नई दिल्ली: संसद का विशेष सत्र 16 अप्रैल से शुरू होने जा रहा है। यह 18 अप्रैल तक चलेगा। इसमें सरकार तीन बड़े बिल पेश करने जा रही है, जिससे 2029 से पहले लोकसभा और राज्यों की विधानसभाओं में 33 प्रतिशत महिला आरक्षण लागू हो सके। इसके लिए पहला बिल परिसीमन कानून से जुड़ा है। वहीं, दूसरा 131वां संविधान संशोधन बिल है। जबकि तीसरा दिल्ली सहित जम्मू-कश्मीर और पुडुचेरी जैसे केंद्र शासित प्रदेश को नए विधेयक से जोड़ने से संबंधित है।
तीनों विधेयकों से विधानसभा और लोकसभा में महिलाओं के लिए 33% सीटें आरक्षित करने का रास्ता खुलेगा। इसे 2029 के लोकसभा चुनाव से ही लागू किया जा सकता है।
संसद ने सितंबर 2023 में संविधान (106वां संशोधन) अधिनियम, 2023 पारित कर महिलाओं के लिए एक तिहाई सीटें आरक्षित कर दी थीं, लेकिन इसे एक्ट के प्रकाशित होने के बाद होने वाली पहली जनगणना के परिसीमन से जोड़ा गया था।
अब सरकार का कहना है कि 2021 की जनगणना, जिसमें देरी हुई है और अभी चल रही है, उसे पूरा होने में बहुत समय लगेगा। इससे महिला आरक्षण को कराने में भी देरी होगी। इसीलिए परिसीमन को 2011 की जनगणना के आधार पर लागू कराने के लिए विधेयक लाए गए हैं।
महिला आरक्षण पर लगभग सहमति है लेकिन परिसीमन से जुड़े विधेयकों पर विपक्ष की नाराजगी दिख रही है। तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एमके स्टालिन पहले ही सख्त तेवर अपनाए हुए हैं। तेलंगाना के मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी ने भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को चिट्ठी लिखकर कहा कि दक्षिणी राज्यों को सीटें बढ़ाना मंजूर नहीं। तीनों बिल क्या हैं, दक्षिण राज्यों में इसे लेकर विवाद क्यों है और नए बिलों से क्या बदलाव किया जाना है, आईए विस्तार से जानते हैं।
तीनों बिलों से क्या बदलेगा?
- संविधान (131वें संशोधन) विधेयक-2026: यदि ये पारित होता है तो लोकसभा का आकार वर्तमान 543 से बढ़कर 850 हो सकता है। वर्तमान में, संविधान के अनुसार लोकसभा में सीटों की अधिकतम संख्या 550 हो सकती है। इसका आधार 1971 की जनगणना है। अब बढ़ी हुई संख्या के बाद राज्यों में 815 और केंद्र शासित प्रदेश से 35 सीटें हो सकती हैं। इसके लिए 2011 की जनगणना को आधार बनाने की बात है।
- परिसीमन (संशोधन) विधेयक 2026: जनगणना के आधार पर सीटों के पुनर्वितरण के लिए परिसीमन आयोग का गठन किया जाएगा।
- केंद्र शासित प्रदेश कानून (संशोधन) विधेयक 2026: यह विधेयक केंद्र शासित प्रदेशों से जुड़े कानून में संशोधन के लिए है ताकि नए महिला आरक्षण और परिसीमन नियम इनसे जुड़ जाएं।
परिसीमन पर दक्षिण में क्यों है विवाद?
परिसीमन पिछले कुछ दशकों से राजनीतिक रूप से संवेदनशील मुद्दा रहा है। ऐसा इसलिए भी है कि उत्तरी राज्यों की तुलना में दक्षिणी राज्यों में जनसंख्या वृद्धि दर कम रही है। ऐसे में दक्षिण के कई राजनीतिक दलों का तर्क है कि यदि परिसीमन केवल जनसंख्या के आधार पर किया जाता है, तो उन्हें उत्तरी राज्यों की तुलना में सीटों की संख्या में नुकसान हो जाएगा। उनका तर्क है कि जनसंख्या नियंत्रण से जुड़ी नीतियों को सफलतापूर्वक लागू करने के लिए उन्हें दंडित नहीं किया जाना चाहिए।
इसी विवाद की वजह से संसद ने जनगणना के आधार पर सीटों के पुनर्निर्धारण को स्थगित करने के लिए 1976 और 2001 में दो संवैधानिक संशोधन पारित किए। वर्तमान रोक 2026 के बाद होने वाली पहली जनगणना तक लागू है। अब सरकार इसमें संशोधन का प्रस्ताव कर रही है, जिसमें परिसीमन के समय के संबंध में किसी भी जनगणना का उल्लेख नहीं होगा।
गृह मंत्री अमित शाह सार्वजनिक रूप से कह चुके हैं कि आगामी परिसीमन से दक्षिणी राज्यों को कोई नुकसान नहीं होगा। हालांकि, विधेयक में फिलहाल यह स्पष्ट नहीं है कि इसे कैसे किया जाएगा। यही वजह है कि विवाद बढ़ा हुआ है।
परिसीमन विधेयक, 2026 में एक परिसीमन आयोग की स्थापना का प्रावधान है, जो ‘ताजा जनगणना’ के आधार पर सीटों का निर्धारण करेगा। ऐसे में अब ये देखना होगा कि आयोग का गठन कब और कैसे होता है, और आगे चलकर सीटों के निर्धारण को लेकर क्या सूत्र अपनाया जाता है।
नए संविधान संशोधन विधेयक में कहा गया है कि परिसीमन का काम परिसीमन आयोग द्वारा संसद की ओर से कानून पारित किए जाने पर किया जाएगा। इसका मतलब है कि भविष्य में सत्ताधारी दल परिसीमन कब और कैसे किया जाए, यह आसानी से तय कर सकेंगे। परिसीमन अब संविधान द्वारा अनिवार्य रूप से हर 10 वर्ष में होने वाली प्रक्रिया नहीं रहेगी।
अब तक संविधान के अनुच्छेद 82 के अनुसार प्रत्येक दस साल में हुई जनगणना के बाद परिसीमन प्रक्रिया अनिवार्य थी। सरकार अब परिसीमन को जनगणना से पूरी तरह अलग करने का प्रस्ताव कर रही है।
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