समय के साथ बदलती सामाजिक संरचनाओं और मनुष्य के बदलते अनुभवों ने आलोचना के सामने नए प्रश्न उपस्थित किए हैं। आलोचना के नए प्रतिमानों का विकास दरअसल उन्हीं प्रश्नों के उत्तर खोजने की प्रक्रिया का हासिल है। मार्क्सवादी आलोचना सिद्धांतों से लेकर अस्मितावादी आलोचना दृष्टि तक के लंबे सफर में विकसित कथालोचना के विभिन्न उपकरणों ने कथा-साहित्य को देखने-परखने की कई दृष्टियाँ प्रदान की हैं। इक्कीसवीं सदी का सामाजिक यथार्थ यह संकेत भी देता है कि मनुष्य के संबंधों का स्वरूप अब केवल सामाजिक संस्थाओं, वैचारिक संरचनाओं अथवा सत्ता-संबंधों से निर्धारित नहीं हो रहा; उनके भीतर संवेदना, परस्पर सम्मान, निजता, आत्मीयता आदि की बहुपरतीय उपस्थिति/अनुपस्थिति भी उतनी ही निर्णायक होती जा रही है। ऐसे में समकालीन कहानी को पढ़ने के लिए नए आलोचनात्मक उपकरणों का खोज एक जरूरी प्रश्न है।
समकालीन जीवन में परिवार, विवाह, प्रेम, मित्रता और सहजीवन जैसी संस्थाएँ कई तरह के गहरे परिवर्तन से गुजर रही हैं। विवाह है, पर उसमें आत्मीयता नहीं; विवाह नहीं है, पर गहरा विश्वास और भावनात्मक साझेदारी है; साथ रहना संभव नहीं, फिर भी स्मृति में संबंध जीवित है; रक्त-संबंध हैं, किंतु उनमें अधिकार से अधिक संवाद और स्वतंत्रता का स्थान है। संबंधों की यह नई संरचना आलोचना से ऐसे उपकरणों की माँग करती है, जो सत्ता और प्रतिरोध के पारंपरिक प्रतिमानों से आगे भावनात्मक परिपक्वता की कसौटी पर भी कहानी को परख सके। इस अर्थ में ‘इमोशनल इंटेलिजेंस’ की अवधारणा कथालोचना की दृष्टि से भी महत्त्वपूर्ण हो सकती है। मनोविज्ञान में इसका आशय अपनी और दूसरों की भावनाओं को पहचानने, समझने और संतुलित ढंग से संचालित करने की क्षमता से है। किंतु कथा साहित्य के विश्लेषण और मूल्यांकन की प्रक्रिया में यह अवधारणा व्यापक अर्थ ग्रहण कर सकती है। इस दृष्टि से देखें तो किसी कहानी में यह देखना भी जरूरी है कि क्या इसका एक पात्र दूसरे पात्र की गरिमा की रक्षा करता है? किसी कहानी का पात्र संबंधों को अधिकार के व्याकरण से संचालित करता है या साझेदारी और सम्मान के साथ जीने में भरोसा रखता है? वह दूसरे के दुःख को केवल द्रष्टा की तरह देखता है या उसकी बेहतरी के लिए अपने व्यवहार में भी कोई बदलाव लाता है? इसी तरह किसी के कहे को सुनने-समझने से ज्यादा उसके मौन को पढ़ सकने की क्षमता ‘इमोशनल इंटेलिजेंस’ के आधार पर कहानी की परख में महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा कर सकती है।
‘इमोशनल इंटेलिजेंस’ या ‘भावनात्मक बुद्धिमत्ता’ को कथालोचना के भूमण्डलोत्तर उपकरण की तरह इस्तेमाल करते हुय इस बात पर ध्यान देना बेहद जरूरी है कि किसी की भावनाओं को समझना और उनके प्रति नैतिक उत्तरदायित्व का निर्वाह करना दो अलग बातें हैं। बहुत संभव है कि कोई व्यक्ति दूसरे के दुःख को पहचान सकने के बावजूद, उसके साथ हिंसक या स्वार्थपूर्ण व्यवहार करे। इसलिए किसी कहानी को ‘इमोशनल इंटेलिजेंस’ के उपकरणों से व्याख्यायित करत हुए ‘इमोशनल एथिक्स’ का भी ध्यान रखना चाहिए। ‘इमोशनल एथिक्स’ का आशय उन नैतिक मूल्यों से है जो संबंधों में गरिमा, विश्वास, देखभाल, आत्मसंयम, सहानुभूति और दूसरे की स्वतंत्रता के सम्मान के भाव को मानव संबंधों के लिए जरूरी मानते हैं। इसके लिए यह जरूरी है कि किसी कहानी को संबंधों के बाहरी ढाँचे के आधार पर नहीं, बल्कि उनके भीतर सक्रिय नैतिक संवेदनाओं के आधार पर परखा जाए।
‘हंस’ (जून 2014) में प्रकाशित वरिष्ठ कथाकार सुधा अरोड़ा की कहानी ‘उधड़ा हुआ स्वेटर’ को इस परिप्रेक्ष्य में पढ़ना अधिक अर्थपूर्ण हो सकता है। पहली दृष्टि में यह वृद्धावस्था, अकेलेपन, स्मृति और स्त्री-अनुभव की कहानी प्रतीत होती है; किंतु तनिक ठहरकर देखें तो, इसके भीतर संबंधों की एक ऐसी जटिल और बहुस्तरीय दुनिया साँसें लेती दिखाई पड़ती है, जहाँ प्रेम, विवाह, लिव-इन, मातृत्व, स्मृति, शोक और आत्मीयता सभी का मूल्यांकन उनके सामाजिक पहचान से नहीं, बल्कि उनके भावनात्मक और नैतिक जीवन से होता है। यही कारण है यह कहानी विवाह या परिवार संस्था के समर्थन या विरोध के गुंजलक में फँसने के बजाय संबंधों की गुणवत्ता पर केंद्रित रहती है।
‘उधड़ा हुआ स्वेटर’ का अधिकांश अनुभव-संसार शिवा की निजी स्मृतियों, वैवाहिक हिंसा, अकेलेपन, अपमान, स्पर्श-अभाव और वृद्धावस्था के भावात्मक रिक्ति-बोध से निर्मित है। यदि लेखिका चाहतीं तो इस कहानी को सहज रूप से ‘मैं’ शैली में लिख सकती थीं। किंतु सुधा अरोड़ा उस आसान रास्ते को नहीं चुनतीं। वे कहानी कहने के लिए एक नियंत्रित तृतीय पुरुष वाचक का चयन करती हैं। यह चुनाव गहरे वैचारिक और नैतिक अर्थ-संयम का नतीजा है। कथाकार का यही वह निर्णय है, जो कहानी को आत्मवृत्तांत बनने से बचाकर मानवीय संबंधों के व्यापक आख्यान में रूपांतरित कर देता है।
गौरतलब है कि कहानी का कथावाचक कोई निर्लिप्त पर्यवेक्षक नहीं है। वह शिवा के मन में प्रवेश करता है, उसकी स्मृतियों के भीतर उतरता है, उसकी देह की सूक्ष्म प्रतिक्रियाओं को दर्ज करता है, उसकी आँखों की नमी, उसके स्पर्श-अभाव, उसकी संकोच-भरी मुस्कानों और उसके भीतर लगातार चल रहे आत्मसंवाद को सुनता है। इस तरह पाठक लगभग पूरी कहानी शिवा के दृष्टि-केंद्र से देखता है। आशीष कुमार, बिंदा, बेटियाँ, यहाँ तक कि पार्क भी हमारे सामने उतना ही खुलते हैं जितना शिवा की संवेदना उन्हें ग्रहण करती है। इस तरह तृतीय पुरुष वाचक के बावजूद कहानी का अनुभव-केंद्र शिवा है। यह संरचना कथा को एक साथ निकटता और दूरी—दोनों प्रदान करती है। परिणामतः अनुभव के अत्यंत निजी होने के बावजूद उसकी अभिव्यक्ति आत्मदया में नहीं बदलती। कथावाचक शिवा के पक्ष में है, किंतु उसका वकील नहीं है। वह उसके साथ चलता है, पर उसकी ओर से बोलता नहीं। उदाहरण के लिए, जब कहानी के उत्तरार्द्ध में शिवा अपने अतीत की वैवाहिक हिंसा को स्मरण करती है, तब कथावाचक उस हिंसा की न तो नाटकीय प्रस्तुति करता है और न ही पति के विरुद्ध किसी प्रत्यक्ष नैतिक टिप्पणी का सहारा लेता है। वह केवल स्मृति को उसके समूचे शारीरिक और मानसिक अनुभव के साथ उपस्थित करता है। इस तरह पाठक स्वयं उस यातना की तीव्रता का अनुभव करता है। यह वाचकीय संयम कहानी की विश्वसनीयता को एक मजबूत आधार देता है।
दरअसल, इस कहानी का कथावाचक करुणा का साक्षी है। वह पात्रों को दोषी या निर्दोष सिद्ध करने के बजाय उनके भीतर चल रही भावनात्मक प्रक्रियाओं को समझने और समझाने का माध्यम बनाता है। इसीलिए कहानी में कहीं भी नैतिक उपदेश नहीं है। शिवा और आशीष कुमार के बीच विकसित हो रही आत्मीयता को भी कथावाचक किसी रोमानी उत्साह या सामाजिक संशय के साथ प्रस्तुत नहीं करता। वह केवल उनके बीच बनती हुई उस सूक्ष्म मानवीय निकटता को दर्ज करता चलता है, जो साझा अकेलेपन, संवाद, विश्वास और देखभाल से निर्मित होती है। इसी प्रकार जब आशीष कुमार अनायास शिवा के चेहरे को अपनी हथेलियों में थाम लेते हैं, तब भी कथावाचक उस दृश्य को न प्रेम की घोषणा बनाता है, न नैतिक संकट। वह उस क्षण की जटिल भावात्मकता को उसके पूरे द्वंद्व सहित पाठक के सामने रख देता है। बाद में आशीष स्वयं स्वीकार करते हैं कि उन्हें उस क्षण शिवा में अपनी दिवंगत पत्नी बिंदा दिखाई दे गई थी। ऐसे में कथावाचक उनके अपराधबोध और शिवा की टूटन- दोनों को समान संवेदनात्मक गरिमा प्रदान करता है। यदि यह कहानी ‘मैं’ शैली में लिखी गई होती तो शायद यह संभव नहीं हो पाता। यही कारण है कि यहाँ एक नियंत्रित तृतीय पुरुष वाचक के चयन को मैं एक नैतिक लेखकीय निर्णय की तरह देखता हूँ।
सुधा अरोड़ा एक घोषित स्त्रीवादी कहानीकार हैं। ‘रहोगी तुम वही’ और ‘अन्नपूर्णा मण्डल की आखिरी चिट्ठी’ जैसी उनकी प्रसिद्ध कहानियों में स्त्रीवाद के पारंपरिक तेवर और ताप दोनों को महसूस किया जा सकता है। लेकिन स्त्रीवादी संवेदना के बावजूद अपने मुखर मौन संवादों के कारण यह कहानी पारंपरिक स्त्रीवादी कहानियों से काफी अलग है। बल्कि यहाँ तक आते आते सुधा अरोड़ा का स्त्रीवाद और ज्यादा परिपक्व और बहुआयामी हो गया है। स्त्री-अनुभव यहाँ निस्संदेह कथा का केंद्र है, किंतु वह एकमात्र सत्य नहीं है। कहानी पितृसत्तात्मक हिंसा को छिपाती नहीं, पर पुरुष को एकरैखिक प्रतिपक्ष में भी नहीं बदलती। शिवा का हिंसक पति और आशीष कुमार दोनों पुरुष हैं, किंतु दोनों की भावनात्मक संरचनाएं एक-दूसरे से सर्वथा भिन्न हैं। यदि कहानी प्रथम पुरुष में होती तो संभवतः यह बहुध्रुवीयता भी सीमित हो जाती। नियंत्रित तृतीय पुरुष वाचक लेखिका को यह अवसर देता है कि वह स्त्री-अनुभव की केंद्रीयता बनाए रखते हुए भी संबंधों की जटिलता को संरक्षित रख सके। इस प्रकार कहानी स्त्री के पक्ष में खड़ी होती है, पर पुरुष के विरुद्ध नहीं। पितृसत्ता की इस पहचान को इसकी नैतिक परिपक्वता मानना चाहिए।
सुधा अरोड़ा अपने कथावाचक से उतना ही कहलवाती हैं जितना आवश्यक है। अनेक निर्णायक क्षणों में कहानी व्याख्या नहीं करती; केवल दृश्य उपस्थित करती है। पार्क की बेंच, उधड़ा हुआ स्वेटर, खाली बाल्कनी, ठंडी होती चाय, बिंदा की तस्वीर, और अंततः मृत आशीष के कंधों पर उनकी पत्नी के हाथ का अबुना वही स्वेटर- ये सभी दृश्य किसी वाचाल टिप्पणी के बिना पाठक के भीतर अपनी मौन उपस्थिति से कहानी के अर्थ का विस्तार करते हैं। इसे पाठकों के विवेक पर लेखकीय भरोसे की तरह भी देखा जाना चाहिए, जो पाठक को भावुक बनाकर नहीं, बल्कि संवेदनशील बनाकर कहानी के भीतर ले जाता है।
यदि ‘उधड़ा हुआ स्वेटर’ की वाचकीय संरचना उसकी भावनात्मक नैतिकता का पहला आधार निर्मित करती है, तो उसका दूसरा और शायद अधिक महत्त्वपूर्ण आधार इसमें निहित संबंधों का विन्यास है। पहली दृष्टि में यह कहानी दो अकेले वृद्ध या अधेड़ व्यक्तियों- शिवा और आशीष कुमार के बीच विकसित होती आत्मीयता की कहानी प्रतीत होती है। किंतु थोड़ा गहरे उतरने पर स्पष्ट होता है कि इसकी वास्तविक संरचना किसी एक संबंध पर नहीं, बल्कि अनेक संबंधों के परस्पर संवाद से निर्मित होती है। यही कारण है कि इसे केवल प्रेम, विवाह, अकेलेपन या स्त्री-अनुभव की कहानी कह देना इसके अर्थ-संसार को सीमित कर देना होगा। ऐसे में इस कहानी को ‘संबंधों के चतुष्कोण’ की तरह भी पढ़ा जा सकता है। यहाँ चार ऐसे संबंध-कोण हैं जो अलग-अलग होते हुए भी एक-दूसरे का अर्थ विस्तार करते हैं। पहला कोण है, शिवा और उसके जीवित, किंतु भावात्मक रूप से मृत वैवाहिक संबंध का। दूसरा संबंध-कोण आशीष कुमार और बिंदा का है, जहाँ मृत्यु के बाद भी प्रेम जीवित है। तीसरे संबंध कोण पर हैं- शिवाय की बड़ी बेटी और उसका मित्र मैक, जहाँ सहजीवन का आधार विवाह नहीं, आत्मीयता और परस्पर भरोसा है। कहानी का चौथा संबंध-कोण शिवा और उसकी दोनों बेटियों से निर्मित हुआ है, जहाँ पारंपरिक मातृत्व का अनुशासन एक नए प्रकार की साझेदारी, देखभाल और भावनात्मक परिपक्वता में रूपांतरित हो चुका है। इस कहानी के वास्तविक वैचारिक क्षितिज को देखने-परखने के लिए इन चारों संबंधों को साथ रखकर देखना चाहिए।
सबसे पहले शिवा के विवाह को देखें। यहाँ पति जीवित है। विवाह सामाजिक रूप से विद्यमान है। परिवार भी कभी रहा है, किंतु संबंध की भावनात्मक ऊष्मा समाप्त हो चुकी है। कहानी कहीं भी उसके पति का विस्तृत चरित्र-चित्रण नहीं करती; वह केवल स्मृतियों के सहारे इतना उद्घाटित करती है कि शिवा का वैवाहिक जीवन हिंसा, अपमान, भय और स्पर्श-वंचना से निर्मित था। इसके ठीक विपरीत कोण पर आशीष कुमार और बिंदा का संबंध है। यहाँ विवाह का सामाजिक रूप भी है, किंतु कहानी उसे उसके वैधानिक स्वरूप से अधिक उसकी भावात्मक स्मृति के माध्यम से पहचानती है। बिंदा कहानी में कहीं प्रत्यक्ष उपस्थित न होकर भी हर क्षण उपस्थित रहती है- आशीष कुमार की भाषा में, उनकी स्मृतियों में, उनकी दिनचर्या में, उनके अपराधबोध में, उनकी करुणा में, यहाँ तक कि उस उधड़े हुए स्वेटर में भी जिसे वे वर्षों बाद भी उसी स्नेह से सहलाते हैं जैसे किसी जीवित व्यक्ति का स्पर्श कर रहे हों। कहानी इस संबंध को स्मृति के माध्यम से वर्तमान में उपस्थित करती है। यहाँ मृत्यु संबंध का अंत नहीं करती, बल्कि उसका भावात्मक विस्तार बन जाती है।
तीसरा संबंध-कोण कहानी की आधुनिक सामाजिक चेतना का महत्त्वपूर्ण संकेतक है। बड़ी बेटी का मित्र मैक उसके साथ रहता है। दोनों के बीच गहरा आत्मीय संबंध है, किंतु वे विवाह नहीं करते। माँ को इस संबंध की जानकारी है। वह कभी-कभी विवाह का सुझाव अवश्य देती है, पर अंततः बेटी के निर्णय का सम्मान करती है। दूसरी ओर बेटी भी स्पष्ट कहती है कि मैक उसका पति नहीं, मित्र है, और शायद वही रहेगा। यह प्रसंग कहानी में किसी विवाद, नैतिक संकट या सामाजिक प्रतिरोध का रूप नहीं लेता। कहानी यहाँ विवाह और सहजीवन के बीच किसी एक का पक्ष नहीं लेती, बल्कि यह दिखाती हैं कि संबंध की प्रामाणिकता उसके नामकरण से नहीं आती। यदि विवाह के भीतर हिंसा होती है, तो विवाह के बाहर भी गरिमामय आत्मीयता संभव है।
कहानी का सबसे मौलिक और आधुनिक चेतनासम्पन्न संबंध-कोण शिवा और उसकी बेटियों की पारस्परिकता से बनता है। वास्तव में यही वह संबंध है जो पूरी कहानी की भावनात्मक नैतिकता को एक नई ऊँचाई देता है। यहाँ माँ-बेटी का संबंध पारंपरिक भारतीय परिवार की संरचना से बिल्कुल भिन्न रूप में विकसित होता है। बेटियाँ माँ की संरक्षक बनती हैं, पर उसके जीवन पर नियंत्रण नहीं करतीं। वे उसकी देखभाल करती हैं, पर उसकी स्वतंत्रता का अतिक्रमण नहीं करतीं। वे उसकी दवाइयों का ध्यान रखती हैं, उसके भोजन की चिंता करती हैं, उसकी दिनचर्या पर निगाह रखती हैं, पर उसके अकेलेपन को भी समझती हैं। यह देखभाल अधिकार की नहीं, संवेदनात्मक समझ की उपज है। इस संदर्भ में छोटी बेटी का व्यवहार विशेष रूप से उल्लेखनीय है। वह आशीष कुमार को अपनी माँ का ‘मॉर्निंग वॉक फ्रेंड’ कहती है। यह संबोधन अपने भीतर बहुत गहरा अर्थ समेटे हुए है। वह न उन्हें संदेह की दृष्टि से देखती है, न किसी रोमानी उत्सुकता से। वह सहज रूप से दरवाज़ा खुला छोड़कर दफ्तर चली जाती है, ताकि वे माँ के साथ बैठ सकें। यह माँ पर विश्वास से बहुत आगे माँ की भावनात्मक जरूरतों की पहचान भी है। भारतीय पारिवारिक संरचना में जहाँ वृद्ध माता-पिता के निजी भावनात्मक जीवन की संभावना लगभग अस्वीकार्य मान ली जाती है, वहाँ इस प्रसंग के गहरे अर्थ संकेत हैं। बेटी अपनी माँ को केवल माँ के रूप में नहीं देखती; उसे एक मनुष्य के रूप में भी पहचानती है, जिसे संवाद, साथ और आत्मीयता की आवश्यकता है। यही इस कहानी का सबसे आधुनिक पक्ष है। बड़ी बेटी और माँ के संबंधों की पारस्परिकता इसी भावात्मक परिपक्वता का विस्तार है। माँ बेटी के बीच रिश्तों की यह संवेदनात्मक सजगता कहानी में भावनात्मक बुद्धिमत्ता का सबसे मजबूत उदाहरण है। माँ और बेटियों के बीच संबंध का यह रूप भारतीय समाज और कथा-साहित्य में प्रचलित त्याग, अपराधबोध या पीढ़ीगत संघर्ष की रूढ़ छवियों से बिल्कुल अलग है। संबंधों को सामाजिक श्रेणियों से मुक्त करके उनकी भावात्मक संरचना के आधार पर पुनर्परिभाषित करने की इस रचनात्मकता को कहानी का बड़ा हासिल माना जा सकता है।
‘उधड़ा हुआ स्वेटर’ प्रकटतः एक संवाद केंद्रित कहानी लगती है। किंतु थोड़ा गहरे उतरने पर स्पष्ट होता है कि इसके निर्णायक क्षण शब्दों में नहीं, स्पर्श में घटित होते हैं। कहानी यहाँ स्पर्श को जैविक या यौन अनुभव के रूप में नहीं, बल्कि मनुष्य की नैतिक उपस्थिति की भाषा के रूप में प्रकट करती हैं। यही कारण है कि इस कहानी को पढ़ते हुए धीरे-धीरे यह अनुभव होने लगता है कि मनुष्य की सभ्यता का सबसे विश्वसनीय प्रमाण उसके शब्द नहीं, उसके स्पर्श हैं।
भारतीय समाज में स्पर्श का प्रश्न सदैव जटिल रहा है। जाति, लिंग, आयु, नैतिकता और सामाजिक मर्यादाओं ने स्पर्श के अनेक अनुशासन निर्मित किए हैं। स्त्री-पुरुष के बीच स्पर्श को सामान्यतया दाम्पत्य के भीतर ही वैध माना जाता है। दाम्पत्य से बाहर के स्पर्श को अमूमन संदेह, वासना अथवा अपराध की दृष्टि से ही देखा जाता रहा है। सुधा अरोड़ा इस कहानी में स्पर्श की इस रूढ़ि को बहुत शांत ढंग से तोड़ती हैं। वे स्पर्श को इच्छा और अधिकार की नहीं, करुणा और सहअस्तित्व की भाषा बनाती हैं।
गौर किया जाना चाहिए कि आशीष कुमार का पहला स्पर्श शिक्षकीय है। वह शिवा की उँगलियों की मुद्रा ठीक कराते हैं, पीठ सीधी करने का आग्रह करते हैं, उसके कंधे को हल्का-सा पीछे करते हैं। इन स्पर्शों में कहीं भी अधिकार का आग्रह नहीं है, बल्कि एक सजग संकोच है। हर बार स्पर्श के बाद वे क्षमा माँगते हैं। यहाँ क्षमायाचना दूसरे की देह की स्वायत्तता की स्वीकृति है। वे मानते हैं कि किसी दूसरे मनुष्य के शरीर तक पहुँचने का अधिकार स्वतः प्राप्त नहीं होता। यही भावनात्मक नैतिकता का पहला संकेत है।
इसके समानांतर कहानी धीरे-धीरे शिवा के अतीत के उस संसार को खोलती है जहाँ स्पर्श प्रेम का माध्यम नहीं, हिंसा का औजार था। कहानी का सबसे मार्मिक पक्ष यह है कि शिवा के लिए स्पर्श का अर्थ वर्षों तक भय, घृणा और अपमान रहा है। इसीलिए जब आशीष कुमार पहली बार उसके कंधे को छूते हैं, तो देह तत्काल प्रतिक्रिया करती है, पीड़ा की एक चिलक उठती है। देह स्मृति को शब्दों से पहले पहचान लेती है।
गहराई से देखें तो यह कहानी स्पर्श की दो नैतिकताओं के अंतर भी रेखांकित करती है। एक स्पर्श वह है जो अधिकार और दावे से उत्पन्न होता है; दूसरा वह जो सहमति और संवेदना से अनकहे ही जन्म लेता है। सुधा अरोड़ा इस अंतर को किसी सैद्धांतिक बहस से नहीं, बल्कि अत्यंत सूक्ष्म दृश्य-रचना से व्यक्त करती हैं। आशीष कुमार कभी शिवा के निजी जीवन में जबरन प्रवेश नहीं करते। वे प्रश्न पूछते हैं, पर उत्तर का आग्रह नहीं करते। वे उसके दुख को पढ़ते हैं, पर उसे उद्घाटित करने के लिए बाध्य नहीं करते। उनके सारे व्यवहार में एक प्रकार की भावनात्मक सहमति विद्यमान है।
कहानी का सबसे महत्त्वपूर्ण दृश्य वह है जब आशीष कुमार शिवा के घर पहुँचते हैं। शिवा बीमार है, अकेली है, भीतर से टूट चुकी है। उसकी आँखों से आँसू बह निकलते हैं और आशीष सहज रूप से उसके चेहरे को अपनी दोनों हथेलियों में थाम लेते हैं। यदि इस दृश्य को केवल स्त्री-पुरुष आकर्षण के रूप में पढ़ा जाए तो कहानी का की मूल अर्थ-योजना नष्ट हो जाएगी। यहाँ स्पर्श दो मनुष्यों के साझा अकेलेपन की करुण स्वीकृति है। स्पर्श को आक्रमण के हिंसक अनुभव की तरह जीती रही शिवा पहली बार अनुभव करती है कि वह मरहम भी हो सकता है। यह वह क्षण है, जब पहली बार शिवा के लिए देह भय का नहीं, विश्वास का स्थल बनती है। लेकिन कहानी यहाँ रुकती नहीं। जिस क्षण पाठक इस स्पर्श को प्रेम की परिणति मान लेने के लिए तैयार होता है, उसी क्षण आशीष कुमार टूटकर स्वीकार करते हैं कि उस क्षण उन्हें शिवा में अपनी दिवंगत पत्नी बिंदा दिखाई दे गई थी। सामान्य रोमानी कथा यहाँ इस स्वीकारोक्ति को विश्वासघात का रूप दे सकती थी। लेकिन यह स्वीकारोक्ति स्पर्श की गरिमा को कम नहीं करती, बल्कि उसे और जटिल तथा अधिक मानवीय बना देती है, जहाँ यह स्पष्ट होता है कि यह स्पर्श दो अधूरे शोकों का आकस्मिक मिलन था। एक ओर शिवा की जीवन भर की स्पर्श-वंचना थी, दूसरी ओर आशीष कुमार का अपूर्ण शोक। दोनों ने एक क्षण के लिए एक-दूसरे में अपनी-अपनी अनुपस्थिति को छू लिया।
यहाँ कहानी करुणा की जिस ऊंचाई पर पहुँचती है, उसे अतिरिक्त ठहराव और संयम से समझे जाने की जरूरत है। शिवा का पहला भाव स्वाभाविक रूप से टूट जाने का है। उसे लगता है कि वह स्पर्श उसके हिस्से का नहीं था। किंतु कहानी इस विडंबना को भी किसी कटु निष्कर्ष में नहीं बदलती। वह यह नहीं कहती कि आशीष ने शिवा का उपयोग किया, न यह कि शिवा भ्रम में थी। दोनों ही अपने-अपने अभावों के साथ उस क्षण में उपस्थित थे। दोनों ने अनजाने में एक-दूसरे के भीतर किसी अनुपस्थित व्यक्ति को खोज लिया। इस प्रकार स्पर्श यहाँ सत्य और भ्रम, उपस्थिति और अनुपस्थिति, स्मृति और वर्तमान सभी के बीच एक अत्यंत जटिल मानवीय सेतु बन जाता है। एक ऐसा सेतु, जहाँ स्पर्श केवल शारीरिक क्रिया नहीं, बल्कि एक गहरी नैतिक जिम्मेदारी है।
यदि ‘उधड़ा हुआ स्वेटर’ के केंद्र में संबंधों की भावात्मक पुनर्व्याख्या है और उसकी सबसे सूक्ष्म अभिव्यक्ति स्पर्श की नैतिकता में घटित होती है, तो उसका अंतिम और सबसे व्यापक अर्थ स्मृति की नैतिकता में उद्घाटित होता है। वस्तुतः यह कहानी स्मृति से ज्यादा स्मृति के नैतिक अर्थ की कहानी है। वह यह प्रश्न उठाती है कि जो व्यक्ति हमारे जीवन से अनुपस्थित हो चुका है, क्या उसका अस्तित्व समाप्त हो जाता है? या वह किसी दूसरी, अधिक गहरी उपस्थिति में हमारे भीतर जीवित रहता है? इसीलिए इस कहानी में अनुपस्थिति भी एक प्रकार की उपस्थिति है- कभी स्पर्श में, कभी वस्तुओं में, कभी भाषा में, कभी स्मृति में। इस दृष्टि से देखें तो कहानी में सबसे अधिक उपस्थित पात्र वही है, जो कहानी में कहीं दिखाई नहीं देती- बिंदा। वह न किसी दृश्य में आती है, न कोई संवाद बोलती है, फिर भी पूरी कथा में उसकी उपस्थिति लगातार बनी रहती है। आशीष कुमार जब योग सिखाते हैं, जब हँसते हैं, जब अपनी पत्नी का प्रसंग छेड़ते हैं, जब स्वेटर को सहलाते हैं, जब शिवा के चेहरे को अपनी हथेलियों में थामते हैं और यहाँ तक कि जब मृत्यु को प्राप्त होते हैं, हर जगह बिंदा उनके साथ है। यह जीवन का वह रूप है जहाँ प्रिय व्यक्ति धीरे-धीरे हमारे व्यक्तित्व का हिस्सा बन जाता है। वह बाहर नहीं रहता; हमारे देखने, बोलने, छूने और जीने के ढंग में बस जाता है।
अतीत शिवा का भी है, किंतु उसका स्वरूप बिल्कुल भिन्न है। उसके भीतर भी स्मृतियाँ हैं, पर वे करुणा नहीं, आघात की स्मृतियाँ हैं। उसके लिए अतीत एक ऐसा बंद कमरा है जहाँ हिंसा, अपमान और भय का अँधेरा जमा है। दूसरी ओर आशीष कुमार की स्मृति उन्हें मनुष्य बने रहने की शक्ति देती है। इस प्रकार कहानी स्मृति के दो नैतिक रूपों को सामने लाती है- एक स्मृति जो मनुष्य को भीतर से नष्ट करती है और दूसरी जो अनुपस्थित व्यक्ति को जीवन के नैतिक आधार में बदल देती है। शिवा और आशीष कुमार की निकटता का एक कारण यह भी है कि दोनों अपने-अपने अतीत के साथ जी रहे हैं, किंतु दोनों की स्मृति का स्वभाव अलग है। इसी बिंदु पर ‘उधड़ा हुआ स्वेटर’ कहानी का शीर्षक अपने समूचे अर्थ वैभव के साथ खुलता है। पहली दृष्टि में स्वेटर केवल एक वस्तु है- पुराना, उधड़ा हुआ। शिवा का सहज स्त्री-सुलभ आग्रह है कि उसे ठीक करा लिया जाए। लेकिन आशीष कुमार उसे ठीक नहीं कराना चाहते। वस्तुतः स्वेटर का उधड़ना समय, जीवन और बुढ़ापे का उधड़ना है। लेकिन उसे जस का तस सँजोए रखना स्मृति की नैतिकता है। यदि वे उसे नया बनवा देते, तो शायद वस्तु बच जाती, स्मृति नहीं। उधड़े हुए फंदों में ही बिंदा की उँगलियों का स्पर्श सुरक्षित है। मनुष्य का जीवन पूर्णताओं से नहीं, इन्हीं उधड़नों से बनता है। कहानी का शीर्षक इसलिए अर्थवान है कि वह टूटन का नहीं, टूटन के साथ जीने की गरिमा का रूपक है। यही रूपक कहानी के अंतिम दृश्य में अपनी पूर्ण अर्थवत्ता प्राप्त करता है। शिवा जब आशीष कुमार के पार्थिव शरीर को देखती है, तो उसकी दृष्टि सबसे पहले उनके चेहरे पर नहीं, उनके कंधों पर पड़े उसी स्वेटर पर जाती है। यह अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। मृत्यु के सामने भी सबसे पहले वही वस्तु दिखाई देती है जिसमें स्मृति का स्पर्श सुरक्षित है। ऐसा लगता है जैसे आशीष कुमार अपने जीवन की सबसे प्रिय स्मृति को ओढ़कर मृत्यु की ओर गए हों।
यहीं कहानी की सबसे बड़ी विडंबना भी उपस्थित है। जिस क्षण शिवा को लगता है कि उसके जीवन में पहली बार कोई स्पर्श उसके हिस्से आया है, उसी क्षण उसे पता चलता है कि वह स्पर्श बिंदा की स्मृति से संचालित था। पहली दृष्टि में यह शिवा की पराजय प्रतीत होती है। लेकिन गहरे स्तर पर देखें तो यही क्षण स्मृति को अतीत की कैद से मुक्त करके उसे वर्तमान की नैतिक शक्ति में बदल देता है। यहाँ स्मृति मनुष्य को अतीत में बाँधती नहीं; उसे अधिक करुण, अधिक संवेदनशील और अधिक मानवीय बनाती है। शायद इसीलिए आशीष कुमार अपनी बिंदा को भूलकर नहीं, उसे अपने भीतर जीवित रखकर शिवा के दुःख तक पहुँच पाते हैं। और शायद इसी कारण शिवा भी अंततः आशीष कुमार को केवल एक व्यक्ति के रूप में याद नहीं करती; वह उनके भीतर स्थित उस मनुष्य को याद करती है जो उसके जीवन में क्षणभर के लिए आया और उसे यह विश्वास देकर चला गया कि दुनिया में ऐसा स्पर्श भी संभव हैं जो स्वामित्व और अधिकार से नहीं, केवल अपनापन से प्रकट होता है।
‘उधड़ा हुआ स्वेटर ’ का यह अंतिम प्रसंग जितना मार्मिक है, उतना ही असुविधाजनक भी। जिस मृत्यु को हम कहानी की करुण परिणति मानकर स्वीकार कर रहे हैं, वही पाठक के मन में एक नया प्रश्न भी पैदा करती है। क्या आशीष कुमार की मृत्यु केवल कथा की स्वाभाविक परिणति है, अथवा वह एक ऐसी रचनात्मक युक्ति भी है जिसके माध्यम से लेखिका एक जटिल सामाजिक संभावना से स्वयं को बचा लेती हैं? यह प्रश्न कहानी के मूल्य को कम नहीं करता, बल्कि उसमें निहित जटिलतम सामाजिक संभावनाओं की व्याख्या के नए अवसर देता है।
बालकनी का वह दृश्य कहानी का भावनात्मक उत्कर्ष है, जहाँ शिवा पहली बार अपने जीवन में किसी पुरुष के स्पर्श को हिंसा, अधिकार और दैहिक आक्रमण के रूप में नहीं, बल्कि करुणा, स्नेह और मानवीय साहचर्य के रूप में अनुभव करती है। दूसरी ओर आशीष के लिए वह स्पर्श शिवा का स्पर्श नहीं रह जाता, बल्कि बिंदा की स्मृति का पुनरागमन बन जाता है। इसी क्षण दोनों पात्र अपने-अपने अतीत से बाहर निकलकर संवेदना की एक नई भूमि पर आ खड़े होते हैं। यह उस संभावना का क्षण है जहाँ दो अधूरे जीवन पहली बार एक-दूसरे की उपस्थिति से एक नया अर्थ ग्रहण कर सकते थे। लेकिन इसके ठीक बाद आशीष कुछ दिनों के लिए अनुपस्थित होते हैं और फिर उन की मृत्यु का समाचार मिलता है। प्रश्न यह है कि यह मृत्यु किसकी समस्या का समाधान करती है- पात्रों की, कथा की, या सामाजिक नैतिकता की?
यदि आशीष जीवित रहता, तो कहानी को उन प्रश्नों का सामना करना पड़ता जिनसे अब तक वह केवल संकेतों में संवाद करती रही थी। क्या वृद्धावस्था में स्त्री और पुरुष के बीच विवाहेतर, किंतु गरिमामय और आत्मीय संबंध संभव हैं? क्या समाज उन्हें केवल ‘प्रेम’ की रूढ़ श्रेणियों में रखकर देखेगा या उनके भीतर निहित भावनात्मक जरूरतों को भी समझ सकेगा? क्या दो अकेले मनुष्य जीवन के उत्तरार्ध में बिना सामाजिक अपराधबोध के एक-दूसरे के सहचर हो सकते हैं? क्या स्मृति और वर्तमान साथ-साथ रह सकते हैं? क्या बिंदा की स्मृति के रहते शिवा की उपस्थिति संभव है? क्या शिवा अपने अतीत के हिंसक वैवाहिक अनुभवों के बावजूद किसी नए संबंध पर विश्वास कर सकती है? ये वे प्रश्न हैं जिनकी ओर कहानी बढ़ती हुई दिखती है, किंतु अंतिम क्षण में उनसे संवाद करने के बजाय मृत्यु के माध्यम से स्वयं को उस चुनौती से मुक्त कर लेती है।
आशीष की मृत्यु एक अर्थ में आख्यान समापन का काम करती है। वह कहानी को उस सामाजिक जटिलता में प्रवेश करने से रोक देती है जहाँ भावनात्मक नैतिकता और सामाजिक नैतिकता का प्रत्यक्ष टकराव होना था। कहानी लिव-इन संबंधों के प्रति नई पीढ़ी की सहजता को स्वीकार करती है, अविवाहित स्त्री की स्वायत्तता का सम्मान करती है, किंतु जैसे ही वृद्धावस्था में स्त्री-पुरुष के बीच एक नई आत्मीयता जन्म लेती है, कथा उस संभावना को जीने का अवसर नहीं देती। यह प्रश्न इसलिए और महत्त्वपूर्ण हो उठता है क्योंकि कहानी ने इससे पहले संबंधों के लगभग सभी पारंपरिक प्रतिमानों का पुनर्पाठ कर लिया है। यदि वह इस अंतिम संभावना का भी सामाजिक और भावनात्मक परीक्षण करती, तो शायद उसका वैचारिक साहस और भी अधिक विस्तृत दिखाई देता।
हालाँकि इस आलोचना के साथ-साथ कहानी के पक्ष में उपस्थित एक दूसरी संभावना को भी समान गंभीरता से समझना चाहिए। संभव है कि लेखिका के लिए इस कहानी का केंद्रीय प्रश्न यह रहा हो कि मनुष्य के जीवन में एक छोटी-सी आत्मीय उपस्थिति भी उसके भीतर वर्षों से जमी हुई संवेदनात्मक बर्फ़ को पिघला सकती है। यदि आशीष जीवित रहता और शिवा के साथ उसका संबंध क्रमशः विकसित होता, तो कथा का केंद्र बदल जाता, जो अपने वर्तमान स्वरूप में इस कहानी का उद्देश्य नहीं लगता है। अपने वर्तमान स्वरूप में कहानी उस क्षणभंगुर मानवीय स्पर्श की परिवर्तनकारी शक्ति को केंद्र में रखना चाहती है, जो जीवन की पूरी दिशा बदल देने के लिए पर्याप्त है। इस अर्थ में आशीष की मृत्यु कहानी को प्रेमकथा बनने से रोकती है और उसे करुणा की कथा बनाए रखती है।
आशीष की मृत्यु केवल कथानक को समाप्त नहीं करती, उसके चरित्र की नैतिक संरचना को भी सुरक्षित रखती है। बालकनी के सबसे अंतरंग क्षण में भी वह शिवा को संबोधित करते हुए अंततः बिंदा को ही पहचानता है। यह कहानी का सबसे जटिल नैतिक क्षण है। यदि इसके बाद आशीष शिवा के साथ एक नए संबंध में प्रवेश करता, तो संभव है उसकी यह नैतिक निरंतरता टूट जाती। कहानी के इस अंत पर विचार करते हुए यह प्रश्न सहज ही सामने आ खड़ा होता है कि क्या बिंदा की स्मृति और शिवा की उपस्थिति वास्तव में परस्पर विरोधी थीं? या वे एक-दूसरे को समृद्ध भी कर सकती थीं? क्या मनुष्य का हृदय स्मृति और वर्तमान दोनों के लिए समान रूप से खुला हो सकता है? कहानी इन प्रश्नों के उत्तर नहीं देती, बल्कि उत्तर देने से पहले ही स्वयं को समाप्त कर देती है। इसलिए यह कहना अनुचित न होगा कि आशीष की मृत्यु केवल एक पात्र की मृत्यु नहीं है; वह उस सामाजिक संभावना की भी मृत्यु है जिसमें वृद्धावस्था का साहचर्य, बिना विवाह, बिना स्वामित्व और बिना दैहिक आग्रह के, एक स्वतंत्र मानवीय संबंध के रूप में स्वीकार किया जा सकता था। इस अर्थ में कहानी अपने समय से आगे जाने की संभावनाओं की तरफ इशारा करने के बावजूद अपने समय की सांस्कृतिक झिझकों से पूरी तरह मुक्त नहीं हो पाती। यह द्वन्द्व इस कहानी की ऐसी सीमा है, जिसमें इसकी वास्तविक शक्ति भी निहित है। ‘उधड़ा हुआ स्वेटर’ हमें यह सोचने के लिए विवश करती है कि संबंधों की प्रामाणिकता का आधार उनका सामाजिक नाम या परिचय नहीं, उनका भावनात्मक और नैतिक जीवन है। किंतु साथ में यह प्रश्न भी खड़ा करती है कि क्या हमारा समाज ऐसी भावनात्मक नैतिकता को स्वीकार करने का साहस रखता है? यही कारण है कि यह कहानी पढ़े जाने के बाद भी समाप्त नहीं होती और यहीं से भावनात्मक बौद्धिकता बनाम भावनात्मक नैतिकता की बहस नए सिरे से शुरू हो जाती है। बड़ी कहानियाँ अपने सबसे प्रभावशाली क्षणों में भी ऐसे प्रश्न छोड़ जाती है जिनका कोई एकमात्र उत्तर संभव नहीं होता। ‘उधड़ा हुआ स्वेटर’ एक ऐसी ही कहानी है।
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