भाषा मनुष्य की सबसे सूक्ष्म और निर्णायक शक्ति है। यह संप्रेषण का माध्यम तो है ही, पर उससे बहुत आगे, यह संसार को देखने और गढ़ने के लिए एक जरूरी उपकरण का काम भी करती है। इसलिए यह तय करते हुए कि हम अपनी बात कैसे और किन शब्दों में कहें, इस बात का ध्यान रखना भी जरूरी है कि हमारे शब्द दुनिया में क्या असर छोड़ेंगे?
शब्दों के पास आकार नहीं होता, पर वे आकार देते हैं; उनके पास हाथ नहीं होते, पर वे छूते भी हैं और चोट भी पहुँचाते हैं।
‘ऐसी बानी बोलिए, मन का आपा खोय
औरन को शीतल करे, आपहुं शीतल होय।’
कबीर के इस दोहे को सिर्फ नैतिक सलाह के चश्मे से नहीं देखा जाना चाहिए। इसके पीछे भाषा की प्रकृति और उसके उपयोग की सलाहियत का गहरा भावबोध छिपा है। भाषा अगर ताप को शीतल न कर सके, तो वह अपने उद्देश्य से भटक जाती है। दूसरी ओर सवाल यह भी है कि भाषा केवल कोमलता का मामला नहीं, बल्कि संघर्ष और टकराव का भी जरिया है, जहाँ शब्द सत्य की खोज में तीखे भी होते हैं, असहज भी। यही द्वंद्व भाषा की नियति है। इसीलिए भाषा उपचार भी है और आघात भी।
जब हम किसी को नाम देते हैं, संबोधित करते हैं, परिभाषित करते हैं, तभी हम उसके लिए एक जगह तय कर देते हैं। ऐसे में भाषा केवल अभिव्यक्ति तक सीमित नहीं रहती, सत्ता का सूक्ष्म तंत्र बन जाती है। भाषा का प्रश्न, गहरे राजनीतिक और सामाजिक अर्थों से जुड़ा हुआ है। यही कारण है कि भाषा के प्रयोग और दुरुपयोग का प्रश्न आज पहले से कहीं अधिक जरूरी और प्रासंगिक हो गया है।
हम एक ऐसे समय में हैं जहाँ शब्द बहुत तेजी से चल रहे हैं, बल्कि कहें तो भाग रहे हैं, एक अंधी और अंतहीन दौड़ में। सोशल मीडिया की तात्कालिकता, प्रतिक्रियाओं की अधीरता और विचारों की असहिष्णुता ने भाषा को एक नए संकट में डाल दिया है। यहाँ अर्थ से अधिक ‘असर’, और संवाद से ज्यादा ‘प्रहार’ महत्त्वपूर्ण हो गया है। इसी पृष्ठभूमि में हाल के तीन प्रसंगों को देखा जाना जरूरी है, जो पहली नज़र में तो अलग-अलग दिखते हैं, लेकिन भीतर से एक ही सूत्र में बंधे हैं। इन तीनों प्रसंगों के बीच जो एक साम्य दिखाई पड़ता है, वह है भाषिक असावधानी और उसके परिणामस्वरूप उत्पन्न हिंसा।
सबसे पहले वरिष्ठ कथाकार ममता कालिया का वह वक्तव्य, जिसमें वे साहित्य अकादेमी पुरस्कार प्राप्ति के पश्चात एक इंटरव्यू में स्वयं को ‘गुलाबी फेमिनिस्ट’ बताती हुई ‘ब्लड रेड फेमिनिस्ट’ से अपनी भिन्नता और दूरी दिखाती हैं। वे शायद यह भूल गयीं कि साहित्य अकादेमी पुरस्कार मिलते हीं, उनके लिए सबसे अधिक खुश ये तथाकथित ‘ब्लड रेड फेमिनिस्ट’ अर्थात ‘रक्ताभ स्त्रीवादी स्त्रियां’ ही थीं। फिलहाल इस बात को यहीं छोड़ते हुए, ममता जी के वक्तव्य के बहाने भाषा के मुख्य मुद्दे पर लौटते हैं।
ऊपर-ऊपर देखें तो यह एक हल्का-फुल्का, लगभग आत्म-परिहासात्मक कथन जैसा था, जोकि उनकी स्वभाविक प्रवृत्ति भी है। लेकिन जब इस वाक्य को उस पूरी बातचीत के साथ पढ़ा जाए, विशेषकर वह कथन जिसमें वे कहती हैं कि आज की लड़की करियर के लिए ‘पीछे मुड़कर नहीं देखेगी’ तो यह स्पष्ट होता है कि यहाँ भाषा एक जटिल सामाजिक यथार्थ को सरल और लगभग सतही रूपक में बदल रही है। ‘गुलाबी’ और ‘लाल’, ये रंग यहाँ विचारधारात्मक सरलीकरण बन जाते हैं, परिहास मात्र नहीं रह जाते। स्त्री-विमर्श, जो अपने भीतर अनुभवों की अनेक परतें समेटे हुए है, उसे एक रंग-भेद में सीमित कर देना, क्या यह अनजाने में ही उसे कमतर नहीं कर देना है? यहाँ भाषा का मुलायमपन भी एक तरह की हिंसा बन जाता है, क्योंकि वह संघर्ष की जरूरत और उसकी तीव्रता को ढँक देता है।
सच कहें तो समस्या ‘गुलाबी’ या ‘लाल’ होने में कत्तई नहीं है, समस्या उस दृष्टिकोण में है जो स्त्री की स्वतंत्रता को एक सीमा के भीतर ही स्वीकार करना चाहता है, जहाँ वह संबंधों को बहुत न झकझोरे, व्यवस्था को बहुत न विचलित करे, और परिवार और या यूं कहिए कि पारिवारिक ढांचे और समाज के बीच अपना संतुलन बनाए रखे। यही कारण है कि जब करियर, संबंध या जीवन के विकल्पों के बीच नई स्त्री अपने निर्णय खुद लेती है, तो उसे एक तरह के भावनात्मक विच्छेद के रूप में देखा जाता है, मानो स्वतंत्रता का अर्थ संवेदनहीनता हो। संवेदनशील न होना हो। लेकिन क्या सचमुच ऐसा है?
सीमोन द बोऊआर के प्रसिद्ध कथन ‘स्त्री पैदा नहीं होती, बल्कि बना दी जाती है’ में इस पूरी बहस का केंद्र छिपा है। स्त्री के संदर्भ में ‘त्याग’, ‘ममता’, ‘समर्पण’ आदि मूल्य प्राकृतिक से ज्यादा सामाजिक निर्मितियाँ हैं। ऐसे में जब कोई स्त्री इन भूमिकाओं से बाहर निकलती है, तो वह असंवेदनशील नहीं हो जाती, वह बस निर्मित ढाँचे से बाहर आ रही होती है। यहीं पर ‘गुलाबी फेमिनिज़्म’ का संकट भी सामने आता है- यह उसी सामाजिक निर्माण यानी पितृसत्ता को बनाए रखते हुए थोड़ी-सी छूट देने या लेने की बात करता है। यानी ढाँचा जस का तस रहे, बस उसके भीतर थोड़ी हवा आ जाए।
राजेंद्र यादव और मन्नू जी की बात चलने पर इसी इंटरव्यू में वे कहती हैं – ‘मन्नू जी पर मैंने ‘उनका घर एक रौशनदान था’ संस्मरण लिखा था। उनके अंदर कोई ऐसी बात नहीं थी, जो गरिमा के विरुद्ध हो। हां, राजेंद्र यादव बड़े शरारती थे। उनके जीवन में आकर मैत्रेयी पुष्पा ने मन्नू जी का दांपत्य चौपट कर दिया। उसने राजेंद्र यादव के कहने पर देहवादी रचनाएं लिखीं।’ मन्नू जी-राजेन्द्र जी को निकट से जाननेवाले यह बखूबी जानते हैं कि मन्नू जी का घर मैत्रेयी पुष्पा की वजह से नहीं टूटा था, वह वजह कुछ और थी। पर मन्नू जी की पक्षधरता के बहाने राजेंद्र जी को गलियाने का लोगों का शौक बहुत पुराना और परखा हुआ है।
ये वही ममता कालिया हैं जो राजेंद्र यादव के हंस में छपनेवाली लेखिकाओं को उनकी ‘घाघरा पल्टन’ दशकों पहले कह चुकी हैं। वह भी, राजेन्द्र यादव के लेख ‘होना-सोना एक खूबसूरत दुश्मन के साथ’ की खातिर, जो मूलतः स्त्रियों के पक्ष में था, जिसकी भाषा ऊपर से मर्दवादी पर अपने गहरे अर्थों में बेहद व्यंजनात्मक थी। प्रश्न यह भी है उस आलेख की वक्रोक्तियों को जब आपने अमिधा में पढ़ा, तो फिर आपके कहे को क्यूं व्यंजना में न पढा जाये?
राजेंद्र यादव ने ‘हंस’ के माध्यम से स्त्री-विमर्श को जिस तरह जगह दी, वह किसी सुरक्षित संतुलन की खोज नहीं थी। वह एक असुविधाजनक हस्तक्षेप था, जिसने यह जोखिम उठाया कि बहस तीखी होगी, असहमति पैदा होगी और स्थापित नैतिकताओं के समक्ष उन्हें असहज करनेवाली चुनौतियाँ खड़ी होंगी। यह हुआ भी।
हिंदी साहित्य में अगर स्त्री-विमर्श सम्बंधी बहस को देखें तो राजेंद्र यादव और मैत्रेयी पुष्पा के हस्तक्षेप बिल्कुल अलग धरातल पर खड़े दिखाई देते हैं। यूं भी मैत्रेयी पुष्पा से उस पूरी पीढी की लेखिकाओं को दिक्कत रही है। दिक्कत होनी भी चाहिए, क्यूंकि मैत्रेयी पुष्पा के यहाँ यह स्पष्ट है कि उनकी स्त्रियाँ ‘गुलाबी’ नहीं हैं; वे मिट्टी, देह, भूख, आकांक्षा और विद्रोह से बनी हुई हैं। वे संबंध निभाती भी हैं, तो अपनी शर्तों पर; तोड़ती भी हैं, तो अपराध-बोध से नहीं, स्वेच्छा से। गांव-जवार से निकली ऐसी विद्रोही औरतें इस पूरी पीढी के लेखन में उस त्वरा के साथ अन्यत्र लगभग असंभव थीं, तो जलन स्वभाविक है, सहज भी। मैत्रेयी पुष्पा की रचनाओं की वे औरतें गुलाबी गैंग की महिलाएं नहीं, रक्ताभ स्त्रीवादी स्त्रियां हैं- आज की स्त्रीवादियों के बेहद करीब भी। इसलिए ममता कालिया के इस कथ्य का मर्म बखूबी समझा जा सकता है और उनकी पीड़ा भी…
ममता कालिया और मैत्रेयी पुष्पा दोनों ही मुझे बेहद प्रिय हैं और सदा रहेंगी। यह अलग है कि बनिस्बत मैत्रेयी पुष्पा मुझे ममता जी का सानिध्य सहज रूप से ज्यादा मिला है, वरिष्ठता की दूरी के बावजूद उनका दोस्ताना व्यवहार भी… शायद इसी कारण वे मुझे बहुत प्रिय भी हैं। पर बतौर लेखक-उपन्यासकार मैत्रेयी मुझे ज्यादा पसंद हैं। लेकिन उनेक अतिरेकी कथनों और बड़बोलेपन से कई बार नाइत्तेफाकी होती रही है, खासकर नयी लेखिकाओं के लिए इनके विद्वेषपूर्ण वक्तव्यों के लिए। अपनी दोनों वरिष्ठ लेखिकाओं के प्रति तमाम सम्मान के साथ जब भी ऐसे क्षण आए, मैंने उनका विरोध किया है, और आगे भी करूंगी। और वह भी बिना किसी भय और झिझक के…
खैर… फिर से भाषा के मूल मुद्दे पर लौटते हैं-
सवाल यह नहीं है कि ये सारे कथन जानबूझकर कहे गये या अनजाने में? सवाल यह है कि क्या यह भाषा अपने समय की जटिलता को ठीक से वहन कर पा रही है? यहाँ एक असहज करनेवाला प्रश्न भी उठता है- क्या उम्र मनुष्य को बड़बोला बना देती है? या फिर उम्र के साथ वह आंतरिक संकोच हट जाता है, जो पहले विचारों को संयमित करता था?
संभव है, दोनों में कुछ सच्चाई हो। लेकिन हर असावधान वक्तव्य को केवल ‘उम्र’ के खाते में डाल देना भी एक तरह का सरलीकरण ही है। कई बार ऐसे वक्तव्य यह भी उजागर करते हैं कि लेखक की वैचारिक ज़मीन कहाँ खड़ी है। यानी यह केवल ‘जुबान फिसलना’ नहीं, बल्कि भीतर के दृष्टिकोण का असावधानीवश खुलकर सामने आना भी हो सकता है, होता भी है।
दूसरा प्रसंग अविनाश मिश्र के ‘रविवासरीय प्रसंग’ के बहाने उनके और चंदन पांडेय के बीच चल रहे ताजा विमर्श का है, जिस क्रम में प्रयुक्त हुई भाषा ने इसे एक विवाद की शक्ल दे दी है। वरिष्ठ कथाकार आनंद हर्षुल ने तो अपनी मर्यादित भाषा के बावजूद, इसके बहाने एक पूरी पीढ़ी को ही निशाने पर लेकर इस विमर्श को एक नया ही कोण दे दिया है, मानो इस तरह के वाद-विवाद-संवाद पुरानी पीढ़ी के लेखकों के बीच हुए ही न हों। आलोचना के प्रति बढ़ती सहनशीलता के बीच, इस बात को भी याद रखा जाना चाहिए कि नई संचार व्यवस्था के कारण चीजें अब तुरंत सरेआम हो जाती हैं, जो पहले नहीं हुआ करती थीं। इसलिए पीढ़ी को लेकर निर्णयात्मक होना भी एक तरह की हड़बड़ी ही कही जाएगी।
ये सभी हमारे समय के जरूरी और प्रतिष्ठित लेखक हैं। अपने लेखन की बदौलत अर्जित इनके अपने-अपने प्रशंसक(वर्ग) भी हैं। लेकिन इस पूरी बहस के दौरान भाषा (खासकर इनके पक्षकारों की) का जो ‘उत्कर्ष’ और ‘स्खलन’, देखने को मिल रहा है, उसने तर्क, विवेक और तमीज को बहुत पीछे धकेल दिया है। विचार-विमर्श कहीं दूर जा चुके हैं और भाषा आरोपों की शक्ल में सीना ताने खड़ी है।
ऐसी स्थिति में पहुंचकर भाषा एक युद्ध-भूमि बन जाती है, जहाँ शब्द हथियार की तरह इस्तेमाल होते हैं। आरोप, कटाक्ष, व्यंग्य, ये सब मिलकर एक ऐसी स्थिति बनाते हैं, जहाँ संवाद की संभावना क्षीण हो जाती है। भाषा तीक्ष्ण, तेज और त्वरित होती है, लेकिन एक-दूसरे को काट खाने को आतुर होने की हद तक असंयमित।
अगर पहले प्रसंग में भाषा का मुलायमपन समस्या है, तो यहाँ उसका तीखापन।
तीसरा और सबसे चिंताजनक प्रसंग रूपम मिश्र की एक कविता ‘बड़कऊ हमहूं बोलब’ से जुड़ा है। उनकी कविता को जिस तरह पढ़ा गया, या यूँ कहें, जिस गलत तरीके से पढ़ा गया, वह हमारे समय की एक गंभीर बौद्धिक समस्या की ओर इशारा करता है।
साहित्य की भाषा अमिधा में नहीं, बल्कि संकेत (व्यंजना) में काम करती है। लेकिन जब किसी कविता को केवल सतही अर्थ में पकड़कर, उसे लेखक की जाति, पहचान या सामाजिक पृष्ठभूमि से जोड़कर देखा जाए, तो यह केवल आलोचना नहीं रह जाती, यह भाषिक हिंसा बन जाती है। रूपम मिश्र के मामले में यही हुआ। कविता की व्यंजना को नज़रअंदाज़ कर उसे अमिधा में सीमित किया गया, और फिर उसके आधार पर एक ऐसा विवाद खड़ा हुआ, जो अंततः एफ.आई.आर. तक पहुँच गया। यहाँ रचनात्मक भाषा की गलत समझ या फिर यह कहिए कि गलत तरीके से उसे देखने ने, एक रचनात्मक अभिव्यक्ति को अपराध में बदल दिया। यह किसी रचना-भाषा को ‘मिस इंटरप्रेट’ किये जाने की समस्या है। उसे व्यंजना से अधिक अमिधा में लिए जाने की भाषिक चतुराई और फिर उसे लेखक के जातिगत पहचान से जोड़ दिया जाना। यह कविता जिन अत्याचारों के खिलाफ थी और जिनके साथ वो खड़ी थी, इस तरह वो उनके विरुद्ध खड़ी हुई दिखती है। यह एक चालाक विश्लेषण है, किसी कवि या कविता की धार को भोंथरा करने और उसे उसी के खिलाफ इस्तेमाल करने के लिए, उसे निर्वाक करने हेतु। इस प्रसंग को समझने के लिए एक बार उस कविता के उस अंश को भी देखा जाना चाहिए
‘रूढ़ियों और मिरजई में बंधे
एक महाकाव्य के जादू को
तार-तार करते जब मैं
कविता की जमीन पर
सिर तान कर खड़ी हुई
तो वे बोली की सबसे भद्दी गाली बुदबुदाते हुए हँसे
ये गाली उन्होंने अपने पिता से सीखी थी
और पिता ने अपने पिता से
अर्थात वहाँ पिता जो गाली माँओं को देते
उनके बच्चे उसे भाषा के पहले शब्द की तरह सीख लेते
इस तरह बपंसी में मिलता स्त्री डाह उनके साथ उनकी यूनिवर्सिटी भी गया
जहाँ उन्होंने उसे अकेडमिक्स से नहलाया-धुलाया
और अंग्रेजी का तेल-फुलेल लगाया
भाषा मेरे लिए औजार भर थी
जिसे मैंने उनके लिए सुरक्षित छोड़ दिया
और अपनी बोली-ठोली में कहा- “बड़कऊ हमहूँ बोलब!”
जल तो उनका सर्वांग गया
लेकिन मूंछों पर ही हाथ फेरते हुए उन्होंने हँसकर कहा –
‘केहू रोकत कहाँ बा!’
और उसी घरी उन्होंने मन में
सदी भर की डाह से सनी किरिया खाई
और बोली के सबसे क्रूर पठारों पर दौड़ लगाई
उनकी दुनिया में
माएँ कितनी कम होती हैं
जहाँ पिता के पेशाब का हलफ उठाया जाता है
लेकिन हाय!
समय की मार
कि अवध में औरत को गरियाने के लिए अकेडमिक्स का सहारा लेना पड़ रहा है-
“नाश हो संविधान रचने वाले उस चमार का
जिसके कारण औरतें आग मूत रहीं हैं”
क्या इस कविता को पढ़ते हुए ‘कथित आपत्तिजनक अंश’ के साथ लगे इनवर्टेड कॉमा पर ध्यान नहीं दिया जाना चाहिए था? सामान्य बोलचाल और उसके रचनात्मक उपयोग का अर्थ क्या ‘इन्टेन्ट’ की अनदेखी कर सिर्फ ‘कंटेन्ट’ के आधार पर तय किया जा सकता है? यदि इन संदर्भों के साथ इसे पढ़ें, तो एक खास समुदाय के खिलाफ समझा गया पाठ उचित नहीं लगेगा।
भाषा का सबसे खतरनाक रूप वह है, जो भाषिक हिंसा को हिंसा मानने से इंकार करता है। ऐसे हीं जब हम किसी रचना को अभिधा में बाँध देते हैं, तो हम उसमें बसी संभावनाओं की हत्या कर देते हैं। भाषा जब संवाद से हटकर वर्चस्व का औज़ार बनती है, तो विचार सबसे पहले घायल होता है।
भाषा का दुरुपयोग केवल गलत शब्दों से नहीं, गलत पढ़ने से भी होता है। मंटो पर अश्लीलता के आरोप इसलिए नहीं लगे कि वे अश्लील लिखते थे, बल्कि इसलिए लगे कि समाज उनकी रचनाओं को अभिधा में पढ़ रहा था, जबकि वे व्यंजना में समाज की कुरूपता उजागर कर रहे थे।
यही गलती मुक्तिबोध और अज्ञेय के साथ हुई। किसी की कविता के बिम्ब को दुरूह कहा गया तो अन्य की भाषा को कठिन कहकर खारिज किया गया। और सभी बाद में ख्यात हुए और लोकप्रिय भी…इससे एक बात साफ़ होती है- भाषा का संकट केवल लेखक का नहीं, पाठक का भी होता है।
खैर….
इन तीनों प्रसंगों को साथ रखकर देखें, तो यहां एक गहरी समानता दिखाई देती है। भाषा का असावधान प्रयोग, उससे उत्पन्न अनर्थ और रचनात्मक भाषा को ठीक से नहीं समझ सकने की सलाहियत। एक ओर ‘गुलाबी फेमिनिज़्म’ जैसा सरलीकरण है, दूसरी ओर आरोपात्मक और असंयमित भाषा का उग्र रूप और तीसरी ओर रचनातंक अभिप्राय को समझे बिना शब्दों की गलत या सतही व्याख्या से पैदा हुआ संकट। तीनों ही स्थितियों में भाषा अपने मूल उद्देश्य; यानी स्वस्थ संवाद और सम्बंधों के सहज निर्वहन से दूर चली जाती है।
भाषा केवल शब्दों का संयोजन नहीं होती। यह एक सामूहिक और सामाजिक जिम्मेदारी भी है। वह जितनी हमारी अभिव्यक्ति है, उतनी ही हमारी समझ का प्रमाण भी। अगर हम भाषा को सावधानी से नहीं बरतेंगे, या उसे उसकी जटिलता में नहीं समझेंगे, या उसे सिर्फ किसी हथियार की तरह बरतेंगे तो वह संवाद का माध्यम नहीं, अनर्थ का कारक बन जाएगी।
एक सबसे जरूरी और आखिरी बात- भाषिक हिंसा हमेशा चिल्लाकर नहीं आती। वह कई बार मुस्कुराते हुए, मज़ाक में, या सहज टिप्पणी के रूप में भी आ सकती है, आती है। कई बार तो वह हमारे सबसे अच्छे इरादों के भीतर भी छिपी होती है। इसलिए बोलने और लिखने से पहले शब्दों को परखना और उनके संभावित प्रभावों का आकलन करना भी बहुत ज़रूरी है। जरूरी यह भी है कि हम केवल यह न देखें कि क्या कहा गया, बल्कि यह भी देखें कि कैसे कहा गया और इसका मंतव्य क्या था। क्योंकि भाषा कभी निरपेक्ष या तटस्थ नहीं होती। वह या तो दुनिया को थोड़ा बेहतर बनाती है या उसे थोड़ा और कठोर। भाषा दुनिया को समझती-संभालती ही नहीं, कभी-कभी उसे तोड़ती भी है।
इसलिए हमारे समय की सबसे बड़ी त्रासदी यह नहीं कि वर्तमान समय में भाषा कठोर हो गई है, याकि उसका इस्तेमाल धारदार हथियारों की तरह होने और किया जाने लगा है, बल्कि वह यह है कि हम उसे समझना छोड़ते जा रहे हैं और ढंग से बरतना भी।

