नई दिल्ली: इजराइल के हमलों ने कुछ दिनों पहले 7 और 8 मार्च को ईरान में तेहरान और उसके आसपास के चार प्रमुख तेल भंडारण केंद्रों और एक डिस्ट्रिब्यूशन सेंटर को निशाना बनाया। नतीजा ये हुआ कि बिना रिफाइल वाला तेल सड़कों पर फैल गया, कई दिनों तक आग लगी रही और फिर बारिश हुई। ये काली बारिश थी और जंग के पर्यावरण पर पड़ रहे असर की एक भयावह तस्वीर भी।
तेहरान के लोगों के अनुसार उनकी कारों, खिड़कियों और त्वचा पर तेल जैसा काला अवशेष गिरता नजर आया। ईरान के रेड क्रिसेंट ने चेतावनी दी कि बारिश ‘अत्यंत खतरनाक और अम्लीय’ थी। ऐसी बारिश से रासायनिक जलन (chemical burns) और फेफड़ों को गंभीर नुकसान हो सकता है।
इसके अलावा इस तेल के धरती में पहुंचने, पानी के स्रोतों जैसे नदियों-झीलों में मिल जाने के खतरे बढ़ गए हैं। ईरान जैसे शुष्क क्षेत्र में, जहाँ पानी पहले से ही अहम माना जाता है, वहां सतह पर मौजूद थोड़े से पानी का प्रदूषित होना बड़ा संकट है। इसमें भी कोई दो राय नहीं यह प्रदूषण कृषि क्षेत्रों तक को भी प्रभावित करेगा। ये एक बानगी भर है कि पिछले करीब एक महीने से पश्चिमी एशिया क्षेत्र में छिड़ा युद्ध पर्यावरण को किस तरह नुकसान पहुंचा रहा है।
पर्यावरण पर चोट! ईरान में तेजाब वाली बारिश कैसे हुई
ईरान में 7-8 मार्च वाले घटनाक्रम के बाद जिस काली बारिश की चर्चा हो रही है, इसके पीछे का विज्ञान क्या है, ये भी समझना चाहिए। दरअसल, जब कच्चा तेल जलता है, खासकर सल्फर से भरपूर कच्चा तेल, तो यह वायुमंडल में सल्फर डाइऑक्साइड और नाइट्रोजन डाइऑक्साइड छोड़ता है।
ये गैसें हवा में मौजूद नमी के साथ रिएक्ट करके सल्फ्यूरिक एसिड और नाइट्रिक एसिड बनाती हैं। जब बारिश होती है, तो यही एसिड पानी के साथ नीचे आता है। इसमें कालिख और धूल के कण भी शामिल हो जाते हैं, और इस तरह करीब एक करोड़ की आबादी वाले शहर पर आसमान से एक जहरीली बारिश हुई।
अगर बारिश नहीं भी होती तो ये प्रदूषक तत्व कई दिनों तक हवा में तैरते रहते। तेहरान की भौगोलिक स्थिति इस परिस्थिति को और भी बदतर बना देती है। यह शहर अल्बोर्ज पर्वतमाला से घिरे एक बेसिन में स्थित है, जिसके कारण अक्सर टेंप्रेचर इनवर्जन होता है। इसमें सतह के पास ठंडी हवा के ऊपर गर्म हवा की एक परत बनी रहती है। ऐसे में सतह के पास वाले प्रदूषक तत्व ठंडी परत में फंसे रह जाते हैं और दूर तक फैल नहीं पाते। यही घटना दिल्ली में तेज सर्दियों में देखने को मिलती है, जो धुंध या स्मॉग का कारण बनती है।
पर्यावरण के नुकसान की कहानी तेजाब वाली बारिश से आगे भी…
क्वीन मैरी यूनिवर्सिटी ऑफ लंदन, लैंकेस्टर यूनिवर्सिटी और क्लाइमेट एंड कम्युनिटी इंस्टीट्यूट के शोधकर्ताओं द्वारा किए गए एक नए विश्लेषण में अनुमान लगाया गया है कि ईरान युद्ध के पहले 14 दिनों में 50 लाख टन से अधिक कार्बन डाइऑक्साइड के बराबर (CO₂e) उत्सर्जन हुआ।
ये निष्कर्ष बता रहे हैं कि इस संघर्ष के कारण पहले ही आइसलैंड के कुल वार्षिक कार्बन उत्सर्जन से अधिक उत्सर्जन हो चुका है। यह नतीजे मौजूदा या आधुनिक युग में जंग के अक्सर अनदेखे किए जाने वाले पर्यावरणीय परिणामों को उजागर कर रहे हैं। यहां गौर करने वाली बात ये भी है कि यह विश्लेषण कार्बन उत्सर्जन की शुरुआती तस्वीर ही पेश कर रहा है। चूकी जंग के जारी रहने के एक महीने होने जा रहे हैं और ये अभी भी जारी है, ऐसे में माना जा रहा है कि आने वाले दिनों जलवायु पर पड़ने वाले प्रभाव को लेकर और चिंता बढ़ाने वाले आंकड़े सामने आएंगे।
यह शोध 28 फरवरी से 14 मार्च 2026 के बीच उत्पन्न प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष उत्सर्जन की जांच पर आधारित है। इसमें सैन्य अभियानों, बुनियादी ढांचे को गिराने या नुकसान पहुंचा सहित ईंधन और तेल सुविधाओं को हुए नुकसान से होने वाले उत्सर्जन शामिल हैं। अध्ययन के अनुमान के अनुसार इस अवधि के दौरान होने वाला उत्सर्जन लगभग 11 लाख पेट्रोल कारों के वार्षिक उत्पादन के बराबर है।
स्ट्रेट ऑफ होर्मूज बंद होने का भी असर
जंग शुरू होने के बाद होर्मुज जलडमरूमध्य के बंद होने से तेल और गैस आपूर्ति में बाधा आई है। इसके अलग पर्यावरणीय नुकसान हैं। माल परिवहन के लिए कोई दूसरा रास्ता ढूंढना की मजबूरी बढ़ी है। UNCTD का अनुमान है कि केप ऑफ गुड होप होते हुए सिंगापुर से उत्तरी यूरोप तक की यात्रा में स्वेज नहर मार्ग की तुलना में 70% अधिक उत्सर्जन होता है। 2024 के एक अध्ययन में पाया गया कि स्वेज नहर में व्यवधान से शिपिंग कार्बन फुटप्रिंट में लगभग 50% की वृद्धि हो जाती है।
यही स्थिति एविशेशन यानी विमानन पर भी लागू होती है। ईरानी हवाई क्षेत्र पूरी तरह से बंद है। खाड़ी क्षेत्र का हवाई क्षेत्र भी नागरिक विमानों के लिए समय-समय पर बंद होता रहा है। उड़ानों के मार्ग बदले जा रहे हैं, जिसका सीधा मतलब है लंबे मार्ग, अधिक उड़ान समय और ज्यादा ईंधन की खपत और इससे होता अधिक कार्बन उत्सर्जन।
इसके अलावा इस जंग और ईंधन सप्लाई पर पड़े असर ने कई देशों को स्वच्छ ईंधन की दिशा में आगे बढ़ने से रोकना शुरू कर दिया है। भारत में एलपीजी संकट की चर्चा हो रही है। भारत अपने एलपीजी इस्तेमाल का लगभग 60% आयात करता है, और इस आयात का लगभग 90% हिस्सा स्ट्रेट ऑफ होर्मूज से होकर गुजरता है। इसमें रुकावट से एलपीजी आपूर्ति में कमी आई है। ऐसे में देश भर के कई रेस्तरां कोयला और लकड़ी के ईंधन का उपयोग करने पर विचार कर रहे हैं।
समुद्र और मरीन लाइफ के लिए भी चुनौती
याद कीजिए 4 मार्च को श्रीलंका के तट के पास अमेरिकी पनडुब्बी द्वारा टारपीडो से ईरानी जहाज IRIS Dena को उड़ाया गया। जहाज के डूबने के तीन दिन बाद लोकप्रिय पर्यटन क्षेत्र और पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्र हिक्काडुवा तट (Hikkaduwa Coast) पर तेल के धब्बे दिखाई दिए। महासागरों में तेल के फैलने और इससे समुद्री जीवन को होने वाले नुकसान की तस्वीरें आने वाले दिनों में और प्रमुखता से सामने आ सकती हैं।
फारस की खाड़ी में भी जोखिम और बढ़ रहे हैं। कई जहाज खाड़ी क्षेत्र वाले समुद्र में फंसे हुए हैं। इससे पहले से ही भीड़भाड़ वाले इस जलक्षेत्र में आकस्मिक टक्करों और तेल रिसाव का खतरा बढ़ गया है।
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फारस की खाड़ी में दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी डुगोंग (Dugong) आबादी मिलती है। इसके अलावा यहां 700 से अधिक मछली की प्रजातियां पाई जाती हैं। अगर तेल फैल जाए, तो यह इस बंद और खाड़ी के उथले पानी में आसानी से नहीं फैलता। यह मछलियों के प्रजनन स्थल के रूप में काम करने वाले मैंग्रोव जंगलों को ढक सकता है, कोरल रिफ्स को नुकसान पहुंचाता है और समुद्री खाद्य शृंखला यानी फूड चेन को दूषित कर सकता है।
गौरतलब है कि 1980 के दशक में ईरान-इराक युद्ध के दौरान खाड़ी में फैले तेल का कनेक्शन इस क्षेत्र की हॉक्सबिल समुद्री कछुओं की लगभग पूरी आबादी के विनाश और ग्रीन कछुओं के एक बड़े हिस्से के विनाश से जोड़ा गया था।
एक के बाद एक युद्ध…और प्रदूषण इतना कि मापना मुश्किल!
ईरान का युद्ध अकेला नहीं है। पिछले तीन-चार सालों में दुनिया ने कई जंगों को देखा है और ये अब भी जारी हैं। इसमें रूस-यूक्रेन और इजराइल की हमास के खिलाफ की गई कार्रवाई भी शामिल हैं। उदाहरण के लिए एक गैर-लाभकारी संस्था ‘इनिशिएटिव ऑन GHG (ग्रीनहाउस गैस) अकाउंटिंग ऑफ वॉर’ के अनुसार यूक्रेन के खिलाफ रूस के युद्ध के पहले तीन वर्षों में कम से कम 23 करोड़ टन कार्बन डाइऑक्साइड के बराबर उत्सर्जन हुआ। यह हंगरी, ऑस्ट्रिया, चेक रिपब्लिल और स्लोवाकिया को मिलाकर होने वाले वार्षिक उत्सर्जन के बराबर है।
वापस ईरान जंग की ओर लौटे तो earth.org की एक रिपोर्ट बताती है कि ईरान पर हुए अमेरिकी-इजरायली हमले के दौरान ‘ऑपरेशन एपिक फ्यूरी’ के तहत अमेरिका की 8,000 से अधिक लड़ाकू उड़ानें हुई हैं। इनमें बमवर्षक और लड़ाकू विमान, ड्रोन, टोही विमान, मालवाहक विमान और ईंधन भरने वाले टैंकर के साथ-साथ सैन्य हेलीकॉप्टर भी शामिल हैं।
इनमें से एक लॉकहीड मार्टिन का एफ-35 लाइटनिंग II लड़ाकू विमान डेढ़ से दो घंटे की एक उड़ान के दौरान लगभग 5,600 से 6,500 लीटर केरोसिन की खपत करता है। इससे लगभग 14-17 टन कार्बन डाइऑक्साइड का उत्सर्जन होता है, जो एक सामान्य यात्री कार के पूरे जीवनकाल के बराबर है।
ये उदाहरण बता रहे हैं कि तमाम आंकड़ेबाजी के बावजूद इन जंगों से पर्यावरण को हो रहे असल नुकसान का तत्काल सटीक आकलन लगाना बेहद मुश्किल है। यह इतने बड़े पैमाने पर हो रहा है कि ठीक-ठीक आंकड़ों के नजदीक भी पहुंचने में लंबा समय लगेगा और तब तक हो रहे नुकसान इतनी गंभीर अवस्था में पहुंच चुके होंगे जिसकी भरपाई शायद बेहद मुश्किल या नामुमकिन ही होगी।

