षेप की तरह सामने आता है। अक्षय सिंह ठाकुर द्वारा निर्देशित यह प्रस्तुति आगा हश्र कश्मीरी के मूल नाटक की पारसी शैली को पुनर्जीवित करते हुए उसे समकालीन वैचारिकता से जोड़ने का  एक सुंदर और विरल प्रयास है। ऐसा करने के क्रम में वे सीता की मौन वेदना को आज की चेतना के केंद्र में भी ले आते हैं। यह कथा सिर्फ अतीत का पुनर्स्मरण नहीं, बल्कि उस अन्याय का कलात्मक पुनर्पाठ है जो समय की परतों के पार स्त्री-अनुभव में आज भी धड़कता है। सीता के दुख को केंद्र में लाने की यह कोशिश एक ओर प्रासंगिक है, तो दूसरी ओर यह भी परखने की मांग करती है कि कहीं यह पुनर्पाठ अपने समय की संवेदनाओं को आरोपित करते हुए मूल नाटकीय जटिलताओं को सरल तो नहीं कर देता। क्या शैलीगत वैभव के सहारे स्त्री-वेदना की गहराई सचमुच उद्घाटित हो पाती है, या वह कहीं भावुकता और प्रभावोत्पादन में धुंधली पड़ जाती है?

जबलपुर के तंरग प्रेक्षागृह में पिछले दिनों (15 मार्च 2026) अक्षय सिंह ठाकुर के निर्देशन में `सीता बनवास’ का मंचन समकालीन हिंदी नाटक जगत की एक बड़ी घटना है। सिर्फ इसलिए नहीं कि ये पारसी शैली में किया गया जिसकी चर्चा आजकल यदा-कदा ही होती है बल्कि इसलिए भी कि इसमें समकालीन व आधुनिक वैचारिकता की प्रतिध्वनि भी थी।

‘सीता बनवास‘ आगा हश्र कश्मीरी का लिखा नाटक है। 1913 मे उन्होंने इसे लिखा था। वे पारसी शैली के एक सिद्धहस्त लेखक थे। कुछ लोगों ने उनको इस शैली का शेक्सपीयर भी कहा। हालांकि ये एक अतिशयोक्ति है फिर भी ये इतना तो इंगित करता ही है वे कितने बड़े लेखक थे। एक बात और वे अपने नाटक अक्सर उर्दू में लिखते थे, लेकिन `सीता बनवास’ उन्होंने हिंदी में लिखा। हिंदी के मुहावरे इसमें हैं। यह ये भी दिखाता है कि कैसी भाषाई दक्षता उनमें थी और पारंपरिक भारतीय संस्कृति की पहचान और समझ भी।

वैसे ‘सीता बनवास’ अपने समय का भी चर्चित नाटक रहा है और आज भी इसे खेला जाता है। लेकिन आजकल इसे खेलने वाले ज्यादातर यथार्थवादी शैली का सहारा लेते हैं। हालांकि वे इसमें पारसी शैली के कुत तत्व भी शामिल कर लेते हैं। लेकिन खालिस पारसी शैली में इसे आजकल अमूमन नहीं खेला जाता। इसलिए इसका वो प्रभाव नहीं पड़ता जो पड़ना चाहिए। अक्षय सिंह ठाकुर ने इसे ठेठ पारसी शैली में पेश किया।

इस शैली में संवादों की खास तरह से अदायगी होती रही है। इसलिए संवादों पर तालियां भी बजती हैं। एक वक्त था जब पारसी शैली में किसी संवाद को इतना पसंद किया जाता था कि मंच पर एक संवाद को कई बार `वन्स मोर’ किया जाता था। मास्टर फिदा हुसैन, जो पारसी शैली के एक चर्चित अभिनेता थे, अपने साक्षात्कारों में बार-बार यह किस्सा सुनाते थे कि उनके किस संवाद पर कितनी बार `वंस मोर’ कहा गया। उनको फिदा हुसैन `नरसी’ भी कहा जाता था क्योंकि वो एक नाटक में उन्होंने नरसी मेहता का किरदार निभाया था।

संवाद अदायगी की शैली और `वंस मोर’ सुनने की  लालसा पारसी शैली के अभिनेता को मंच पर कई गुने उत्साह से भरे रखती थी। इस कारण इस शैली के नाटक रात भर चलते थे। अब जमाना बदल  गया है इसलिए रात भर के नाटक होने असंभव से हो गए है। फिर भी संवाद अदायगी की यह नाटक के वाचिकता को एक ऊंचाई पर पहुंचा देती थी।

इस शैली में दो अन्य तत्व भी प्रमुख होते हैं – एक तो पर्दे, जो नाट्य प्रस्तुति के दौरान प्रसंग के मुताबिक बदलते रहते हैं और दूसरे कुछ प्रविधियों का इस्तेमाल जिसमें यंत्रों को प्रयोग में लाया जाता है। इस कारण नाट्य्र प्रभाव बढ़ जाता है। संगीत औऱ नृत्य का उपयोग भी इसमें काफी होता रहा है। भारतीय फिल्मों ने इस शैली से बहुत कुछ लिया। इसलिए भी भारतीय फिल्मों का ढांचा पश्चिमी फिल्मों से अलग होता है।

बहरहाल अब प्रस्तुति पर लौटें। नाम से ही जाहिर है कि `सीता बनवास’ राम के लंका से अयोध्या लौटने के बाद सीता को वनवास देने की घटना पर आधारित है। ये भी सर्वविदित है कि लोकापवाद के चलते राम ने राजा के रूप में गर्भवती सीता को वन में भेजा और वहां वे महर्षि वाल्मीकि के आश्रम में रहीं जो रामायण के रचयिता है। महर्षि वाल्मीकि ने उनके दोनों पुत्रों लव और कुश (हालांकि कुश की कथा अलग है लेकिन उसे यहीं छोड़ देते हैं क्योंकि नाटक के सिलसिले में वो प्रासंगिक नहीं है) को शिक्षा दी।रामायण की कथा सुनाने का प्रशिक्षण दिया और साथ ही धनुर्विद्या भी सिखाई। राम जब अश्वमेध यज्ञ करते हैं तो कुश और लव उनके घोड़े को रोक लेते हैं। दोनों भाई राम की सेना के साथ साथ हनुमान और लक्ष्मण को भी पराजित कर देते हैं। बाद में वे महर्षि वाल्मीकि के साथ राम के दरबार में जाते हैं और वहां राम कथा सुनाते हैं। सीता अंत में पृथ्वी में समा जाती है।

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वैसे तो `सीता बनवास’ राम (नमन मिश्रा) और सीता (हिमाद्री व्यास) की कथा है लेकिन इसके ढांचे पर ध्यान दें तो लव (आर्या सिंह) और कुश (वैश्णवी बरसैया) की भूमिका इसमें काफी महत्त्वपूर्ण है। अक्षय द्वारा निर्देशित नाटक में भी दोनों एक तरह से केंद्रीय चरित्र के रूप में उभरते हैं। सीता तो  इसकी मुख्य चरित्र हैं ही, आखिर उनको ही वनवास दिया गया था और वही बारह साल तक राज महल त्यागने के बाद आश्रम में रहकर अपने बच्चों का लालन पालन करती हैं। इतना होने के बाद भी राम के प्रति उनका लगाव और प्रेम कम नहीं होता है। इसलिए उनका दुख ही इस नाटक का नाभिक है। पर चूंकि लव और कुश राम की सेना को चुनौती देते हैं, अश्वमेध यज्ञ का घोड़ा रोकते हैं और अय़ोध्या की सेना से युद्ध करते हैं इसलिए नाटक में दोनों का जो व्यक्तित्व उभरता है उसमें विरोध का तेज है। अपनी मां के साथ हुए अन्याय को लेकर उनका रोष तब भी बरकरार रहता है जब वे अयोध्या में रामाय़ण का गायन करते हैं। इस प्रस्तुति में ये बात उभरती है, औऱ ये अक्षय की मौलिक उदभावना है, जब वे राज सभा में अश्वमेध के पूरा होने पर राम कथा का गायन करते हैं तो `सीतानाम सीतानाम’ करते हैं, `सीताराम सीताराम’ नहीं। महर्षि वाल्मीकि बीच में आकर टोकते भी हैं कि `सीताराम सीताराम’ बोले, लेकिन दोनों `सीतानाम सीतानाम’ बोलते रहते हैं। इस तरह निर्देशक ने न सिर्फ लव औऱ कुश के अंदर के विरोध भाव को मुखरित किया है बल्कि उसे आज के समय की वैचारिकता के अनुसार ढाल भी दिया है।   किसी स्त्री के साथ हुए बेइंसाफी को आज के निर्देशक को कहीं न कहीं रेखांकित करना ही चाहिए। आज के दौर में `सीता बनवास’ करना सिर्फ रामकथा का पारंपरिक प्रस्तुतिकरण नहीं होना चाहिए बल्कि सीता के साथ जो हुआ उसे प्रश्नांकित करना भी निर्दशक का दायित्व है। लव और कुश यही करते हैं और निर्देशक की सहानुभूति उनके साथ है और सीता के साथ भी। हालांकि राम का अंतर्द्वंद्व भी इसमें है।

पर ऐसा भी नहीं है कि ये प्रस्तुति सिर्फ इस वैचारिकता की वजह से ही याद रखी जाएगी। इसमें पारसी नाटकों के उत्कर्ष युग में प्रचलित पर्दों का प्रयोग भी इस तरह हुआ है कि सीता-राम संबंध की प्रगाढ़ता भी प्रमुखता से दिखती है।  नाटक में एक स्थल है जहां सीता राम को याद कर रही हैं। उसी स्मृति-क्षण में राम भी आते हैं। पर्दों और प्रकाश योजना के सहारे चांदनी रात का दृश्य निर्मित किया गया। सीता के मानस पटल पर राम उदित होते हैं। दोनों के  बीच संवाद भी होता है। ये एक ऐसा लम्हा है जो सीता औऱ राम के बीच की अनन्यता को दिखाते हैं। यहां सूर्यकांत त्रिपाठी की कविता `राम की शक्ति पूजा’ का वो स्थल याद आता है जहां युद्ध के बीच राम को सीता की याद आती है-

‘ऐसे क्षण अंधकार घन में जैसे विद्युत
जागी पृथ्वी- तनया – कुमारिका- छवि अच्युत
देखते हुए निष्पलक. याद आया उपवन
विदेह का, प्रथम स्नेह का लतांतराल मिलन
नयनों का -नयनों से गोपन- प्रिय संभाषण
पलकों का  नव पलकों पर प्रथमोत्थान – पतन
कांपते हुए  किसलय- झरते पराग समुदय
गाते खग- नव-जीवन- परिचय, -तरू मलय वलय
ज्योति प्रपात स्वर्गीय- ज्ञात छवि प्रथम स्वीय
जानकी नयन कमनीय प्रथम कंपन तुरीय’

ये `राम की शक्ति पूजा’ का वो प्रसंग है जहां राम का ईश्वरत्व नहीं बल्कि उनकी मानवीयता  प्रकट होती है। `सीता बनवास’ की इस प्रस्तुति में राम और सीता के बीच का वही रागात्मक लगाव दिखता है जो उस काव्यांश में आया है। यहीं पर पारसी शैली की विशिष्टता सामने आती है कि जहां नाट्यास्वाद में काव्यास्वाद भी आ जाता है। हालांकि आज के सिनेमाई युग में फिल्मों मे इस तरह के दृश्यों की रचना सहज ही संभव है। लेकिन यथार्थवादी रंगमंच पर ये आसान नहीं है। लेकिन पारसी शैली में इसे संभव किया गया है। और ये भी गौर करना होगा कि ये सिर्फ शैलीगत खासियत नहीं है बल्कि यहां अनुभूतिगत सघनता भी है। राम जन दबाव में सीता को निष्काषित करते हैं लेकिन उनके प्रति सीता का प्रेम कम नहीं होता। राम ने उन्हें घर या कहिए कि राजमहल  से निकाल दिया है लेकिन सीता ने राम को अपने मन से नहीं निकाला है। राम भी अपने मन से सीता को कहां निकाल पाते हैं!

निर्दशक अक्षय सिंह ठाकुर ने अपनी इस प्रस्तुति में  दोनों ही विंदुओं का साध लिया है- एक तो तो राम के प्रति सीता के लगाव को और लव और कुश के माध्यम से राम द्वारा किए गये सीता के प्रति अन्याय को।

नाटक के गीत लिखे हैं जफर संजरी ने। संगीत भी उनका ही है। और दोनों ही उत्कृष्ट कोटि के। कश्मीरी द्वारा लिखित सीता बनवास में कोई गीत नहीं है। लेकिन अक्षय की इस प्रस्तुति में कई गीत हैं और इस कारण कई स्थलों पर भावात्मक गहराई आ जाती है। पहले गीत के आरंभिक बोल दीप जलाने को लेकर हैं – `दीपों का उत्सव मान दीप जलाओ जी, ये शाम सुहानी आई है और नई तरेंगे लाई है, अयोध्या में  राम राज है , राम आरती गाओ जी।‘

ये गीत सिर्फ गीत नहीं हैं। ये बताता है कि राम, सीता और लक्ष्मण लंका से अयोध्या लौट आए हैं। ये पारंपरिक मिथक है कि दीपावली की पूजा तब से शुरू हुई जब राम रावण को हरा कर और उसे मारकर अयोध्या लौटे। इस गीत और दृश्य के माध्यम से अयोध्या के तब के माहौल को दिखा दिया जाता है औऱ ठीक इसके बाद राम लोकापवाद के कारण सीता का परित्याग करते है। यानी उल्लास के माहौल के बाद सीता परित्याग का दुखद प्रसंग घटित होता है। इस तरह प्रस्तुति के गीत और संगीत के माध्यम से कई स्थलों पर ऐसी मार्मिकता उत्पन्न होती है।

आख्रिरी दृश्य, जिसमें सीता पृथ्वी में समा जाती है, का गीत तो ऐसा है कि राम-सीता काव्य परंपरा में एक न भूली जानेवाली कविता की तरह हो गया है। जफर संजरी द्रवारा लिखित गीत के बोल हैं (गाए हैं पूजा केवट ने) –

 हे धरती मां, मेरा मन तेरे जैसा हो गया है
हजारों घाव इसमें भी दबके रह गए हैं
इस मन में भी दबके रह गए हैं
इसमें भी दबके रह गए है
वसुंधरा वसुंधरा वसुंधरा

कोरस- ( वसुंधरा की कोख में पली सीता सीता सीता

अब उसी की शरण में चली जाती सीता सीता सीता)
सीता- कहां जाऊं , करूं क्या, समझ आता नहीं
अबकि अपने से मेरे विष पिया नहीं जाता
अब दे दे शरण माता तू, और कोई नजर आता नहीं अब

(कोरस – वसुंधरा की कोख में…)

सीता- पसारे बांह बैठी हूं तेरी गोद में आने को

व्याकुल हो रही हूं मां मैं तुझमें समाने को

(कोरस- वसुंधरा की कोख में…)

 इसे पूरा होते ही सीता पृथ्वी में समा जाती है। सीता की वेदना और त्रासदी से दर्शक के मन के गह्वर में उतर जाती है।

अक्षय ने इस नाटक के लिए पर्दों की व्यवस्था के लिए हैदराबाद की `सुरभि’ संस्था के कलाकार बुलाए। `सुरभि’ वह कला संस्था है जो अभी भी पर्दों के निर्माण में विशेषज्ञ है। शायद देश की एक मात्र ऐसी संस्था। पर पर्दों को पेंट करने और उनपर दृश्य चित्रित करने का काम जबलपुर के ही दो कलाकारों ने किया- तरुण ठाकुर और अंजलि राउत ने किया। ये भी एक कला है जिसे साधने में एक लंबी प्रक्रिया पूरी करनी होती है।

वैसे तो पारसी शैली के नाटक अब मुख्य धारा में नहीं हैं। लेकिन अब भी होते  रहते हैं। राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय और मघ्य प्रदेश नाट्य विद्यालय में भी इसकी प्रस्तुतियां होती हैं। हालांकि पारसी शैली का व्याकरण बहुत कुछ फिल्मों में समा गया फिर भी इसका वास्तवित जादू तब दिखता है जब ये मंच पर समग्रता में होता है। हालांकि आज के दौर में ये समग्रता अपवाद स्वरूप ही दिखती है।

यहां अलग से ये भी कहना आवश्यक है कि हिंदी के अकादमिक जगत भी पारसी नाटकों को तिरस्कार भाव से देखा। विश्वविद्यालयों के हिंदी विभागों ने आगा हश्र कश्मीरी और राधेश्याम कथावाचक जैसे नाटककारों की अनदेखी की गई। वे विश्व विद्यालयों में अपवाद स्वरूप ही पढाए जाते हैं। हिंदी के नाट्य अध्यापकों ने ये भ्रामक धारणा भी फैलाई कि पारसी नाटक  सांस्कृतिक पतन की निशानी है जबकि वे अपने वक्त के नवोन्मेष की तरह थे। विश्वविद्यालयों में ये अपराध भी हुआ और मूढ़ता भी फैली। आज के समय में वो मूढ़ता और भी पसरती जा रही है।

 इस दुर्वाख्या और पूर्वग्रही दृष्टिकोण को संशोधित करने की जरूरत है। पर ये तभी संभव है जब पारसी नाटकों (या कंपनी नाटकों का, क्योंकि पारसी नाटकों को कंपनी नाटक के नाम से भी जाना गया) का मंचन लगातार होता रहे और विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रम और वहां की नाट्यालोचना पद्धति में आमूल बदलाव हो।

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रवीन्द्र त्रिपाठी
रवीन्द्र त्रिपाठी
रवीन्द्र त्रिपाठी (जन्म 15 फरवरी, 1959), मेदिनीनगर/डालटनगंज, झारखंड। प्रिंट, टेलीविजन और सोशल-मीडिया के वरिष्ठ पत्रकार, नाटककार, साहित्य-फिल्म-कला-रंगमंच आलोचक, व्यंग्यकार, डॉक्यूमेंट्री फिल्ममेकर, यू- ट्यूबर, अनुवादक, स्क्रिप्ट-लेखक और संपादक। महात्मा गांधी के जीवन पर `पहला सत्याग्रही’ और स्वामी विवेकानंद के जीवन पर `विवेकानंद इन शिकागो’ नाटक लिखे। `कथा शिवपालगंज की’ , `राग विराग’ और `अज्ञातवास’ (तीनों श्रीलाल शुक्ल के उपन्यासों के नाट्य रूपांतर)। सभी नाटक मंचित। साहित्य अकादेमी और साहित्य कला परिषद के लिए डॉक्यूमेंट्री फिल्मों का निर्माण, एबीपी न्यूज के व्यंग्य-शो `पोलखोल’ के स्क्रिप्ट लेखक (शुरू में उसके प्रॉड्यूसर भी)। प्रसन्ना की पुस्तक `इंडियन मेथड इन एक्टिंग’ का `अभिनय की भारतीय पद्धति’ नाम से हिन्दी अनुवाद। राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय की पत्रिका `रंग प्रसंग’ और केंद्रीय हिन्दी संस्थान की पत्रिका `मीडिया विमर्श’ के अतिथि संपादक रहे।
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