Homeविचार-विमर्शखबरों से आगे: जम्मू-कश्मीर के स्कूली किताबों में अलगाववादियों का महिमामंडन, चूक...

खबरों से आगे: जम्मू-कश्मीर के स्कूली किताबों में अलगाववादियों का महिमामंडन, चूक या सुनियोजित साजिश?

जम्मू-कश्मीर के दो स्कूली किताबों में अलगाववादियों और आतंकियों के महिमामंडन के खुलासे ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं। आखिर ऐसी चूक कैसे हो जाती है। फिलहाल जांच जारी है और सूबे के स्कूल शिक्षा विभाग के 8 अधिकारियों को निलंबित किया गया है।

जम्मू-कश्मीर में पुलिस की एफआईआर और के बाद ‘समग्र शिक्षा’ द्वारा अनुमोदित दो पुस्तकों में अलगाववादियों का महिमामंडन किए जाने से जुड़े मामले में और असहज करने वाले तथ्य जल्द ही सामने आने की संभावना है। अभी हिलाल अहमद और संतोष मीणा की ‘पर्सनैलिटिज एंड लीजेड्स ऑफ जे एंड के’ और सुशांत गिरी की ‘ग्रेट पर्सनैलिटिज ऑफ जम्मू एंड कश्मीर’ किताब इस समय जांच के दायरे में है।

यदि शिक्षा मंत्री सकीना इट्टू अपनी मर्जी से फैसले लेती हैं तो फिलहाल निलंबित किए गए स्कूल शिक्षा विभाग के आठ अधिकारियों को नौकरी से बर्खास्त भी किया जा सकता है। उन्होंने सार्वजनिक रूप से कहा है कि जब उन्हें पता चला कि इन दोनों किताबों में आतंकवादियों का महिमामंडन किया गया है, तो उनकी पहली प्रतिक्रिया इन सभी अधिकारियों को तत्काल बर्खास्त करने की थी। निलंबित अधिकारियों की टीम का नेतृत्व फाजिल इमरान सिद्दीकी कर रहे थे। उनके साथ बडगाम के लेक्चरर इम्तियाज मीर और एससीईआरटी (SCERT) की अकादमिक अधिकारी शाजिया कौसर शामिल थीं।

इसके अलावा निगरानी भूमिका में पांच अन्य अधिकारी भी थे। इनमें संजीव शर्मा (प्रिंसिपल), गुरजीत सिंह (असिस्टेंट कोऑर्डिनेटर, समग्र शिक्षा), निरंजना शर्मा (लेक्चरर), रेणु मेंगी (लेक्चरर) और राजमोहिनी (लेक्चरर) शामिल थे। बताया जा रहा है कि इन पांच अधिकारियों ने गलत तरीके से चुनी गई इन पुस्तकों को मंजूरी दी और भारत विरोधी तथा पाकिस्तान समर्थक माने जाने वाले व्यक्तियों के महिमामंडन पर कोई आपत्ति नहीं जताई। इन अलगाववादियों में जम्मू-कश्मीर लिबरेशन फ्रंट (JKLF) के मारे जा चुके संस्थापक मकबूल भट्ट, दिवंगत एसएएस गिलानी, मसर्रत आलम और शब्बीर शाह जैसे नाम शामिल हैं।

जम्मू और दिल्ली से प्रकाशित हुई थी किताबें

इन दो पुस्तकों में से पहली जम्मू स्थित ओबेरॉय बुक सर्विस द्वारा प्रकाशित की गई, जबकि दूसरी पुस्तक दिल्ली के दरियागंज स्थित अनुराग प्रकाशन द्वारा प्रकाशित की गई है। जम्मू के बहु प्लाजा स्थित ओबेरॉय बुक सर्विस के कार्यालय पर पुलिस ने छापा मारा है। हालांकि, अब तक यह जानकारी सार्वजनिक नहीं की गई है कि छापेमारी के दौरान कोई आपत्तिजनक सामग्री मिली या नहीं। यह भी स्पष्ट नहीं है कि दिल्ली स्थित प्रकाशक के खिलाफ अब तक क्या कार्रवाई की गई है या भविष्य में क्या कार्रवाई की जा सकती है।

एफआईआर गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम (UAPA)की धारा 13 के तहत दर्ज की गई है। इसके अलावा भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 49 (उकसावा), धारा 61(2) (आपराधिक साजिश), धारा 152 (भारत की संप्रभुता, एकता और अखंडता को खतरे में डालना), धारा 196 (वैमनस्य फैलाना) तथा धारा 353 (झूठे बयान, अफवाह या रिपोर्ट प्रकाशित अथवा प्रसारित करना) भी एफआईआर में शामिल की गई हैं। इन पुस्तकों की प्रतियां जम्मू, रामबन, उधमपुर और बारामूला जिलों के सैकड़ों स्कूलों में वितरित की गई थीं। अब सरकार के आदेश के बाद स्कूल इन पुस्तकों को वापस लौटा रहे हैं।

जम्मू स्थित प्रकाशक के परिसर पर छापेमारी के दौरान जांच एजेंसियों ने फिजिकल डॉक्यूमेंट्स के साथ-साथ डिजिटल साक्ष्य (Digital Evidence) भी जब्त किए।

अभी कुछ दिन पहले स्कूल शिक्षा विभाग के आठ अधिकारियों को निलंबित कर दिया गया, जबकि एक संविदा (कॉन्ट्रैक्ट) कर्मचारी की सेवाएं समाप्त कर दी गईं। जिस संविदा कर्मचारी की सेवा समाप्त की गई, उसका नाम शेख सुहैल अहमद है। वह टीम लीडर फाजिल इमरान सिद्दीकी का सहायक था। इसके साथ ही इस ‘बेहद अनुचित सामग्री’ के चयन और उसके प्रसार की जांच के आदेश भी दे दिए गए हैं।

मामले की गंभीरता को देखते हुए यह जांच वरिष्ठ आईएएस अधिकारी और अतिरिक्त मुख्य सचिव अश्विनी कुमार करेंगे। जांच में उनकी सहायता जेकेएएस अधिकारी रोहित शर्मा करेंगे, जिन्हें ‘प्रेजेंटिंग अफसर’ नियुक्त किया गया है।

फाजिल इमरान सिद्दीकी की भूमिका संदिग्ध!

विवादित पुस्तकों के चयन की प्रक्रिया की शुरुआत समग्र शिक्षा के वरिष्ठ अधिकारी फाजिल इमरान सिद्दीकी ने की थी। उनके साथ एससीईआरटी की अकादमिक अधिकारी शाजिया कौसर और बडगाम के वाथूरा स्थित गवर्नमेंट हायर सेकेंडरी स्कूल के लेक्चरर इम्तियाज मीर भी इस प्रक्रिया में शामिल थे। अन्य पांच अधिकारी संजीव शर्मा (प्रिंसिपल), गुरजीत सिंह (असिस्टेंट कोऑर्डिनेटर, समग्र शिक्षा), निरंजना शर्मा (लेक्चरर), रेणु मेंगी (लेक्चरर) और राजमोहिनी (लेक्चरर) भी इस प्रक्रिया में शामिल हुए।

फाजिल इमरान सिद्दीकी की टीम का हिस्सा रहे इन सभी अधिकारियों को निलंबित कर दिया गया है। इसमें सिद्दीकी मूल रूप से किश्तवाड़ जिले के रहने वाले हैं और कुछ अधिकारियों ने उन्हें कम बोलने वाला लेकिन कट्टर इस्लामवादी बताया है। बताया जाता है कि जम्मू के एक स्थानीय स्कूल में प्रिंसिपल रहने के दौरान तथा अन्य पदों पर कार्यकाल के समय भी उनका आचरण संदेह के घेरे में रहा, लेकिन वह हर बार जांच से बचने में सफल रहे।

इन अधिकारियों के निलंबन और जांच समिति के गठन से संबंधित सरकारी आदेश शनिवार, 4 जुलाई 2026 को स्कूल शिक्षा विभाग के आयुक्त/सचिव राम निवास शर्मा द्वारा जारी किया गया। आदेश में कहा गया है कि सब-कमेटी सीरीज-4 के सदस्यों (जिन्हें निलंबित किया गया है) द्वारा गंभीर लापरवाही, कर्तव्य के निर्वहन में चूक तथा आवश्यक सावधानी न बरतने के प्रमाण मिले हैं।

समग्र शिक्षा ने विभिन्न प्रकाशकों द्वारा भेजी गई कुल 463 पुस्तकों की सामग्री की जांच के लिए चार उप-समितियां गठित की थीं। पर्सनैलिटिज एंड लीजेंड्स ऑफ जम्मू एंड कश्मीर नाम की पुस्तक में जम्मू-कश्मीर लिबरेशन फ्रंट (JKLF) के सह-संस्थापक मकबूल भट्ट, कट्टरपंथी हुर्रियत नेता रहे एसएएस गिलानी, मसर्रत आलम और शब्बीर शाह जैसे कई कश्मीरी अलगाववादी नेताओं के नाम को शामिल किया गया था।

तिहाड़ में बंद हैं मसर्रत आलम और शब्बीर शाह

मसर्रत आलम और शब्बीर शाह पिछले कई सालों से दिल्ली की तिहाड़ जेल में बंद हैं। इन पर आतंकवाद के लिए धन जुटानेतथा आतंकवाद से जुड़ी गतिविधियों में प्रत्यक्ष रूप से शामिल रहने के आरोप हैं। मसर्रत आलम वही व्यक्ति हैं जिन्होंने साल 2010 की गर्मियों में हिंसक विरोध प्रदर्शनों का नेतृत्व किया था, जिनमें 100 से अधिक लोगों की मौत हुई थी और दर्जनों लोग कश्मीरी पेलेट गन के इस्तेमाल से घायल हुए थे। ये वही शख्स भी हैं, जिसे दिवंगत मुफ्ती मोहम्मद सईद ने 1 मार्च 2015 को मुख्यमंत्री बनने के तुरंत बाद रिहा करना चाहा था। हालांकि, उस समय उनकी सहयोगी पार्टी भाजपा ने इस प्रस्ताव का विरोध किया था, जिसके कारण यह योजना लागू नहीं हो सकी।

बहरहाल, जब अलग-अलग प्रकाशकों से पुस्तकें प्राप्त हो जाती है, तो समग्र शिक्षा उनकी जांच के लिए समितियों का गठन करती है। इन समितियों का काम किताबों में तथ्यों को लेकर अशुद्धियों और तथ्यात्मक गलतियां सहित अन्य कमियों की जांच करना होता है। समिति के सदस्य आपस में पुस्तकों का बंटवारा कर लेते हैं और सबसे पहले पुस्तक की भूमिका (Preface), विषय-सूची तथा उसमें दिए गए चित्रों की जांच शुरू करते हैं।

इसके बाद नोटशीट तैयार की जाती हैं, जिनमें कुछ पुस्तकों की सिफारिश की जाती है। इन नोटशीटों पर समिति के सभी सदस्यों के हस्ताक्षर होने होते हैं। आमतौर पर होता यह है कि समिति के केवल एक या दो सदस्य ही वास्तव में पुस्तक को पढ़ते हैं। इसके बाद वे बाकी सदस्यों को बताते हैं कि उन्होंने पुस्तक में क्या पढ़ा है। फिर अन्य सभी सदस्य बिना खुद पुस्तक पढ़े ही इस घोषणा के साथ हस्ताक्षर कर देते हैं कि उन्होंने पुस्तक की सामग्री पढ़ ली है और उसे उपयुक्त पाया है। तो इसका मतलब क्या हुआ? इसका अर्थ यह है कि व्यवहार में समिति का केवल एक सदस्य किसी विशेष पुस्तक या कुछ पुस्तकों को पढ़ता है, जबकि उप-समिति के बाकी सात सदस्य उस पर आंख बंद करके भरोसा करते हुए हस्ताक्षर कर देते हैं।

यह भी पढ़ें- वक्फ बोर्ड में हिंदू सदस्यों को शामिल करने वाला पहला राज्य बना मध्य प्रदेश, इन दो को मिली जगह

author avatar
सन्त कुमार शर्मा
RELATED ARTICLES

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Most Popular