NEET पेपर लीक मामले और इस बीच सीजेपी के प्रदर्शन से बढ़ते दबाव के बीच शनिवार को केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने इस्तीफा दे दिया। मोदी सरकार के पिछले 12 सालों के कार्यकाल में इस तरह का इस्तीफा संभवत: पहली बार हुआ है। इसलिए पिछले कुछ दिनों का घटनाक्रम देश के राजनीतिक इतिहास के लिहाज से भी अहम हो जाता है।
धर्मेंद्र प्रधान की बात करें तो पिछले कुछ वर्षों में वह भाजपा के सबसे भरोसेमंद केंद्रीय नेताओं में शामिल रहे हैं। पार्टी में उनकी पहचान पहले एक मजबूत संगठनकर्ता, फिर मंत्री और पार्टी के शीर्ष नेतृत्व के करीब रहकर प्रभावशाली राजनीतिक प्रबंधक के रूप में रही। प्रधान राष्ट्रीय राजनीति में प्रभाव रखने वाले चुनिंदा उड़िया नेताओं में भी शामिल रहे है।
छात्र राजनीति से कैबिनेट मंत्री तक का सफर
26 जून 1969 को जन्में धर्मेंद्र प्रधान बचपन से ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) की सामाजिक-सांस्कृतिक गतिविधियों से जुड़े रहे। उनके पिता डॉ. देवेंद्र प्रधान ओडिशा में भाजपा के प्रमुख नेताओं में शामिल थे और अटल बिहारी वाजपेयी सरकार में केंद्रीय मंत्री भी रह चुके थे।
प्रधान ने अपने गृह नगर तलचेर कॉलेज में उच्च माध्यमिक शिक्षा के दौरान अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (ABVP) के माध्यम से छात्र राजनीति से जुड़े। 1985 में वह कॉलेज छात्रसंघ के अध्यक्ष बने। इसके बाद 1993 में एबीवीपी के प्रदेश सचिव और 1995 तक राष्ट्रीय सचिव की जिम्मेदारी संभालने लगे थे।
भुवनेश्वर स्थित उत्कल विश्वविद्यालय से मानव विज्ञान (एंथ्रोपोलॉजी) में स्नातकोत्तर करने वाले प्रधान ने 1990 में छात्रसंघ चुनाव भी लड़ा, लेकिन उन्हें वर्तमान में बीजू जनता दल (BJD) के सीनियर नेता बन चुके अरुण साहू से तब हार का सामना करना पड़ा था।
भाजपा में एंट्री और तेजी से बढ़ता राजनीतिक कद
1998 में उन्होंने अपने पिता के नक्शेकदम पर चलते हुए भाजपा का दामन थामा। इसके बाद 2000 में पल्हारा विधानसभा सीट से पहली बार विधायक चुने गए। विधायक के रूप में उनके प्रदर्शन के लिए उन्हें ओडिशा विधानसभा का सर्वश्रेष्ठ विधायक सम्मान ‘उत्कलमणि गोपबंधु प्रतिभा सम्मान’ भी मिला है।
समय के साथ संगठन में उनकी सक्रियता लगातार बढ़ती गई। 2001 में भाजपा युवा मोर्चा के प्रदेश अध्यक्ष बने। इसके बाद 2002 में पार्टी के राष्ट्रीय सचिव बनाए गए और 2004 में भारतीय जनता युवा मोर्चा (BJYM) के राष्ट्रीय अध्यक्ष की जिम्मेदारी उन्हें मिली।
साल 2004 में ही प्रधान देवगढ़ लोकसभा सीट से पहली बार सांसद चुने गए। राष्ट्रीय राजनीति में सक्रिय भूमिका निभाने के दौरान 2012 में उन्हें बिहार से राज्यसभा भी भेजा गया। फिर साल 2014 में नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद उन्हें पेट्रोलियम मंत्री बनाया गया। इस दौरान उज्ज्वला योजना और देशभर में एलपीजी की पहुंच बढ़ाने जैसी योजनाओं से उनका नाम प्रमुखता से जुड़ा।
इस दौरान देशभर में भाजपा के विस्तार के दौर में धर्मेंद्र प्रधान को ओडिशा में पार्टी का सबसे प्रमुख चेहरा माना जाने लगा। पार्टी के शीर्ष नेतृत्व से उनकी करीबी भी लगातार बनी रही। 2018 में उन्हें मध्य प्रदेश से दोबारा राज्यसभा भेजा गया और मोदी सरकार के दूसरे कार्यकाल में भी केंद्रीय मंत्रिमंडल में जगह मिली।
2021 में शिक्षा मंत्रालय की जिम्मेदारी
साल 2021 में धर्मेंद्र प्रधान को शिक्षा मंत्रालय की जिम्मेदारी सौंपी गई, जिसे उन्होंने एनडीए सरकार के तीसरे कार्यकाल यानी 2024 के चुनाव के बाद भी संभाला। यही नहीं, लगभग 15 साल बाद उन्होंने 2024 के लोकसभा चुनाव से सीधे चुनावी मैदान में वापसी की और संबलपुर सीट से बड़े अंतर से जीत दर्ज की।
धर्मेंद्र प्रधान को ओडिशा में भाजपा के संगठनात्मक विस्तार का भी अहम शिल्पकार माना जाता है। जब राज्य में पार्टी की मौजूदगी बेहद सीमित थी, तब उन्होंने लगातार राज्य का दौरा किया और जमीनी स्तर के नेताओं को भाजपा से जोड़ने का काम किया।
उनकी रणनीति का असर 2017 के पंचायत चुनावों में दिखाई दिया, जहां भाजपा ने बड़ी सफलता हासिल की। इसके बाद 2019 के लोकसभा चुनाव में पार्टी ने ओडिशा में आठ सीटें जीतीं। वहीं 2024 में भाजपा ने पहली बार अपने दम पर राज्य में सरकार बनाई और बीजू जनता दल को सत्ता से बाहर कर दिया। इसमें धर्मेंद्र प्रधान की भूमिका अहम मानी गई। ओडिशा की जीत के ठीक बाद उन्हें वहां के संभावित मुख्यमंत्री के तौर पर भी देखा जाने लगा था।
धर्मेंद्र प्रधान को भाजपा के भीतर कुशल प्रबंधक और बेहद योजनाबद्ध तरीके से काम करने वाले शख्स के रूप में जाना जाता है। उन्होंने कई राज्यों के चुनावों में भी संगठनात्मक जिम्मेदारियां निभाई हैं और भाजपा की जीत में बड़ी भूमिकाएं अदा की।
अमित शाह के करीबी नेताओं में उनकी गिनती होती रही है। जानकार मानते हैं कि उनकी असल ताकत जनसभाओं की लोकप्रियता से ज्यादा संगठन चलाने, चुनावी रणनीति बनाने और कठिन राजनीतिक परिस्थितियों को संभालने में मानी जाती रही है।
केंद्रीय शिक्षा मंत्री के तौर पर विवाद और उपलब्धियां
शिक्षा मंत्री रहते हुए धर्मेंद्र प्रधान ने राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) का लगातार समर्थन किया। उन्होंने मातृभाषा और बहुभाषी शिक्षा को बढ़ावा देने की वकालत की। पीएम-श्री (PM-SHRI) जैसी योजनाओं और शिक्षा सुधार एजेंडे को आगे बढ़ाया। हालांकि उनका कार्यकाल लगातार विवादों से भी घिरा रहा। राष्ट्रीय स्तर की परीक्षाओं की विश्वसनीयता पर सवाल उठे, पेपर लीक जैसी घटनाएं हुईं। नेशनल टेस्टिंग एजेंसी (NTA) और भर्ती परीक्षाओं के संचालन को लेकर विपक्ष लगातार सरकार पर हमलावर रहा।
तमिलनाडु के साथ तीन-भाषा फार्मूले को लेकर चला विवाद भी रहा। विपक्षी पार्टियों ने ‘हिंदी थोपने’ और राज्यों के अधिकारों में दखल देने के आरोप लगाए, जिससे शिक्षा नीति केंद्र और राज्यों के बीच टकराव का मुद्दा बना
इसके अलावा उनके कार्यकाल में शिक्षा क्षेत्र में आरएसएस के बढ़ते प्रभाव और प्रमुख शैक्षणिक संस्थानों के ‘भगवाकरण’ के आरोप भी लगाए गए। बेशक इन मुद्दों के कारण धर्मेंद्र प्रधान छात्र संगठनों, विपक्षी दलों और कई राज्य सरकारों के निशाने पर रहे। आखिरकार, NEET पेपर लीक विवाद ने उनके बतौर शिक्षा मंत्री कार्यकाल पर सबसे बड़ा असर डाला और आखिरकार उन्हें इस्तीफा देना पड़ा।

