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सुपर अल नीनो हो रहा एक्टिव! भारत में कौन-कौन से इलाके सबसे ज्यादा खतरे में? सर्दियों तक दिखेगा असर

भारत इस साल के मॉनसून के मौसम में प्रवेश करने जा रहा है। इस बार मॉनसून के समय से पहले पहुंचने की संभावना है। हालांकि, इस अच्छी खबर के बावजूद मौसमीय बदलाव से जुड़ी कुछ अन्य अपडेट ने चिंता की लकीरें भी पैदा कर दी हैं। भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (IMD) पहले ही बता चुका है कि इस बार दक्षिण-पश्चिम मॉनसून के सामान्य से कम या अपर्याप्त रहने की संभावना है। इसका संभावित कारण प्रशांत महासागर में इस समय बन रहा एक अल नीनो है। आशंका है कि यह अल नीनो बेहद प्रभावी होगा और ‘सुपर अल नीनो’ का रूप ले सकता है।

दूसरी ओर अमेरिकी मौसम एजेंसी ‘नेशनल ओशेनिक एंड एटमॉस्फेरिक एडमिनिस्ट्रेशन’ (नोआ) के अनुसार अल नीनो मई-जुलाई के दौरान ही दस्तक दे सकता है। पिछले महीने जारी एक अनुमान में अल नीनो के बनने की संभावना 61% थी, जो अब बढ़कर 82% हो गई है। यही नहीं, इसके सर्दियों तक प्रभावी बने रहने की आशंका है, जिससे मुश्किलें और बढ़ेंगी।

अल नीनो क्या होता है?

आमतौर पर भूमध्य रेखा के आसपास चलने वाली Trade Winds पूरब से पश्चिम की ओर बहती हैं। ये हवाएं दक्षिण अमेरिका के पास मौजूद गर्म सतही समुद्री पानी को धकेलकर इंडोनेशिया और ऑस्ट्रेलिया की दिशा में ले जाती हैं। इस वजह से पश्चिमी प्रशांत क्षेत्र के ऊपर गर्म और नमी से भरे बादल बनते हैं, जबकि दक्षिण अमेरिका के तट के पास अपेक्षाकृत ठंडा पानी ऊपर आता रहता है। यही संतुलन वैश्विक मौसम प्रणाली का एक अहम हिस्सा है।

हालांकि, जब प्रशांत महासागर का पानी सामान्य से ज्यादा गर्म होने लगता है तो अल नीनो की स्थिति बनती है। दरअसल, ऐसे समय में ट्रेड विंड्स कमजोर पड़ जाती हैं या कई बार दिशा और गति में असामान्य बदलाव आता है। जब ऐसा होता है, तो गर्म पानी पश्चिम की ओर नहीं धकेला जा पाता और प्रशांत महासागर के मध्य तथा पूर्वी हिस्से में जमा होने लगता है। इस दौरान वहां समुद्र का सतही तापमान और अधिक बढ़ जाता है। समुद्र की इस अतिरिक्त गर्मी से वायुमंडल की संरचना बदलती है, बादलों और वर्षा के पैटर्न शिफ्ट होते जाते हैं, और पूरी दुनिया के मौसम तंत्र पर इसका असर पड़ता है।

दूसरे शब्दों में कहें तो अल नीनो पृथ्वी के ‘हीट और नमी के बंटवारे’ को बिगाड़ देता है। जहां सामान्य तौर पर बारिश होनी चाहिए, वहां कम हो सकती है; और जहां कम होती है, वहां ज्यादा हो सकती है।

भारत के लिए समस्या यह है कि अल नीनो अक्सर उस वायुमंडलीय सिस्टम को कमजोर कर देता है जो भारत में मॉनसून को ताकत देता है। एक तरह से यह भारत की तरफ आने वाली मॉनसूनी हवाओं को प्रभावित करता है। यही कारण है कि अल नीनो को भारत के मौसम वैज्ञानिक हमेशा गंभीरता से देखते हैं। हमेशा अल नीनो भारत में सूखा नहीं लाता, लेकिन इतिहास बताता है कि देश के कई बड़े सूखे वर्ष इसी जलवायु घटना से जुड़े रहे हैं।

अल नीनो: भारत के कौन-कौन से इलाके सबसे ज्यादा खतरे में?

आईएमडी भारत की अग्रणी निजी मौसम पूर्वानुमान कंपनी स्काईमेट, दोनों का अनुमान है कि मानसून का पहला आधा हिस्सा विशेषकर जून का महीना, अपेक्षाकृत स्थिर रहेगा। लेकिन समस्याएँ अगस्त और सितंबर में शुरू होंगी जब अल नीनो का पूरा प्रभाव महसूस होने लगेगा और वर्षा कम हो जाएगी।

अनुमान है कि भारत के उत्तरी, पश्चिमी और मध्य क्षेत्रों में सूखे की स्थिति का सबसे अधिक खतरा रहेगा। संभवतः लंबे समय तक सूखा पड़ सकता है और कृषि को नुकसान हो सकता है।

अगस्त और सितंबर के महीनों में पंजाब, हरियाणा और राजस्थान के विशेष रूप से प्रभावित होने की आशंका है। जबकि मध्य और पश्चिमी भारत के प्रमुख मॉनसूनी क्षेत्रों में अपर्याप्त वर्षा होने की आशंका है। मध्य प्रदेश में इंदौर, उज्जैन, ग्वालियर, चंबल, जबलपुर, रीवा, शाहडोल, सागर और नर्मदापुरम सहित कई क्षेत्रों में सामान्य से कम वर्षा होने की संभावना है।

केवल लद्दाख, राजस्थान के कुछ हिस्से, पूर्वोत्तर और तेलंगाना सहित उत्तरी दक्षिणी प्रायद्वीप के क्षेत्रों के ही वर्षा की गंभीर कमी से बचने की उम्मीद है।

कई क्षेत्रों में बारिश न होने या कम होने की आशंका है, जबकि चेन्नई जैसे स्थानों पर भारी बारिश हो सकती है जिससे व्यापक बाढ़ और तबाही मच सकती है।

जैसे-जैसे मौसम पूर्वानुमान आ रहे हैं और तीव्र अल नीनो के आने की संभावना बढ़ रही है, स्थानीय अधिकारी सतर्क हो रहे हैं और तैयारी में जुटे हैं। इसका मुख्य कारण यह है कि पिछली गलतियों को न दोहराया जाए और गंभीर परिणामों का सामना न करना पड़े।

भारत में अल नीनो का पहले कैसा रहा है असर?

साल 2015-16 में आए पिछले सुपर अल नीनो के दौरान वास्तविक मानसून वर्षा लॉन्ग पीरियड एवरेज (LPA) का 86% थी, जिससे पूरे देश में व्यापक सूखे जैसी स्थिति उत्पन्न हो गई थी। उस वर्ष अकेले महाराष्ट्र के मराठवाड़ा क्षेत्र में 40 प्रतिशत बारिश की कमी दर्ज की गई, जिससे फसलें बर्बाद हो गईं और किसानों की परेशानी बढ़ी।

इस बीच, चेन्नई में अत्यधिक बारिश हुई और ये कई दिनों तक जलमग्न रहा, जिससे भारी तबाही और जानमाल का नुकसान हुआ।

ऐसे ही 2023 के अल नीनो वाले साल में, भारत में अकेले अगस्त माह में 36% वर्षा की कमी दर्ज की गई। सबसे अधिक प्रभावित जिलों में महाराष्ट्र के सतारा, नासिक और रायगढ़, मध्य प्रदेश का पश्चिम निमार, ओडिशा का बालांगीर और छत्तीसगढ़ का कोरबा शामिल थे।

भारत में हमेशा से प्रमुख सूखाग्रस्त क्षेत्रों में दक्षिण-पूर्वी महाराष्ट्र, उत्तरी कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, ओडिशा, गुजरात और राजस्थान शामिल हैं। यहां भारत की लगभग दो-तिहाई कृषि भूमि पूरी तरह से वर्षा पर ही निर्भर है। इसलिए, जब वर्षा लगभग न के बराबर हो, तो तबाही की आशंका बढ़ जाती है। इसके अलावा दिल्ली-एनसीआर जैसे क्षेत्रों को भारी गर्मी झेलनी पड़ेगी।

यह भी पढ़ें- सदी के सबसे ताकतवर ‘सुपर अल नीनो’ की आहट! भारत पर खतरा; क्या है 1877 की वो कहानी जब मारे गए थे करोड़ो लोग

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विनीत कुमार
पूर्व में IANS, आज तक, न्यूज नेशन और लोकमत मीडिया जैसी मीडिया संस्थानों लिए काम कर चुके हैं। सेंट जेवियर्स कॉलेज, रांची से मास कम्यूनिकेशन एंड वीडियो प्रोडक्शन की डिग्री। मीडिया प्रबंधन का डिप्लोमा कोर्स। जिंदगी का साथ निभाते चले जाने और हर फिक्र को धुएं में उड़ाने वाली फिलॉसफी में गहरा भरोसा...
विनीत कुमार
पूर्व में IANS, आज तक, न्यूज नेशन और लोकमत मीडिया जैसी मीडिया संस्थानों लिए काम कर चुके हैं। सेंट जेवियर्स कॉलेज, रांची से मास कम्यूनिकेशन एंड वीडियो प्रोडक्शन की डिग्री। मीडिया प्रबंधन का डिप्लोमा कोर्स। जिंदगी का साथ निभाते चले जाने और हर फिक्र को धुएं में उड़ाने वाली फिलॉसफी में गहरा भरोसा...
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