नई दिल्लीः सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार (19 फरवरी) को कहा कि नागरिकता संशोधन अधिनियम (सीएए) को लेकर दायर की गई याचिकाओं पर सुनवाई इस साल मई महीने में होगी।
सीजेआई सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाला बागची और जस्टिस विपुल पंचोली की पीठ ने वकीलों से पूछा कि वे अपनी दलीलें पेश करने में कितना समय लेंगे।
सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?
सुप्रीम कोर्ट ने कहा “सीएए 2019 को चुनौती देने वाले दो प्रकार के मामले हैं। इन मामलों को दो समूहों में वर्गीकृत किया गया है: असम-त्रिपुरा और बाकी पूरा देश। नियुक्त नोडल वकील पहले और दूसरे समूह में आने वाले मामलों की पहचान करेंगे और सूची दो सप्ताह के भीतर रजिस्ट्री को प्रस्तुत की जाएगी। इसके बाद रजिस्ट्री इन्हें दो श्रेणियों में विभाजित करेगी और 5 मई, 2026 से शुरू होने वाले सप्ताह में अंतिम सुनवाई के लिए इन्हें क्रमानुसार सूचीबद्ध किया जाएगा। याचिकाकर्ताओं की सुनवाई 5 मई को पहले पखवाड़े में फिर 6 मई को दूसरे पखवाड़े में और फिर 7 मई को प्रतिवादियों की सुनवाई होगी और 12 मई को प्रत्युत्तर प्रस्तुत किया जाएगा।”
गौरतलब है कि सीएए को लेकर 243 याचिकाएं दायर की गईं थीं। यह अधिनियम 11 दिसंबर 2019 को संसद से पारित हुआ था। इसके अगले दिन इसे राष्ट्रपति का अनुमोदन मिला था। उसी दिन आईयूएमएल ने नियम को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट का रुख किया था। इसके बाद बड़ी संख्या में इसको लेकर याचिकाएं दायर की गईं थीं।
सीएए और इसके नियमों का उद्देश्य पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान से 31 दिसंबर 2014 या उससे पहले भारत आए हिंदुओं, जैनियों, ईसाइयों, सिखों, बौद्धिकों और बौद्धों और पारसियों को नागरिकता प्रदान करना है।
सीएए नागरिकता अधिनियम, 1995 की धारा-2 को संशोधित करती है जो ‘अवैध प्रवासियों’ को परिभाषित करती है। इस अधिनियम ने नागरिकता अधिनियम की धारा 2(1)(ख) में एक नया प्रावधान जोड़ा। इसके मुताबिक अफगानिस्तान, बांग्लादेश या पाकिस्तान से संबंधित हिंदू, सिख, बौद्ध, जैन, पारसी या ईसाई समुदायों के वे व्यक्ति जिन्हें केंद्र सरकार द्वारा पासपोर्ट (भारत में प्रवेश) अधिनियम, 1920 या विदेशी अधिनियम, 1946 के तहत छूट दी गई है, उन्हें “अवैध प्रवासी” नहीं माना जाएगा। परिणामस्वरूप ऐसे व्यक्ति 1955 के अधिनियम के तहत नागरिकता के लिए आवेदन करने के पात्र होंगे।
मुस्लिम समुदाय को प्रावधानों से रखा गया बाहर
हालांकि कानून में विशेष रूप से मुस्लिम समुदाय को इस प्रावधान से बाहर रखा गया है जिससे पूरे देश में विरोध प्रदर्शन हुए और सुप्रीम कोर्ट में कई याचिकाएं दायर की गईं।
याचिकाकर्ताओं ने नियमों के खिलाफ दायर याचिका में कहा कि सीएए धर्म के आधार पर मुसलमानों के साथ भेदभाव करता है। यह तर्क दिया गया है कि इस प्रकार का धार्मिक अलगाव बिना किसी उचित भेदभाव के है और अनुच्छेद -14 के तहत समानता के अधिकार का उल्लंघन करता है।
18 दिसंबर 2019 को सुप्रीम कोर्ट ने भारत सरकार को इन चुनौतियों के विषय में नोटिस जारी किया था। हालांकि, अदालत ने रोक नहीं लगाई क्योंकि नियम अधिसूचित नहीं किए गए थे। इसका अर्थ था कि यह अधिनियम अधर में लटका हुआ था।
हालांकि, सरकार ने 11 मार्च 2024 को अचानक से एक कदम उठाते हुए इन नियमों को अधिसूचित कर दिया जिससे सीएए प्रभावशाली तरीके से लागू हो गया।
इसके चलते अधिनियम और नियमों पर रोक लगाने के लिए न्यायालय में कई आवेदन दायर किए गए। उसी महीने सुप्रीम कोर्ट ने नागरिकता संशोधन नियमों पर रोक लगाने की याचिका पर केंद्र सरकार से जवाब मांगा लेकिन अंतरिम रोक लगाने से इनकार कर दिया।

