देश की सबसे बड़ी कार निर्माता कंपनी मारुति सुजुकी इंडिया ने रायपुर जिला उपभोक्ता कोर्ट के उस आदेश को चुनौती देने का फैसला किया है, जिसमें कंपनी को एक ग्राहक की ग्रैंड विटारा स्ट्रॉन्ग हाइब्रिड कार बदलकर नई E20 कंपैटिबल कार देने का निर्देश दिया गया था। कंपनी का कहना है कि बेचा गया वाहन पहले से ही E20 ईंधन के अनुकूल था और उसमें आई खराबी का कारण इंजन नहीं, बल्कि दूषित ईंधन था।
कंपनी ने गुरुवार को जारी बयान में कहा कि जिला उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग, रायपुर के आदेश में ईंधन में मिलावट से जुड़े महत्वपूर्ण सबूतों पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया गया।मारुति सुजुकी ने कहा, ‘जिस कार का मामला है, वह पहले से ही E20 कंपैटिबल थी और E20 ईंधन पर चलने के लिए पूरी तरह सक्षम थी। इसकी जानकारी वाहन के ओनर मैनुअल में भी स्पष्ट रूप से दी गई थी।’
कंपनी ने यह भी दावा किया कि ग्राहक की कार से लिए गए ईंधन के नमूने में मिलावट के प्रमाण मिले थे। बयान में कहा गया, ‘ईंधन में मिलावट के सबूत मौजूद हैं। इसके अलावा कई अन्य महत्वपूर्ण तथ्यों का भी आयोग के आदेश में उल्लेख नहीं किया गया है।’ मारुति ने साफ किया कि वह कानून के तहत इस आदेश को चुनौती देगी।
क्या है पूरा मामला?
कार कंपनी का यह बयान उस फैसले के बाद आया है, जिसमें कंज्यूमर कोर्ट, रायपुर ने एक शख्स डॉक्टर प्रेमराज देबता के पक्ष में फैसला सुनाया था। कोर्ट ने कहा कि मारुति सुजुकी और उसके अधिकृत डीलर ने सेवा में कमी बरती और अनुचित व्यापारिक व्यवहार किया।
कोर्ट ने कंपनी और डीलर को निर्देश दिया था कि वे 45 दिनों के भीतर शिकायतकर्ता की ग्रैंड विटारा स्ट्रॉन्ग हाइब्रिड जेटा प्लस को नई E20 कंपैटिबल इंजन वाली कार से बदलें। अगर ऐसा नहीं किया जाता है तो ग्राहक को वाहन, रजिस्ट्रेशन और बीमा पर खर्च किए गए 20,50,494 रुपये लौटाने होंगे। इसके अलावा मानसिक उत्पीड़न के लिए एक लाख रुपये और मुकदमे के खर्च के लिए 10 हजार रुपये भी देने होंगे।
ग्राहक ने क्या आरोप लगाए थे?
शिकायत के मुताबिक, प्रेमराज देबता ने 3 जून 2024 को रायपुर स्थित एक अधिकृत नेक्सा डीलरशिप से ग्रैंड विटारा स्ट्रॉन्ग हाइब्रिड जेटा प्लस खरीदी थी। वाहन एक्सटेंडेड वारंटी के तहत था। करीब 21,913 किलोमीटर चलने के बाद 11 नवंबर 2024 को कार में पहली बार इंजन वार्निंग लाइट जली और वाहन बंद हो गया।
ग्राहक के अनुसार, डीलर ने शुरुआत में खराबी के लिए मिलावटी ईंधन को जिम्मेदार बताया। ईंधन टैंक खाली कर उसमें नया पेट्रोल डाला गया, लेकिन करीब 60 किलोमीटर चलने के बाद वाहन फिर खराब हो गया। इसके बाद भी कई बार मरम्मत के बावजूद इंजन में दिक्कत आती रही।
शिकायतकर्ता ने उस पेट्रोल पंप से भी संपर्क किया, जहां से उन्होंने ईंधन भरवाया था। पेट्रोल पंप ने दावा किया कि उसका ईंधन निर्धारित गुणवत्ता मानकों के अनुरूप था और अन्य किसी ग्राहक से ऐसी शिकायत नहीं मिली।
बाद में मारुति सुजुकी ने ग्राहक को बताया कि ईंधन में मिलावट के कारण इंजन और कुछ अन्य पुर्जों को बदलना पड़ेगा, जिस पर करीब 5 लाख रुपये का खर्च आएगा। कंपनी ने यह मरम्मत वारंटी के तहत करने से इनकार कर दिया।
कोर्ट ने किन आधारों पर सुनाया फैसला?
सुनवाई के दौरान आयोग ने पाया कि संबंधित वाहन का निर्माण जनवरी 2023 में हुआ था, जबकि उसे जून 2024 में बेचा गया। कोर्ट ने यह भी कहा कि ईंधन कई बार बदलने और टैंक की सफाई के बावजूद वाहन में लगातार खराबी आती रही और ग्राहक को बार-बार वर्कशॉप जाना पड़ा।
इन तथ्यों के आधार पर आयोग ने मारुति सुजुकी और उसके अधिकृत डीलर को सेवा में कमी और अनुचित व्यापारिक व्यवहार का दोषी माना तथा वाहन बदलने या पूरी राशि वापस करने का आदेश दिया। आयोग ने यह भी कहा कि यदि निर्धारित समय के भीतर भुगतान या रिफंड नहीं किया गया तो देय राशि पर 7 प्रतिशत वार्षिक ब्याज भी देना होगा।

