कोलकाता: पश्चिम बंगाल की राजनीति में महिला वोटर हमेशा से निर्णायक भूमिका में रही हैं। पिछले दो विधानसभा चुनावों (2016 और 2021) में महिलाओं की भारी भागीदारी और तृणमूल कांग्रेस की ओर झुकाव ने ममता बनर्जी को खूब फायदा पहुंचाया। यह कुछ-कुछ ही है, जैसा बिहार में महिला वोटों को लेकर नीतीश कुमार के लिए कहा जाता रहा है। बंगाल में हालांकि इस बार मुकाबला दिलचस्प हो गया है।
भारतीय जनता पार्टी ने भी महिला वोटरों को साधने के लिए आक्रामक रणनीति बनाई है। फिर चाहे घोषणापत्र में महिलाओं के लिए एक से बढ़कर एक वादे हों या फिर बंगाल में महिलाओं की सुरक्षा के विषय को मुखरता से उठाने की बात, भाजपा कोई कसर छोड़ती नजर नहीं आ रही है। ऐसे में सवाल है क्या ‘दीदी’ का महिला वोट बैंक बरकरार रहेगा?
भाजपा का घोषणापत्र और उसमें महिलाओं के लिए किए गए वादे तो चर्चा में हैं ही, साथ ही 16 अप्रैल से शुरू हो रहा संसद का विशेष सत्र भी इस पूरी कहानी को एक नया आयाम दे रहा है। बंगाल में 23 और 29 अप्रैल को दो चरणों में होने वाले मतदान से ठीक पहले संसद के बुलाए जा रहे विशेष सत्र में संशोधित नारी शक्ति वंदन अधिनियम (महिला आरक्षण बिल) को लागू कराने के लिए बिल पारित कराया जाएगा। इसमें आरक्षण को लागू करने को लेकर लोकसभा सीटों की संख्या बढ़ाकर 816 करने के लिए एक विधेयक लाया जाना है। विपक्ष इसे जल्दबाजी और चुनाव में लाभ लेने की कोशिश के तौर पर देख रहा है।
महिला वोटों पर भाजपा की नजर
भाजपा ने अपने चुनावी घोषणापत्र में महिलाओं को केंद्र में रखते हुए कई बड़े वादे किए हैं। इसमें महिलाओं के प्रति माह 3000 रुपये से लेकर राज्य में पुलिस बल और सभी सरकारी नौकरियों में महिलाओं के लिए 33% आरक्षण उपलब्ध कराने जैसे वादे शामिल हैं। घोषणा पत्र में कहा गया है कि भाजपा सरकार हर महीने की 1 तारीख से 5 तारीख के बीच महिलाओं के बैंक खाते में 3,000 रुपये ट्रांसफर करेगी ताकि वे आर्थिक रूप से स्वतंत्र बन सकें।
इसके अलावा भाजपा ने वादा किया है कि हर मंडल में महिला थाना और महिला डेस्क बनाया जाएगा। बंगाल में 75 लाख लखपति दीदी बनाने का भी लक्ष्य है। गर्भवती महिलाओं को 21 हजार रुपये बतौर सहायता भी देने का वादा किया गया है। इसके अलावा आरजी कर मेडिकल कॉलेज सहित बंगाल में महिलाओं के खिलाफ रेप और हत्या की घटनाओं को लगातार भाजपा मुद्दा बनाकर तृणमूल को बैकफुट पर भेजने की कोशिश में है। यही वजह भी है कि पार्टी ने आरजी कर मेडिकल कॉलेज की पीड़िता छात्रा की मां को टिकट दिया है।
तृणमूल का बड़ा वोट बैंक रही हैं महिलाएं
तृणमूल के लिए बंगाल में महिला वोट बड़ा बेस रही हैं। तृणमूल के इस बार के 291 उम्मीदवारों में 52 महिलाएं हैं। ममता बनर्जी का सबसे बड़ा दांव लक्ष्मी भंडार योजना भी रही है। इसे बंगाल की सबसे शक्तिशाली राजनीतिक योजना भी कह सकते हैं। इसके तहत राज्य सरकार हर महीने सीधे महिलाओं के बैंक खातों में नकद राशि भेजती है।
यह योजना फिलहाल करीब 2.5 करोड़ महिलाओं को लाभ पहुंचा रही है। 2026 के लिए, टीएमसी ने सामान्य वर्ग की महिलाओं के लिए इसे बढ़ाकर 1,500 रुपये प्रति माह और अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति की महिलाओं के लिए 1,700 रुपये प्रति माह करने का वादा किया है। इसके अलावा कन्याश्री प्रकल्प और रूपश्री योजनाएं भी हैं जो लड़कियों की शिक्षा और विवाह सहायता के लिए हैं।
सीएसडीएस-लोकनीति के आंकड़ों के अनुसार 2024 के लोकसभा चुनावों में 53 प्रतिशत महिलाओं ने टीएमसी को वोट दिया, जो 2019 की तुलना में 11% अधिक है। इसके अलावा 2021 के विधानसभा चुनाव में करीब 48 प्रतिशत महिलाओं ने तृणमूल को वोट दिया था। 2016 में भी यह आंकड़ा 45 प्रतिशत के पास है। वर्षों से लगातार बना हुआ इस तरह का रुझान भी ममता को सत्ता में बनाए रखने में बड़ी भूमिका निभाता आया है।
बंगाल में महिला वोट इतने अहम क्यों?
बंगाल के सात करोड़ योग्य मतदाताओं में से 3.44 करोड़ से अधिक महिलाएं हैं, जो कुल मतदाताओं का लगभग आधा हिस्सा हैं। ये संख्या अपने आप में दर्शाती है कि बंगाल में महिला वोट क्यों अहम हैं। आंकड़े बताते हैं कि करीब दो दर्जन सीटें ऐसी हैं जहां पुरुषों की तुलना में महिला वोटरों का दबदबा या पिछले चुनाव में उनका मतदान प्रतिशत ज्यादा रहा है।
वैसे, ताजा एसआईआर के बाद राज्य में महिला मतदाताओं का अनुपात कम हुआ है। राज्यसभा में दिए गए एक जवाब में चुनाव आयोग द्वारा जारी आंकड़ों के अनुसार, बंगाल में महिला मतदाताओं की संख्या प्रति 1000 पुरुषों के मुकाबले 10 वर्षों में सबसे कम हो गई है। 2024 की लोकसभा चुनाव सूची में प्रति 1,000 पुरुषों पर लगभग 966 महिलाएं थीं, जो एसआईआर के बाद घटकर लगभग 956 रह गई है।
इस पर अलग विवाद है। तृणमूल कांग्रेस की नेता और राज्य मंत्री चंद्रिमा भट्टाचार्य आरोप लगा चुकी हैं कि ‘चुनाव आयोग ने जानबूझकर महिला मतदाताओं को निशाना बनाया है। मतदाताओं की मदद के लिए हमारे बूथ स्तर के एजेंटों को सुनवाई सत्रों में शामिल होने की भी अनुमति नहीं दी गई।’

