नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने 5 मई को ठोस कचरा प्रबंधन (Solid Waste Management) नियमों की एक सूची जारी की। अदालत के आदेश ने भारत के अपशिष्ट प्रबंधन में निर्णायक बदलाव ला दिया है। सुप्रीम कोर्ट के आदेश के मुताबिक, कचरा प्रबंधन की जिम्मेदारी अब सिर्फ नगरपालिकाओं के पास नहीं होगी बल्कि हर जिले के जिलाधिकारी (डीएम) भी इसकी निगरानी रखेंगे और उन्हें इसकी रिपोर्ट देनी होगी। इन नियमों की निगरानी हेतु अदालत ने एक कमेटी का भी गठन किया है। इस कमेटी में केंद्र सरकार के पांच मंत्रालयों के सचिव होंगे। इसके साथ ही केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) के सदस्य भी शामिल होंगे। यह समिति देशभर में नियमों के पालन की निगरानी करेगी और निर्देश देगी। समिति राज्यों द्वारा उठाए जा रहे कदमों और रिपोर्ट की भी समीक्षा करेगी।
अदालत के हालिया आदेश के मुताबिक, ठोस कचरा प्रबंधन के निपटारे के लिए चार स्तर की पृथक्करण व्यवस्था अपनाई जाएगी। कचरे को चार कैटेगरी अलग कर उनका निपटारा किया जाएगा। इसमें गीला कचरा, सूखा कचरा, सेनेटरी कचरा और विशेष कचरा (ई-कचरा) आदि शामिल हैं।
सुप्रीम कोर्ट का हालिया आदेश क्यों है अहम?
भारत में कचरा प्रबंधन (वेस्ट मैनेजमेंट) क्षेत्र अक्सर विसंगति से जूझता नजर आया है। कागजों में भले ही इसके निपटारे के लिए मजबूत नियम हैं। हालांकि, जमीनी स्तर पर इनके क्रियान्वयन को लेकर हीलाहवाली की स्थिति देखने को मिलती है जिससे लोगों को परेशानी होती है। सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट रूल्स, 2016 बेहद प्रगतिशील माने जाते हैं लेकिन संस्थागत जवाबदेही न होना, निगरानी रखने वाली कमजोर प्रणालियों और अपर्याप्त बुनियादी ढांचे के चलते लक्ष्य पूरा करने में चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है।
ऐसे में अदालत का नया आदेश इस प्रणाली में अभूतपूर्व बदलाव ला सकता है। सुप्रीम कोर्ट का 5 मई 2026 का आदेश हाल के वर्षों में भारत की पर्यावरण शासन संरचना में संभवतः सबसे सशक्त न्यायिक हस्तक्षेपों में से एक है। इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि अदालत ने पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, 1986 के तहत उपलब्ध शक्तियों का प्रयोग करते हुए पर्यावरण विनियमन और प्रशासनिक क्रियान्वयन के बीच लंबे समय से चली आ रही खाई को पाटने का प्रयास किया है।
इस परिवर्तन के केंद्र में इस अधिनियम की धारा 5 के तहत शक्तियों का बंटवारा है जो निर्देश जारी करने की शक्ति प्रदान करती है। इसे धारा 23 के साथ जोड़ें तो यह देश भर के जिला कलेक्टरों को शक्तियों के हस्तांतरण करने की अनुमति देती है।

मौजूदा समय में अपशिष्ट प्रबंधन नियमों का कार्यान्वयन नगरपालिका संरचनाओं तक ही सीमित रहा है। यह अक्सर संसाधनों की कमी, कर्मचारियों की कमी और संस्थागत रूप से कमजोर होती हैं। पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय को एक वर्ष के लिए जिला मजिस्ट्रेटों और जिला कलेक्टरों को शक्तियां हस्तांतरित करने का निर्देश देकर सुप्रीम कोर्ट ने प्रभावी रूप से कचरा प्रबंधन को नगरपालिका स्वच्छता कार्य से जिला स्तरीय शासन प्राथमिकता में बदल दिया है। ऐसे में जिला अधिकारियों को इस सिलसिले में विशेष अधिकार दिए गए हैं।
जिलाधिकारियों को दिए गए विशेष अधिकार
जिला कलेक्टरों (डीसी) को न केवल कार्यान्वयन की समीक्षा करने का अधिकार दिया गया है बल्कि ठोस अपशिष्ट प्रबंधन नियम, 2026 (सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट रूल्स, 2026) के अनुपालन की निगरानी, प्रशासन और प्रवर्तन का अधिकार भी दिया गया है। सुप्रीम कोर्ट ने प्रत्येक जिला कलेक्टर को ठोस अपशिष्ट प्रबंधन के लिए एक विशेष प्रकोष्ठ गठित करने का निर्देश दिया है। इन में प्रदूषण नियंत्रण बोर्डों के क्षेत्रीय अधिकारी शामिल होंगे। इनके पास निरीक्षण करने, डंपिंग स्थलों की निगरानी करने और यहां तक कि नियमों का पालन न करने वाले बड़े पैमाने पर अपशिष्ट उत्पादकों के पानी और बिजली कनेक्शन काटने के निर्देश जारी करने का अधिकार होगा।
यह पहली बार है जब भारत के अपशिष्ट प्रबंधन ढांचे को जिला स्तर पर इस तरह के प्रत्यक्ष रूप से संचालन करने का अधिकार प्राप्त हुआ है। सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट रूल्स, 2026 अपने आप में पिछले नियामक दृष्टिकोण से एक महत्वपूर्ण बदलाव को दर्शाते हैं। ये नियम स्रोत पर चार-स्तरीय पृथक्करण को लागू करते हैं। यह विकेंद्रीकृत अपशिष्ट प्रबंधन दायित्वों को सुदृढ़ करते हैं, केंद्रीकृत ऑनलाइन पोर्टलों के माध्यम से डिजिटल निगरानी को अनिवार्य बनाते हैं और थोक अपशिष्ट उत्पादकों (Bulk Waste Generators) के लिए अनुपालन ढांचे का व्यापक विस्तार करते हैं।
20,000 वर्ग मीटर से अधिक निर्मित क्षेत्र 40,000 लीटर प्रति दिन से अधिक जल खपत या 100 किलोग्राम प्रति दिन से अधिक अपशिष्ट उत्पादन करने वाली संस्थाएं अब थोक अपशिष्ट उत्पादक श्रेणी (बल्क वेस्ट जेनरेटर कैटेगरी) के अंतर्गत आती हैं। ठोस अपशिष्ट उत्पादकों (सॉलिड वेस्ट जेनरेटर्स) पर ध्यान केंद्रित करना “पूर्ण और सर्वोपरि” होना चाहिए इस पर बार-बार जोर दिया गया है।
भारत के कई शहरों में बड़े आवासीय परिसर, संस्थान, मॉल, होटल, परिवहन केंद्र और व्यावसायिक प्रतिष्ठान शहरी भूमि का एक बड़ा हिस्सा घेरते हैं। और भारी मात्रा में कचरा उत्पन्न करते हैं। ये प्रतिष्ठान कचरा प्रबंधन की लागत को शहरी स्थानीय निकायों पर डालते रहते हैं। सुप्रीम कोर्ट के निर्देश अब शहरों को “प्रदूषक उत्तरदायित्व” (पॉल्यूटर रिस्पांसबिलिटी) ढांचे की ओर धकेल रहे हैं जहां कचरा उत्पन्न करने वाले अब निष्क्रिय योगदानकर्ता नहीं बल्कि पृथक्करण, प्रसंस्करण और वैज्ञानिक निपटान के लिए जवाबदेह सक्रिय इकाइयां हैं।
अदालत ने सरकार के हर स्तर को सौंपी जिम्मेदारियां
सुप्रीम कोर्ट ने नए नियमों के तहत सरकार के हर स्तर को जिम्मेदारियां सौंपी हैं। राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के मुख्य सचिवों को फॉर्म-IV रिपोर्टिंग प्रारूपों के वितरण से लेकर पर्यटन-केंद्रित कूड़े के हॉटस्पॉट की पहचान, प्लास्टिक वेस्ट मैनेजमेंट नियमों के कार्यान्वयन की सूची तैयार करने, पुराने कचरे के निपटान की समीक्षा करने और थोक अपशिष्ट उत्पादक पंजीकरण की निगरानी करने तक की जिम्मेदारियां सौंपी गई हैं।
केंद्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय, केंद्रीय आवास और शहरी मामलों के मंत्रालय, केंद्रीय पंचायती राज मंत्रालय, केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्रालय और पेयजल एवं स्वच्छता विभाग के सचिवों को विशिष्ट रिपोर्टिंग और निगरानी दायित्व सौंपे गए हैं। महत्वपूर्ण बात यह है कि सुप्रीम कोर्ट ने मंत्रालयों को राज्यों से प्राप्त रिपोर्टों को केवल आगे बढ़ाने के खिलाफ चेतावनी दी है। इसके बजाय उसने उन्हें जांच-पड़ताल करने प्रमाणित करने और मूल्यांकन की गई अनुपालन रिपोर्टों को सुप्रीम कोर्ट के समक्ष प्रस्तुत करने का निर्देश दिया है।
इस आदेश में यह भी स्वीकार किया गया है कि केवल सही संचालन से वेस्ट मैनेजमेंट को सफल नहीं बनाया जा सकता। इसमें फाइनेंस, मानव संसाधन (एचआर) और संस्थागत क्षमता जैसी प्रणालीगत बाधाओं को भी संबोधित किया गया है।
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सुप्रीम कोर्ट ने राज्यों को शहरी और ग्रामीण स्थानीय निकायों में मानव संसाधन की कमी की समीक्षा करने और जहां आवश्यक हो वहां स्वच्छता और अपशिष्ट प्रबंधन कैडर बनाने का निर्देश दिया है। इसने स्वच्छ भारत मिशन-शहरी, स्वच्छ भारत मिशन-ग्रामीण, वित्त आयोग अनुदान, कॉरपोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व सहायता, सार्वजनिक-निजी भागीदारी परियोजनाओं और शहरी चुनौती निधि तंत्र के माध्यम से वित्तपोषण के समन्वय को भी प्रोत्साहित किया है।
महत्वपूर्ण रूप से अदालत ने सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट प्रदर्शन को शासन के प्रोत्साहन और हतोत्साहन से भी जोड़ा है। राज्यों को निर्देश दिया गया है कि वे अच्छा प्रदर्शन करने वाले स्थानीय निकायों को अनुदान में प्राथमिकता दें वहीं गड़बड़ी करने वालों पर जुर्माना लगाने की भी बात कही है।
भारत में रोजाना करीब 1.6-1.7 मीट्रिक टन सॉलिड कचरा उत्पन्न होता है। वहीं सालाना यह उत्पादन करीब 6.2 करोड़ टन होता है। कचरे के निस्तारण के लिए भारत के राज्यों में 2,400 के करीब बड़ी कचरे की डंपसाइट्स हैं। सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट की 2020 की एक रिसर्च के मुताबिक, भारत में सालाना 53 मिलियन टन कूड़ा उत्पादित होता है। ऐसे में इसके निस्तारण के कडे़ उपाय अपनाने चाहिए।
अदालत ने अपने आदेश में यह भी कहा कि यह धरती और देश हम सभी का है। हमें विश्वास है कि प्रतिबद्ध सिविल सेवकों, अधिकारियों, जन प्रतिनिधियों और कार्यकर्ताओं का एक समूह, जिन्हें एसडब्ल्यूएम नियम, 2026 को लागू करने की शक्ति सौंपी गई है। वे इस ग्रह और इस राष्ट्र को मानव निर्मित विनाश से बचाने का प्रकाश फैला सकता है।

