चेन्नई: लोकसभा में विपक्ष के 100 से ज्यादा सांसदों ने मंगलवार को स्पीकर ओम बिरला को मद्रास हाईकोर्ट के मद्रास हाई कोर्ट के जस्टिस जीआर स्वामीनाथन को हटाने के लिए एक प्रस्ताव पेश करने का नोटिस सौंपा। यह मामला तमिलनाडु में एक पहाड़ी पर स्थित एक पत्थर के खंभे पर पारंपरिक दीया जलाने की अनुमति देने वाले उनके आदेश से जुड़ा है। राज्य में डीएमके के नेतृत्व वाली सरकार ने आदेश की आलोचना की है। इस स्थान को लेकर अरुलमिघु सुब्रमण्य स्वामी मंदिर और पास की दरगाह के बीच विवाद चल रहा है।
आदेश देने वाले जज पर सवाल उठाते हुए कांग्रेस, डीएमके और समाजवादी पार्टी समेत 107 सांसदों ने उस आवेदन पर हस्ताक्षर किए हैं जिसमें जस्टिस स्वामीनाथन पर कदाचार का आरोप लगाते हुए कहा गया है कि उनके कामकाज ने न्यायपालिका की ‘निष्पक्षता, पारदर्शिता और धर्मनिरपेक्ष प्रवृति’ पर सवाल खड़े किए हैं।
मद्रास उच्च न्यायालय के जज के खिलाफ विपक्ष द्वारा दायर नोटिस में एक आधार यह भी रखा गया है कि न्यायाधीश ‘एक विशेष राजनीतिक विचारधारा के आधार पर और भारतीय संविधान के धर्मनिरपेक्ष सिद्धांतों के विरुद्ध मामलों का फैसला कर रहे हैं।’ डीएमके सांसद कनिमोझी ने ओम बिरला को नोटिस सौंपा। उनके साथ कांग्रेस की प्रियंका गांधी और गौरव गोगोई सहित सपा के अखिलेश यादव भी मौजूद थे।
मद्रास हाई कोर्ट के फैसले की आलोचना कर रहा विपक्ष
जज पर एक वरिष्ठ अधिवक्ता और एक विशेष समुदाय के वकीलों के साथ ‘अनुचित पक्षपात’ करने का भी आरोप विपक्ष की ओर से लगाया गया है। हस्ताक्षर करने वालों में एनसीपी (शरद पवार) की सुप्रिया सुले और AIMIM के असदुद्दीन ओवैसी भी शामिल हैं।
किसी न्यायाधीश को हटाने के प्रस्ताव का समर्थन करने के लिए कम से कम 100 सांसदों की आवश्यकता होती है, और अब बिड़ला को उन बातों का अध्ययन करना होगा जिनके आधार पर उन्हें हटाने का प्रस्ताव प्रस्तुत किया गया है।
बता दें कि कोर्ट के फैसले के बाद डीएमके ने पिछले सप्ताह लोकसभा में इस मुद्दे को उठाया। पार्टी सांसद टीआर बालू ने भाजपा पर राज्य में सांप्रदायिक तनाव भड़काने की कोशिश करने का आरोप लगाया, जहां कुछ ही महीनों में चुनाव होने वाले हैं। दूसरी ओर केंद्रीय मंत्री और भाजपा सांसद एल मुरुगन ने पलटवार करते हुए राज्य सरकार पर श्रद्धालुओं के पूजा-पाठ के अधिकार से वंचित करने का आरोप लगाया।
बालू द्वारा लोकसभा में जस्टिस स्वामीनाथन की ‘एक विशेष विचारधारा’ के प्रति निष्ठा रखने की आलोचना पर सरकार की ओर से तीखी प्रतिक्रिया आई। केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू ने जोर देकर कहा कि न्यायपालिका पर इस तरह लांछन नहीं लगाया जा सकता।
क्या है कोर्ट का फैसला, जिस पर शुरू हुआ विवाद?
दरअसल, एक याचिका की सुनवाई करते हुए, जस्टिस जीआर स्वामीनाथन ने 1 दिसंबर को फैसला सुनाया था कि अरुलमिघु सुब्रमण्य स्वामी मंदिर का यह कर्तव्य है कि वह दरगाह के पास तिरुपरनकुंड्रम पहाड़ी पर स्थित पत्थर के दीपक स्तंभ ‘दीपातून’ पर दीपक जलाए।
जब अधिकारियों ने इसकी अनुमति नहीं दी, तो एकल पीठ ने 3 दिसंबर को एक और आदेश पारित कर श्रद्धालुओं को स्वयं दीपक जलाने की अनुमति दी और केंद्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल को उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करने का निर्देश दिया।
हालांकि, राज्य सरकार ने इस आदेश का पालन नहीं किया और फैसले को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की है। हाई कोर्ट की मदुरै पीठ ने पिछले सप्ताह मदुरै जिला कलेक्टर और शहर पुलिस आयुक्त द्वारा दायर अपील को खारिज कर दिया था।

