नई दिल्लीः सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार, (10 फरवरी) को याचिकाकर्ता द्वारा दायर याचिका जिसमें चुनावी खर्च कम करने के उपायों की गई थी, पर चुनाव आयोग से विचार करने को कहा है। इस याचिका में चुनावी खर्च कम करने के कुछ सुझाव भी दिए गए थे जिस पर अदालत ने विचार करने को कहा।
याचिकाकर्ता द्वारा दिए गए सुझावों को “विचारणीय” मानते हुए, भारत के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत , जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस एनवी अंजारिया की पीठ ने प्रभाकर देशपांडे द्वारा दायर जनहित याचिका का निपटारा किया।
सीजेआई सूर्यकांत ने क्या टिप्पणी की?
इस मामले पर सुनवाई शुरू होते ही सीजेआई कांत ने मौखिक रूप से टिप्पणी की कि याचिकाकर्ता ने एक प्रासंगिक मुद्दा उठाया है। उन्होंने कहा, “यह मुद्दा बहुत दिलचस्प है लेकिन अगर हम इस पर कुछ कहेंगे तो यह अतिशयोक्ति हो सकती है। भारत निर्वाचन आयोग को कुछ दिशा-निर्देश तय करने होंगे। याचिकाकर्ता ने चुनाव में होने वाले अत्यधिक खर्च को रोकने के लिए एक व्यापक कार्य योजना की मांग की है। सैद्धांतिक रूप से हम इससे सहमत हैं।”
जब पीठ को बताया गया कि चुनाव खर्च पर “सीमाएं” लगाई गई हैं तो जस्टिस बागची ने हल्के-फुल्के अंदाज में टिप्पणी की, “सीमाओं में भी खामियां होती हैं।” याचिकाकर्ता ने बताया कि 2024 के चुनाव के लिए खर्च चुनाव आयोग द्वारा निर्धारित सीमाओं से 100 गुना अधिक था।
याचिकाकर्ता ने चुनाव आयोग को चुनाव खर्च पर मौजूदा सीमा की फिर से जांच करने का निर्देश देने की भी मांग की। याचिका में तर्क देते हुए कहा गया कि वर्तमान सीमाएं स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित करने में विश्वसनीयता और प्रभावशीलता खो चुकी हैं, जिससे लोकतांत्रिक सुधार कमजोर हो रहे हैं।
मंगलवार को हुई सुनवाई के दौरान अदालत ने गौर किया कि याचिकाकर्ता की मुख्य शिकायत यह प्रतीत होती है कि चुनाव आयोग ने चुनाव अभियानों के दौरान चुनावी कदाचार और अनियंत्रित खर्च को रोकने के लिए समय पर और प्रभावी कार्रवाई नहीं की थी।
चुनाव आयोग की तरफ से वरिष्ठ अधिवक्ता दामा शेषाद्रि ने रखा पक्ष
इस मामले में चुनाव आयोग की तरफ से वरिष्ठ अधिवक्ता दामा शेषाद्रि नायडू ने पक्ष रखा। उन्होंने अदालत को बताया कि चुनाव व्यय की निगरानी और नियमन के लिए पहले से लागू उपायों का विवरण देते हुए एक प्रति-हलफनामा दायर किया गया है। चुनाव आयोग ने बताया कि चुनावों के दौरान व्यय पर्यवेक्षकों को तैनात किया जाता है और उम्मीदवारों और राजनीतिक दलों द्वारा किए गए खर्चों पर नजर रखने के लिए विशेष लेखा दल गठित किए गए हैं। आयोग ने अदालत को यह भी सूचित किया कि प्रवर्तन ढांचे के अंतर्गत कॉल सेंटर और अन्य निगरानी तंत्र भी स्थापित किए गए हैं।
सीजेआई ने नायडू से कहा कि चुनाव आयोग इसे “विरोधी मुकदमेबाजी” के रूप में न ले। नायडू ने आश्वासन दिया कि चुनाव आयोग मौजूदा ढांचे में सुधार के लिए याचिकाकर्ता द्वारा दिए गए सुझावों पर विचार करने के लिए तत्पर रहेगा।
चुनाव आयोग की दलीलों पर ध्यान देते हुए, पीठ ने पाया कि वैधानिक प्राधिकरण ने चुनाव व्यय की निगरानी के लिए पहले से ही एक संस्थागत तंत्र स्थापित कर रखा है। हालांकि, इसने याचिकाकर्ता द्वारा मौजूदा ढांचे को मजबूत करने के उद्देश्य से दिए गए स्वतंत्र सुझावों पर भी विचार किया।
अदालत ने टिप्पणी की कि “उपरोक्त रिपोर्ट से अलग याचिकाकर्ता ने कुछ सुझाव दिए हैं। हमारा मानना है कि चुनाव प्रक्रिया के दौरान कदाचार को रोकने के लिए चुनाव आयोग द्वारा गठित विभिन्न समितियों द्वारा इन सुझावों पर विचार किया जाना चाहिए।”
अदालत ने अपने आदेश में कहा कि “हम याचिका का निपटारा करते हुए चुनाव आयोग को निर्देश देते हैं कि वह याचिकाकर्ता द्वारा दिए गए सुझावों को विभिन्न समितियों के सदस्यों के बीच प्रसारित करे जिनका विवरण प्रतिवाद में प्रस्तुत किया गया है। यदि सुझाव उपयोगी पाए जाते हैं तो समितियां उन्हें अपने मानक संचालन प्रक्रिया (एसओपी) में शामिल कर सकती हैं। याचिकाकर्ता आगे भी अभ्यावेदन प्रस्तुत करने के लिए स्वतंत्र होगा।”

