गांधी मैदान के बगल में स्थित बांकीपुर बस स्टैंड, जो कभी पटना की धड़कन हुआ करता था, अब खामोश हो चुका है। करीब साढ़े तीन एकड़ में फैले इस ऐतिहासिक बस अड्डे ने 31 जुलाई को बसों और यात्रियों के लिए अपने दरवाज़े हमेशा के लिए बंद कर दिए। इसके साथ ही लगभग सात दशक पुराना एक दौर समाप्त हो गया। अब बिहार सरकार इस ज़मीन पर बिल्कुल नई पहचान गढ़ने की तैयारी में है। यहां निजी भागीदारी से 500 कमरों वाला एक भव्य पांच सितारा लक्ज़री होटल बनाया जाएगा।
बांकीपुर सिर्फ़ एक बस स्टैंड नहीं था। यही वह जगह थी जहां से भारत-नेपाल मैत्री बस सेवा की शुरुआत हुई थी। यह सेवा नरेंद्र मोदी सरकार और नेपाल सरकार के बीच हुए समझौते के बाद शुरू की गई थी। यहीं से नई दिल्ली, छत्तीसगढ़, झारखंड और उत्तर प्रदेश के लिए लंबी दूरी की बसें चलती थीं। हर दिन लगभग 500 बसें बिहार के अलग-अलग शहरों और कस्बों के लिए रवाना होती थीं, जो रांची, जमशेदपुर, हज़ारीबाग, पूर्णिया और सिलीगुड़ी तक का सफर तय करती थीं।
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मुझे आज भी याद है, जब मैंने पहली बार बांकीपुर बस स्टैंड से वातानुकूलित भारत-नेपाल मैत्री बस में बैठकर काठमांडू के सामाखुशी बस स्टैंड तक की यात्रा की थी। वह दौर था जब नेपाल के वर्तमान प्रधानमंत्री काठमांडू के मेयर हुआ करते थे।
हमारे परिवार का इस बस स्टैंड से रिश्ता तो बचपन से ही जुड़ा रहा। गर्मी की छुट्टियां शुरू होते ही एक ही उत्साह होता था, बांकीपुर से हज़ारीबाग जाने वाली स्टेट ट्रांसपोर्ट की बस पकड़ने का। तब न पुराना बाइपास था और न ही नया। बस अशोक राजपथ से निकलती, गुरुद्वारे के सामने से गुजरती, दीदारगंज और फतुहा होते हुए बख्तियारपुर पहुंचती, जहां चाय के लिए थोड़ी देर रुकती। फिर बिहारशरीफ और नवादा के रास्ते हज़ारीबाग की ओर बढ़ जाती।
कॉलेज के दिनों की भी अपनी अलग यादें हैं। मासिक छात्र रियायती पास बनवाने के लिए प्रिंसिपल या बर्सर से आवेदन अग्रेषित कराना पड़ता था, जिसके बाद वह बांकीपुर बस स्टैंड पर बैठे डिपो सुपरिंटेंडेंट के पास जाता था। वेटरिनरी कॉलेज से इंजीनियरिंग कॉलेज तक चलने वाली 10A बस तो जैसे छात्र जीवन का अभिन्न हिस्सा थी। लालू प्रसाद यादव भी उन दिनों इसी बस से नियमित सफर किया करते थे। उसके कंडक्टर बद्री प्रसाद लगभग हर छात्र के लिए एक परिचित चेहरा थे।
आज यह सब इतिहास बन चुका है। बांकीपुर बस स्टैंड के बंद होने के साथ ही उसके आसपास अपनी रोज़ी-रोटी चलाने वाले सैकड़ों छोटे दुकानदारों, चाय-नाश्ते के ठेले वालों, कैंटीन कर्मचारियों और अख़बार-पत्रिका बेचने वालों की आजीविका भी छिन गई है। एक बस स्टैंड का बंद होना केवल एक इमारत का अंत नहीं है, बल्कि उन अनगिनत यादों, रिश्तों और जीवनों का भी विराम है, जो दशकों तक उसकी रौनक का हिस्सा रहे।
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