नई दिल्ली: भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू की आज (27 मई) को पुण्यतिथि है। भारतीय राजनीति और समाज पर उनका गहरा प्रभाव रहा है। उनकी नीतियों खासकर विदेश नीति आज भी भारतीय विदेश नीति का हिस्सा है। नेहरू भारत के पहले विदेश मंत्री थे। उन्होंने भारतीय विदेश नीति में गुटनिरपेक्षता को बढ़ावा दिया और वैश्विक स्तर पर भी इसकी वकालत की।
आज के मल्टीपोलर या बहुध्रुवीय व्यवस्था में राजनीति तेजी से बदल रही है जिसका असर अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भी पड़ रहा है। वैश्विक राजनीति इन दिनों अस्थिरता और संक्रमण काल के दौर से गुजर रही है। ऐसे में नेहरू और उनकी गुटनिरपेक्षता की नीति आज भी प्रासंगिक है। इस बारे में वैश्विक राजनीति पर नजर रखने वाले शोधार्थियों का क्या सोचना है? बोले भारत ने यह जानने का प्रयास किया।
बहुध्रुवीयता (Multipolarity) शब्द से तात्पर्य संरचनात्मक यथार्थवादी और भू-राजनीतिक सिद्धांतों से है। यह एक अकादमिक शब्द है जो अंतर्राष्ट्रीय राजनीति में बहुत महत्वपूर्ण है। इसे हालांकि किसी एक व्यक्ति ने लोकप्रिय नहीं बनाया, बल्कि अंतर्राष्ट्रीय संबंध (International Relations) के विद्वानों जैसे मॉर्टन कपलान ने विकसित किया और बाद में येवगेनी प्रिमाकोव जैसे राजनीतिक हस्तियों ने कई प्रमुख शक्तियों वाली दुनिया का वर्णन करने के लिए इसका समर्थन किया।
NAM का गठन द्वितीय विश्व युद्ध के बाद हुआ
द्वितीय विश्व युद्ध के बाद शीत युद्ध के दौरान गुटनिरपेक्ष आंदोलन (Non Alignment Movement) का गठन उन देशों के संगठन के रूप में हुआ था जिन्होंने औपचारिक रूप से न तो संयुक्त राज्य अमेरिका (USA) और न ही सोवियत संघ (USSR) के साथ गठबंधन करने की कोशिश की। इन देशों ने स्वतंत्र या तटस्थ रहने की मांग की।
इसकी मूल अवधारणा 1955 में इंडोनेशिया में आयोजित एशिया-अफ्रीका बांडुंग सम्मेलन में हुई चर्चाओं के दौरान उत्पन्न हुई थी। गुटनिरपेक्ष आंदोलन यानी NAM शिखर सम्मेलन सितंबर 1961 में युगोस्लाविया के बेलग्रेड में आयोजित हुआ था।
अप्रैल 2018 तक इसके 120 सदस्य देश थे। इनमें अफ्रीका के 53 देश, एशिया के 39 देश, लैटिन अमेरिका और कैरेबियन के 26 देश और यूरोप के 2 देश (बेलारूस, अजरबैजान) शामिल थे। NAM में 17 देश और 10 अंतर्राष्ट्रीय संगठन पर्यवेक्षक (Observer) हैं।
नॉन अलाइनमेंट मूवमेंट (NAM) की वेबसाइट के मुताबिक, मौजूदा समय में इसके 120 सदस्य देश हैं। इसके साथ ही 18 देश और 10 संगठन पर्यवेक्षक हैं। इसकी 19वीं मंत्रिस्तरीय बैठक 13 से 16 अक्टूबर 2025 को आयोजित की गई थी। यह बैठक युगांडा के कंपाला में आयोजित की गई थी।
गुटनिरपेक्ष आंदोलन की स्थापना 1961 में युगोस्लाविया के जोसिप ब्रोज टीटो, मिस्र के गमाल अब्देल नासिर, भारत के जवाहरलाल नेहरू, घाना के क्वामे न्क्रुमा और इंडोनेशिया के सुकर्णो के नेतृत्व में हुई थी और उसी वर्ष इसका पहला सम्मेलन (बेलग्रेड सम्मेलन) आयोजित किया गया।

नेहरू की गुटनिरपेक्षता को लेकर एक्सपर्ट्स ने क्या बताया?
अर्पण बाखला सेंट्रल यूनिवर्सिटी झारखंड (CUJ) से राजनीति शास्त्र में पीएचडी कर रहे हैं और अंतर्राष्ट्रीय विषय में उनकी गहरी रुचि है। उन्होंने बताया कि 21वीं सदी की बहुध्रुवीयता को ही गुटनिरपेक्ष आंदोलन का अपग्रेडेड वर्जन मानते हैं। उन्होंने बताया कि आज ग्लोबल साउथ और ग्लोबल नॉर्थ की बहस तेज है। जैसे 20वीं सदी में गुटनिरपेक्ष आंदोलन ने गुटों की राजनीति से अलग राह बनाने का प्रयास किया। वैसे ही 21वीं सदी में भी ब्रिक्स (BRICS) जैसे तमाम संगठन हैं जो अलग-अलग नीतियों को मानते हैं और अपने राष्ट्रीय हितों के अनुरूप काम करते हैं।
नेहरू की गुटनिरपेक्षता की नीति को लेकर उनका मानना है कि यही भारतीय विदेश नीति की नींव है। यही वह नीति है जिसके आधार पर मौजूदा विदेश मंत्री एस जयशंकर आज मल्टीपोलेरिटी (बहुध्रुवीयता) की बात करते हैं। अर्पण का मानना है कि भारत की विदेश नीति में स्वतंत्रता से लेकर अभी तक निरंतरता देखने को मिलती है। भारत ने गुटनिरपेक्षता की जो नीति तभी अपनाई थी और किसी भी गुट का समर्थन न करने की वकालत की थी। उनका मानना है कि 20वीं सदी में जो भूमिका NAM की थी, वही अब 21वीं सदी में बहुध्रुवीयता निभा रहा है। वह जापान और दक्षिण कोरिया का उदाहरण देते हैं जिन्होंने अमेरिकी गुट का समर्थन किया था और आज भी वे उसी गुट के अनुरूप काम कर रहे हैं। जबकि भारत ने गुटनिरपेक्षता की नीति अपनाई थी और आज भी उसी नीति पर कायम है।
अभिनव बाजपेई इंदिरा गांधी नेशनल ट्राइबल यूनिवर्सिटी (IGNTU) से राजनीति शास्त्र में शोध कर रहे हैं। वह गुटनिरपेक्ष आंदोलन की भूमिका को बेहद अहम मानते हैं। हालांकि, उनका यह भी मानना है कि मौजूदा परिस्थितियों में इसकी भूमिका बेहद सीमित है।
अभिनव के मुताबिक, ” नवस्वतंत्र राष्ट्र (भारत) के द्वारा एक साहसिक कदम के रूप में NAM को हमेशा याद रखा जाएगा। वर्तमान परिस्थितियों में NAM की प्रासंगिकता कुछ विशेष तो नहीं परन्तु बारूद के ढेर पर खड़े विश्व के सामने अग्निनाशक यंत्र के समान मध्यस्थता करने की सॉफ्ट पॉवर के रूप में तो परिलक्षित होती प्रतीत होती है। “
अर्पण कहते हैं कि भारत का झुकाव आज भले ही कई मौकों पर अमेरिका की तरफ अधिक झुका हुआ प्रतीत हो सकता है लेकिन भारत एक संप्रभु राष्ट्र है और वह अपने फैसले लेने में सक्षम है और किसी भी बाहरी दबाव में आए बगैर अपने राष्ट्रीय हितों के मुताबिक निर्णय लेने की शक्ति रखता है। उनका मानना है कि विदेश नीति में एकरूपता बनी हुई है और कहीं न कहीं भारतीय विदेश नीति में नेहरू की नीतियों का असर आज भी देखने को मिलता है। वह यह मानते हैं कि भले ही NAM का स्वरूप पहले जैसा नहीं है और इसकी कोई मीटिंग या कॉन्फ्रेंस की चर्चा नहीं होती है लेकिन उनका कहना है कि इसे सिर्फ यहीं तक नहीं देखना चाहिए। बल्कि आज के दौर में यह BRICS, और अन्य समूहों के रूप में देखा जा सकता है जो अपनी नीतियों और हितों को ध्यान में रखकर फैसले लेते हैं और किसी बाहरी शक्ति पर निर्भरता नहीं होती है।
उनका मानना है कि भारत ने 1991 के बाद से बहुध्रुवीय व्यवस्था अपनाई जो कि जरूरत थी। उन्होंने कहा कि 20 सदी में NAM की जो भूमिका थी वही 21वीं सदी में बहुध्रुवीयता निभा रहा है, हो सकता है आने वाले वर्षों में यह किसी और नए रूप में सामने आए लेकिन इसकी नींव कहीं न कहीं NAM से ही जुड़ी होंगी।
अभिनव कहते हैं वर्तमान वैश्विक राजनीतिक व्यवस्था अधिक यथार्थवादी (Realist) व्यवस्था हो गई है जिसमें सिद्धांतविहीनता का अतिरेक है। वर्तमान विश्व में एक मात्र सिद्धांत है राष्ट्रहित जिसका ज्वलंत उदाहरण ईरान युद्ध है जिसमें ईरान के खिलाफ इस्लामिक राष्ट्र सऊदी, लेबनान अग्रपंक्ति में अपने हितों को सर्वोपरि रखते हुए खड़े थे।
उन्होंने कहा “पूर्व में शीतयुद्ध एवं वर्तमान युद्ध में एक समानता स्पष्ट रूप से देखी जा सकती है वह है अमेरिकी प्रधानता (Hegemony)। आपने 1962में इतिहास की किताबों में वियतनाम युद्ध सुना होगा, वर्तमान में भी आप ईरान युद्ध सुन रहे है आपको नीर-क्षीर विवेक का प्रयोग करके सोचना चाहिए़ कि इन दोनों युद्ध को शुरू किसने किया तो इसका नामकरण अमेरिकी युद्ध (WAR) क्यों नहीं पड़ा। आज तक अमेरिकी युद्ध विश्वइतिहास की पुस्तकों में नहीं सुना गया अगर सुना गया तो वह गौरवपूर्ण AMERICAN WAR OF INDEPENDENCE।”

