पटना: बिहार में सम्राट चौधरी के नेतृत्व में नई सरकार का गठन हो चुका है। जदयू कोटे से विजय कुमार चौधरी और बिजेंद्र प्रसाद यादव डिप्टी सीएम बने। जबकि इससे पहले ऐसी खबरें थी नीतीश कुमार के पुत्र निशांत को यह पद मिल सकता है। हालांकि, ऐसा नहीं हुआ। इसी के साथ बिहार में कई सवाल और चर्चाओं का दौर भी शुरू हो गया।
अभी कुछ दिन पहले राजनीति में कदम रखने वाले निशांत नई सरकार के शपथ ग्रहण में भी नजर नहीं आए थे। हालांकि, एक दिन बाद निशांत कुमार ने गुरुवार को अपनी प्रतिक्रिया दी। इस दौरान उन्होंने सम्राट चौधरी को बड़ा भाई बताते हुए शुभकामनाएं दी। इस दौरान उन्होंने थोड़ा संकेत अपनी भविष्य की योजनाओं का भी दिया।
निशात क्यों नहीं बने डिप्टी सीएम?
अंदरखाने और कई मीडिया रिपोर्ट में सूत्रों के हवाले से आई जानकारी में ये कहा गया कि निशांत खुद ही मंत्री पद अभी नहीं लेना चाहते थे। उन्हें मनाने की कई कोशिशें हुईं और आखिरी समय तक हुई, लेकिन वे दूरी बनाए रखना चाहते थे। ये बातें कही जा रही हैं कि निशांत अभी कुछ देर ठहरकर सरकार में आना चाहेंगे। उनके बिहार यात्रा की भी बातें कही जा रही है, ताकि वे ज्यादा से ज्यादा लोगों और पार्टी कार्यकर्ताओं से मिले।
राजनीतिक गलियारों में यह भी चर्चा है कि वे अपने राजनीतिक करियर की शुरुआत में ही परिवारवाद से इसे नहीं जोड़ने देना चाहते हैं। पार्टी संगठन के भीतर काम करते हुए वे खुद को एक स्वतंत्र नेता के रूप में स्थापित करना चाहते हैं ताकि आगे चलकर उनकी स्वीकार्यता पर कोई सवाल न उठे। लेकिन सवाल है कि क्या इतना समय निशांत के पास है?
हालांकि, इन सबके बीच ऐसी भी चर्चाएं हैं कि निशांत संभवत: राजनीति में फिलहाल सक्रिय नहीं होना चाहते। पिछले एक-डेढ़ महीने में जो सक्रियता निशांत की दिखी, वो केवल पार्टी में उभरी नाराजगी और नीतीश के फैसले से मची हलचल को शांत करने के लिए थी। चूकी सरकार नई बन गई है, नीतीश कुमार ने दिल्ली का रुख कर लिया है तो निशांत दोबारा अपने पुराने जीवन में लौटेंगे।
यही नहीं, हाल के दिनों में जब बिहार में सत्ता बदलने को लेकर हलचल चल रही थी, तो नेताओं की भीड़ वाली उन तस्वीरों में नीतीश तो दिखे लेकिन निशांत बहुत सक्रिय नजर नहीं आए। यही भी थोड़ा हैरत भरा रहा। राज्य और देश की राजनीति में अगर निशांत उभरना चाहते हैं तो उन्हें सक्रिय भी दिखना होगा।
निशांत को करीब से देखने-जानने वाले इस बात से वाकिफ हैं कि वे भीड़भाड़ से खुद को दूर रखते आए हैं। वे संकोची स्वभाव के रहे हैं। सीएम आवास में होते हुए भी राजनीति और उसकी हलचलों से दूर रहे। अध्यात्म और किताबों में समय बिताते रहे हैं, और इस वजह से लोगों से मिलना-जुलना भी उनका हमेशा से कम ही रहा है। हालांकि, नीतीश के स्वास्थ्य और सीएम पद छोड़ने के फैसले के बाद निशांत को दबाव में ही सही पर बाहर आना पड़ा।
जदयू को संभाल पाएंगे निशांत?
निशांत को लेकर कई लोगों का ये मानना है कि बिहार में नई सरकार के बनने के बाद उनकी सक्रियता घट रही है। हालांकि, अभी इस पर भी कुछ कहना जल्दबाजी होगी। निशांत जब गुरुवार को मीडिया के सामने आए तो उन्होंने कहा कि वे पार्टी को मजबूत करने काम करेंगे और नीतीश कुमार के सपनों को पूरा करने की ओर कदम बढ़ाएंगे।
पत्रकारों ने जब उनसे पूछा कि उन्हें डिप्टी सीएम बनाने की मांग पार्टी कर रही है तो निशांत ने कहा- ‘पार्टी गठबंधन को मजबूत करूंगा। पार्टी को मजबूत करूंगा। पिताजी ने जो 20 साल में काम किया है, उसे जन-जन तक पहुंचाने की कोशिश करूंगा और उनके सपनों को पूरा करूंगा।’
निशांत ने जवाब तो दिया लेकिन कैसे वे राजनीति की इस डगर पर चलेंगे, ये देखना बाकी है। नीतीश के बाद जदयू कैसे बढ़ेगी, इसे लेकर भी फिलहाल काफी असमंजस है। अभी नीतीश राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं। याद कीजिए तो पार्टी में नीतीश के उत्तराधिकारी को तलाशने की कोशिशें जैसी खबरें भी पिछले चार-पांच सालों में आई हैं। पर बात नहीं बनी।
पार्टी के भीतर निशांत कुमार को लेकर बहुत हद तक स्वीकार्यता है पर बताया जाता है कि नीतीश कुमार स्वयं इस विचार से दूरी बनाए रखना चाहते हैं। इसलिए भी असमंजस बरकरार है।
जदयू में नीतीश के बाद दूसरे बड़े नेता ललन सिंह हैं। वो भूमिहार जाति से आते हैं। यहां जातीय समीकरण के मामले में जदयू के लिए दिक्कत खड़ी हो सकती है क्योंकि नीतीश का समर्थक तबका शायद ललन सिंह को अपना नेता स्वीकार नहीं करेगा। यही वजह है कि नजर घूम-घूम पर निशांत पर आ जाती है। हालांकि, क्या वो इस पर खड़ा उतरेंगे, इसका जवाब शायद अगले कुछ महीनों या साल में मिल जाएगा।
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