भारतीय पार्श्व गायन के आकाश में आशा भोसले एक ऐसी ध्रुवतारा रही हैं, जिनकी चमक ने हर दशक के संगीत को रोशन किया। आठ दशकों के लंबे करियर और 12,000 से अधिक गीतों के साथ आशा जी ने भारतीय संगीत के हर बड़े दिग्गज के साथ काम किया।
आशा भोसले की आवाज की सबसे बड़ी खूबी उनका ‘लचीलापन’ था। यही वजह रही कि वे हर संगीतकार की कल्पना को स्वर देने में सक्षम रहीं। उनका हुनर कुछ ऐसा था कि वह हर संगीतकार की जरूरत के हिसाब से आसानी से ढल जाती थीं। हालांकि उनके संगीत करियर में कुछ ऐसी जोड़ियां रहीं जिन्होंने बॉलीवुड संगीत के ग्रामर को ही बदल दिया।
आरडी बर्मन-आशा भोसलेः सबसे हिट जोड़ी
आशा भोसले के करियर में सबसे प्रमुख नाम आरडी बर्मन यानी पंचम दा का आता है। यह जोड़ी न केवल निजी जीवन में बल्कि रचनात्मक स्तर पर भी भारतीय संगीत की सबसे सफल जोड़ी मानी जाती है। कहा जाता है कि इस जोड़ी ने लगभग 600 से अधिक गानों में साथ काम किया। जहां पंचम दा अपनी धुनों में प्रयोगधर्मिता के लिए जाने जाते थे, वहीं आशा जी उनकी प्रेरणा थीं।
‘दम मारो दम’, ‘पिया तू अब तो आजा’, ‘चुरा लिया है तुमने’ और ‘ओ हसीना जुल्फों वाली’ जैसे गानों ने न केवल उन्हें सुपरहिट बनाया, बल्कि भारतीय फिल्म संगीत में ‘रॉक’, ‘पॉप’ और ‘डिस्को’ शैली को भी एक नई पहचान दी। इस जोड़ी ने पारंपरिक संगीत के साथ आधुनिक धुनों का ऐसा मेल बनाया, जो उस दौर में नया और बेहद आकर्षक था।
ओपी नैय्यर-आशा भोसले: 60 के दशक की चर्चित जोड़ी
आशा भोसले के शुरुआती संघर्ष के दिनों में ओपी नय्यर वह नाम थे जिन्होंने उनकी आवाज की असली ताकत को पहचाना और उन्हें बड़े मौके देकर एक अलग पहचान दी। ओपी नय्यर ने बिना लता मंगेशकर के अपना एक विशाल साम्राज्य खड़ा किया और उनकी इस यात्रा में आशा जी उनकी सबसे बड़ी शक्ति बनीं।
अक्सर यह कहा जाता है कि ओपी नैय्यर ही वह शख़्स थे जिन्होंने आशा को यह यकीन दिलाया कि उनमें इतनी अपनी पहचान है कि वह अकेले दम पर अपनी राह बना सकती हैं। उनके मार्गदर्शन में, आशा ने अपना बेफिक्र अंदाज विकसित किया। उन्होंने कैबरे-शैली की गायकी में भी महारत हासिल की और अपने संगीत में एक दिलकश अंदाज जोड़ा। मोहम्मद रफी के साथ उनके युगल गीत, जिन्हें नैयर ने संगीतबद्ध किया था, अपने जमाने के सभी चार्टबस्टर थे। ‘कश्मीर की कली’ और ‘तुमसा नहीं देखा’ जैसी फिल्मों के गाने आज भी बेहद लोकप्रिय हैं।
नैय्यर के संगीत में जो रिदम थी, उसे आशा जी ने ‘आइए मेहरबां’, ‘ये है रेशमी जुल्फों का अंधेरा’ और ‘जाइये आप कहाँ जाएंगे’ जैसे गीतों से अमर बना दिया। यह साझेदारी 50 और 60 के दशक की सबसे चर्चित और महत्वपूर्ण जोड़ियों में से एक मानी जाती है। दोनों ने करीब 250 से 300 गाने साथ में किए।
जब एसडी बर्मन की प्रमुख गायिका बनीं आशा
सचिन देव बर्मन साथ भी आशा भोसले ने कई यादगार और सदाबहार गाने गाए। आशा जी उन्हें दादा कहा करती थीं।1950 के दशक में जब लता मंगेशकर और दादा बर्मन के बीच कुछ समय के लिए रचनात्मक दूरी आई, तब आशा भोसले उनकी प्रमुख गायिका बन गईं। दोनों ने 100 से अधिक गानों पर साथ काम किए।
दादा बर्मन ने आशा जी की आवाज की चुलबुलाहट और गहराई का बेहतरीन इस्तेमाल किया। ‘छोड़ दो आंचल जमाना क्या कहेगा’, ‘हाल कैसा है जनाब का’ और ‘दीवाना मस्ताना हुआ दिल’ जैसे गानों में उनकी आवाज ने एक नई जान फूंक दी, जिसने यह साबित किया कि वे चुलबुले और मस्ती भरे गीतों में भी बेमिसाल हैं।
खय्याम: शास्त्रीयता और गजल का चरम
संगीतकार खय्याम के साथ आशा भोसले की साझेदारी भी संगीत के इतिहास में बेहद खास रही है। खासतौर पर फिल्म ‘उमराव जान’ (1981) के गानों ने उनकी गायकी का एक अलग ही रूप दुनिया के सामने पेश किया। जब दुनिया उन्हें केवल ‘कैबरे’ गानों की रानी मान चुकी थी, तब खय्याम ने उनसे ‘दिल चीज क्या है’ और ‘इन आंखों की मस्ती के’ जैसी गजलें गवाकर यह साबित किया कि वे शास्त्रीय और सूफियाना अंदाज में भी उतनी ही माहिर हैं। इन गानों के लिए आशा जी ने अपने स्वर को एक सुर नीचे उतारा और इसी प्रयोग ने उन्हें प्रतिष्ठित राष्ट्रीय पुरस्कार भी दिलाया।
90 के दशक में जब संगीत का तकनीकी स्वरूप बदल रहा था, तब एआर रहमान और आशा भोसले की जोड़ी ने नई पीढ़ी को अपना दीवाना बना लिया। ‘रंगीला रे’, ‘तन्हा तन्हा’ और ‘राधा कैसे ना जले’ जैसे गानों में 60 वर्ष की उम्र पार कर चुकीं आशा जी की आवाज में जो ताजगी और ऊर्जा थी, उसने यह साबित कर दिया कि उम्र सिर्फ एक नंबर है। उन्होंने नई धुनों और आधुनिक संगीत के साथ खुद को बखूबी ढाला और युवा दर्शकों के बीच भी अपनी मजबूत पहचान बनाए रखी। उन्होंने शंकर-जयकिशन, मदन मोहन, इलैयाराजा और बप्पी लाहिड़ी जैसे हर दौर के दिग्गजों के साथ सुपरहिट गानों की एक लंबी श्रृंखला तैयार की।

