नई दिल्ली: भगोड़े कारोबारी नीरव मोदी को ब्रिटेन में एक और कानूनी झटका लगा है। लंदन की एक अदालत ने बैंक ऑफ इंडिया (BOI) के पक्ष में फैसला सुनाते हुए नीरव मोदी को 1.07 करोड़ डॉलर (करीब 100 करोड़ रुपये से अधिक) का भुगतान करने का आदेश दिया है। यह मामला नीरव मोदी द्वारा प्रमोट की गई दुबई स्थित कंपनी फायरस्टार डायमंड एफजेडई (Firestar Diamond FZE) को दिए गए ऋण और उस पर दी गई व्यक्तिगत गारंटी से जुड़ा है।
लंदन सर्किट कमर्शियल कोर्ट ने कहा कि नीरव मोदी ‘फायरस्टार डायमंड FZE’ (फायरस्टार ग्रुप की दुबई स्थित कंपनी) को दिए गए लोन के लिए दी गई पर्सनल गारंटी के तहत लोन चुकाने के लिए व्यक्तिगत रूप से जिम्मेदार हैं। मोदी 13,000 करोड़ रुपये के पंजाब नेशनल बैंक (पीएनबी) घोटाले का भी मुख्य आरोपी है।
कोर्ट ने मंगलवार को सुनाए गए फैसले में साफ किया नीरव मोदी व्यक्तिगत रूप से उस कर्ज के भुगतान के लिए जिम्मेदार हैं, जिसके लिए उन्होंने बैंक ऑफ इंडिया को निजी गारंटी दी थी। अदालत ने माना कि उधार लेने वाली कंपनी के डिफॉल्टर होने के बाद भी मोदी की कानूनी जिम्मेदारी समाप्त नहीं हुई। अदालत के अनुसार, कुल देनदारी में लगभग 41 लाख डॉलर (करीब 38.9 करोड़ रुपये) की मूल बकाया राशि शामिल है। इसके अलावा बैंक द्वारा दावा किया गया ब्याज भी जोड़ा जाएगा, जिससे कुल वसूली योग्य राशि 1.07 करोड़ डॉलर से अधिक हो गई है।
2012 में मंजूर हुआ था ऋण
यह विवाद साल 2012 में बैंक ऑफ इंडिया द्वारा मंजूर की गई ऋण से जुड़ा है। यह ऋण उस समय दिया गया था जब पंजाब नेशनल बैंक घोटाले के आरोप सामने नहीं आए थे। आरोपों के अनुसार 3 अगस्त 2012 को नीरव मोदी ने बैंक के पक्ष में एक व्यक्तिगत गारंटी पर हस्ताक्षर किए थे। इसके तहत उन्होंने यह स्वीकार किया था कि यदि उधार लेने वाली कंपनी अपने दायित्वों का निर्वहन करने में विफल रहती है तो वह व्यक्तिगत रूप से ऋण चुकाने के लिए जिम्मेदार होंगे।
अदालत के रिकॉर्ड के अनुसार, 2018 की शुरुआत में कथित बैंकिंग धोखाधड़ी की जांच सामने आने के बाद फायरस्टार समूह की वित्तीय स्थिति तेजी से खराब हो गई थी। फरवरी 2018 में सीबीआई ने पीएनबी घोटाले के संबंध में अपनी पहली एफआईआर दर्ज की थी।
बैंक ने शुरू की थी अलग से रिकवरी प्रक्रिया
फायरस्टार डायमंड एफजेडई के डिफॉल्ट करने के बाद बैंक ऑफ इंडिया ने नीरव मोदी के खिलाफ उनकी व्यक्तिगत गारंटी के आधार पर अलग से वसूली प्रक्रिया शुरू की थी। बैंक ने बकाया राशि की वसूली के लिए कई नोटिस जारी किए, लेकिन उसके अनुसार बार-बार प्रयासों के बावजूद कोई भुगतान प्राप्त नहीं हुआ।
मामले की सुनवाई के दौरान नीरव मोदी ने अदालत में दलील दी कि उनकी व्यक्तिगत गारंटी को लागू नहीं किया जा सकता। सुनवाई के दौरान उनकी कानूनी टीम ने दावा किया कि बैंक ऑफ इंडिया लोन की वापसी के लिए कोई वैध मांग जारी करने में नाकाम रहा और उसके पास लोन की समय-सीमा से पहले वसूली की प्रक्रिया शुरू करने या तुरंत रिकवरी की मांग करने के लिए पर्याप्त आधार नहीं थे।
नीरव मोदी के पक्ष ने यह भी कहा गया कि अप्रैल 2018 और अक्टूबर 2025 में जारी किए गए नोटिस उन्हें प्राप्त नहीं हुए क्योंकि वह उस समय भारत से बाहर थे। हालांकि अदालत ने इन दलीलों को खारिज कर दिया। अदालत ने कहा कि नोटिस विधिवत तरीके से भेजे गए थे। फैसले में कहा गया कि अक्टूबर 2025 का नोटिस उस ब्रिटिश जेल में भी भेजा गया था, जहां नीरव मोदी वर्तमान में बंद हैं।
अदालत ने यह भी माना कि मोदी के कानूनी प्रतिनिधियों को 2019 में अप्रैल 2018 के नोटिस की प्रति मिल चुकी थी, जिससे यह स्पष्ट होता है कि उन्हें बैंक की मांग की जानकारी थी।
अदालत ने बैंक के दावे को सही माना
फैसले में अदालत ने कहा कि फरवरी 2018 तक यह स्पष्ट हो गया था कि नीरव मोदी और फायरस्टार समूह की कंपनियों की वित्तीय स्थिति गंभीर रूप से बिगड़ चुकी थी। अदालत ने एक बैंक को भेजे ईमेल का भी उल्लेख किया, जिसमें नीरव मोदी ने स्वीकार किया था कि उनके खिलाफ आई नकारात्मक मीडिया रिपोर्टों का कारोबार पर गंभीर असर पड़ा है और समूह की कंपनियां अपने वित्तीय दायित्वों को पूरा करने की स्थिति में नहीं हैं।
इन परिस्थितियों को देखते हुए अदालत ने निष्कर्ष निकाला कि बैंक ऑफ इंडिया को ऋण की तत्काल वसूली मांगने, ऋण सुविधा को समाप्त करने और नीरव मोदी की व्यक्तिगत गारंटी लागू करने का पूरा अधिकार था।
यह फैसला नीरव मोदी के लिए यूके में एक और बड़ा झटका माना जा रहा है, जहां वह भारत के प्रत्यर्पण का विरोध भी कर रहे हैं। इस साल की शुरुआत में भी यूके हाई कोर्ट ने भारत सरकार की ओर से दिए गए आश्वासनों पर विचार करने के बाद नीरव मोदी की प्रत्यर्पण को दी गई चुनौती के मामले को दोबारा खोलने की मांग खारिज कर दी थी।
नीरव मोदी फिलहाल ब्रिटेन में हिरासत में हैं और भारत प्रत्यर्पण को रोकने के लिए यूरोपीय मानवाधिकार न्यायालय में कानूनी विकल्पों का सहारा ले रहे हैं। भारत में उन्हें सीबीआई और प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) द्वारा पंजाब नेशनल बैंक से जुड़े कथित घोटाले में वॉन्टेड घोषित किया गया है।

