भारतीय सिनेमा में किशोर कुमार से बड़ा नटखट, बेबाक और अलबेला फनकार शायद ही कोई दूसरा हुआ हो। उनकी गायकी के जितने दीवाने थे, उनकी ‘सनक’ और अजीबोगरीब हरकतों के किस्से भी उतने ही मशहूर थे। लोग उन्हें ‘पागल’ या ‘सनकी’ कहते थे, लेकिन किशोर दा का अपना ही तर्क था- “दुनिया पागल है, मैं नहीं!”
किशोर दा की जयंती के मौके पर उनके जीवन के अनगिनत किस्सों में से एक किस्सा सबसे ज्यादा गुदगुदाने वाला है। यह किस्सा तब का है जब एक ऊँचे दर्जे के इंटीरियर डेकोरेटर ने उनके घर को सजाने की कोशिश की थी, लेकिन किशोर दा के ‘ड्रीम लिविंग रूम’ का प्लान सुनते ही वह उल्टे पाँव ऐसा भागा कि फिर कभी लौटकर नहीं आया!
4 अगस्त 1929 को मध्य प्रदेश के खंडवा में जन्मे आभास कुमार गांगुली, जिन्हें दुनिया किशोर कुमार के नाम से जानती है, सिर्फ महान गायक, अभिनेता या संगीतकार नहीं थे। वह प्रकृति से गहरा प्रेम करने वाले, अपनी शर्तों पर जीने वाले और भीड़ से बिल्कुल अलग सोच रखने वाले कलाकार थे। उनके पिता कुंजीलाल गांगुली पेशे से वकील थे, जबकि बड़े भाई अशोक कुमार पहले ही हिंदी सिनेमा के सबसे बड़े सितारों में शुमार हो चुके थे। पारिवारिक विरासत उन्हें मुंबई तक तो ले आई, लेकिन उनका मन कभी इस मायानगरी का होकर नहीं रह सका।
किशोर कुमार अक्सर कहा करते थे कि मुंबई ने उन्हें नाम, दौलत और शोहरत तो दी, लेकिन सुकून छीन लिया। उनका दिल हमेशा अपने शहर खंडवा में बसता था। वह अक्सर मजाकिया अंदाज में कहते थे, “दूध-जलेबी खाएंगे, खंडवा में बस जाएंगे।” संयोग भी ऐसा रहा कि 13 अक्टूबर 1987 को उनके निधन के बाद उनकी अंतिम इच्छा के अनुरूप उनका अंतिम संस्कार भी खंडवा में ही हुआ।
खैर लौटते हैं उनकी ‘सनक’ और अजीबोगरीब हरकतों के किस्से की ओर। यह वाकया उस दौर का है जब उन्हें कुछ लोग सनकी और पागल बुलाया करते थे। साल 1985 में वरिष्ठ पत्रकार प्रीतिश नंदी को दिए इंटरव्यू में उन्होंने जिंदगी के कई ऐसे पहलुओं से पर्दा उठाया था, जिन्हें लोग वर्षों तक सिर्फ अफवाह मानते रहे। गौरतलब है कि किशोर दा अपनी शर्तों पर जीने वाले कलाकार थे। प्रकृति प्रेमी थे, अपने घर के पेड़ों से घंटों बतियाते थे। उनके नाम जनार्दन, रघुनंदन, गंगाधर, बुद्धूराम रखे थे। नावों से उन्हें काफी प्रेम था। वह अपने घर को वेनिस बनाना चाहते थे।
दीवारों पर जिंदा कौवे और छत से टंगे बंदर!
एक बार की बात है। किशोर दा घर में कुछ इंटीरियर करना चाहते थे। भीषण गर्मी में थ्री-पीस ऊनी सूट पहनकर एक इंटीरियर डेकोरेटर घर पहुंचा था। वह घंटों तक अंग्रेजी में डिजाइन और विज़ुअल सेंस पर अपनी रखीं। लेकिन किशोर कुमार का नजरिया दुनिया से बिल्कुल अलग था। जब इंटीरियर डेकोरेटर ने उन्हें बड़े-बड़े फैंसी सोफे और झूमर लगाने की सलाह दी, तो किशोर दा ने उसे अपना देसी और अनोखा प्लान बताया,जिसे सुनकर उसके होश उड़ गए।
किशोर कुमार ने डेकोरेटर से कहा, “लिविंग रूम में बड़े-बड़े सोफों के बजाय बस कई फीट गहरा पानी हो और उसमें तैरती छोटी-छोटी नावें! बीच की टेबल को पानी के नीचे बाँधकर रखा जाए ताकि उस पर चाय का सेट रखा जा सके और हम सब अपनी-अपनी नावों में तैरते हुए उस तक पहुँचें और चाय की चुस्कियाँ लें। लेकिन नावें संतुलित होनी चाहिए, वरना हम एक-दूसरे से टकराकर आगे निकल जाएँगे और बातचीत मुश्किल हो जाएगी।”
इतना सुनते ही वह डेकोरेटर घबरा गया, लेकिन असली ट्विस्ट तो अभी आना बाकी था! जब बात दीवारों और छत की सजावट की आई, तो किशोर दा के प्लान को सुन डेकोरेटर का खौफ से बुरा हाल हो गया। किशोर कुमार ने उससे कहा कि पेंटिंग्स की जगह दीवारों पर जिंदा कौवे टंगे होने चाहिए, क्योंकि मुझे प्रकृति पसंद है! और पंखों की जगह छत से बंदर टंगे हों जो हवा छोड़ें! इतना सुनते ही उसकी आँखों में अजीब सा डर तैर गया और वह धीरे-धीरे कमरे से पीछे की ओर खिसकने लगा। किशोर कुमार ने बताया था कि मेरी बातों को सुनने के बाद वह घर के मेन गेट से इतनी तेजी से भागा कि कोई बिजली की ट्रेन भी उसके सामने फीकी पड़ जाए! इस घटना को याद करते हुए किशोर कुमार ने बड़ी मासूमियत से सवाल किया था, “अगर वह कड़ाके की गर्मी में ऊनी थ्री-पीस सूट पहनकर मेरे घर आ सकता है, तो मैं अपनी दीवारों पर जिंदा कौवे क्यों नहीं टांग सकता? इसमें पागलपन कहां है?”

