नई दिल्लीः सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार (13 अप्रैल) को टिप्पणी की कि भारत के चुनाव आयोग (ECI) ने पश्चिम बंगाल में मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के दौरान ही संदिग्ध मतदाताओं की “तार्किक विसंगति” सूची बनाई थी।
भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ में शामिल जस्टिस जॉयमाला बागची ने कहा कि पश्चिम बंगाल में मतदाता अब अलग-अलग संवैधानिक प्राधिकरणों के बीच फंस गए हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने क्या टिप्पणी की?
जस्टिस बागची ने यह टिप्पणी तब की जब भारतीय चुनाव आयोग (ECI) ने तर्क दिया कि चुनाव आयोग द्वारा जारी नोटिसों पर फैसला सुनाने वाले न्यायिक अधिकारियों द्वारा 47 प्रतिशत मामलों को खारिज कर दिया गया था।
जस्टिस बागची ने कहा कि ” यह लक्ष्य को पाने के लिए साधनों का औचित्य सिद्ध करने का मामला नहीं है बल्कि साधनों द्वारा लक्ष्य को उचित ठहराने का मामला है। यह राज्य और चुनाव आयोग के बीच की लड़ाई नहीं है। यह आरोप-प्रत्यारोप का खेल नहीं है। यह मतदाताओं के दो संवैधानिक प्राधिकरणों के बीच फंसे होने का मामला है। अदालतों ने केवल चुनावों को बढ़ावा देने के लिए हस्तक्षेप किया है न कि उन्हें बाधित करने के लिए।”
हालांकि जस्टिस बागची ने यह भी कहा कि जब तक ” भारी संख्या में मतदाताओं को मतदान से बाहर नहीं किया जाता ” तब तक चुनाव परिणामों में हस्तक्षेप नहीं किया जा सकता। उन्होंने कहा ” यदि 10 फीसदी मतदाता मतदान नहीं करते हैं और जीत का अंतर 10 प्रतिशत से अधिक है… यदि यह 5 प्रतिशत से कम है तो हमें विचार करना होगा। पहले अपील न्यायाधिकरण के समक्ष उम्मीदवार को प्राथमिकता दी जाती थी क्योंकि किसी भी उम्मीदवार को चुनाव लड़ने के अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता। कृपया यह न सोचें कि हमारे मन में यह प्रश्न नहीं है कि मतदान से बाहर किए गए लोगों का क्या होगा।”
पश्चिम बंगाल और बिहार SIR में अंतर
जस्टिस बागची ने पश्चिम बंगाल और बिहार में SIR के बीच के अंतरों पर भी प्रकाश डाला विशेष रूप से तार्किक विसंगति सूची के निर्माण पर। जब चुनाव आयोग के सीनियर एडवोकेट डी.एस. नायडू ने कहा कि लोगों को यह साबित करना होगा कि वे वही व्यक्ति हैं जिनका नाम 2002 की सूची में है। इस पर जस्टिस बागची ने कहा कि “अब आप अपने पहले दिए गए तर्कों में ही बदलाव कर रहे हैं।”
इस दौरान जस्टिस बागची ने यह भी टिप्पणी की कि न्यायिक अधिकारियों से भी निर्णय प्रक्रिया के दौरान कुछ गलतियां हुई होंगी। उन्होंने कहा कि ” यदि आप प्रतिदिन 1000 दस्तावेजों की जांच करते हैं और सटीकता 70 प्रतिशत है तो इस गतिविधि को उत्कृष्ट माना जाना चाहिए। इसलिए त्रुटि की गुंजाइश तो रहेगी ही और हमें एक सशक्त अपीलीय मंच की आवश्यकता है। “
उन्होंने आगे टिप्पणी की कि ” जिस देश में आपका जन्म हुआ है वहां वोट देने का अधिकार केवल संवैधानिक ही नहीं बल्कि भावनात्मक भी है। यह ऐसा है मानो आप लोकतंत्र का हिस्सा हैं और सरकार चुनने में मदद कर रहे हैं। “
जब नायडू ने कहा कि SIR किए गए राज्यों के तुलनात्मक आंकड़ों में पश्चिम बंगाल किसी भी तरह से अलग नहीं दिखता तो जस्टिस बागची ने कहा कि बिहार में कोई तार्किक विसंगति सूची नहीं है। नायडू ने जवाब दिया कि बिहार में भी अस्वीकृतियां हुई हैं लेकिन वहां कोई अपील प्रक्रिया नहीं है।
इसके जवाब में जस्टिस बागची ने कहा “अपीलीय न्यायाधिकरण के लिए यह मतदाता सूचियों को मिलाने या घटाने की प्रतिस्पर्धा नहीं है। उन्हें समावेशन के सिद्धांतों के आधार पर इसकी सुनवाई करनी होगी।”
चुनाव आयोग के वकील ने क्या कहा?
सुप्रीम कोर्ट पश्चिम बंगाल में अपीलीय न्यायाधिकरणों के कामकाज से संबंधित एक मामले की सुनवाई कर रही थी। याचिकाकर्ता के वकील ने कहा कि चुनाव आयोग मुख्य न्यायाधीश (रिटायर्ड) टी.एस. शिवंगनम की अध्यक्षता वाले अपीलीय न्यायाधिकरण के समक्ष मामले रख ही नहीं रहा है।
वकील ने कहा कि “अपीलों पर सुनवाई नहीं हो रही है। सुनवाई की तारीख बढ़ाई जाए।”
सीजेआई कांत ने याचिकाकर्ता को अपील न्यायाधिकरण में जाकर ये दलीलें पेश करने को कहा। वकील ने पूछा कि क्या अपीलों का फैसला एक निश्चित समय सीमा के भीतर किया जाएगा। अदालत उनकी इस दलील से संतुष्ट नहीं हुआ। ऐसी ही टिप्पणी जस्टिस बागची ने भी की। उन्होंने कहा कि ” कलकत्ता उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश ने सूचित किया है कि अपीलों के तरीके और प्रारूप तैयार कर लिए गए हैं। आज से सुनवाई शुरू हो गई है। हम यह नहीं कह सकते कि आज से X अपीलों की सुनवाई शुरू हो रही है।”

