पश्चिम बंगाल चुनाव में एक ट्विस्ट उस समय देखने को मिला जब तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) द्वारा कथित तौर पर एक स्टिंग वीडियो जारी करने के बाद ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM) ने हुमायूं कबीर की आम जनता उन्नयन पार्टी (AJUP) के साथ अपना गठबंधन तोड़ने का ऐलान कर दिया। जिस स्टिंग पर बवाल मचा है, उसमें कबीर पश्चिम बंगाल के मुसलमानों के बारे में कुछ विवादास्पद टिप्पणी करते नजर आ रहे थे। साथ ही भाजपा से संबंध होने जैसे भी कुछ दावे करते वे दिखे।
असदुद्दीन ओवैसी के नेतृत्व वाली एआईएमआईएम ने आगामी पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावों के लिए कबीर की नई एजेयूपी के साथ गठबंधन की घोषणा पिछले महीने की थी। इस गठबंधन को अल्पसंख्यक वोटों को एकजुट कर अपनी ओर खींचने के प्रयास के तौर पर देखा जा रहा था। अगर ये गठबंधन अपना काम बखूबी करता तो माना जा रहा था सबसे बड़ा झटका सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस को लगता।
मौजूदा समय में यही माना जाता है कि पश्चिम बंगाल में अल्पसंख्यक वोटों पर तृणमूल कांग्रेस की अच्छी-खासी पकड़ है। वामपंथी धड़े या कांग्रेस में भी ये वोट रहे हैं लेकिन पिछले 15 सालों में इनका झुकाव तेजी से ममता बनर्जी की ओर हुआ है। हालांकि, तृणमूल द्वारा वीडियो जारी किए जाने के बाद ओवैसी-कबीर का गठबंधन कुछ ही हफ्तों में टूट गया।
गठबंधन तोड़ने हुए AIMIM ने क्या कहा?
AIMIM ने एक पोस्ट में कहा, ‘हुमायूं कबीर के खुलासों ने बंगाल के मुसलमानों की असुरक्षा को उजागर किया है। एआईएमआईएम ऐसे किसी भी बयान का समर्थन नहीं कर सकती जिससे मुसलमानों की गरिमा पर सवाल उठे। आज से एआईएमआईएम ने कबीर की पार्टी से अपना गठबंधन वापस ले लिया है।’
पार्टी ने आगे कहा, ‘बंगाल के मुसलमान सबसे गरीब, उपेक्षित और शोषित समुदायों में से एक हैं। दशकों के धर्मनिरपेक्ष शासन के बावजूद उनके लिए कुछ नहीं किया गया है। किसी भी राज्य में चुनाव लड़ने के संबंध में एआईएमआईएम की नीति यही है कि हाशिए पर पड़े समुदायों को एक स्वतंत्र राजनीतिक आवाज मिले। हम बंगाल चुनाव स्वतंत्र रूप से लड़ेंगे और आगे किसी भी पार्टी के साथ गठबंधन नहीं करेंगे।’
तृणमूल कांग्रेस को होगा फायदा?
तृणमूल कांग्रेस शुरू से कबीर को भाजपा की बी टीम कहती रही है। तृणमूल से निष्कासित कबीर ने जब नई पार्टी बनाकर चुनाव लड़ने का ऐलान किया था, उसके बाद से ही उनके बंगाल में अल्पसंख्यक सीटों पर प्रभाव को लेकर तमाम तरह के अनुमान लगाए जा रहे थे। कबीर बहुत बड़ा फैक्टर पूरे राज्य में भले नहीं हैं लेकिन कबीर-AIMIM का गठबंधन कुछ अल्पसंख्यक सीटों पर सीधा-सीधा नुकसान पहुंचा सकता था। ऐसा इसलिए क्योंकि बंगाल में अल्पसंख्यक वोट चुनाव में बड़ी भूमिका निभाते हैं।
आंकड़े बताते हैं कि कुल 294 विधानसभा सीटों में से करीब 100 से 120 सीटों पर मुस्लिम मतदाताओं का सीधा-सीधा या निर्णायक प्रभाव है। साल 2011 की जनगणना के अनुसार, पश्चिम बंगाल की जनसंख्या में मुसलमानों की आबादी लगभग 27% है। कुछ अनुमान मौजूदा समय में यह आंकड़ा 30% या उससे भी बताते हैं।
इसमें भी बंगाल में तीन जिलों- मालदा, मुर्शिदाबाद और उत्तर दिनाजपुर में मुस्लिम आबादी 50% या उससे अधिक है। यहां से 43 विधानसभा सीटें निकलती हैं। इसके अलावा दो अन्य जिले- दक्षिण 24 परगना और बीरभूम में मुस्लिम आबादी 35% से अधिक है।
AIMIM और AJUP कितने सीटों पर लड़ रहे चुनाव?
कबीर की पार्टी ने 182 सीटों पर चुनाव लड़ने की घोषणा की थी। वहीं, AIMIM ने 12 सीटों पर उम्मीदवार खड़े किए हैं। इसमें अब कोई बदलाव नहीं होने जा रहा है क्योंकि बंगाल में दोनों चरणों के लिए नामांकन की समयसीमा खत्म हो चुकी है।
एआईएमआईएम ने जिन 12 सीटों पर उम्मीदवार खड़े किए हैं, वो टीएमसी के लिए अहम माने जाते हैं। इन 12 सीटों में से नौ सीटों पर पहले चरण में 23 अप्रैल को मतदान होगा, जबकि शेष तीन सीटों पर दूसरे चरण में 29 अप्रैल को मतदान होगा।
AIMIM ने जिन 12 निर्वाचन क्षेत्रों में उम्मीदवार उतारे हैं, वे हैं- मोथाबारी और सुजापुर (मालदा जिला), सूती, रघुनाथगंज और कंडी (मुर्शिदाबाद), नालहाटी और मुरारई (बीरभूम), आसनसोल उत्तर (पश्चिम बर्धमान), हावड़ा, बारासात और बसीरहाट दक्षिण (उत्तर 24 परगना), और करनदीघी (उत्तर दिनाजपुर)।
इन निर्वाचन क्षेत्रों में बड़ी संख्या में मुस्लिम आबादी होने के कारण AIMIM को खुद के लिए एक अवसर दिख रहा है। पार्टी नेताओं ने कहा कि उन्हें भाजपा के अलावा अन्य प्रमुख दलों से निराश मतदाताओं का समर्थन मिलने की उम्मीद है।
वैसे यह पहली बार नहीं है जब AIMIM बंगाल में चुनाव लड़ रही है। 2021 में इसने बंगाल की छह सीटों पर चुनाव लड़ा था, लेकिन उसका वोट शेयर केवल 0.93% था। इसके सभी उम्मीदवारों की जमानत जब्त हो गई थी। पार्टी का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन मुर्शिदाबाद के सागरदिघी में रहा, जहां उसे 3,450 वोट मिले थे।

