चेन्नई: मद्रास हाई कोर्ट ने हाल ही में तमिल फिल्म ‘करप्पू’ पर प्रतिबंध लगाने से इनकार करते हुए कहा कि न्यायपालिका में भ्रष्टाचार है, इस बात से कोई इनकार नहीं कर सकता। इस फिल्म में निचली अदालत में भ्रष्टाचार को दर्शाया गया है।
जस्टिस जीआर स्वामीनाथन और जस्टिस वी लक्ष्मीनारायणन की पीठ ने अधिवक्ता आर.एस. तमिलवेंडन द्वारा दायर याचिका को खारिज करते हुए टिप्पणी की।
न्यायपालिका में भ्रष्टाचार से कोई नहीं कर सकता इंकार: मद्रास हाई कोर्ट
याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया था कि फिल्म ‘करप्पू’ में अदालतों को गलत तरीके से चित्रित किया गया है और न्यायिक व्यवस्था को कलंकित किया गया है। अदालत ने याचिका खारिज करते हुए कहा कि ” न्यायपालिका में भ्रष्टाचार की बात से कोई इनकार नहीं कर सकता। भ्रष्ट जज थे और हैं। “
मद्रास हाई कोर्ट ने सुनवाई के दौरान यह भी टिप्पणी की कि न्यायाधीश और अदालतें आलोचना से परे नहीं हैं। अदालत ने टिप्पणी की कि ” न्यायाधीशों को पवित्र नहीं माना जाना चाहिए। न्याय कोई गुप्त गुण नहीं है; उसे आम लोगों की आलोचना और सम्मानजनक टिप्पणियों का सामना करने की अनुमति दी जानी चाहिए, भले ही वे स्पष्टवादी हों।”
अदालत ने केरल के कोल्लम में आयोजित एक कानूनी सम्मेलन में भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश एसपी भरूचा के उस बयान का भी जिक्र किया, जिसमें उन्होंने संकेत दिया था कि देश के 20 प्रतिशत जज भ्रष्ट हैं। पीठ ने वरिष्ठ अधिवक्ता शांति भूषण और उनके पुत्र, अधिवक्ता प्रशांत भूषण द्वारा इस मामले में दिए गए “चौंकाने वाले बयान” पर भी ध्यान दिया। पीठ ने स्पष्ट किया कि वह ऐसे व्यापक बयानों का समर्थन नहीं करती है।
पीठ ने कहा, ” हम इतनी दूर तक नहीं जाएंगे। हम ऐसे व्यापक बयानों का भी समर्थन करने से इनकार करते हैं। “
‘करप्पू’ फिल्म पर प्रतिबंध लगाने की मांग की थी
पीठ ने हालांकि यह भी कहा कि वह इस बात से इनकार नहीं करती कि व्यवस्था में भ्रष्ट जज रहे हैं। अदालत ने यह भी कहा कि ” न्यायिक भ्रष्टाचार के मामले हमें ज्ञात हैं और हमने देखे भी हैं। मद्रास उच्च न्यायालय की पूर्ण पीठ नियमित रूप से ऐसे भ्रष्ट जजों को पद से हटा देती है।”
अदालत के समक्ष याचिका में तमिलनाडु सरकार, सूचना एवं जनसंपर्क विभाग और केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड को सिनेमाघरों और ओटीटी प्लेटफॉर्म पर ‘करप्पू’ फिल्म पर प्रतिबंध लगाने या उसे विनियमित करने के निर्देश देने की मांग की गई है।
इसमें चौथे प्रतिवादी ड्रीम वॉरियर पिक्चर्स फिल्म के निर्माता हैं। आरजे बालाजी इसके निर्देशक हैं। सूर्या और तृषा ने प्रमुख भूमिकाएं निभाई हैं। अदालत ने गौर किया कि फिल्म की कहानी सेवन वेल्स नामक स्थान पर स्थित एक अदालत में घटित होती है। अदालत के पीठासीन अधिकारी को भ्रष्ट दिखाया गया है और एक अनैतिक वकील अदालत के कामकाज पर अत्यधिक नियंत्रण रखता है।
पीठ ने हालांकि माना कि इस तरह के चित्रण को फिल्म पर प्रतिबंध लगाने का आधार नहीं बनाया जा सकता। सुनवाई के दौरान अदालत ने कहा कि एक अनैतिक वकील और एक भ्रष्ट जज के बीच “अनैतिक गठबंधन” फिल्म का विषय है। आदेश लिखने वाले जस्टिस स्वामीनाथन ने यह भी दर्ज किया कि उन्होंने फिल्म देखी है।
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पीठ ने आगे कहा कि एक कलाकार को अपनी कहानी को अपने तरीके से प्रस्तुत करने का अधिकार है और कलात्मक स्वतंत्रता को उच्च स्थान दिया जाना चाहिए। अदालत ने आगे टिप्पणी की कि एक बार जब केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड ने फिल्म को मंजूरी दे दी है तो अदालत जनहित याचिका में अपनी राय नहीं देगी और प्रतिबंध लगाने का निर्देश नहीं देगी।
इस मामले में याचिकाकर्ता की तरफ से अधिवक्ता एम सेंथिलकुमार ने पक्ष रखा। वहीं, राज्य सरकार की तरफ से एम मुरली उपस्थित हुए। केंद्र सरकार और सीबीएफसी की तरफ से वरिष्ठ अधिवक्ता के श्रीनिवासमूर्ति उपस्थित हुए।

