24 दिसंबर 1999 को काठमांडू–दिल्ली की इंडियन एयरलाइंस की फ्लाइट संख्या 814 को शाम 4 बजे कश्मीरी आतंकवादियों ने हथियारों के बल पर अपहृत कर लिया था। विमान में 11 क्रू मेंबर सहित 190 यात्री सवार थे। पांच आतंकवादियों ने विमान को अमृतसर, लाहौर, दुबई और फिर कंधार ले जाया। इस दौरान हाल ही में विवाह हुए एक यात्री की हत्या कर दी गई और छह लोग घायल हुए।
मैं उस समय कश्मीर की राजधानी श्रीनगर में टाइम्स ऑफ इंडिया के विशेष प्रतिनिधि के रूप में कार्यरत था। कुछ महीने पहले ही कारगिल युद्ध भी हुआ था।
विमान में फंसे यात्री करीब एक सप्ताह तक बंधक बने रहे और 31 दिसंबर 1999 को तब राहत की सांस ली, जब यात्रियों की जान बचाने के लिए आतंकवादियों की मांग मानते हुए कोट भलवाल जेल में 1993 से बंद आतंकी मसूद अजहर, उमर शेख और मुश्ताक जरगर को रिहा कर दिया गया। इन तीनों को तत्कालीन विदेश मंत्री जसवंत सिंह और नागरिक उड्डयन मंत्री शरद यादव के साथ कंधार ले जाया गया और अपहरणकर्ताओं को सौंप दिया गया।
अपहृत यात्रियों में मेरे पुराने मित्र और उस समय भोपाल में पदस्थ वन मंडल अधिकारी ए.के. भट्टाचार्य भी शामिल थे। भोपाल के एक स्कूल में उनकी बेटी नौवीं कक्षा की छात्रा थी। प्रधानमंत्री कार्यालय में भोपाल के ही एक अधिकारी ने इस छात्रा का इंटरव्यू करवाया, जिसे दूरदर्शन पर प्रसारित किया गया। इस बच्ची ने अपील की थी, “मेरे पापा-मम्मी भले न छूटें, लेकिन आतंकवादी नहीं छोड़े जाने चाहिए।”
मैंने श्रीनगर से अपने कार्यालय को एक स्टोरी फैक्स की, जिसमें स्पष्ट लिखा था कि कश्मीर के मुख्यमंत्री फारूक अब्दुल्ला के कड़े विरोध के बावजूद केंद्र सरकार द्वारा भेजे गए रॉ प्रमुख ए.एस. दुलत के निर्देश पर जम्मू की कोट भलवाल जेल में बंद तीन आतंकवादियों को रिहा किया जा चुका है और उन्हें भारतीय वायु सेना के विशेष विमान से दिल्ली भेज दिया गया है। इस विशेष बैठक में राज्यपाल और मुख्यमंत्री भी मौजूद थे। एक बिहारी मूल के अधिकारी, जिनके यहां मैं अक्सर चाय पीने जाता था, ने मुझे बैठक की पूरी जानकारी दी थी। मैंने अपनी रिपोर्ट में पूरा विवरण, किसने क्या कहा, साफ-साफ लिख दिया था।
कुछ देर बाद टाइम्स न्यूज सर्विस के संपादक मनमोहन का फोन आया। उन्होंने नाराजगी भरे लहजे में शिकायत की कि पाड़गांवकर (संपादक) की अभी बृजेश मिश्र (प्रधानमंत्री के प्रमुख सचिव) से बात हुई है। पाड़गांवकर ने टीवी पर भी कहा है कि भारत सरकार नहीं झुकेगी और आतंकवादियों को रिहा नहीं किया जाएगा।
मैंने जवाब दिया, “आप किसी रिपोर्टर को दिल्ली हवाई अड्डे पर भेज दीजिए। जो तीन आतंकवादी यहां से रिहा हुए हैं, वहीं मिल जाएंगे। और सभी संपादकों को निर्देश दीजिए कि मेरी रिपोर्ट से कोई छेड़छाड़ न की जाए।”
प्रधानमंत्री के उच्च अधिकारी एक बड़े संपादक को भी भ्रमित कर रहे थे और रॉ प्रमुख का यह फैसला भारी पड़ा।
कंधार कांड के बाद ही देश के हवाई अड्डों की सुरक्षा की जिम्मेदारी केंद्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल (CISF) को दी गई। इससे पहले हवाई अड्डों की सुरक्षा केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल या राज्य पुलिस के हाथों में होती थी।

