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खबरों से आगे: दक्षिण कश्मीर में पखवाड़े भर में हुए दो आतंकी हमले क्या संकेत दे रहे हैं?

फारूक अब्दुल्ला और महबूबा मुफ्ती, दोनों जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री रह चुके हैं। फारूक अब्दुल्ला एक से अधिक बार इस पद पर रहे। उनके कार्यकाल वर्तमान समय की तुलना में कहीं अधिक हिंसक और अशांत रहे थे।

जम्मू-कश्मीर के उपराज्यपाल मनोज सिन्हा ने शनिवार (1 अगस्त) को जम्मू और कश्मीर पुलिस में हेड कांस्टेबल रहे अशिक हुसैन कुरैशी के बेटे अब्सार अशिक कुरैशी को नियुक्ति पत्र सौंपा। अशिक हुसैन कुरैशी की 22 जुलाई को अनंतनाग में हुए एक आतंकी हमले में मौत हो गई थी। नियुक्ति पत्र सौंपे जाने के दौरान शहीद पुलिसकर्मी के परिवार के सदस्य भी मौजूद थे।

यह असल में बेहद तेज प्रशासनिक कार्रवाई रही, क्योंकि शहादत के महज 10 दिनों के भीतर पुलिसकर्मी के परिवार को नौकरी के रूप में सहायता प्रदान कर दी गई। हालांकि, विभिन्न प्रकार के वैधानिक भुगतान की भी प्रक्रिया पूरी हो चुकी होगी या उस समय चल रही होगी।

मनोज सिन्हा ने अनंतनाग के व्यस्त बाजार में ड्यूटी के दौरान दिनदहाड़े आतंकियों द्वारा मारे गए अशिक हुसैन कुरैशी को श्रद्धांजलि दी। उन्होंने देश की सेवा में उनके साहस और सर्वोच्च बलिदान की सराहना की। साथ ही शोकाकुल परिवार को प्रशासन की ओर से हरसंभव सहयोग का भरोसा दिलाया और मारे गए सुरक्षा कर्मियों के परिवारों के कल्याण के प्रति सरकार की प्रतिबद्धता दोहराई।

उपराज्यपाल प्रशासन ने जिस तेजी और तत्परता से इस मामले का निपटारा किया, वह सराहनीय है। आतंकवाद से प्रभावित किसी परिवार को इतनी तेजी से सहायता उपलब्ध कराना अभूतपूर्व है, क्योंकि हाल के वर्षों में ऐसा देखने को नहीं मिला था।

एक मामले में तेजी, दूसरे में धीमा रवैया क्यों?

अब एक दूसरे लगभग इसी तरह के मामले पर गौर कीजिए। उसी दिन मनोज सिन्हा ने जम्मू-कश्मीर पुलिस में इंस्पेक्टर मसरूर अली वानी की पत्नी इंशा नजीर को भी अनुकंपा नियुक्ति पत्र सौंपा। अधिकारियों के अनुसार, शहीद पुलिस अधिकारी के परिवार को सहायता प्रदान करने के तहत यह नियुक्ति अनुकंपा के आधार पर की गई।

इस अवसर पर भी उपराज्यपाल ने इंस्पेक्टर वानी के कर्तव्य निभाते हुए दिए गए सर्वोच्च बलिदान को याद करते हुए श्रद्धांजलि दी और उनके परिवार को प्रशासन की ओर से निरंतर सहयोग और सहायता का आश्वासन दिया।

इंस्पेक्टर मसरूर अली वानी को 29 अक्टूबर 2023 को श्रीनगर के ईदगाह इलाके में दोस्तों के साथ क्रिकेट खेलते समय गोली मार दी गई थी। इलाज के दौरान उसी साल 7 दिसंबर को दिल्ली के एम्स में उन्होंने दम तोड़ दिया। बताया गया कि जब उन पर हमला हुआ, उस समय वे ड्यूटी पर नहीं थे।

हेड कांस्टेबल अशिक हुसैन कुरैशी के मामले में मौत के 10 दिनों के भीतर अनुकंपा नियुक्ति दे दी गई। वहीं इंस्पेक्टर वानी की मृत्यु 7 दिसंबर 2023 को हुई थी, लेकिन उनकी पत्नी को अनुकंपा नियुक्ति 31 महीने से अधिक समय बाद मिली।

यह स्पष्ट नहीं है कि प्रशासन ने एक मामले में इतनी तेजी कैसे दिखाई कि परिवार को 10 दिनों में सहायता मिल गई, जबकि दूसरे मामले में लगभग 1,150 दिनों बाद सहायता उपलब्ध कराई गई। संभव है कि दूसरे मामले में कोई तकनीकी कमी या प्रक्रिया संबंधी बाधा रही हो, जिसके कारण देरी हुई। या फिर कोई अन्य वजह रही हो।

हालांकि यह जरूर कहा जा सकता है कि आतंकवाद का शिकार हुए दो पुलिसकर्मियों के परिवारों से जुड़े लगभग समान मामलों का घटनाक्रम बिल्कुल अलग-अलग तरीके से सामने आया।

यहां यह भी उल्लेख करना होगा कि उपराज्यपाल मनोज सिन्हा के कार्यकाल में पिछले कुछ वर्षों में परिस्थितियों में काफी बदलाव आया है। फिर भी इन दोनों मामलों का निष्कर्ष उस स्पष्ट अंतर को सामने लाता है, जिसका वे प्रतिनिधित्व करते हैं।

  • आखिर 10 दिन और 1,150 दिन के इस अंतर को कैसे समझाया जाए?

इसी शनिवार (1 अगस्त) को मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने कुलगाम जिले में एक दिन पहले आतंकी हमले में मारे गए छत्तीसगढ़ के दो प्रवासी मजदूरों के परिजनों को 10-10 लाख रुपये की अनुग्रह राशि देने की घोषणा की। ईंट-भट्ठे में काम करने वाले दीपक और भोपिंदर की इस आतंकी हमले में मौत हो गई थी।

यह राशि जिला प्रशासन द्वारा तत्काल सहायता के रूप में घोषित 6-6 लाख रुपये से अलग होगी।

उमर अब्दुल्ला के कार्यालय ने सोशल मीडिया मंच ‘एक्स’ पर पोस्ट में कहा, ‘मुख्यमंत्री ने कुलगाम में दो मजदूरों की निर्मम हत्या की कड़ी निंदा की है और निर्दोष लोगों की मौत पर गहरा शोक व्यक्त किया है। उन्होंने मुख्यमंत्री राहत कोष से मृतकों के परिजनों को 10-10 लाख रुपये की अनुग्रह राशि देने की घोषणा की है। यह राशि जिला प्रशासन द्वारा तत्काल दी जाने वाली 6-6 लाख रुपये की सहायता के अतिरिक्त होगी।’

इससे पहले 22 अप्रैल 2025 को पहलगाम आतंकी हमले में आतंकियों द्वारा 24 हिंदू पुरुषों की हत्या किए जाने के बाद भी मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने मृतकों के परिजनों के लिए 10-10 लाख रुपये की अनुग्रह राशि की घोषणा की थी।

उमर अब्दुल्ला ने छत्तीसगढ़ के शोकाकुल परिवारों के प्रति गहरी संवेदना भी व्यक्त की और भरोसा दिलाया कि इस कठिन समय में सरकार उनके साथ मजबूती से खड़ी है। शुक्रवार शाम आतंकियों ने 20 वर्ष की आयु वाले दीपक रात्रे और भोपिंदर की हत्या कर दी थी।

सीनियर अब्दुल्ला और महबूबा मुफ्ती किस पर निशाना साध रहे?

कुलगाम आतंकी हमले पर प्रतिक्रिया देते हुए पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (पीडीपी) की अध्यक्ष महबूबा मुफ्ती ने इसे गंभीर सुरक्षा चूक करार दिया और मामले की गहन जांच की मांग की। महबूबा मुफ्ती ने शनिवार को पत्रकारों से बातचीत में कहा, ‘मेरे पास इसकी निंदा करने के लिए शब्द नहीं हैं।’ उन्होंने हमले पर गहरा दुख और हैरानी जताई।

उन्होंने कहा, ‘यहां इतनी अधिक सुरक्षा व्यवस्था है। यह सुरक्षा में चूक है और इसकी जांच होनी चाहिए। जब अमरनाथ यात्रा के लिए इतनी व्यापक सुरक्षा तैनाती है, तो फिर ऐसी घटनाएं लगातार क्यों हो रही हैं?’

इसी तरह नेशनल कॉन्फ्रेंस के अध्यक्ष फारूक अब्दुल्ला ने भी कुलगाम हमले के लिए जिम्मेदार लोगों की पहचान करने के उद्देश्य से निष्पक्ष और पारदर्शी जांच की मांग की। उन्होंने कहा कि यह पता लगाना जरूरी है कि इस हमले के पीछे कौन लोग थे। उन्होंने कहा, ‘जिम्मेदार लोगों की पहचान के लिए पूरी ईमानदारी और गंभीरता से जांच होनी चाहिए।’

फारूक अब्दुल्ला ने हमले के समय पर भी सवाल उठाते हुए कहा कि जब-जब जम्मू-कश्मीर को राज्य का दर्जा बहाल करने की मांग तेज होती है, तब-तब इस तरह की घटनाएं होती दिखाई देती हैं। उन्होंने कहा, ‘मुझे नहीं पता कि जब भी हम राज्य का दर्जा बहाल करने की मांग करते हैं, तभी ऐसी घटनाएं क्यों होती हैं।’

डॉ. फारूक अब्दुल्ला और महबूबा मुफ्ती सुरक्षा व्यवस्था तथा हत्याओं की परिस्थितियों पर सवाल उठाकर आखिर किसे निशाना बना रहे थे? स्पष्ट है कि उनका निशाना उपराज्यपाल मनोज सिन्हा थे, जो इस समय जम्मू-कश्मीर में गृह विभाग की जिम्मेदारी संभाल रहे हैं। साथ ही उनका इशारा केंद्र सरकार की ओर भी था।

फारूक अब्दुल्ला और महबूबा मुफ्ती, दोनों जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री रह चुके हैं। फारूक अब्दुल्ला एक से अधिक बार इस पद पर रहे। उनके कार्यकाल वर्तमान समय की तुलना में कहीं अधिक हिंसक और अशांत रहे थे। उस समय गृह विभाग भी उनके ही अधीन था, जिसकी जिम्मेदारी अब मनोज सिन्हा के पास है। क्या उनके कार्यकाल के दौरान हुई हर मौत और हिंसक घटना के लिए वे जिम्मेदार थे?

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सन्त कुमार शर्मा
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