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केरल जीत के बाद भी कांग्रेस में संकट! क्यों हर चुनाव के बाद खुल जाती है पार्टी की अंदरूनी लड़ाई?

आज हालत यह है कि कांग्रेस चुनाव हारती है तो नेतृत्व पर सवाल उठते हैं और जीतती है तब भी मुख्यमंत्री चयन से लेकर गुटबाजी तक की लड़ाई खुलकर सामने आ जाती है। हाल का उदाहरण भले ही केरल का है लेकिन कांग्रेस में ऐसा घटनाक्रम कई बार हम देख चुके हैं।

देश की राजनीति में एक समय ऐसा था जब हर तरफ कांग्रेस ही कांग्रेस थी। राज्यों से लेकर केंद्र तक पार्टी की मजबूत मौजूदगी थी। समय के साथ हालात बदले हैं, और कांग्रेस की मुश्किलें भी। चुनाव हारना-जीतना एक बात है लेकिन अपने सबसे चुनौतीपूर्ण दौर में भी पार्टी में ऊपरी तौर पर एका नजर न आए और हार तो छोड़िए, जीत भी ‘सिरदर्द’ बन जाए तो ये मानकर चला जाना चाहिए कि स्थिति गंभीर है। आज हालत यह है कि कांग्रेस चुनाव हारती है तो नेतृत्व पर सवाल उठते हैं और जीतती है तब भी मुख्यमंत्री चयन से लेकर गुटबाजी तक की लड़ाई खुलकर सामने आ जाती है। हाल का उदाहरण केरल का है।

कांग्रेस नेतृत्व वाले यूडीएफ गठबंधन की चुनावी सफलता के बाद भी मुख्यमंत्री के नाम पर देरी हो रही है। 4 मई को नतीजे आए थे और अब तक राज्य में नए मुख्यमंत्री को लेकर कोई नाम तय नहीं हो सका है। केरल में सीएम पद के लिए मुख्य रूप से अभी तीन प्रमुख दावेदारों के नाम सामने आ रहे हैं। इसमें केसी वेणुगोपाल के साथ-साथ निवर्तमान विधानसभा में विपक्ष के नेता वीडी सतीशन और वरिष्ठ नेता रमेश चेन्निथला भी चर्चा में बने हुए हैं। खींचतान जारी है।

ऐसे में फिर यह सवाल खड़ा हो गया है कि आखिर कांग्रेस में निर्णय लेने की क्षमता इतनी कमजोर क्यों दिखाई देती है। ये दिखाता है कि पार्टी का संकट सिर्फ चुनावी हार-जीत तक सीमित नहीं, बल्कि संगठनात्मक और नेतृत्व संबंधी भी है।

कांग्रेस में नेतृत्व की लड़ाई

कांग्रेस की मौजूदा राजनीति में सबसे बड़ा संकट यह है कि पार्टी में चुनाव जीतने के बाद ‘कौन मुख्यमंत्री बनेगा’, यही सवाल संगठन से बड़ा हो जाता है। भाजपा की तरह कांग्रेस के पास ऐसा केंद्रीकृत और अनुशासित ढांचा नहीं दिखता जिसमें अंतिम निर्णय को सभी नेता सहज रूप से स्वीकार कर लें।

दरअसल कांग्रेस में लंबे समय से क्षेत्रीय क्षत्रपों की राजनीति हावी रही है। राज्य स्तर के छोटे नेता भी अपने-अपने समर्थक विधायकों का समूह बनाकर चलते हैं। चुनाव जीतने के बाद यही समूह सत्ता में हिस्सेदारी की लड़ाई शुरू कर देते हैं। चूंकि पार्टी का केंद्रीय नेतृत्व पहले जैसा प्रभावशाली अब नहीं दिखता, इसलिए भी विवाद लंबा खिंचता है।

इसके कई उदाहरण हाल के सालों में नजर आए हैं। मसलन, राजस्थान में 2018 में कांग्रेस ने सत्ता हासिल की, लेकिन मुख्यमंत्री पद को लेकर अशोक गहलोत और सचिन पायलट के बीच संघर्ष खुलकर सामने आया। गहलोत अनुभवी नेता थे जबकि पायलट युवा चेहरे के रूप में खुद को स्वाभाविक दावेदार मान रहे थे। पायलट को तब चुनावी जीत का बड़ा श्रेय भी दिया जा रहा था।

हालांकि, कुर्सी सौंपने के समय कांग्रेस नेतृत्व ने समझौते के तौर पर गहलोत को मुख्यमंत्री और पायलट को उपमुख्यमंत्री बनाया, लेकिन यह व्यवस्था ज्यादा समय नहीं चल सकी। 2020 में सचिन पायलट खुली बगावत पर उतर आए। ऐसा लगने लगा था कि कांग्रेस सरकार गिरने के कगार पर है। बाद के वर्षों में भी दोनों गुटों के बीच बयानबाजी जारी रही। यह सिर्फ व्यक्तिगत संघर्ष नहीं था, बल्कि कांग्रेस संगठन की कमजोर पकड़ का भी संकेत था।

मध्य प्रदेश: सिंधिया प्रकरण ने जब गिरा दी सरकार

मध्य प्रदेश में 2018 में कांग्रेस ने 15 साल बाद भाजपा को सत्ता से बाहर किया। मुख्यमंत्री पद को लेकर यहां भी कमलनाथ और ज्योतिरादित्य सिंधिया के बीच असंतोष बना रहा। सिंधिया बड़े दावेदार बनकर उभरे थे, जबकि पार्टी हाई कमान ने कमलनाथ पर भरोसा जताया। आखिरकार यह असंतोष इतना बढ़ा कि 2020 में सिंधिया समर्थक विधायकों ने इस्तीफा दे दिया और कांग्रेस सरकार गिर गई। यह सिर्फ सरकार गिरने की कहानी नहीं थी, बल्कि यह भी दिखाता है कि कांग्रेस कई बार अपने महत्वाकांक्षी और उभरते नेताओं को साथ रखने में विफल हो रही है।

छत्तीसगढ़: ढाई-ढाई साल का फार्मूला

छत्तीसगढ़ में भी 2018 की भारी जीत के बाद भी कांग्रेस के भीतर संघर्ष कम नहीं हुआ। मुख्यमंत्री पद के लिए भूपेश बघेल और टीएस सिंहदेव दोनों दावेदार थे। बाद में यह चर्चा भी चली कि ढाई-ढाई साल का सत्ता बंटवारा तय हुआ था, हालांकि इसे कभी आधिकारिक रूप से स्वीकार नहीं किया गया।

समय बीतने के साथ सिंहदेव खेमे की नाराजगी सामने आने लगी। हालांकि राजस्थान या मध्य प्रदेश जैसी स्थिति नहीं बनी, लेकिन यह साफ था कि कांग्रेस में नेतृत्व को लेकर स्थिरता नहीं है।

हिमाचल और कर्नाटक में भी दिखी वही तस्वीर

हिमाचल प्रदेश में 2022 की जीत के बाद प्रतिभा सिंह और सुखविंदर सिंह सुक्खू खेमे आमने-सामने दिखाई दिए। कांग्रेस को मुख्यमंत्री चयन में लंबा समय लगाना पड़ा।

ऐसे ही कर्नाटक में भी सिद्धारमैया और डीके शिवकुमार के बीच मुख्यमंत्री पद को लेकर लंबी खींचतान चली। आखिरकार समझौता हुआ, लेकिन खींचतान मौके-बेमौके सामने आती रही है। इससे यह स्पष्ट है कि कांग्रेस में चुनावी जीत के बाद नेतृत्व संघर्ष लगभग स्वाभाविक प्रक्रिया बन चुका है।

आखिर कांग्रेस बिखरी हुई क्यों नजर आती है?

केंद्रीय नेतृत्व की कमजोर होती पकड़: इंदिरा गांधी या नरसिंह राव के दौर में केंद्रीय नेतृत्व अंतिम निर्णायक होता था। हालांकि, उस समय भी पार्टी में फूट और खींचतान रहती थी, लेकिन नियंत्रण था। मौजूदा समय में संगठनात्मक नियंत्रण उतना मजबूत नहीं दिखता। क्षेत्रीय और कई बार बिना जनाधार वाले नेता भी खुलकर दबाव बनाने लगे हैं।

वैचारिक से ज्यादा व्यक्तित्व आधारित राजनीति: कांग्रेस अब वैचारिक संगठन कम और नेताओं के समूहों का गठबंधन ज्यादा नजर आती है। हर राज्य में अलग शक्ति केंद्र बन चुके हैं।

संगठनात्मक चुनावों का अभाव: भाजपा और आरएसएस ढांचे में लगातार कैडर निर्माण और संगठनात्मक प्रशिक्षण चलता है। कांग्रेस में लंबे समय से संगठनात्मक चुनाव और वैचारिक प्रशिक्षण कमजोर पड़ चुके हैं। इससे कार्यकर्ता संस्कृति की जगह व्यक्ति-निष्ठा बढ़ी। वैसे, यह स्थिति कांग्रेस में बहुत पहले से रही है।

भाजपा इस मामले में अलग क्यों दिखती है?

यह कहना गलत होगा कि भाजपा में गुटबाजी नहीं होती। वहां भी आंतरिक प्रतिस्पर्धा है, लेकिन वह सार्वजनिक विद्रोह में कम बदलती है। इसकी कुछ वजहें हैं। भाजपा में मजबूत संगठनात्मक अनुशासन है। भाजपा का ढांचा सिर्फ चुनावी पार्टी नहीं बल्कि कैडर आधारित संगठन है। आरएसएस की पृष्ठभूमि से आए नेताओं में संगठनात्मक अनुशासन भी अपेक्षाकृत ज्यादा दिखता है।

इसके अलावा नेतृत्व का स्पष्ट केंद्रीकरण है। आज भाजपा में शीर्ष नेतृत्व का निर्णय अंतिम माना जाता है। मुख्यमंत्री चयन से लेकर संगठनात्मक बदलाव तक पर सार्वजनिक असहमति कम दिखाई देती है।

भाजपा लगातार यह संदेश देती रही है कि संगठन व्यक्ति से बड़ा है। इसी कारण कई बड़े नेताओं को भी बिना बड़े विवाद के बदला गया। गुजरात से लेकर उत्तराखंड और कर्नाटक तक भाजपा ने मुख्यमंत्री बदले, लेकिन सरकारें नहीं डगमगाईं। इसके अलावा भाजपा लगातार दूसरी और तीसरी पंक्ति का नेतृत्व तैयार करती रहती है। कांग्रेस में अक्सर नेतृत्व कुछ चेहरों तक सीमित रह जाता है।

कांग्रेस के सामने चुनौती

कांग्रेस का संकट सिर्फ चुनाव जीतने का नहीं है। असली चुनौती जीत को स्थिर शासन और मजबूत संगठन में बदलने की है। जब भी पार्टी सत्ता में आती है, अंदरूनी खींचतान उसकी राजनीतिक ऊर्जा को खत्म कर देती है।

यदि कांग्रेस को राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा का प्रभावी विकल्प बनना है तो उसे सिर्फ चुनावी गठबंधन नहीं, बल्कि संगठनात्मक पुनर्निर्माण करना होगा। नेतृत्व चयन की पारदर्शी व्यवस्था, मजबूत राज्य संगठन और स्पष्ट अनुशासन के बिना पार्टी बार-बार इसी संकट में फंसती रहेगी।

ईमानदारी से देखें तो आज भारतीय राजनीति में भाजपा और कांग्रेस के बीच सबसे बड़ा अंतर सिर्फ चुनावी ताकत का नहीं, बल्कि संगठनात्मक संस्कृति का दिखाई देता है। भाजपा सत्ता को संगठन से नियंत्रित करती है, जबकि कांग्रेस में कई बार सत्ता ही संघर्ष का मैदान बनती नजर आती है।

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विनीत कुमार
पूर्व में IANS, आज तक, न्यूज नेशन और लोकमत मीडिया जैसी मीडिया संस्थानों लिए काम कर चुके हैं। सेंट जेवियर्स कॉलेज, रांची से मास कम्यूनिकेशन एंड वीडियो प्रोडक्शन की डिग्री। मीडिया प्रबंधन का डिप्लोमा कोर्स। जिंदगी का साथ निभाते चले जाने और हर फिक्र को धुएं में उड़ाने वाली फिलॉसफी में गहरा भरोसा...
विनीत कुमार
पूर्व में IANS, आज तक, न्यूज नेशन और लोकमत मीडिया जैसी मीडिया संस्थानों लिए काम कर चुके हैं। सेंट जेवियर्स कॉलेज, रांची से मास कम्यूनिकेशन एंड वीडियो प्रोडक्शन की डिग्री। मीडिया प्रबंधन का डिप्लोमा कोर्स। जिंदगी का साथ निभाते चले जाने और हर फिक्र को धुएं में उड़ाने वाली फिलॉसफी में गहरा भरोसा...
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