बिश्केकः भारतीय रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने मंगलवार (28 अप्रैल) को बिश्केक में आयोजित शंघाई सहयोग संगठन (SCO) सम्मेलन में हिस्सा लिया। इस दौरान उन्होंने पाकिस्तान को घेरा। उन्होंने कहा “आतंकवाद के केंद्र अब न्यायोचित दंड से मुक्त नहीं हैं” और आतंकवाद से निपटने में “दोहरे मापदंड के लिए कोई जगह नहीं हो सकती।”
रक्षा मंत्रियों को संबोधित करते हुए उन्होंने यह बात कही। इस दौरान पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ भी मौजूद थे।
ऑपरेशन सिंदूर ने प्रदर्शित किया भारत का दृढ़ संकल्प
सीमा पार आतंकवाद पर भारत के रुख को रेखांकित करने के लिए क्षेत्रीय सुरक्षा मंच का उपयोग करते हुए सिंह ने कहा कि एससीओ सदस्यों को उन देशों, संस्थाओं और नेटवर्कों के खिलाफ दृढ़ कार्रवाई करनी चाहिए जो आतंकवादियों को “सहयोग देते हैं, शरण देते हैं और सुरक्षित ठिकाने मुहैया कराते हैं।”
उनके संबोधन के बाद जारी एक सरकारी बयान के मुताबिक, उन्होंने कहा कि राष्ट्रों की संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता को निशाना बनाने वाले राज्य-प्रायोजित सीमा पार आतंकवाद को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है।
सिंह ने कहा कि ” ऑपरेशन सिंदूर ने भारत के इस दृढ़ संकल्प को प्रदर्शित किया कि आतंकवाद के गढ़ अब न्यायोचित दंड से मुक्त नहीं रहेंगे। ” पाकिस्तान और चीन दोनों को शामिल करने वाले एक बहुपक्षीय मंच पर भारत की सैन्य प्रतिक्रिया और राजनयिक संदेश को एक समान रखा।
उन्होंने दो टूक कहा कि इस मामले में दोहरे मानदंड के लिए कोई जगह नहीं होनी चाहिए और एससीओ को उन देशों के खिलाफ उचित कार्रवाई करने से नहीं हिचकना चाहिए जो आतंकवादियों को समर्थन, शरण या सुरक्षित ठिकाने उपलब्ध कराते हैं। उन्होंने ऑपरेशन सिंदूर का जिक्र करते हुए कहा कि भारत ने यह स्पष्ट कर दिया है कि आतंकवाद के केंद्र अब दंड से अछूते नहीं रहेंगे। राजनाथ सिंह ने अपने संबोधन में वैश्विक परिदृश्य पर चिंता जताते हुए कहा कि दुनिया इस समय बढ़ते एकतरफावाद और संघर्षों के दौर से गुजर रही है।
वैश्विक सहमति पड़ रही है कमजोर
उन्होंने कहा कि वैश्विक सहमति कमजोर पड़ रही है और टकराव की स्थितियां बढ़ रही हैं। ऐसे समय में यह सुनिश्चित करना जरूरी है कि यह दौर हिंसा और युद्ध का दौर न बनकर शांति और समृद्धि का दौर बने। उन्होंने महात्मा गांधी के विचारों को याद करते हुए कहा कि “आंख के बदले आंख” की सोच अंततः पूरी दुनिया को अंधा बना देती है और हर निर्णय से पहले यह सोचना चाहिए कि उसका असर गरीब और जरूरतमंद लोगों पर क्या पड़ेगा। उन्होंने बीते साल 22 अप्रैल को पहलगाम में हुए भीषण आतंकवादी हमले का जिक्र करते हुए कहा कि इस घटना ने पूरी मानवता को झकझोर दिया।
अपने संबोधन में उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि क्या दुनिया को एक नई व्यवस्था की जरूरत है या एक अधिक व्यवस्थित विश्व की। उन्होंने कहा कि जरूरत ऐसी व्यवस्था की है जहां हर व्यक्ति को सम्मान और गरिमा मिले, जहां मतभेद विवाद में न बदलें और विवाद आपदा का कारण न बनें। राजनाथ सिंह ने कहा कि वर्तमान संकट किसी व्यवस्था के अभाव का नहीं, बल्कि स्थापित नियम-आधारित विश्व व्यवस्था पर सवाल उठाने की प्रवृत्ति का है। उन्होंने वैश्विक सहमति, सह-अस्तित्व, सह-निवास और करुणा को प्राथमिकता देने की आवश्यकता पर बल दिया।
उन्होंने एससीओ को प्राचीन सभ्यताओं का घर बताते हुए कहा कि यह क्षेत्र ऐतिहासिक व्यापार मार्गों, सांस्कृतिक आदान-प्रदान और साहसिक परंपराओं का प्रतीक रहा है। आज के समय में जब दुनिया का दृष्टिकोण बिखरा हुआ नजर आ रहा है और देश अधिक आत्मकेंद्रित होते जा रहे हैं, ऐसे में एससीओ की भूमिका और भी महत्वपूर्ण हो जाती है। अंत में उन्होंने कहा कि भारत एससीओ के उद्देश्यों को लागू करने के लिए रचनात्मक योगदान देने के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है। उन्होंने विश्वास जताया कि समानता, पारस्परिक सम्मान और आपसी विश्वास के आधार पर सहयोग को बढ़ाकर एससीओ को शांति और आशा का प्रतीक बनाया जा सकता है।
(समाचार एजेंसी आईएएनएस इनपुट्स के साथ)

