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अमेरिका H-1B, ग्रीन कार्ड और स्टूडेंट वीजा में बड़े बदलाव की तैयारी में, भारतीयों पर इसका सबसे ज्यादा असर क्यों पड़ेगा?

ट्रंप प्रशासन द्वारा प्रस्तावित सबसे बड़े बदलावों में से एक H-1B वीजा प्रोग्राम से जुड़ा है, जो अमेरिकी कंपनियों को खास क्षेत्रों में विदेशी पेशेवरों को काम पर रखने की इजाजत देता है। हर साल सालाना सीमा के तहत 85,000 नए H-1B वीजा उपलब्ध होते हैं।

वाशिंगटन: ट्रंप प्रशासन इमिग्रेशन नियमों का एक नया सेट तैयार कर रहा है। यह नया बदलाव विदेशी प्रोफेशनल्स, स्टूडेंट्स और एम्प्लॉयर्स के लिए US के इमिग्रेशन सिस्टम को समझना और उसका पालन करना और मुश्किल हो सकता है।

ट्रंप प्रशासन द्वारा प्रस्तावित इन बदलावों में वे तरीके शामिल हैं जिनका इस्तेमाल भारतीय अक्सर अमेरिका में पढ़ाई और काम करने के लिए करते हैं। इसलिए अमेरिका में सबसे बड़े प्रवासी समूहों में से एक होने के नाते भारतीयों को H-1B प्रोग्राम, L-1 वीजा और स्टूडेंट वीजा में प्रस्तावित बदलावों के कारण खास तौर पर ज्यादा मुश्किलों का सामना करना पड़ सकता है।

US डिपार्टमेंट ऑफ होमलैंड सिक्योरिटी (DHS), डिपार्टमेंट ऑफ लेबर (DOL) और डिपार्टमेंट ऑफ स्टेट (DOS) की ओर से जारी हालिया रेगुलेटरी एजेंडा में शामिल प्रस्ताव, कुशल प्रवासियों द्वारा इस्तेमाल किए जाने वाले लगभग हर अहम रास्ते को कवर करते हैं।

हालांकि इनमें से कोई भी उपाय अभी लागू नहीं हुआ है, लेकिन इनसे प्रशासन की योजनाओं का साफ संकेत मिलता है। अगर इन्हें लागू किया जाता है, तो इसका मतलब हो सकता है – ज्यादा सख्त पात्रता नियम, ज्यादा कागजी कार्रवाई, नियोक्ताओं की बारीकी से जांच और विदेशी कर्मचारियों को काम पर रखने वाली कंपनियों के लिए ज्यादा लागत।

H-1B वीजा नियम अगस्त से हो सकते हैं और सख्त

ट्रंप प्रशासन द्वारा प्रस्तावित सबसे बड़े बदलावों में से एक H-1B वीजा प्रोग्राम से जुड़ा है, जो अमेरिकी कंपनियों को खास क्षेत्रों में विदेशी पेशेवरों को काम पर रखने की इजाजत देता है। हर साल सालाना सीमा के तहत 85,000 नए H-1B वीजा उपलब्ध होते हैं।

उम्मीद है कि DHS अगस्त में एक प्रस्तावित नियम जारी करेगा जिससे इस प्रोग्राम के कई हिस्सों को और सख्त बनाया जाएगा। इस प्रस्ताव से H-1B कैप (सीमा) से मिलने वाली छूट कम हो सकती है, जो अभी यूनिवर्सिटी और कुछ रिसर्च संगठनों को मिलती है। इसके साथ ही जो एम्प्लॉयर H-1B वर्करों को थर्ड-पार्टी क्लाइंट साइट पर भेजते हैं, उनके लिए सख्त नियम लागू किए जाएंगे और जिन एम्प्लॉयर ने पहले प्रोग्राम के नियमों का उल्लंघन किया है, उनकी ज्यादा बारीकी से जांच की जाएगी।

थर्ड पार्टी प्लेसमेंट मॉडल का इस्तेमाल मुख्यतः भारतीय आईटी और कंसल्टिंग कंपनियों द्वारा इस्तेमाल किया जाता है। इन प्रस्तावित बदलावों के तह नियोक्ताओं को और पुख्ता सबूत मुहैया कराने पड़ सकते हैं जो नियोक्ता और कर्मचारी के बीच वास्तविक संबंध को दर्शाता है।

इसके अलावा उन्हें यह भी दिखाना पड़ सकता है कि एम्प्लॉई क्लाइंट की जगह पर खास तरह का काम करेगा और अपनी एप्लीकेशन के समर्थन में अतिरिक्त दस्तावेज जमा करने पड़ सकते हैं।

जिन कंपनियों का H-1B नियमों के उल्लंघन का इतिहास रहा है, उन्हें भविष्य में याचिकाएं दाखिल करते समय ज्यादा सख्त जांच का सामना करना पड़ सकता है।

DHS कुछ बड़े एम्प्लॉयर्स पर लागू होने वाली मौजूदा अतिरिक्त फीस को बढ़ाने की भी योजना बना रहा है। अभी यह फीस शुरुआती H-1B याचिकाओं और एम्प्लॉयर बदलने पर लागू होती है। प्रस्तावित नियम के तहत यह वीजा बढ़ाने के आवेदनों पर भी लागू होगी। इस बदलाव का असर उन एम्प्लॉयर्स पर पड़ेगा जिनके US में 50 से ज्यादा कर्मचारी हैं और जिनकी आधी से ज्यादा वर्कफोर्स H-1B या L-1 वीजा पर है। इससे आउटसोर्सिंग पर ध्यान देने वाली कंपनियों की लागत बढ़ जाएगी।

ग्रीन कार्ड स्पॉन्सरशिप का बढ़ सकता है खर्च

लेबर डिपार्टमेंट ऐसे बदलावों की योजना बना रहा है जिनसे H-1B वीजा और रोजगार-आधारित ग्रीन कार्ड के लिए विदेशी कर्मचारियों को स्पॉन्सर करने का खर्च बढ़ सकता है।

विभाग H-1B और PERM लेबर सर्टिफिकेशन मामलों में इस्तेमाल होने वाले मौजूदा वेतन स्तरों में बदलाव करना चाहता है। इस प्रस्ताव के तहत एंट्री-लेवल वेतन 17वें परसेंटाइल से बढ़कर 34वें परसेंटाइल हो जाएगा और साथ ही ज्यादा वेतन स्तरों को भी बढ़ाया जाएगा। इससे विदेशी कर्मचारियों को स्पॉन्सर करने के लिए एम्प्लॉयर को जो न्यूनतम वेतन देना होता है, वह बढ़ जाएगा।

विभाग से PERM लेबर सर्टिफिकेशन प्रोसेस में बदलाव का प्रस्ताव रखने की भी उम्मीद है जो नौकरी पर आधारित कई ग्रीन कार्ड आवेदनों में एक अहम कदम है। इन प्रस्तावित बदलावों में भर्ती के मानकों, अमेरिकी कर्मचारियों की छंटनी से जुड़े नियमों और भेदभाव-रोधी कड़े उपायों में बदलाव शामिल हैं।

ध्यान देने वाली बात यह है कि ग्रीन कार्ड के लंबे समय से चले आ रहे बैकलॉग और अमेरिकी इमिग्रेशन सिस्टम को लेकर अनिश्चितता के कारण कई प्रोफेशनल स्थायी निवास (परमानेंट रेजिडेंसी) पाने के लिए ज्यादा निश्चित रास्ते की तलाश में UK जाने पर भी विचार कर रहे हैं।

छात्रों पर पड़ेगा असर

इमिग्रेशन कानूनों में हुए नए बदलावों से इंटरनेशनल स्टूडेंट्स पर भी असर पड़ने की संभावना है। भारत ने 2024-25 एकेडमिक ईयर में लगभग 3.6 लाख स्टूडेंट्स को अमेरिका भेजा जो सभी देशों में सर्वाधिक है।

DHS छात्रों और एक्सचेंज विजिटर्स के लिए मौजूदा ” ड्यूरेशन ऑफ स्टेटस ” सिस्टम को खत्म करने की योजना बना रहा है। अभी छात्रों को आम तौर पर तब तक अमेरिका में रहने की इजाजत होती है, जब तक वे अपने एकेडमिक प्रोग्राम की शर्तों को पूरा करते रहते हैं।

प्रस्तावित नियम के तहत, छात्रों को रहने के लिए एक तय समय मिलेगा। वह समय खत्म होने के बाद, उन्हें अपनी पढ़ाई जारी रखने या देश में बने रहने के लिए समय बढ़ाने (एक्सटेंशन) के लिए आवेदन करना होगा।

फरवरी 2027 में आने वाले एक और प्रस्ताव से ‘ऑप्शनल प्रैक्टिकल ट्रेनिंग’ (OPT) के नियम और सख्त हो सकते हैं। इस समीक्षा में दो साल का STEM OPT एक्सटेंशन और ‘करिकुलर प्रैक्टिकल ट्रेनिंग’ (CPT) दोनों शामिल हैं। ये दोनों ही योग्य विदेशी छात्रों को अमेरिका में काम का अनुभव हासिल करने का मौका देते हैं।

यह भी पढ़ें – ‘हमला करोगे तो जवाब मिलेगा’, ईरान की अमेरिका को चेतावनी; कहा – धमकियों से नहीं खुलेगा होर्मुज

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अमरेन्द्र यादव
लखनऊ विश्वविद्यालय से राजनीति शास्त्र में स्नातक करने के बाद जामिया मिल्लिया इस्लामिया से पत्रकारिता की पढ़ाई। जागरण न्यू मीडिया में बतौर कंटेंट राइटर काम करने के बाद 'बोले भारत' में कॉपी राइटर के रूप में कार्यरत...सीखना निरंतर जारी है...
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अमरेन्द्र यादव
लखनऊ विश्वविद्यालय से राजनीति शास्त्र में स्नातक करने के बाद जामिया मिल्लिया इस्लामिया से पत्रकारिता की पढ़ाई। जागरण न्यू मीडिया में बतौर कंटेंट राइटर काम करने के बाद 'बोले भारत' में कॉपी राइटर के रूप में कार्यरत...सीखना निरंतर जारी है...
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